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उपन्यास >> मुझे चाँद चाहिए

मुझे चाँद चाहिए

सुरेन्द्र वर्मा

19.95

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 81-7119-134-7 पृष्ठ :571
मुखपृष्ठ : सजिल्द पुस्तक क्रमांक : 3262
 

परम्परा और आधुनिकता की ज्वनशील टकराहट से दीप्त रंगमंच....

Mujhe chand chahiye

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


कई दशकों से हिन्दी उपन्यास में छाये ठोस सन्नाटे को तोड़ने वाली कृति आपके हाथों में है, जिसे सुधी पाठकों ने भी हाथों-हाथ लिया है और मान्य आलोचकों ने भी !
शाहजहाँपुर के अभाव-जर्जर, पुरातनपंथी ब्राह्मण-परिवार में जन्मी वर्षा वशिष्ठ बी.ए. के पहले साल में अचानक एक नाटक में अभिनय करती है और उसके जीवन की दिशा बदल जाती है। आत्माभिव्यक्ति के संतोष की यह ललक उसे शाहजहाँनाबाद के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा तक लाती है, जहाँ कला-कुंड में धीरे-धीरे तपते हुए वह राष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमता प्रमाणित करती है और फिर उसके पास आता है एक कला फिल्म का प्रस्ताव !

आत्मान्वेषण और आत्मोपलब्धि की इस कंटक-यात्रा में एक ओर वर्षा अपने परिवार के तीखे विरोध से लहूलुहान होती है और दूसरी ओर आत्मसंशय, लोकापवाद और अपनी रचनात्मक प्रतिभा को मांजने-निखारने वाली दुरूह, काली प्रक्रिया से क्षत-विक्षत। पर उसकी कलात्मक आस्था उसे संघर्ष-पथ पर आगे बढ़ाती जाती है।
वस्तुतः यह कथा-कृति व्यक्ति और उसके कलाकार, परिवार, सहयोगी एवं परिवेश के बीच चलने वाले सनातन द्वंद्व की और कला तथा जीवन के पैने संघर्ष व अंतर्विरोधों की महागाथा है।

परंपरा और आधुनिकता की ज्वलनशील टकराहट से दीप्ति रंगमंच एवं सिनेमा जैसे कला-क्षेत्रों का महाकाव्यीय सिंहावलोकन ! अपनी प्रखर संवेदना और बेधक भाषा के लिए सर्वमान्य सिद्धहस्त कथाकार तथा प्रख्यात नाटककार की अभिनव उपलब्धि !

अचानक मुझमें असंभव के लिए आकांक्षा जागी। अपना यह संसार काफी असहनीय है, इसलिए मुझे चंद्रमा, या खुशी चाहिए—कुछ ऐसा, जो वस्तुतः पागलपन-सा जान पड़े। मैं असंभव का संधान कर रहा हूँ...देखो, तर्क कहाँ ले जाता है—शक्ति अपनी सर्वोच्च सीमा तक, इच्छाशक्ति अपने अंतर छोर तक ! शक्ति तब तक संपूर्ण नहीं होती, जब तक अपनी काली नियति के सामने आत्मसमर्पण न कर दिया जाये। नहीं, अब वापसी नहीं हो सकती। मुझे आगे बढ़ते ही जाना है...

कालिगुला

1
विष-वृक्ष


 अगर मिस दिव्या कत्याल उसके जीवन में न आतीं, तो वह या तो आत्महत्या कर चुकी होती या रूँ-रूँ करते चार-पाँच बच्चों को सँभालती, किसी क्लर्क की कर्कश, बोसीदी जीवन-संगिनी होती।
पिछले साल जब वर्षा इंटरमीडिएट में थी, तभी मिस कत्याल मिश्रीलाल डिग्री कॉलेज में आयी थी—लखनऊ से। वह दोनों किस्म की अंग्रेजी पढ़ाती थीं---सामान्य और साहित्य। साथ ही वह जनाने छात्रावास की वार्डन भी थीं। गेट से अंदर घुसते ही बायीं ओर उनका एक छोटा-सा सुंदर बंगला था। पोर्च में उनकी, उन्हीं के जैसी, नाजुक-सी सुंदर कार खड़ी रहती थी।

