मोरी रँग दी चुनरिया - मालती जोशी Mori Rang di Chunariya - Hindi book by - Malti joshi
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मोरी रँग दी चुनरिया

मालती जोशी

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2011
आईएसबीएन : 81-7016-718-3 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :130 पुस्तक क्रमांक : 3371

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प्रस्तुत कहानी-संग्रह में नारी जीवन के इन्हीं उतार-चढ़ावों का सजीव चित्रण किया गया है...

Mori rang di chunariya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

शोषण जैसे नारी की नियति बन गया है। आदिम युग से आज तक नारी पिसती ही चली जा रही है। पहले यह शोषण केवल शारीरिक या भावनात्मक स्तर पर ही होता था, पर वर्तमान युग में अर्थतंत्र भी नारी की गर्दन पर सवार हो गया है। अब वह केवल भोग्या या बच्चे जनने की मशीन ही नहीं रह गई है, बल्कि रुपया कमाने का यंत्र भी बन गई है। उसकी अर्जन-क्षमता को जी भरकर निचोड़ा जा रहा है। अभिभावक चाहे पिता हो, चाहे भाई या पति-उनका दृष्टिकोण समान होता है। ससुराल हो या पीहर-इस दुश्चक्र से उसे छुटकारा नहीं मिलता। प्रस्तुत कहानी-संग्रह में नारी-जीवन के इन्हीं उतर-चढ़ावों का सजीव चित्रण किया गया है।

सती


पूरा आँगन ढोलक की थाप से गूँज रहा था। रोज की तरह मोहल्ले-भर की औरतें जुड़ आई थीं और गीतों की कल्पना की लड़ियाँ पिरो रही थीं। कहीं बन्नो के बाबा से, ताऊ से जड़ाऊ कंगन बनवाने का आग्रह था, तो कहीं चाचा और फूफा को कलक्टर दूल्हा ढ़ूँढ़ने के लिए कहा जा रहा था। कहीं बन्नो की अम्मा अपनी बी.ए. पास लाड़ली की घड़ी, सैंडिल और साइकिल की तारीफ कर रही थी, तो किसी गीत में भाभी होने वाले ननदोइया को ताकीद कर रही थी कि जीप या कार लेकर आना। मेरी नकचढ़ी ननद रानी टमटम या बैलगाड़ी में नहीं बैठेगी।

औरतें झूम-झूमकर गा रही थीं। कोई मनचली तो मौज में आकर ठुमका भी लगा देती थी। मस्ती का आलम पूरे जोर पर था इन गीतों की नायिका को इस महफिल से कोई मतलब नहीं था। वह तो छज्जे पर अपनी सखी-सहेलियों से घिरी मेहँदी लगवा रही थी। रचना और मेघना ने उसकी दोनों हथेलियाँ थाम रखी थीं और वे उन पर महीन चित्रकारी कर रही थीं। प्लास्टिक कोन से झरती हुई हरीकंच मेहँदी दुलहिन के हल्दी लगे हाथों पर बड़ी प्यारी लग रही थी।

‘‘क्या बात है नीलम ? तेरा रंग तो इन सात-आठ दिनों में और भी निखर आया है।’’ रमा ने कहा।
‘शादी की खुशी ऐसा ही रंग लाती है पगली ! तुझे जल्दी ही पता चल जाएगा।’’ गौरी ने रमा के चिकोटी काटी। अगले महीने की छब्बीस को उसकी भी तो शादी है।
‘‘शादी की खुशी तो खैर है ही, ‘‘नीलम की भाभी ने कहा, ‘‘पर थोड़ा क्रेडिट मुझे भी तो दो। वह उबटन बनाया है कि बस।’’
‘‘वाह, क्या उबटन बनाया है। पूरा बदन छीलकर रख दिया है।’’
‘‘बड़ी एहसानफरामोश हो। खैर, तुमसे तो यही उम्मीद थी। अपना इनाम तो मैं कुँअरजी से वसूल करूँगी। वो तो देखकर ही दंग रह जाएँगे—क्या यही है वह नीलम, जिसे हम देखकर गए थे।’’
‘‘फेयर एंड लवली।’’ किसी ने उछाला।

‘‘अरे गोली मारो अपनी फेयर एंड लवली’ को। हमारा नुस्खा उससे लाख गुना बेहतर है।’’
‘‘सो तो होगा ही,’’ वंदना ने कहा, ‘तभी तो इतने सालों से भाई साहब को अपने रूपजाल में बाँधे हुए हैं।’’
‘‘अपना राज हमें भी तो बताइये भाभी, प्लीज !’’ लड़कियों ने चिरौरी की।’’

