औरत एक रात है - मालती जोशी Aurat ek Rat Hai - Hindi book by - Malti joshi
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औरत एक रात है

मालती जोशी

प्रकाशक : परमेश्वरी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
आईएसबीएन : 81-88121-01-0 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :154 पुस्तक क्रमांक : 3526

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इस उपन्यास में औरत के प्रति पुरुष की मानसिकता का वर्णन है...

Aurat Ek Rat Hai a hindi book by Malti joshi - औरत एक रात है- मालती जोशी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

नहीं, आप गलत क्यों कहेंगे ? गलत तो उन्होंने कहा है, जो दीदी के अविवाहित रहने के लिए जिम्मेदार हैं। अपनी गलती छिपाने के लिए उन्होंने यह कहानी गढ़ ली है।...यह घर की बात थी,घर में ही रह जाती, तो अच्छा था,पर दीदी के बारे में ऐसा कुप्रचार हो और मैं चुप रह जाऊँ,यह तो नहीं हो सकता, तो सुन लीजिए दीदी शादी नहीं कर सकीं,क्योंकि छोटे भैया की पढ़ाई बाकी थी और बड़े भाई ने साफ इंकार कर दिया था वह अनब्याही रह गई,क्योंकि घर में बूढ़ी बीमार माँ थी और उन्हें देखने वाला कोई नहीं था। वह अविवाहित रह गई, क्योंकि मेरी परवरिश करनी थी, और सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी शादी के लिए आज तक किसी ने पहल नहीं की और खुद अपना दूल्हा ढूँढ़ने के संस्कार हमारे परिवार में नहीं थे,इसीलिए उनकी शादी नहीं हो सकी, बात करते-करते मेरा गला भर आया था। मैं एकदम उठ खड़ी हुई, अच्छा अब मुझे इजाजत देंगे। थैंक्स फॉर द टाइम यू गेव मी।

अरे बिटिया चाय तो पीती जाओ। जज साहब की पत्नी बोलीं। गृहिणियों को हमेशा मेहमानों को खिलाने-पिलाने की ही पड़ी रहती है,और बातों से उन्हें कोई सरोकार नहीं होता, पर जज साहब मेरी बात समझ रहे थे। दोनों भाई मेरे साथ ही उठ खड़े हुए और मुझे छोड़ने बाहर तक आए।

निर्वासित कर दी तुमने मेरी प्रीत


रात बड़े भैया का फोन आया था। रुँधे गले से उन्होंने बस इतना कहा था, ‘‘सुमि, दिव्या नहीं रही।’’
बस एक वाक्य और फोन चुप हो गया था। मैं भी निर्निमेष उसे देखते हुए काठ होकर रह गई थी। दिव्या नहीं रही ! दिव्या, जो जीवन का, सौंदर्य का, उल्लास का, उमंग का प्रतीक थी, वह नहीं रही। यह कैसे हो सकता है ? सचमुच, हरदम हँसती-खिलखिलाती, ठुमकती-मचलती दिव्या को मृत्यु के साथ जोड़कर देखना बड़ा कठिन लग रहा था, पर यह मजाक तो नहीं हो सकता। ऐसा क्रूर मजाक और वह भी बड़े भैया क्यों करेंगे ?
इस धक्के से उबरने में मुझे कोई आधा घंटा लग गया। जब मन थोड़ा स्वस्थ हुआ, तो मैंने ही फोन लगाया। इस बार लाइन पर छाया थी। ठीक तो है। वही तो सबसे पास है। दौड़कर पहुँच गई होगी। वह भी बुरी तरह टूटी हुई थी। सुबकते हुए उसने जो कुछ बताया, उसका सार यह था कि दिव्या ने अपनी लैब की सत्रहवीं मंजिल से छलाँग लगा दी थी। उसके प्राण-पखेरू तत्क्षण उड़ गए थे। अब यह पता लगाना मुश्किल है कि यह आत्महत्या है या मात्र दुर्घटना। हत्या की संभावना को भी एकदम नकारा नहीं जा सकता। ये तीनों ही संभावनाएँ मेरे गले से नीचे नहीं उतर रही थीं। उसने तो अपनी पसंद से यह कैरियर चुना था और अपनी पसंद के जीवनसाथी के साथ सपनों के देश में बसने चली गई थी। शादी को अभी मात्र तीन साल ही तो हुए हैं। इतनी जल्दी कोई इतना हताश हो सकता है ?