मिस कत्याल ने मिश्रीलाल डिग्री कॉलेज के इतिहास में भाव पक्ष और कला पक्ष—दोनों दृष्टियों से नया, स्वर्णिम अध्याय जोड़ा था। वे खूब गोरी और आकर्षक थीं। कभी चूड़ीदार-कमीज पहनकर लावण्यमयी युवती बन जातीं, कभी लहराते पल्लू वाली साड़ी बांधकर गरिमामय महिला। कभी बालों की दो चोटियाँ पीछे डोलतीं, कभी बड़ा-सा जूड़ा बन जाता। वेश कोई भी हो, लेकिन जैसे लक्ष्मी के साथ समृद्धि चलती है, वैसे ही अपने विषय का अधिकार उनके साथ-साथ चलता था। कॉलेज की वह अकेली अध्यापक थीं, जिनके हाथों में नोट्स की कापी नहीं देखी गयी। मिस कत्याल जब कॉलेज के गलियारों में चलती हैं, तो विद्यार्थी-समुदाय की निगाहों से सम्मान की रेड कार्पेट बिछती जाती।

संस्थापक-दिवस पर अब तक सेठ मिश्रीलाल की दानशीलता पर भाषण होते थे, जिसके प्रारंभ में मंगलाचरण के समान यह कविता पढ़ी जाती थी, ‘जीवन में मिश्री घोल गये तुम मिश्रीलाल पालरवाले/जड़ता के फाटक खोल गये तुम ज्ञान—जड़ी झालरवाले...।’ मिस कत्याल ने आते ही इस कार्यक्रम को ‘ध्रुवस्वामिनी’ के मंचन के रूप में मनाया (कॉलेज का यह पहला नाट्य-प्रदर्शन था)। शहर के मुख्य बाजार में ‘नारी सिंगार निकेतन’ के बाहर रखा पोस्टर उत्सुक’ ‘आंखों की बंदनवार’ से शोभित होने लगा। शहर, जो एक सलोनी युवती के कुशल कार-चालन से चौका हुआ था, इस नाटक के प्रदर्शन से स्तब्ध रह गया। मिस कत्याल की प्रसिद्धि मिश्रीलाल डिग्री कॉलेज की सीमाएँ पार करके नगर को आलोड़ित करने लगी।
यह वर्षा वशिष्ठ के जीवन का बेहद संकटकालीन दौर था।
पिछले महीने से उसकी ब्रा का साइज और बढ़ गया था। उसके शरीर के अंग तथा कटाव और मांसल मुखर हो रहे थे। दिन पर दिन तीखी होती हुई समस्या यह थी कि देह के इस निखरते वसंत का उसके मन की ऋतु से कोई तालमेल नहीं था। उसके मन में लगातार शोकगीत बजते रहते थे।

क्यों ? कुछ सवालों का डंक उसे हमेशा चुभता था। वह क्यों पैदा हुई ? उसके जीवन का उद्देश्य क्या है ? क्या जीवन की प्रकृति वैसी ही होती है, जैसी 54, सुल्तान गंज की ? क्या उसे भी वैसा ही जीवन जीना होगा, जैसा अम्माँ, दद्दा और जिज्जी का है ?

अपने रक्त-संबंधियों के लिए उसके मन में जो भावनाएँ थीं, वे हमदर्दी, उदासीनता, करुणा और आक्रोश के दायरे में स्पंदित होती रहतीं। इन दिनों अंतिम जज्बा उफान पर था।