‘‘अरे वाह, मुफ्त में कैसे बता दें !’’ तभी नीचे से उनकी बुलाहट हुई और वे हास्य-विनोद की इस महफिल को बीच में ही छोड़कर नीचे आईं।
मेहँदी के कलाकारों ने सुस्ताने के लिए दस मिनट का मध्यांतर कर दिया था। मौका पाकर गार्गी ने बाल खोल लिये थे और अब वह उँगली के पोरों से उनमें तेल मल रही थी।

‘‘देख नीलम, मैं जताए दे रही हूँ,’’ गार्गी ने कहा, ‘‘आज जितना जी चाहे तेल डलवा लेना, पर कल एक बूँद भी नहीं डालने दूँगी। सुबह अच्छी तरह शैम्पू करा लेना नहीं तो कोई भी हेयर स्टाइल नहीं बना पाएगी। फिर तो परंपरागत लंबी चोटी डालकर ही जयमाला के लिए जाना पड़ेगा।’’
तभी नाइन मौसी वहाँ प्रकट हुई।

‘‘तुम क्या बाल्टी-भर महावर घोलकर लाई हो मौसी !’’ नीलम ने हँसकर पूछा। पर उनकी बात पूरी होने से पहले ही मौसी ने पूरी बाल्टी उसके सिर पर उड़ेल दी।
‘नहीं !’’ वह जोर से चीखी और पसीना-पसीना होकर उठ बैठी।
बगल में लेटी कांता भाभी भी एकदम जाग गई और उसे सहलाते हुए पूँछने लगीं, ‘‘क्या हुआ निम्मो ? कोई बुरा सपना देखा क्या ?’’

तब तक मौसी भी दरवाजे से मुँह डालकर पूछ चुकी थीं, ‘‘क्या हुआ ? नींद में कोई बर्याया था क्या ?’’
और नीलम आँखें फाड़कर अपनी जिठानी को घूरे जा रही थी।
बड़ी देर बाद उसे होश आया और शर्म भी। कितनी मुश्किल से आजकल घर में किसी की आँख लग पाती है : और उसने आधी रात को यह हंगामा कर डाला ?

‘‘सॉरी भाभी !’’ उसने दबी जबान से कहा, ‘‘दरअसल जी बहुत घबरा रहा है। लगता है मैं घर क्यों गई ! अगर आज ही कुछ हो गया तो ?’’
‘‘धत् पगली, ‘ऐसा अशुभ बोलते है कहीं ! चल सो जा।’’

नींलम दुबारा लेट गई। उसने चादर से मुँह ढाँप लिया। कांता भाभी वत्सल भाव से उसे धीरे-धीरे थमकाती रहीं।
कुछ ही देर में उसके क्लांत-शांत शरीर पर नींद ने अपना आँचल डाल दिया पर दुःस्वप्न ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। इस बार सहेलियों के हुजूम में कांता भाभी का चेहरा भी आकर जुड़ गया था और उसे देखकर उसे बार-बार दहशत हो रही थी। नीलम बराबर चिरौरी कर रही थी,

‘‘भाभीजी, आप जाइए भी, आप जैसों का यहाँ क्या काम है ?’’ पर कांता भाभी थीं कि जमकर बैठ गईं थीं। नहीं, बैठी कहाँ थीं ? बाल्टी लेकर ही तो आईं थीं। नाइन मौसी तो उसके पाँव में महावर लगा रही थी। सर पर पानी तो कांता भाभी ने ही उड़ेला था। चादर के भीतर वह पसीने से नहा गई थी। पर दम साधकर वैसी ही पड़ी रही। हाथ भर के अंतर पर कांता भाभी लेटी हैं और उनकी ओर देखने का साहस उसमें नहीं है। शाम को उन्हें देखा है, तब से वह सहज नहीं हो पा रही है।
शाम को ही वे लोग भोपाल से आई थीं।

घर का सामान रखकर दोनों सास-बहू गिरीश को देखने सीधे अस्पताल पहुँची थीं। कांता भाभी को उसने पूरे तीन साल बाद देखा था। उनका वह निराभरण रूप देखकर वह धक् से रह गई थी। झुककर पैर छूने का भी उसे होश नहीं रहा था।
तीन साल पहले अशोक भैया, गिरीश के मौसेरे भाई, एक दुर्घटना में चल बसे थे। पूरे परिवार पर वज्रपात ही था वह। सब लोग भागे-भागे शोकाकुल परिवार को धीरज बँधाने पहुँचे थे। नीलम भी अपने सास-ससुर के साथ गई थी। उस समय पूरे घर में ही शोक का साम्राज्य था।

