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विदुर नीति

अश्विनी पाराशर

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2002
आईएसबीएन : 81-284-0030-4 पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : पेपरबैक पुस्तक क्रमांक : 3697

महाभारत के विदुर के सम्बन्ध की चर्चा इस पुस्तक में हुई है....

Vidur niti

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

निवेदन

जीवन-जगत के व्यवहार में राजा और प्रजा के दायित्वों की विधिवत् नीति की व्याख्या करने वाले महापुरुषों ने महात्मा विदुर सुविख्यात हैं। उनकी विदुर-नीति वास्तव में महाभारत युद्ध से पूर्व युद्ध के परिणाम के प्रति शंकित हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के साथ उनका संवाद है। विदुर जानते थे, युद्ध विनाशकारी होगा। महाराज धृतराष्ट्र अपने पुत्र (दुर्योधन) मोह में समस्या का कोई सरल समाधान नहीं खोज पा रहे थे। वह अनिर्णय की स्थिति में थे। दुर्योधन अपनी हठ पर अड़ा था। दुर्योधन की हठ-नीति विरुद्ध थी। पाण्डवों ने द्यूत की शर्त के अनुसार बारह वर्ष के बनवास और एक वर्ष की अज्ञातवास अवधि पूर्ण करने का बाद जब अपना राज्य वापिस माँगा तो...दुर्योधन के हठ के सम्मुख असहाय एवं पुत्र मोह से ग्रस्त महाराज धृतराष्ट्र के पाण्डवों के दूत कोई निर्णायक उत्तर नहीं दे सके। केवल इतना आश्वस्त किया कि वह सबसे परामर्श करके संजय द्वारा अपना निर्णय प्रेषित कर देंगे। संजय के माध्यम से भेजा गया संदेश भी कोई निर्णायक संदेश नहीं था। उसमें इतना कहा गया था कि वे ऐसा कार्य करें जिससे भरतवंशियों का हित हो और युद्ध न हो।

पाण्डवों की सभा में संजय का कथन सुनकर देवकीनन्दन कृष्ण ने सब विधि से सोच-विचार कर अपने धर्म विवेक से इतना कहा—‘‘संधि या युद्ध का निर्णय युधिष्ठिर के हाथों में नहीं, महाराज धृतराष्ट्र के निर्णय के अधीन है। वह इसे परामर्श या चुनौती कुछ भी मान सकते हैं। हमारा आशय परामर्श से है, चुनौती से नहीं।’’
संजय की वापसी जिस समय हुई, दिन ढल चुका था। महाराज धृतराष्ट्र युधिष्ठिर से हुई बातचीत का ब्यौरा जानने के लिए उत्सुक थे। जबकि संजय का मत था कि सारी बातें अगले दिन राज्यसभा में सबके सामने की जाए तो उत्तम होगा। यही सोचकर संजय महाराज धृतराष्ट्र को सांत्वना देकर घर लौट गया।

महाराज धृतराष्ट्र उद्विग्न हो रहे थे। संजय ने कोई बात उन्हें स्पष्ट रूप से नहीं बताई थी। उनकी चिन्ता का विषय था, युधिष्ठिर का निर्णय। वास्तव में महाराज धृतराष्ट्र अनिश्चय से घिर गए थे। कहना बड़ा कठिन था कि युधिष्ठिर के पास से संजय क्या समाचार लाए हैं ? उनके मन का चोर उन्हें व्याकुल किये हुए था। प्रश्न यह था कि—वह अपने मन की दशा किस के सामने प्रकट करें ? और अन्ततः इस अनिश्चय और शंका की घड़ी में वह अपने परम आत्मीय विदुर को ही याद करते हैं।
विदुर ने द्यूत क्रीड़ा के समय महाराज धृतराष्ट्र को चेताया था कि यदि यह खेल समाप्त नहीं किया गया तो अनर्थ हो जाएगा। हस्तिनापुर विनाश के कगार पर जाने से नहीं बच पाएगा और महाराज भौतिक रूप से नेत्रहीने होते हुए भी देख नहीं पा रहे थे, विदुर के समझाने पर भी नहीं समझ पाए। वह पुत्र मोह-पाश से मुक्त नहीं हो पाए। उन्हें अनुभव हो गया—यह दिन तो आना ही था।
महाविनाश की आधारशिला रखी जाने से पूर्व सशंकित धृतराष्ट्र द्वारा विदुर को बुलाकर उनसे विचार-विमर्श करना और विदुर का महाराज धृतराष्ट्र की भूमिका का उल्लेख करते हुए उन्हें उनके दायित्व का बोध कराने के लिए दिया गया नीतिगत उपदेश ही वास्तव में महर्षि वेदव्यास रचित ‘महाभारत’ में उद्योग पर्व में ‘विदुर नीति’ के रूप में वर्णित है।

कैसा विचित्र संयोग था विदुर और महाराज धृतराष्ट्र के बीच। विदुर अपनी नीति से बंधे हुए थे और धृतराष्ट्र अपने मोह में फंसे हुए थे। विदुर स्वयं को कहने से रोक नहीं पाए और महाराज धृतराष्ट्र विदुर के परामर्श मान नहीं पाए। महाराज धृतराष्ट्र के इस संशय और पुत्र-मोह का परिणाम था ‘महाभारत’ का भीषण विनाशकारी युद्ध।