किशनदास शर्मा प्राइमरी स्कूल में संस्कृत के अध्यापक थे। शहर के पुराने, निम्नमध्य वर्गीय इलाके में सँकरी, ऊबड़खाबड़ गलियों और बदबूदार नालियों के बीच उनका पंद्रह रुपया महीना किराये का आधा कच्चा, आधा पक्का दुमंजिला मकान था। बड़ा बेटा महादेव स्टेट रोडवेज में क्लर्क था। दो साल पहले उसका तबादला पीलीभीत हो गया था। बड़ी बेटी गायत्री माँ पर गयी थी—गोरी, आकर्षक। पढ़ाई के नाम से उसे रुलाई आती थी, इसलिए इंटरमीडिएट के बाद उसने विवाह के शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा कर घर सँभाल लिया। इससे माँ को बहुत राहत मिली, क्योंकि ‘जिंदगी भर कोल्हू में जुते रहने के बाद अब बचा-खुचा समय तो सीताराम-सुमिरन में लगे।’ सबसे छोटी नौ वर्ष की गौरी उर्फ झल्ली थी। उसके ऊपर तेरह वर्ष का किशोर और बीचों-बीच की साँवली, लंबी-छरहरी, बड़ी-बड़ी आँखों वाली सिलबिल उर्फ शारदा शर्मा।
अनुष्टुप के बिना 54, सुल्तानगंज का पोर्टेट पूरा नहीं होता। यह तोता तुलसी के चौरे के पास बरामदे की दीवार से लटका रहता था। यह हरा जीवधारी अपने नाम को सार्थक करते हुए (इस छंद को काव्यशास्त्र में उपदेश देने के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है।) मुँहअँधेरे से चालू हो जाता था, ‘‘झल्ली, सीताराम बोला’’, ‘‘किशोर, गायित्री-मंत्र पढ़ लिया ?’’ सिलबिल के साथ अनुष्टुप का संबंध वैसा ही था, जैसे बाघिन का हिरनी से होता है। जैसे ही सिलबिल सामने आती, अनुष्टुप की टोकाटाकी शुरू हो जाती, ‘‘सिलबिल धीरे बोलो,’’ ‘‘सिलबिल, तुलसी में पानी नहीं दिया ?’’ ‘सिलबिल, देर लगा दी।’’

सिलबिल की पहली रणनीति अनुष्टुप को अपनी ओर फोड़ने की बनी। उसने मीठा ग्राइपवाटर पिलाया, सर्दी से पिंजरा धूप में रखा, मिश्री की डली खिलायी। पर जब इस पर भी अनुष्टुप ने अपने छंद का मूल-भाव नहीं छोड़ा, तो उसने गोबरभरी हरी मिर्च पिंजरे की कटोरी में रख दी। इस पर अनुष्टुप ने ‘सिलबिल कपटी है’(उसका शब्द-चयन रीतिकाल के निकट पड़ता था और जीवन-दृष्टि भक्ति काल के !) की रट लगा कर माँ की डाँट की भूमिका बना दी।
सिलबिल का विचार था, तोते का नाम सही मानों में ‘पृथ्वीभर क्षमा’ होना चाहिए (जिस छंद का व्यवहार आक्षेप, क्रोध और धिक्कार के लिए किया जाता है। पिता की आलमारी से महाकवि क्षेमेंद्र लिखित ‘सुवृत्त-तिलक’ के पन्ने उसने पलट लिये थे)।

अनुष्टुप के संदर्भ में सिलबिल जो नहीं कर पायी, उसका खतरा अपने लिए उसने जरूर उठा लिया। हाईस्कूल का फॉर्म भरते समय (आत्मान्वेषण की जीवनभर चलनेवाली सुदीर्घ यात्रा की शुरुआत में) सबसे पहले अपनी विरासत को नकारते और आत्मशुद्धि करते हुए उसने अपना नाम बदल लिया—वर्षा वशिष्ठ !

सिलबिल का घरेलू नामकरण तब किया गया था, जब वह कुछ ही हफ्तों की थी। लगभग तीन-चार साल तक उसे संज्ञा की सार्थकता बनाये रखी। चलते समय उसकी चड्डी फिसलती रहती थी, फ्राक से ही अचानक बह आयी नाक पोंछने से उसे कोई परहेज न था और कुछ नीचे गिराये बिना उसके लिया खाना-पीना मुश्किल था। लेकिन पाँच की उम्र तक धीरे-धीरे सिलबिल ने अपने संबोधन को निरर्थक सिद्ध कर दिया। समय के साथ-साथ शर्माजी को इस बात का एहसास हो गया था कि यशोदा और बच्चों से भिन्न है। वह दूसरों से उल्टे एकांतप्रिय और चिंतनशील थी। उन्होंने देखा था कि गहराती शाम को वह छत पर पड़ी खरहरी चारपाई पर पत्रिका पढ़ रही है या छुट्टी की दोपहर खोयी निगाह से सामने देखती हुई कुछ सोच रही है (जिसके पहले पैसे की कलेजा निचोड़ सनातन कमी के कारण कोई पारिवारिक कलह संपन्न हो चुकी होती थी)।