और उसकी हत्या भला कोई क्यों करेगा ? क्या उस जैसी निश्छल, सरल लड़की से भी किसी की दुश्मनी हो सकती है ? और दुर्घटना का तो सवाल ही नहीं उठता। वह तो अपने सहकर्मी से कहकर गई थी कि वह फ्रेश एयर लेने ऊपर जा रही है।
‘‘फ्यूनरल कब है ? कहाँ है ?’’ मैंने दबी जबान से पूछ लिया। दिव्या जैसी लड़की के फ्यूनरल की कल्पना तक सिहरा देती है, पर औपचारिकता है। पूछना ही पड़ा।
‘‘फ्यूनरल तो बुआ वहीं हो गया। यहाँ लाने लायक स्थिति नहीं थी। चित्रा और अंकित गए हैं। मैं तो...।’’ और वह चुप हो गई। समझ गई कि देवी जी फिर से उम्मीद से हैं। चित्रा की शादी में मिली थी, तब एक बेटी थी। दूसरी की तैयारी थी। दिव्या की शादी में देखा, दो कन्याएँ हैं, तीसरे की आहट है और अब यह चौथे की सूचना है। इस बार भी बेटी ही हुई तो ? उस मनःस्थिति में भी मुझे छाया पर खीज हो आई।

‘‘अच्छा, मैं कल रवाना हो रही हूँ। भैया-भाभी का खयाल रखना।’’ मैंने कहा और फोन रख दिया, फिर एक फोन योगेश्वरी ट्रेवल्स को किया कि कल किसी भी गाड़ी में मेरा आगरा के लिए रिजर्वेशन करवा दे। इस उम्र में अब धक्के खाते हुए जाने की हिम्मत नहीं होती। रात में ही मैंने सूटकेस जमाकर रख लिया। कल जिस भी गाड़ी में सीट होगी, निकल जाऊँगी।
सब समेटकर सोने गई, तो साढ़े बारह बज रहे थे। पर मेरी आँखों में नींद का नाम नहीं था। एक मन हुआ, पम्मी को फोन कर लूँ, पर घड़ी देखकर अपने को रोक लिया। वैसे भैया ने वहाँ फोन तो कर ही दिया होगा। वह भी मेरे आगे-पीछे ही पहुँचती होगी। मुँह से चाहे जैसा, उलटा-सीधा बोलती रहे, पर ऐसे समय में सब कुछ भूलकर दौड़ी चली आएगी, मुझे विश्वास है। इस समय हम दोनों का वहाँ होना बेहद जरूरी है। भाभी रो-रोकर बेहाल हुई जा रही होंगी। भैया को सांत्वना देने वाला कोई नहीं होगा।
अम्मा के बाद उस घर से संबंध थोड़े औपचारिक हो गए थे। जब तक अम्मा थीं, तब तक तो मैं हर छुट्टी में घर पहुँच जाती थी। इसीलिए लड़कियाँ भी मुझसे हिली हुई थीं। खासकर दिव्या के लिए तो मैं ‘फ्रैंड’, फिलॉसफर एंड गाइड’ थी, पर अम्मा के बाद सब कुछ बदल गया। अम्मा की तेरहवीं पर ही मैंने भाभी को किसी से कहते सुना था, ‘अरे, एक सास मर गई तो क्या हुआ, दूसरी तो अभी बैठी है। वे तो बेचारी खटिया से लगी थीं, पर यह तो खासमखास है। अभी पता नहीं कितने दिनों तक और राज करेगी।’

