योग स्त्रियों के लिए - आचार्य भगवान देव Yog Istrio Ke Liye - Hindi book by - Acharya Bhagwan Dev
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योग स्त्रियों के लिए

आचार्य भगवान देव

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2004
आईएसबीएन : 81-7182-290-8 मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :118 पुस्तक क्रमांक : 3604

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स्त्रियों के योग संबंधी पुस्तक...

Yog striyon ke liye

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

स्त्रियां जो प्राय: गृहकार्यो में व्यस्त रहती हैं-खुले मैदानों में आधुनिक खर्चीले खेल उनकी प्रकृति के विरुद्ध भी हैं-उनके लिए योग का मार्ग एक वरदान स्वरूप समझना चाहिए। योगाभ्यास से शरीर सुकोमल, स्वस्थ और सुन्दर बनता है, जिसकी चाहना प्रत्येक स्त्री को रहती है।
विद्वान लेखक ने सुन्दर एवं सरल भाषा में अनुभव सिद्ध इस पुस्तक में जो दिया है, हमें पूर्ण विश्वास है कि न सिर्फ स्त्रियों में अपितु पुरुषों को भी इससे लाभ होगा।

अपनी बात


जिस राष्ट्र की स्त्री जाति सुन्दर, स्वस्थ, शिक्षित एवं शक्तिशाली होती है; वह राष्ट्र भी सुन्दर, स्वस्थ, शिक्षित एवं शक्तिशाली होता है-यह निर्विवाद सत्य है। स्वस्थ, शिक्षित, शक्तिशाली माता ही राष्ट्र को स्वस्थ, शिक्षित एवं शक्तिशाली सन्तान दे सकती है। इसलिए भारत में माता को प्रथम गुरु माना गया है। सृष्टि उत्पत्ति से लेकर आज तक हमारे राष्ट्र में स्त्री को आदर और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। जब तक इस भारत देश में स्त्री को पूज्य भाव से देखा गया, तब तक भारत को, विश्व की मानव जाति, अपना गुरु और मार्गदर्शक समझकर प्रेरणा प्राप्त करती रही।

मध्यकाल में विशेषकर मुसलमान शासन काल में स्त्री जाति को पर्दे में रखने की प्रथा चल पड़ी। स्त्री का बाहर निकलना बन्द हो गया, जिससे स्त्री हर प्रकार से गुलाम और अशिक्षित बनकर एक मात्र गृह-कार्य एवं संतान पैदा करने का साधन समझी जाने लगी। उनके प्रति आदर का अभाव हो गया। चिर काल में ऐसा भी समय आया कि स्त्री को घृणा और नफरत की दृष्टि से देखा जाने लगा। जिस जाति समाज एवं राष्ट्र में मातृशक्ति के प्रति आदर नहीं रहता वह राष्ट्र शीघ्र पतन को प्राप्त होकर गुलाम बन जाता है। धन, यश, वैभव, विकास सब समाप्त हो जाता है। सुख-शांति एवं शक्ति का नाश हो जाता है। सर्वत्र विनाश लीला का तांडव नृत्य नज़र आता है।

 जिस परिवार, समाज एवं राष्ट्र में सद्गुणी, मधुरभाषी, धीर-गंभीर, गृहकार्य में दक्ष, बड़ों का आदर करने वाली, छोटों को प्यार करने वाली सुशिक्षित, श्रेष्ठ स्वभाव वाली सुन्दर स्वस्थ स्त्री हो तो वहां स्वर्गीय सुख की स्थापना हो जाती है। हर व्यक्ति आनन्द की अनुभूति करने लगता है।

एक अच्छी स्त्री, पुरुष के लिए परमात्मा द्वारा प्रदान किया गया एक ऐसा श्रेष्ठ उपहार है, जिसको पाकर पुरुष पूर्णता को प्राप्त कर सकता है। श्रेष्ठ सुन्दर स्त्री को देखकर साधारण व्यक्ति तो क्या, ऋषि-महर्षि, योगी एवं संत पुरुष भी भाव-विभोर हुए बिना नहीं रह सकते। इस पवित्र सृष्टि में परमात्मा ने स्त्री को पैदाकर एक ऐसी ज्योति की स्थापना की है, जिसके समीप जाकर अनेक पतित व्यक्ति भी प्रकाश प्राप्त करके महान व्यक्ति बन गये हैं। अच्छी स्त्री का सहवास और साथ व्यक्ति को जमीन से उठाकर आकाश तक पहुंचा देता है। खराब स्त्री देवता को दानव बना देती है।