 पहनने-ओढ़ने की सुध किसी को नहीं थी। पर इस बात को तो तीन साल हो गए। भाभी को देखकर लगा जैसे वह कल ही की बात है। पूरा इतिहास मन में फिर ताजा हो उठा। वह गुमसुम हो गई। उसकी उदासी को सबने लक्ष्य भी किया, पर वे लोग यही समझे कि गिरीश की बिगड़ती हालत को देखकर वह टूट गई है। पस्त हो गई है।

जब वे लोग उठीं तो नीलम की सास ने अपनी बहन को रोक लिया और भाभी से बोलीं, ‘‘कांता : आज तू इसे घर लिवा ले जा। पिछली दस सालों रातों से इसकी पलक नहीं झपकी है। जिज्जी थोड़ी देर को मेरे पास बैठ लेंगी। बड़का मेरा खाना लेकर आएगा, चाहेंगी तो उसके साथ भेज दूँगी।’’

नीलम ने थोड़ी आनाकानी की, पर सबने मिलकर जैसे उसे घर ठेल ही दिया। अस्पताल से नीचे उतरकर सड़क पर आते ही भाभी ने पूछा, ‘‘कैसे चलेंगे निम्मो बस से या टैंपो से ?’’
नीलम अब भी उनसे आँख नहीं मिला पा रही थी फिर भी उसने हिम्मत करके पूछा, ‘‘भाभी, आप सफर से बहुत थख तो नहीं गईं ?’’
‘नहीं रे ! सफर ही कितना-सा था ?’’

‘‘तो पैदल चलें ? दरअसल चारदीवारी में रहते-रहते मेरा दम घुटने लगा। घर से अस्पताल, अस्पताल से घर-यही भागमभाग मची हुई है। जरा खुली हवा में साँस लेने को जी चाह रहा है।’’
भाभी ने करुणा भरी दृष्टि से उसके मुरझाए चेहरे को देखा और स्नेहिल स्वर में बोलीं, ‘‘चल।’’
कुछ क्षण वे लोग मौन ही चलती रहीं। और फिर नीलम ने एकाएक पूछ लिया, ‘‘भाभी, क्या आप दफ्तर में भी इन्हीं कपड़ों में जाती हैं ?’’

भाभी ने चौंककर उसकी ओर देखा पर उसके इस बचकाने प्रश्न का बुरा नहीं माना। बच्ची ही तो है बेचारी।

फीकी हँसी हँसकर बोली, ‘‘अम्माँजी का बस चले तो दफ्तर भी इन्हीं कपड़ों में भेज दें। पहले कुछ दिन जाती भी रही। पर दफ्तर की दो-तीन दबंग औरतें एक दिन घर आ गईं। उन्होंने अम्माजी को खूब जिरह की। तब से कुछ नहीं कहतीं। अब तो मैं दफ्तर जाते हुए ढंग की साड़ी पहनती हूँ। हल्का-सा क्रीम-पाउडर भी लगा लेती हूँ। पर अम्माँजी कुछ नहीं कहतीं। देखकर भी अनदेखा कर जाती हैं पर और कभी करने लगूँ तो झट कह देती हैं, ‘आदमी मर गया पर इसका मन नहीं मरा।’’
‘‘क्या ?’’ नीलम तो हतप्रभ रह गई थी।

‘‘सच कह रही हूँ निम्मो ! रात-दिन उन्हें बस शिकायत है। पर मैं क्या करूँ  ? आदमी तो पट्ट से मर गया। कुछ सोचने-समझने का भी अवसर नहीं दिया। पर मन क्या इतनी आसानी से मरता है ? बड़े-बड़े साधु-संन्यासी, ऋषि-मुनि तो मन को मार नहीं सके। अम्मा जी मुझसे कहती हैं...’’ भाभी की आवाज में एक अजीब कसैलापन था।

कुछ पल फिर सन्नाटे में बीत गए। कुछ देर बाद नीलम ने कहा, ‘मौसीजी तो शुरू से ही मुँहफठ हैं पर सोच रही थी कि आपकी नौकरी के कारण वे आपसे दबती होंगी। अब तो क्वार्टर भी आपके नाम हो गया है न !

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