अपने स्नेह की ऐसी अवमानना देखकर मन खट्टा हो गया था। तब से मैंने घर जाना छोड़ दिया था। या तो पम्मी के यहाँ कुछ दिन चली जाती या फिर किसी यात्रा-कंपनी के साथ भारत-भ्रमण कर आती। भैया के यहाँ तो बस लड़कियों की शादी या सगाई में जाना होता था, इसीलिए दिव्या की भी जो आखिरी छवि मेरे मन में अंकित थी, वह नववधू की ही थी। शादी के तुरंत बाद, वह तो अमेरिका चली गई थी। उसके बाद शायद एकाध बार ही आई हो।
रात-भर दिव्या का चेहरा मेरी आँखों के सामने घूमता रहा, उसके कई रूप याद आते रहे। यूँ तो तीसरी बेटी के जन्म पर घरों में मातम छा जाता है, पर जब नर्स ने वह जापानी गुड़िया हाथों में थमाई थी, तो क्षण-भर को अम्मा भी अपनी हताशा भूल गई थीं। वह लड़की घर-भर की आँखों का तारा थी। खिलौना थी। घर और बाहर उसने इतना प्यार बटोरा था कि पूँजी के सहारे वह सात जन्म जी लेती। इसीलिए तो उसकी आत्महत्या की बात गले नहीं उतर रही थी।
किसी तरह ठेलठालकर मैंने अपने को ट्रेन में चढ़ाया था। अम्मा के बाद से घर जाने का उत्साह ही खत्म हो गया था, फिर भी शादी-ब्याह में जाते समय उत्साह न सही, एक उत्सुकता तो रहती ही है, पर इस बार तो यह सफर पहाड़-सा लग रहा था।
वक्त काटने के लिए मैं पिछली यात्राओं को याद करना शुरू किया। सबसे पहले छाया की शादी याद हो आई। मैं और पम्मी करीब-करीब साथ ही पहुँचे थे। शादी में अभी चार-पाँच दिन बाकी थे, पर घर अभी से गोदाम बन गया था। पीछे वाला बरामदा तो बोरियों से अटा पड़ा था। कमरों में बिखरा हुआ सामान भी अपने लिए मुनासिब जगह तलाश रहा था। हमें लगा कि इस महासागर में अगर हमारी अटैचियाँ खो गईं, तो ढूँढ़े नहीं मिलेंगी।
नहा-धोकर हम लोग सुस्ता ही रहे थे कि एक तोंदियल-सा शख्स दाखिल हुआ, ‘‘आंटी, आपकी लिस्ट के अनुसार सारा सामान भिजवा दिया था। मिला लिया था ?’’
‘‘बाकी सामान तो आ गया, पर शायद बासमती का कट्टा नहीं पहुँचा।’’
‘‘आप क्या पंगत में बासमती परोसेंगी, आंटी जी ? गोल्डन सेला चलने दीजिए। आजकल सब जगह रिसेप्शन में यही चलता है।’’

‘‘मुकुंद, पंगत में जो तुम्हारा जी चाहे बनवाना। मैं तो घर के लिए मँगवा रही थी। अब साल-भर तीज-त्योहार चलते रहेंगे। दामाद का, समधियों का आना-जाना लगा ही रहेगा। उन्हें क्या सेला चावल खिलाऊँगी ?’’
‘‘अभी ले आऊँ या बाद में लाने से चलेगा ?’’
‘‘बाद में ले आना। अभी ले आते तो लगे हाथ साफ-सूफ करके गोलियाँ डाल के रख देती।’’
‘‘जी, अच्छा,’’ कहकर जब वह मुकुंद नामक प्राणी चला गया तब मैंने पूछा, ‘‘आजकल गोपालदास के यहाँ से सामान नहीं आता क्या ? या कि यह उन्हीं का आदमी है ?’’
‘‘क्या बात करती हो,’’ भाभी झल्लाईं, ‘‘ये तो इनका स्टुडेंट है। फाइनल में है, इंग्लिश में एम.ए. कर रहा है।’’
पम्मी चिहुँकी, ‘‘मुझे तो यकीन ही नहीं आ रहा। मुझे तो लगा, जैसे सीधे किराने की दुकान से उठकर चला आ रहा हो।’’
‘‘उसकी दुकान है। शहर का सबसे बड़ा किराना मर्चेंट है उसका बाप। मुझसे बोला कि इस बार छाया दीदी की शादी का सामान हमारे यहाँ से लीजिए। हमने कहा, ठीक है। हमें क्या, कहीं भी पैसे देने हैं। वहाँ न दिए, यहाँ दे दिए।’’
‘‘ये पैसे देंगी ?’’ पम्मी फुसफुसाई। मैंने बड़ी मुश्किल से चिकोटी काटकर उसे चुप किया, फिर विषय बदलने की गरज से भाभी से कहा, ‘‘हमें होने वाले दामाद की फोटो तो दिखाइए, हमने सुना है कि वे भी भैया के स्टुडेंट थे।’’
‘‘हाँ, पिछले साल ही तो फाइनल किया है। गोल्ड मेडल मिला था।’’
‘‘अच्छा ?’’
‘‘अब पी-एच.डी. कर रहे हैं। मुरादाबाद में लेक्चरर हैं।’’
भाभी फोटो लेने भीतर चली गई, तो पम्मी ने कहा, ‘‘कन्यादान के लिए गोल्ड मेडल की वर दक्षिणा, सौदा कोई बुरा नहीं रहा। क्यों दीदी ?’’
‘‘तुम थोड़ी देर चुप नहीं रह सकतीं ?’’

