सितारे टूटते हैं - इरफाना अजीज Sitare Tootate Hain - Hindi book by - Irphana Ajij
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सितारे टूटते हैं

इरफाना अजीज

प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 81-288-1371-4 मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :159 पुस्तक क्रमांक : 3458

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प्रस्तुत है पाकिस्तानी शायरी...

Sitare Tootate Hai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पाकिस्तानी कवयित्री इरफ़ाना अज़ीज़ का समकालीन उर्दू शायरी में उल्लेखनीय योगदान है। उनकी शायरी का कैनवस काफ़ी विस्तृत है। उनकी ग़ज़लों और नज़्मों का विषय उनके अपने देश की समस्याओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे तमाम संकीर्णताओं से ऊपर उठकर सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण का सपना देखती हैं।

इन्साँ के साथ रिश्ता ए-इन्साँ अगर रहे,
 दुश्वार ज़िन्दगी का कोई मरहला नहीं।

उनका यही मानवीय दृष्टिकोण उनके नितांत वैयक्तिक शे’रों को भी साधारण जन के दिल की आवाज़ बना देता है। भारतीय पाठकों के लिए उनकी श्रेष्ठ ग़ज़लों और नज़्मों का पहला और अविस्मरणीय संकलन।

प्राक्कथन


आधुनिक उर्दू शायरी को नये आयाम देने में पाकिस्तान के शायरों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यदि समकालीन उर्दू कवयित्रियों की बात करें तो आश्चर्य होता है कि उर्दू शायरी के विकास में जिन शायराओं का उल्लेखनीय योगदान है, वे प्रायः पाकिस्तान से ही हैं। फ़हमीदा रियाज़, अदा ज़ाफ़री, किश्वर नाहीद, इरफ़ाना अज़ीज़, परवीन शाकिर, परवीन फ़ना सैयद, शाहिदा हसन आदि अनेक ऐसे नाम हैं, जिनसे भारत और पाकिस्तान का शायद ही कोई काव्य प्रेमी अपरिचित हो।
इरफ़ाना अज़ीज़ पिछले चार दशकों से शे’र कह रही हैं। 1971 में प्रकाशित अपने पहले मज़मुआ-ए-कलाम ‘बर्गरेज़’ से उर्दू काव्य जगत में उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज़ करायी। उर्दू काव्य प्रेमियों और आलोचकों ने उनका भरपूर स्वागत किया। पश्चिमी साहित्य के गहन अध्ययन तथा यूरोपीय और अमरीकी प्रवास की उनकी अपनी अनुभव सम्पदा ने भी उनकी शायरी को एक नयापन प्रदान किया है। अपनी शायरी के माध्यम से क़दम-क़दम पर प्रेम और शांति के चिराग़ जलाती हुई इरफ़ाना अज़ीज़ की शायरी का कैनवॅस काफ़ी विस्तृत है। उनकी ग़ज़लों और नज़्मों का विषय सिर्फ़ उनके अपने देश की समस्याओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे तमाम संकीर्णताओं से ऊपर उठकर सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण का सपना देखती हैं।

इन्साँ के साथ रिश्ता-ए-इन्साँ अगर रहे
दुश्वार ज़िन्दगी का कोई मरहला नहीं

उनका यही मानवीय दृष्टिकोण उनके नितांत वैयक्तिक शे’रों को भी साधारण जन के दिल की आवाज़ बना देता है। प्रेम कविता का शास्वर विषय है। अपने प्रिय को देखने के बाद उसकी अनुपस्थिति में जो मनःस्थिति होती है, इरफ़ाना ने उसका अद्वितीय चित्रण किया है।

दायरे ख़लाओं में खींचती रही आँखें
देखकर उसे पहरों एक ख़्वाब-सा देखूँ

अजनबी शहर में इरफ़ाना जिस तरह का अनुभव करती हैं, सम्भवतः हम सभी ने ऐसे अवसर पर कभी न कभी ऐसा ज़रूर महसूस किया होगा।

देता है आज कौन सर-ए-रहगुज़र सदा
ये शहर आशना है न आवाज़ आशना

इरफ़ाना के यहाँ छोटी-छोटी अनुभूतियों को इतने मार्मिक ढंग से अभिव्यक्ति दी गई है कि हैरत है।