घर में शुद्ध घी की अविद्यमानता के चलते वह दूसरे बच्चों के मुकाबले बिना चूँ-चपड़ किये रूखी रोटी खा लेती थी और त्योहार पर नये कपड़ों के लिए जिद करते हुए भी उसे नहीं पाया गया। बस, ऐसे अवसरों पर उसके चेहरे पर धीरे-धीरे सख्ती-सी आने लगी, जो आगे चलकर घर की चारदीवारी में घुसने पर उसकी आँखों में आ जाने वाले स्थायी भाव में बदल गयी।

जब संध्या समय शर्माजी को बाजार में मिश्रीलाल इंटर कॉलेज के अध्यापक जनार्दन राय ने बताया कि सिलबिल ने अपना नाम बदल लिया है, तो कुछ पलों के लिए शर्माजी आवाक् रह गये। उन्होंने यह तो सुना था कि फलानी लड़की घर से भाग गयी, ढिकानी ने आत्महत्या कर ली, लेकिन ऐसे हादसे से वह अब तक दो-चार नहीं हुए थे। उनके वंश की सात पीढ़ियों के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ था।
जब शर्माजी घर में घुसे, तो काफी विचलित थे। उन्होंने अपना छाता आंगन-से लगे बरामदे में खूँटी पर टाँगा, चप्पलें एक कोने में उतारीं, सफेद टोपी उतारकर दूसरी खूँटी पर लटकायी।
गायत्री रसोई में मसाला भून रही थी। उसकी माँ आँगन में बैठी लौकी काट रही थी। किशोर जीने की निचली सीढ़ी पर बैठा अपने जूतों पर पालिश कर रहा था।

‘‘दद्दा, चाय पियोगे ?’’ गायत्री ने रसोई के द्वार पर आकर पूछा।
इसका जवाब दिये बिना शर्माजी ने पूछा, ‘‘सिलबिल घर में है क्या ?’’
गायत्री ने माँ की ओर देखकर कहा, ‘‘ऊपर है।’’
‘‘सिलबिल....’’ शर्माजी ने पुकार लगायी।
‘‘सिलबिल...’’ अनुष्टुप ने दोहराया।
माँ का तरकारी काटना रुक गया और किशोर की जूतों की पॉलिश भी।
ऊपर मुंडेर से स्वर सुनायी दिया, ‘‘क्या ?’’
उत्तर माँ ने दिया, ‘‘दद्दा बुलाते हैं।’’
शर्माजी दरी पर बैठ चुके थे। उन्होंने बगल में रक्खा तम्बाकू का डिब्बा उठा लिया था।
सिलबिल सहजता से नीचे आ गयी, ‘‘क्या है ?’’
शर्माजी ने उसकी ओर देखा (रंगमंच की शब्दावली में यह नाटकीय समक्षता थी। शर्माजी को यह पता नहीं था कि आने वाले समय में सिलबिल ऐसे अनेक अवसर सुलभ करवायेगी) !
‘‘तुमने अपना नाम बदल लिया है ?’’

सिलबिल ने अपराध-भाव से नीचे नहीं देखा। वह पूर्ववत् सामने देखती रही, ‘‘हाँ।’’ उसका स्वर स्थिर था।
‘‘काहे ?’’
‘‘मुझे अपना नाम पसंद नहीं था।’’
पल भर की चुप्पी रही।

‘‘अगर हाईस्कूल में न बदलती, तो आगे चलकर बहुत मुश्किल होती। अखबार में छपवाना पड़ता।’’ सिलबिल ने आगे जोड़ा—वैसे ही समतल स्वर में।
इस नाटकीय दृश्य के तीनों दर्शक भी आवाक् थे। जैसे मंत्रबिद्ध-से बाप-बेटी को देखे जा रहे थे। जब शर्माजी ने सिलबिल को पुकारा, तो माँ और गायत्री के मन को आशंका कँपा गयी। किशोर भी मन-ही-मन सिहर उठा। सिलबिल ने क्या किया है ? कारण स्पष्ट होते ही  आतंक तिरोहित हो गया। माँ और गायत्री ने छुटकारे की साँस ली।
‘‘तुम्हारे नाम में क्या खराबी है ?’’ पिता ने कड़वे स्वर में पूछा।



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