‘‘चुप कैसे रहूँ दीदी ? मुझे तो यह चिंता खाए जा रही है कि इस साल अगर इस मोटूमल की पोजीशन आ गई, तो बेचारी चित्रा की जिंदगी तबाह हो जाएगी।’’
पम्मी की बात पर हँसी भी आई और गुस्सा भी। अच्छा हुआ, भाभी फोटो लेकर प्रकट हो गईं। बात वहीं दब गई। हम लोग फोटो का मुआयना कर रहे थे कि एक सुदर्शन-सा नवयुवक, एक मिस्त्री टाइप व्यक्ति के साथ मंच पर अवतरित हुआ-‘‘आंटी जी, आप इलेक्ट्रिशियन के लिए कह रही थीं, ले आया हूँ। क्या-क्या काम करवाना है, बता दीजिए।’’
‘‘सामान ले आए ?’’
‘‘कैसा सामान ?’’
‘‘एक तो बिजली की झालरें चाहिए। पूरे कंपाउंड में मकान में लगेंगी। दो ठो बड़े पंखे चाहिए। एक बरामदे में लगेगा और एक छत पर। दो ठो पंखे और दो कूलर जनवासे में भी लगेंगे। हाँ, वहाँ एक रंगीन टी.वी. भी चाहिए। दूसरे दिन इतवार है। वे लोग महाभारत देखेंगे और देखो, एक बड़ा-सा फ्रिज दो दिन पहले से ही यहाँ आ जाए। हलवाई ने कहा है कि बंगाली मिठाई फ्रिज में ही रखी जाएगी।’’
वह लड़का मुँह बाए भाभी की फइमाइशें सुनता रहा, फिर धीरे से बोला, ‘‘ये सब सामान कहाँ से आएगा ?’’
‘‘अब यह भी मैं बताऊँगी ? अजीब आदमी हो। हाथ हिलाते चले आए, सामान नहीं होगा तो इस बिजली वाले का मैं क्या अचार डालूँगी ?’’
लड़का अपना-सा मुँह लेकर बाहर चला गया। साथ में वह मिस्त्री भी। पम्मी एकदम पूछ बैठी, ‘‘भाभी, क्या यह भी स्टुडेंट है ?’’
‘‘हाँ, क्यों ?’’
‘‘तो इस साल इसे ही गोल्ड मेडल दिलवा दीजिए।’’
‘‘क्यों ?’’
उस समय पता नहीं कहाँ से चित्रा कमरे में टपक पड़ी। पम्मी की उससे कभी नहीं बनी। इस बार भी पम्मी को अपमानित करते हुए कसैले स्वर में बोली, ‘‘उसे तुम्हारी सिफारिश की जरूरत नहीं है छोटी बुआ। आलोक हमेशा से टॉपर रहा है।’’
चित्रा शायद सेफ की चाबी लेने आई थी, लेकर चली गई, पर वातावरण को बड़ा असहज बना गई। मैंने वातावरण को थोड़ा हलका बनाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘दरअसल भाभी, लड़का इतना सुंदर है कि हमें लगा, चित्रा के साथ उसकी जोड़ी खूब जमेगी ?’’