अजीब बात है कि अक्सर तलाश करता था
वो बेवफ़ाई के पहलू मिरी वफ़ाओं में

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने कभी उनके बारे में कहा था—‘‘इरफ़ाना अज़ीज़ हर ऐतबार से हमारे जदीद शुअरा की सफ़-ए-अव्वल में जगह पाने की मुस्तहक़ हैं।’’ औरआज निश्चित रूप से इरफ़ाना अज़ीज़ अपनी एक अलग पहचान के साथ जदीद शायरों की पहली पंक्ति में खड़ी हुई है।

इरफ़ाना अज़ीज़ की ग़ज़लों और नज़्मों के उर्दू में अनेक संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। भारत में प्रकाशित होने वाली अनेक पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ छपती रहती हैं। लेकिन उनकी रचनाओं का कोई भी संकलन भारत में प्रकाशित नहीं हुआ। उर्दू हिन्दी पाठकों के लिए पहली बार उनकी श्रेष्ठ ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन ‘सितारे टूटते हैं’ देवनागिरी में आपके समक्ष प्रस्तुत हैं। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय काव्य प्रेमियों के लिए यह संकलन अविस्मरणीय सिद्ध होगा।

सुरेश कुमार

1


कब दिल के जख़्म चारागरों1 से रफू हए
जो हाथ दिल की सम्त बढ़े सब लहू हुए

शिकवे हुए कि जौर2 हुए सब हुए तमाम
वो हुस्न-ए-इत्तिफ़ाक3 से जब रू-ब-रू हुए

जिस के सबब हर एक सुख़नफ़ह्म4 है ख़फ़ा
मुद्दत हुई है आप से वो गुफ़्तगू हुए

कीजे तलाश तर्क़-ए-तमन्ना की सूरतें
गुज़रा है इस ज़माना जिगर को लहू हुए

शोरिश5 हर एक मौज-ए-तलातुम6 की थम गयी
शोरीदासर7 ज़माने की जब आबरू हुए

निकले जो मंज़िलों की तमन्ना में खो गये
जो संग-ए-दर पे तेरे झुके सुर्ख़रू8 हुए

1.    चिकित्सकों 2. अत्याचार 3. संयोग का 4. सहृदय 5. उन्माद 6. बाढ़ की लहर 7. विक्षिप्त लोग 8. सम्मानित

2


निगार-ए-गुल पे सभी ज़ख़्म दिल के वारे गये
बहार आयी तो जुल्फ़-ओ-क़बा सँवारे गये

ख़याल-ए-तश्नगी-ए-मौसम-ए-निशात1 कसे
दुखों के ज़हर-ए-हलाहल से लब निखारे गये

तिरी तलाश में खो आये खुद को अहल-ए-तलब2
तिरे फ़िराक़3 में कब रोज़-ओ-शब गुज़ारे गये

शिकस्त-ए-मौज4 नज़र आयी नाखुदा की तरह
समन्दरों से बहुत दूर जब किनारे गये

वो रहगुज़ार सलामत की जिसकी उल्फ़त में
सलीब-ओ-दार5 के क़र्ज़े सभी उतारे गये

1.    आनन्द की ऋतु की तृष्णा का विचार 2. अभिलाषी 3. वियोग 4. लहर की पराजय 5 सलीब और फाँसी

3.


शाख़ों पे जख़्म, फूल सदाओं पे आये हैं
वो रंग शहर-ए-गुल1 की फ़ज़ाओं पे आये हैं

वो सुर्ख़रू है सरमद-ओ-मंसूर की तरह
इल्ज़ाम सारे मेरी वफ़ाओं पे आये हैं

शायद निशस्त-ए-दर्द2 से वाक़िफ़ थे नेशतर3
क्या रंग अब के दिल की क़बाओं पे आये हैं

फिर जैसे हों दिलों के तआकुब4 में फ़ासले
फिर दिन बुरे हमारी दुआओं पे आये हैं

खुशबू की तरह गोशा-ए-जिन्दाँ5 में ऐ सबा
पैग़ाम किसके नाम हवाओं पे आये हैं

1. फूलों का नगर 2. पीड़ा की गोष्ठी 3. नश्तर 4. पीछा करना 5. कारागार का एकांत


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