-अश्विनी पाराशर


विदुर कथा



‘महाभारत’ की कथा के महत्त्वपूर्ण पात्र विदुर कौरव-वंश की गाथा में अपना विशेष स्थान रखते हैं। और विदुर नीति जीवन-युद्ध की नीति ही नहीं, जीवन-प्रेम, जीवन-व्यवहार की नीति के रूप में अपना विशेष स्थान रखती है। राज्य-व्यवस्था, व्यवहार और दिशा निर्देशक सिद्धांत वाक्यों को विस्तार से प्रस्तावना करने वाली नीतियों में जहां चाणक्य नीति का नामोल्लेख होता है, वहां सत्-असत् का स्पष्ट निर्देश और विवेचन की दृष्टि से विदुर-नीति का विशेष महत्त्व है। व्यक्ति वैयक्तिक अपेक्षाओं से जुड़कर अनेक बार नितान्त व्यक्तिगत, एकेंद्रीय और स्वार्थी हो जाता है, वहीं वह वैक्तिक अपेक्षाओं के दायरे से बाहर आकर एक को अनेक के साथ तोड़कर, सत्-असत् का विचार करते हुए समष्टिगत भाव से समाज केंद्रीय या बहुकेंद्रीय होकर परार्थी हो जाता है।

 ‘स्व’ का ‘पर’ विस्तार रही सत्य में मनुष्य धर्म का प्रमुखतः अपेक्षित पक्ष होता है। चाणक्य ने इसे स्पष्टतया समाज धर्म के आलोक में देख-परख कर प्रस्तुत किया है और विदुर ने अपने समय के संदर्भ में न्यायसंगत पक्षधरता के साथ निर्भय होकर व्यक्त किया है। चाणक्य निर्णायक स्थिति में व्याख्याता थे, जब कि विदुर अपनी वैयक्तिक-स्थितिगत सीमाओं से परिचित, परिचालित विनम्र निवेदन के रूप में प्रस्तावना करते हैं। चाणक्य में निर्देश एवं आदेश का भाव है, जबकि विदुर अपने विचार सत् परामर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

विदुर एक तरह से हस्तिनापुर राज-परिवार का सदस्य होकर ही दासी पुत्र के नाते अधिकार-रूप में कुछ भी कह पाने की दशा में नहीं थे। यह तो राजपरिवार का अनुग्रह और विदुर का तटस्थ सत्य स्थापन, ज्ञान और धर्म में रुचि का प्रभाव था कि सामान्य होकर भी उन्हें विशिष्ट रूप में उन्हें सदैव सम्मान मिला। भीष्म, माता सत्यवती, धृतराष्ट्र अपने जीवनकाल तक पाण्डु, युधिष्ठिर आदि भाई, कृष्ण, गान्धारी, कुन्ती और आचार्य द्रोण, कृपाचार्य आदि सभी उनको यथोचित मान-सम्मान देते रहे और विदुर भी समय-समय पर अपने सत् परामर्श से हस्तिनापुर राज्य की यथा संभव सेवा करते रहे।

विदुर कौन थे ? यह प्रश्न स्वयंमेव विदुर की स्थिति को प्रकट करने वाला सबल पक्ष है। हम इसी तथ्य से भली भांति परिचित हैं कि हस्तिनापुर के महाराज शान्तनु का निषाद पुत्री सत्यवती के प्रति आसक्ति और उनके विवाह में निषाद की यह शर्त कि सत्यवती का पुत्र ही युवराज होगा—यही बात महाराज शान्तनु को भीतर तक आहत कर गयी। वह गंगा-पुत्र देवव्रत के अधिकार को कैसे दांव पर लगा सकते थे ? गंगा-पुत्र देवव्रत ने पिता की चिन्ता का कारण जानकर स्वयं निषादराज के समक्ष प्रतिज्ञा की  कि ‘निषादराज ! तुम्हारी कन्या के गर्भ से उत्पन्न पुत्र ही हस्तिनापुर के राज्य का उत्तराधिकारी होगा।’’ इस बात पर भी निषादराज का संशय समाप्त न हुआ। उन्होंने कहा, ‘‘यदि तुम्हारा पुत्र मेरी सत्यवती के पुत्र से राज्य छीन ले ? देवव्रत ने यह आशय जानकर कहा, ‘निषादराज मैं अजन्म ब्रह्मचर्य का पालन करने का भीष्मव्रत लेता हूँ।’’ यह सुनकर निषादराज ने महाराज शान्तनु के साथ अपनी राजकन्या सत्यवती के विवाह के लिए कोई आपत्ति नहीं की। देवव्रत भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