‘‘अरे, सुंदर है तो क्या सिर पर बिठा लें ?’’ भाभी ने हिकारत से कहा, ‘‘न जात का, न बिरादरी का। वैसे भी चित्रा के लिए तो हम कोई डॉक्टर या इंजीनियर ही ढूँढ़ेंगे। वो तो छाया का रंग थोड़ा दबा हुआ था, तो हमने सोचा कि चलो प्रोफेसर ही सही।’’
‘‘हाँ, सो तो है। प्रोफेसरों को तो कैसी भी बीवी चल जाती है।’’ पम्मी किसी तरह बाज नहीं आ रही थी। मैंने उसे जबरदस्ती उठाते हुए कहा, ‘‘चल, थोड़ा लॉन में घूम लेते हैं। बैठे-बैठे पाँव अकड़ गए हैं। अब तो धूप भी कम हो गई है।’’
बाहर आते ही मैंने उसे आड़े हाथों लिया, ‘‘तुम्हारी जबान पर क्या काँटे उग आए हैं, जो एक बात भी सीधी नहीं निकलती। कुछ भी कहने से पहले कम से कम मेरा तो खयाल किया करो। तुम्हारे पास तो अपना घर-परिवार है, पर मुझे तो रिटायर होकर यहीं इन्हीं लोगों के पास आना है।’’
‘‘कोई जरूरी है ? मेरे यहाँ भी तो आ सकती हो ? बहुत संकोच हो रहा हो, तो अपना सारी जमा-पूँजी मेरे छोटे के नाम कर देना। मैं बिलकुल मना नहीं करूँगी।’’
मैं कोई माकूल-सा जवाब सोच ही रही थी कि उसने कहा, ‘‘दीदी, उधर फाटक पर देखो !’’
मैंने देखा, आलोक नामक वह शख्स, अपने स्कूटर पर अब भी बैठा हुआ सड़क ताक रहा था।
‘‘कमाल है, इतनी लताड़ खाने के बाद भी जनाब अब भी जमे हुए हैं।’’
‘‘गोल्ड मेडल का सवाल है, दीदी, शायद मिस्त्री को भेजकर सामान मँगवाया होगा।’’
पर इस बार पम्मी का अंदाजा गलत साबित हो गया था। बाद में पता चला था कि बिजली का काम भी मोटूमल ने ही अंजाम दिया था, इस फिकरे के साथ कि यह काम क्या उस घोंचू के वश का है ?
उस समय आलोक को मिस्त्री का नहीं, किसी और का ही इंतजार था। एकाएक वह सतर्क होकर खड़ा हो गया। एक साइकिल सड़क से सरपट आती हुई सर्र से फाटक के भीतर दाखिल हुई और उसके साथ-साथ आलोक भी।
वह दिव्या थी। स्कूल से लौटी थी। आते ही दोनों में तकरार शुरू हो गई, ‘‘यह वक्त है तुम्हारा घर लौटने का ? घड़ी देखी है ?’’

‘‘ओफ्फो ! नाराज क्यों होते हैं ? एक्स्ट्रा क्लास थी आज फिजिक्स की।’’
‘‘फेंको मत। जुलाई में कहीं एक्स्ट्रा क्लास लगती है ?’’
‘‘लगती हैं, बाबा, हमारे यहाँ टेंथ और टुवेल्थ के लिए वीक में दो बार लगती हैं।’’ उसने रुआँसी आवाज में कहा, ‘‘और आप अभी जाना मत। मैं अभी तैयार होकर आई।’’
‘‘कहाँ जाना है ?’’
‘‘मार्केट और कहाँ। चूड़ियाँ लेनी हैं, मेकअप का सामान खरीदना है, टेलर के यहाँ से लहँगा उठाना है।’’
‘‘तो जाओ, जल्दी करो।’’
जैसे ही वह मुड़ी, उसने हम लोगों को देखा।
‘‘अरे, आप लोग कब आईं ? आलोक दा, ये दोनों मेरी बुआ हैं। ये सुमि बुआ, और ये पम्मी बुआ।’’
उसने शालीनता से हाथ जोड़ लिए। दिव्या ने हमारे पाँवों को हलका-सा स्पर्श किया और भीतर भाग गई। जाते हुए फिर एक बार आलोक को रुकने के लिए जता गई।
ऐसा शायद पहली बार हुआ था कि उसने मेरा इतना औपचारिक अभिवादन किया हो। नहीं तो वो तो बस लिपट जाती थी, झूम जाती थी। मचल जाती थी कि अभी सूटकेस खोलकर दिखाइए कि हमारे लिए क्या लाई हैं ?
थोड़ा बुरा तो लगा, पर मैंने मन को समझा लिया कि दिव्या अब बड़ी हो गई है, बच्ची नहीं रही और सचमुच जब वह तैयार होकर बाहर आई, तो मानना पड़ा कि वह बड़ी हो गई है। स्कूल यूनिफॉर्म में गुड़िया-सी दिखती दिव्या सलवार-सूट में एकदम आकर्षक युवती लग रही थी।
वह बाहर आई तो भाभी भी साथ थीं। दोनों में खूब चखचख हो रही थी। मुझे देखते ही दिव्या बोली, ‘‘अच्छा बुआ, फंक्शन में एकाध दिन लिपस्टिक लगाने में कोई हर्ज है ?’’
मैं भाभी का मूड देखकर जवाब सोच रही थी कि भाभी ही बोल उठीं, ‘‘अरे, जब एकाध बार ही लगानी है, तो अलग से खरीदने की क्या जरूरत है ? अजब तमाशा है ? तीनों का सामान अलग आएगा। बड़ी तो खैर दुल्हन है, पर ये दोनों तो साझे में काम चला सकती हैं कि नहीं ? एक हमारा जमाना था, घर में एक पौडर का डिब्बा आता था, घर-भर लगाता था।’’