स्त्री समर्पण की एक साकार जीती-जागती मूर्ति है। दया का सागर उसमें हिलोंरे मारते हुए नज़र आता है। वह प्यार से सदा परिपूर्ण नज़र आती है। स्वभाव से वह सरल है। त्याग और तप की साक्षात् प्रतिमा है। जन्म से मृत्यु-पर्यन्त अनेक पारिवारिक, सामाजिक अत्याचार को सहन करके वह शमा के समान अपने- आपको जलाकर औरों को प्रकाश देना ही जानती है। उसके प्यार भरे हृदय की गहराई में आप जाइए। आपको जीवन पर्यन्त जिस दृष्टि से देखें, जिस भाव से देखें-आप उसे असीम पाएंगे।

स्त्री अमीर हो, चाहे गरीब-उसका स्वभाव मातृ भाव से आप परिपूर्ण पाएंगे, जिस व्यक्ति ने जिस श्रेष्ठ भाव से उसे देखा, जितना गहराई में गया, उसके ज्ञान चक्षु खुलते जाते हैं। वास्तव में स्त्री एक प्रेरणा की मूर्ति है जिसके जीवन ने अनेक गिरे हुए व्यक्तियों को संसार का श्रेष्ठतम व्यक्ति बना दिया। स्त्री एक ऐसी सरिता है, जिसके पास पहुंचकर पुरुष चिन्ताओं, दु:खों, कष्टों, आभावों से मुक्त हो जाता है।

परमात्मा द्वारा मनुष्य को प्रदान किया गया एक अमूल्य उपहार स्त्री के जीवन में देखते हैं कि मानव की अज्ञानता, लापरवाही एवं मनमानी ने उसके जीवन को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है। पारिवारिक एवं सामाजिक परिस्थितियों ने उसे पतन के मार्ग पर चलाकर उसके नरकीय जीवन में धकेल दिया है। जिसका परिणाम संसार के कुछ परिवारों को छोड़कर हम देखते हैं कि प्राय: सब घरों में दु:ख, दरिद्रता, रोगों का साम्राज्य स्थापित होता जा रहा है। श्रेष्ठ, सुन्दर, सुखी, स्वस्थ परिवारों का अभाव संसार की मानव जाति के विनाश का कारण बनता जा रहा है। प्रत्येक परिवार हर दृष्टि से सुखी बने, उसका सर्वांगीण विकास हो, शारीरिक, मानसिक, आत्मिक उन्नति करे, इसके लिए यह अति आवश्यक है कि प्रत्येक परिवार में गृलक्ष्मी, ‘‘सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम्’’ की साकार मूर्ति बने। इसके सरल साधन इस पुस्तक में देने का हमने प्रयास किया है। स्त्री की उन्नति में अपनी, परिवार, समाज एवं राष्ट्र की उन्नति समझनी चाहिए।

भगवान देव  

1.स्त्री-पुरुष स्वभाव


संसार में बिना स्त्री के मनुष्य का जीवन नीरस और बिना पुरुष के स्त्री का संसार व्यर्थ है। बिना स्त्री-पुरुष के परस्पर सहयोग के इस संसार का चलना भी असंभव है, इसे भी कोई अस्वीकार न करेगा। यदि स्त्री तरणी है तो पुरुष पतवार है। यदि स्त्री नदी का जल है तो पुरुष उसका किनारा। यदि स्त्री वाटिका है तो पुरुष उसका माली है। जो सम्बंध बिजली और आकाश का है, वर्षा और बादल का है, यही अनिवार्य एवं अभिन्न सम्बंध स्त्री-पुरुष का है। परन्तु भारत में ही क्या संसार-भर के बहुत कम स्त्री-पुरुष ऐसे होंगे जो अपने जीवन में एक-दूसरे से लड़े न हों, जिनका जीवन दूध और पानी की तरह मिल गया हो, जो परछाईं की भांति एक दूसरे से सटे रहते हों। देखा गया है कि कुछ घरों को छोड़कर प्राय:सभी घरों में स्त्री-पुरुष आपस में लड़ते हैं, चाहे यह झगड़ा कितना ही सूक्ष्म क्यों न हो। किन्हीं-किन्हीं घरों में तो स्त्री और पुरुष का पारस्परिक कलह इतना भयंकर रूप धारण कर लेता है कि पुरुष स्त्री का मुंह तक देखना पसंद नहीं करता और स्त्री का मान पुरुष की सूरत से घृणा करा देता है। कहीं-कहीं तो वे परस्पर एक दूसरे की जान तक के दुश्मन हो जाते हैं और उनकी जीवन-वाटिका की कली अधखिली ही मुरझा जाती है। उनका फूल वनने वाला जीवन बिना खिले ही मिट्टी में मिल जाता है।