राजकुमार देवव्रत की भीष्मप्रतिज्ञा के बाद ‘देवव्रत कहीं पीछे छूट गया, अंतःकक्ष में सिमटकर रह गया और शेष रह गया भीष्म। शान्तनु निरुपाय असहाय मन मसोस कर रह गए। उनकी आसक्ति का इतना बड़ा मूल्य चुकाना पड़ा उनके पुत्र देवव्रत को।
महारानी सत्यवती ने चित्रांगद और विचित्र वीर्य को जन्म दिया। दोनों ही राजकुमार पूर्णयुवा भी नहीं हो पाए थे कि महाराज शान्तनु स्वर्ग सिधार गए। चित्रांगद हस्तिनापुर के सम्राट बने पर नियति को उनका राज् स्वीकार नहीं था। एक युद्ध में गंधर्व राज के हाथों महाराज चित्रांगद की मृत्यु हो गई। अभी विचित्रवीर्य युवा नहीं हो पाये थे, किन्तु राज्यसिंहासन तो खाली नहीं रह सकता था। अनुज विचित्रवीर्य को राज सिंहासन पर अभिषिक्त किया गया। भीष्म उनके संरक्षक थे।

युवा होने पर विचित्रवीर्य का विवाह होना था। समाचार मिला-काशी नरेश की तीन कन्याओं का स्वयंवर हो रहा है। माता सत्यवती की आज्ञा से भीष्म ने स्वयं ही रथ पर सवार होकर काशी की यात्रा की। स्वयंवर में उनके सफेद बालों और वैधव्य को देखकर उपहास होने लगा। रोष में आकर भीष्म तीनों कन्याओं का अपहरण कर हस्तिनापुर ले आए। उन्होंने तीनों कन्याएँ विचित्र वीर्य को समर्पित कर दीं। विवाह का आयोजन किया गया। यह देखकर काशी नरेश की बड़ी कन्या ने उन्हें बताया-वह मन-ही-मन कौशल नरेश महाराज शाल्व को अपना पति मान चुकी है तो भीष्म ने उन्हें सेवकों के साथ शाल्व के यहाँ पहुँचा दिया और अम्बिका तथा अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य से कर दिया गया। होनी को कौन टाल सकता था ? सदाचारी देवव्रत की कोमल भावनाओं को हस्तिनापुर राज्य की वेदी पर भेंट चढ़वा दिया गया था तो महारानी सत्यवती को भी उसका कुछ मूल्य चुकाना ही था। सो, चित्रांगद तो अविवाहित ही संसार से विदा हुए और विचित्रवीर्य भी यौवनोन्माद में उन्मत्त कामासक्त क्षय रोग से ग्रस्त हो गये और असमय ही निःसन्तान स्वर्ग सिधार गए।

राज सिंहासन फिर खाली हो गया। उत्तराधिकारी का प्रश्न फिर सत्यवती के सम्मुख समस्या बन गया। भीष्म प्रतिज्ञा से बंधे हुए थे। निरुपाय सत्यवती ने पूर्वकाल में मुनि पराशर के संसर्ग से उत्पन्न अपने ही पुत्र कृष्ण द्वैपायन व्यास को बुलवाया और कुल को चलाने के लिए नियोग के द्वारा अम्बिका को पुत्र-प्रदान करने के लिए निवेदन किया। किसी भी सन्सारी के लिए मन से ऐसा स्वीकार्य करना मर्यादा ही नहीं, भावना के भी प्रतिकूल था। किन्तु कुल की रक्षा के लिए उसने बलात् यह आदेश स्वीकार किया पर व्यास जी के कक्ष में जाकर भय व लज्जा से उसने आंखें बंद कर लीं। फलतः उसने नेत्रहीन धृतराष्ट्र को जन्म दिया।

स्वस्थ बालक की कामना से सत्यवती ने दूसरा प्रयास किया और अबकी बार अम्बालिका को व्यास जी के कक्ष में भेजा। अम्बालिका व्यासजी के कृष्णरूप को देखकर भय से पीली पड़ गई। फलतः रुग्ण पाण्डु ने जन्म लिया। सत्यवती की समस्या का समाधान अभी भी नहीं हुआ था। अतः एक बार अम्बिका को पुनः व्यास जी की शरण में भेजने का विचार हुआ। अम्बिका इस बार जाने को तैयार न हुई। उसने अपनी जगह अपनी दासी को व्यासजी की शरण में भेज दिया। इस दासी ने ही व्यासजी के द्वारा विदुर को जन्म दिया। वास्तव में महात्मा माण्डव्य के शाप से धर्मराज ही विदुर के रूप में अवतीर्ण हुए।

यह भी एक पूर्व प्रसंग है। माण्डव्य यशस्वी मुनि थे। उन्हें एक राजा ने भ्रम से अपराधी जानकर प्राण-दण्ड देते हुए सूली पर लटका दिया।
उन्होंने प्राण नहीं छोड़े। काफी दिन बाद राजा को अपनी भूल का भान हुआ तो उन्हें सूली से उतार अपने अपराध की क्षमा मांगी। मुनि ने राजा को क्षमा कर दिया। तभी से उनका नाम अणीमाण्डव्य पड़ गया। पर उनके  कारण साधारण असावधानी पर जो दण्ड मिला, इसके लिए उन्होंने धर्मराज की सभा में जाकर उन्हें शूद्र योनि में जन्म लेकर मनुष्य बनने का शाप दे दिया।


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