‘‘हमारा-आपका जमाना बहुत पीछे छूट गया भाभी, हमारे यहाँ तो वह इकलौता पावडर का डिब्बा भी बाबूजी से छुपाकर लाना पड़ता था। नहीं तो घर में महाभारत मच जाता था।’’
तब तक आलोक और दिव्या फाटक तक पहुँच चुके थे। आलोक ने स्कूटर स्टार्ट किया और दिव्या उछलकर पीछे बैठ गई। उनके आँखों से ओझल होते ही पम्मी ने एक विशिष्ट भंगिमा से मेरी ओर देखा। मैं कुछ समझ पाती, इससे पहले ही भाभी ने उसका मतलब भाँप लिया। तमककर बोलीं, ‘‘पम्मी जी, ज्यादा चतुराई न झाड़ो। सुमि कुछ समझे, न समझे। हम तुम्हारे इशारे खूब समझते हैं। बेटों वाली हो न, इसीलिए तुम्हारी नाक ऊँची है। हमें तो पग-पग पर इन लड़कों का मुँह जोहना पड़ता है। इस जमाने में लड़कियों को क्या कहीं अकेले भेजा जा सकता है ? फिर तुम्हारे भैया तो हमेशा कहते रहते हैं कि तुम एक बेटे के लिए रोती रहती हो। तुम्हारे तो इतने बेटे हैं, इन्हें ही अपना समझो।’’
कहते-कहते उनका गला भर आया था। अनजाने ही पम्मी ने उनकी दुखती रग छू दी थी। बड़ी मुश्किल से उन्हें शांत किया जा सका था। इसके बाद मैंने पम्मी से कसम ले ली थी कि जितने दिन रहेगी, शराफत से रहेगी। एक बार भी बदतमीजी की तो मैं उसी दम भोपाल लौट जाऊँगी।
इसके बाद पम्मी ने तो शराफत ओढ़ ली, पर मेरी ही नजरें चोर बन गईं। जब भी वे दोनों साथ होते, मैं अनचाहे उनकी ही गतिविधियाँ नोट करती रहती। उस घर में आलोक की कोई हैसियत हो न हो, दिव्या के लिए उसका शब्द आदेश था। हर काम में, हर बात में आलोक का सहयोग और सहमति आवश्यक थी। अल्पना के लिए आलोक का सर्टिफिकेट चाहिए, नहीं तो वह उसे मिटाकर दुबारा बनाएगी। मेहँदी का डिजाइन वे पसंद करेंगे। दिव्या के चेहरे पर कौन-सी हेयर स्टाइल फबेगी, इसे भी वे ही तय करेंगे। कपड़ों का चुनाव तो उन्हीं को करना था। गरज यह कि हर बात में उनकी मुहर का लगना जरूरी था।