प्रथम मिलन में प्रत्येक स्त्री, पुरुष अपने सुख स्वप्न का एक नया संसार बनाता है। परन्तु कितने ऐसे जीवन है जो अपने स्वप्न जगत् के निर्माण में सफल होते हैं। जो निकटता का भाव उनके जीवन में सर्व प्रथम होता है वह आगे खाई क्यों बन जाता है ? एक वृक्ष पर बैठने वाले दो पक्षी सर्वथा एक-दूसरे से दूर क्यों उड़ जाते हैं ? इन प्रश्नों का उत्तर हमें अपने जीवन की झांकी में, पड़ोसी के जीवन-निरीक्षण में और मित्रों के जीवन की दु:ख और निराशा भरी आह में मिलेगा। परन्तु उसकी घुटन का आभास और अनुभव उसकी वास्तविकता को हमसे ओझल किए रहता है। जैसे प्रत्येक व्यक्ति की जीवन-यात्रा सिनेमा का प्लाट होते हुए भी दर्शक उससे उतने आकर्षित नहीं होते जितने कि एक व्यक्ति की जीवन घटनाओं के समन्वय से जो चित्रपट पर एक साथ प्रदर्शित की जाती है। हमें अपने गृहस्थ जीवन के विभिन्न काले पहलुओं को एक स्थान पर लाकर रखना है जिससे उनके द्वारा होने वाले अहितों से हम छुटकारा पा सकें और हमारा जीवन सुखी हो और अनावश्यक एवं अस्वाभाविक कलह से हम छुटकारा पा सकें।

प्राय: संसार में स्त्री-पुरुषों को एक दूसरे से कई प्रकार की शिकायतें होती हैं।
सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए स्त्री-पुरुष दोनों का स्वभाव कोमल, सुमधुर एवं शान्त वृत्ति वाला होना चाहिए, परन्तु यदि यह सम्भव न हो तो और भिन्न-भिन्न स्वभाव के स्त्री-पुरुषों को ही अपनी संसार नैया खेनी पड़े तो परस्पर मिलकर रहने के अचूक मंत्र का पाठ उन्हें कण्ठस्थ करना होगा। यदि अपने उग्र स्वभाव के कारण कलह जीवन का अनिवार्य अंग बन जाये तो फिर उसे मिटाने के लिए भी कभी-कभी विचार करना ही चाहिये।

ये उपाय कलह होने के कुछ समय उपरान्त ही सोचने चाहिये जबकि शरीर कुछ ठंडा पड़ गया हो और मस्तिष्क विभिन्नता के दूषित विष से मुक्त हो चुका हो, उस समय कोई-न-कोई साधन सूझ ही जायेगा, यदि झगड़ा मिटाने की लगन हो।
जबकि दो स्त्री-पुरुष भिन्न-भिन्न स्वभाव के होते है उनमें परस्पर कलह होने लगती है और यह कलह प्राय: उस समय बढ़ जाती है जबकि दोनों उग्र स्वभाव के हों। यदि एक गरम और दूसरा ठंडा हो तो कुछ अंशों में बात बनी रहती है। परन्तु इसके प्रथम, दूसरे पर अन्याय ही करता है और कभी-कभी दूसरे की शान्ति की बाढ़ टूटकर भयंकर रूप भी धारण कर लेती है। साथ ही ठंडे स्वभाव वाला चाहे वह स्त्री हो या पुरुष गरम स्वभाव वाले के बर्ताव का कारण दब्बूपन का शिकार बन जाता है, जो उसके जीवन पथ में एक भयंकर अभिशाप सिद्ध होता है।

 ऐसी अवस्था में एक उग्र-स्वाभाव वाले को यह समझने का यत्न करना चाहिए कि वह अपने साथी के साथ यदि न्याय नहीं कर सकता, तो अन्याय तो न करे। यदि ईश्वर ने उसे न्याय अन्याय की भी विवेचना बुद्धि न दी तो शांत-स्वभाव वाले को परस्पर की कलह से बचने के लिये ही इतना अधिक शांत बन जाना चाहिए कि वह गरम लोहे को काट सके। फिर धैर्य का फल मीठा होता है। यदि दोनों में से एक भी परस्पर मिलकर रहने की भावना से ओत-प्रोत हैं तो उसे चाहिए कि जब उसका साथी जोश में हो तो उसे कुछ समय के लिए चुप ही हो जाना चाहिए और अपने उठते हुए क्रोध को एक गिलास ठंडे पानी से कड़वे घूंट के समान गले के नीचे उतार कर भभकती हुई अग्नि को शान्त करना ही हितकर साधन है।



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