लेडीज संगीत वाले दिन की घटना याद आ जाती है। उस दिन दिव्या ने खूब रंग जमाया। मुझे तो पता ही नहीं था कि वह इतना अच्छा नाच लेती है। उस दिन बहुत सुंदर भी लग रही थी। किसी ने कहा, ‘‘दिव्या, तुम्हारा चुन्नीबेस मोरपंखी है न ! शादी वाले दिन लम्हे वाला डांस, ‘बागो में मोर नाचे’, मजा आएगा।’’
‘‘नहीं,’’ एक गरज सी सुनाई दी। हम सब चौंक पड़े। तब तक हमें आलोक की उपस्थिति का अहसास ही नहीं था। हमें पता ही नहीं था कि बरामदे में बैठा वही कैसेट चला रहा था, ‘‘शादी में कोई नहीं नाचेगा ?’’ उसने सख्त लहजे में कहा।
‘‘क्यों ?’’ दिव्या ने इतराकर पूछा।
‘‘ये कोई फिल्मों का सेट है कि घर की लड़कियाँ नाचेंगी ? पता है, ठेठ गाँव की बारात है और गाँवों में नाचने वाली लड़कियों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता।’’
‘‘पर मेरे इतने महँगे सूट का क्या होगा ?’’
‘‘अपनी शादी पर पहन लेना, पर इस शादी में नाच-वाच नहीं होगा, कह दिया।’’

और सचमुच नाच नहीं हुआ और न ही दिव्या ने वह सूट पहना, पर उसने जो भी पहना था, उसमें भी वह गजब ढा रही थी। देखने वालों की आँखें उस पर अटक जाती थीं। आलोक को यह भी सहन नहीं हुआ। डपटकर बोला, ‘‘तुम्हें दौड़-दौड़कर कोल्ड्रिंक सर्व करने की क्या जरूरत है ? ये इतने सारे बैरे यहाँ किसलिए हैं ?’’ फिर मुझसे बोला, ‘‘बुआ जी, इसमें तो जरा भी अकल नहीं है। जरा आप ही इसे समझाइए और इन उजड्ड गँवारों को तो देखिए, कैसे आँख फाड़-फाड़कर घूर रहे हैं, जैसे लड़की पहली बार देख रहे हों। मेरा वश चले तो किसी को उनके सामने ही न पड़ने दूँ।’’
और सचमुच उसने ऐसा ही किया। दिव्या को बुरा तो लगा होगा, पर वह आलोक की अवज्ञा नहीं कर सकी यह उम्र ऐसी ही होती है। हम जिसे चाहते हैं, उसकी हर बात सिर-माथे लेते हैं। दिव्या उम्र के उसी मोड़ पर थी। आलोक उससे चार-पाँच साल बड़ा था। इसी नाते उसे हिदायतें भी दे रहा था, उसकी हिफाजत भी कर रहा था। मैं परेशान हो उठी थी। मैंने जिस सच को चार दिन में पकड़ लिया था, क्या भैया-भाभी उससे अनजान होंगे ? या कि उनकी नजरों में दिव्या अब भी बेबी ही थी, या कि फिर यह मेरा ही भ्रम था ?
चित्रा, छाया से तीन साल छोटी थी। तीन साल बाद उसकी भी शादी का नंबर आ गया। एम.एस.सी में टॉप करके चित्रा उन दिनों आसमान में उड़ रही थी। आई.ए.एस. बनने के ख्वाब देख रही थी। भैया ने अपनी लाड़ली के लिए आई.ए.एस. दूल्हा ही ढूँढ़ दिया।

मैं और पम्मी तो छाया की शादी के ठाठ देखकर ही दंग रह गए थे, पर चित्रा की शादी देखकर लगा कि वह ठाठ-बाट तो कुछ भी नहीं था। इस बार घरातियों के लिए एक शानदार बँगला किराए पर लिया गया था। बारातियों का इंतजाम तो थ्री स्टार होटल में था। दहेज का सामान देखकर तो आंखें चकाचौंध हो गईं। सब कुछ इम्पोर्टेड था। तीस तोला सोना और चाँदी के बर्तनों का पूरा सेट। साड़ी कोई भी दो हजार से कम की नहीं होगी। पिछली बार की तरह इस बार भी हम विस्मय-विमुग्ध थे। क्या सचमुच भैया की इतनी हैसियत है ?
लेकिन इस शाही सरंजाम के बावजूद बारातियों के मिजाज नहीं मिल रहे थे। बार-बार शिकायतें आ रही थीं, ‘‘रूम सर्विस ठीक नहीं है, ए.सी.काम नहीं कर रहा, कमरों में कलर टी.वी. नहीं है, फोन पर एस.टी.डी. सुविधा नहीं है...।’’
भैया बार-बार फोन पर गिड़गिड़ाए जा रहे थे, ‘‘सर, मैंने तो इस शहर का सबसे पॉश होटल आपके लिए बुक करवाया है। इससे अधिक मैं क्या कर सकता हूँ ?’’

अपने धीर, गंभीर, विद्वान और रौब-दाब वाले भाई को इस तरह गिड़गिड़ाते देखना बड़ा बुरा लग रहा था। उधर होटल वाले बरातियों की बदतमीजियों की शिकायत किए जा रहे थे। भैया अजीब पसोपेश में थे।
उन लोगों की बदतमीजी का प्रमाण तो द्वाराचार के समय ही मिल गया। नाचते-नाचते तीन घंटे तो उन लोगों ने रास्ते में ही लगा दिए। भैया के सारे गण्यमान्य अतिथि भाभी के हाथ में लिफाफा थमाकर बिना खाए-पिए ही चले गए। अपनी बेटी के लिए भैया ने हीरे जैसा दामाद ढूँढ़ा था, पर उसका प्रदर्शन करने की तमन्ना अधूरी ही रह गई।
बाद में लगा कि अच्छा ही हुआ, जो सब लोग जल्दी चले गए। बाद का नजारा जरा भी देखने लायक नहीं था। सब लोग, खासकर लड़के नशे में धुत्त थे। वे लोग अश्लील गाने गा रहे थे। भद्दी फब्तियाँ कस रहे थे। वे लोग कोल्ड्रिंक से होली खेल रहे थे। गिलासों को फुटबॉल की तरह लुढ़का रहे थे। एक-दो वेटरों के साथ तो झूमा-झटकी भी हो गई। सजे-सँवरे पंडाल का उन्होंने पल-भर में नक्शा बदल दिया। कॅटरर के साथ बदसलूकी की, तो वह जाने की धमकी देने लगा। अब भैया कभी उसके हाथ जोड़ रहे थे, तो कभी उन लड़कों के। मेरा तो खून खौल उठा था। बड़ी मुश्किल से अपने ऊपर जब्त किए रही। ऐसा न हो कि अपनी वजह से रंग में भंग हो जाए।
उधर भाभी बार-बार आँसू पोंछते हुए अपने भाग्य को कोस रही थीं, ‘‘काश, एक बेटा होता, तो आज बाप के साथ खड़ा तो होता।’’

वहाँ जो एक सुपुत्र थे, यानी कि सन-इन-लॉ प्रो. जीतेंद्र, बड़े ही निर्लिप्त भाव से सारा तमाशा देख रहे थे। मौका पाते ही उन्होंने हँसते हुए कहा, ‘‘बुआजी, देख रही हैं न, अब इन्हें पता चलेगा कि बारातियों के नखरे क्या होते हैं ? हमारा तो गँवाई गाँव का परिवार था। उसे धर्मशाला में टिका दिया, पाँच मिठाइयों वाली पंगत दे दी, छुट्टी पा गए। हमारा तो खैर कोई सवाल ही नहीं था। हम तो लिहाज में ही मारे गए। पापाजी को अब आनंद आ रहा होगा।’’
पापाजी की फजीहत का सबसे ज्यादा आनंद तो खुद जीतेंद्र ही उठा रहे थे। सब कुछ देखकर उन्हें बड़ा आसुरी संतोष मिल रहा था। मुझे तो छाया पर तरस आ रहा था। दीन-दुनिया से बेखबर, बस अपनी छुटकी में ही मगन थी। एक गोद में, एक पेट में। दोनों बच्चों ने उसे हलकान कर रखा था। दूसरों की ओर ध्यान देने का उसे अवकाश ही नहीं था।
सबसे ज्यादा ताव तो मुझे चित्रा पर आ रहा था। महँगा ब्राइडल मेकअप करवाकर ऐसे तनी बैठी थी, मानो विश्वसुंदरी का खिताब जीत लिया हो। लड़के पापा का अपमान कर रहे थे, मखौल उड़ा रहे थे, बेजा फइमाइशें कर रहे थे। उसे जैसे किसी चीज से सरोकार ही नहीं था। स्टेज पर बैठी मंद-मंद मुस्करा रही थी। अपने नए-नवेले पति से बतिया रही थी।




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