साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबन्ध - महादेवी वर्मा Sahityakar Ki Aastha Tatha Anya Nibandh - Hindi book by - Mahadevi Verma
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साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबन्ध

महादेवी वर्मा

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1995
आईएसबीएन : 0000000 मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :174 पुस्तक क्रमांक : 3236

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महादेवी का विवेचनात्मक गद्य....

Sahityakar Ki Aastha Tatha Anya Niband

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘महादेवी का विवेचनात्मक गद्य’ के नाम से इस रचना के कतिपय निबन्ध पहले हो चुके हैं, किन्तु इसको वांछित पूर्णता देने के लिए निबन्धों का परिवर्द्धन कर दिया गया है।

•    महादेवी जी का साहित्य-विषयक प्रतिमानस किसी भी प्रकार की पूर्वग्रह-प्रवृत्ति से सीमित न होकर जीवन के विविधता के साथ संचरणशील है।

•    जीवन के विविध मूल्यों के सम्बन्ध में इतना व्यापक और सुसंगत दृष्टिकोण उपस्थिति करने के कारण विवेचना आधुनिक समालोचना के लिए अभिनव पथ निर्माण करने में सफल सिद्ध हुई है।

•    सामयिक साहित्यक प्रवृत्तियों के विवेचन के साथ-साथ इनकी समालोचना सांस्कृति एवं ऐतिहासिक अनुशीलन की दृष्टि से भी अत्यन्त उपयोगी है। इनका सन्तुलित तथा संयमित विवेचन आधुनिक समालोचना की गति के लिए प्रेरक और प्राणप्रद सिद्ध हुआ है।



लोक हित-तन्त्री सँभाले
सिंधु लहरों पर अधिश्रित,
बह चला कवि क्रान्तदर्शी
सब दिशाओं में अबाधित !

 

विज्ञप्ति

छायावाद युग ने नये काव्य की सृष्टि के साथ एक नये काव्य-चिन्तन की नये काव्य-शास्त्र की, नये काव्यालोचन की भी नींव रखी, तो यह स्वाभाविक ही था। समालोचन की इस प्राणवन्त प्राणाली में, अनुभव से परिपुष्टि इस चिंतन में पाठकों को शिक्षित करने के साथ एक नये काव्य-सिद्धान्त की स्थापना का भी उद्देश्य रहा तो आश्चर्य की बात नहीं। जीर्ण-शीर्ण परम्परा से आबद्ध ह्रासोन्मुख-युग में कवि, जब पाठकों की रसज्ञता के प्रति आश्वस्त नहीं रहता है तब उसके लिए काव्य से स्पष्टीकरण की विवशता अनिवार्य हो उठती है।

कवि समालोचक की दृष्टि में काव्य-सृष्टि के प्रति एक प्रयत्क्ष-साक्ष्य की स्पष्टता और तत्परता तो होती है, सृजन के विभिन्न और विविध तथ्यों से परिचित होने के नाते उसकी मान्यताओं का बोधगम्य और विश्वसनीय होना भी सहज होता है। स्वयं कवि के स्वानुभूति मार्मिक स्पंदनों से मुखारित होने के कारण उसकी विवेचना अपनी प्रेषणीयता और प्रभविष्णुता में भी अमोघ रहती है।

छायावादी कवियों ने अपनी भूमिका में तथा वक्तव्यों और विज्ञप्तियों द्वारा अपने काव्यात्मक दृष्टिकोण को  स्पष्ट करने की सफल और सार्थक चेष्टाएं की हैं। महादेवी जी ने ऐसी भूमिकाएँ लिखी हैं। जो छायावाद-युग मात्र की भूमिकाएं मानी जा सकती हैं। वस्तुतः वे छायावाद की सबसे समर्थ समालोचक हैं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता निस्संगता और काव्य को जीवन की विशाल भूमि पर रखकर परखने की क्षमता  है। भारतीय साहित्य के अध्ययन-मनन से पुराने कसौटी तो उनके पास है ही, आवश्यकता के अनुसार युगानुरूप नवीन कसौटी गढ़ लेने की सर्जनात्मक शक्ति का भी उनमें प्राचुर्य है। यही कारण है कि उनकी विवेचना शास्त्रज्ञ आचार्य की कठोर बौद्धिक रेखाओं से घिरी न होकर जीवन को संसिक्त करने वाले भावना-प्रपात की तरह तरल-स्वच्छ और सतत् प्रसरणशील है।

बाह्य जीवन की स्थूलता और अन्तर्जन की सूक्ष्मता के व्यापक अनुभव चिंतन और मनन से प्राप्त सत्य, शिव और सौन्दर्य के बल पर समालोचक के पूर्व निर्मित सिद्धान्तों और परम्परापोषित विचारों को चुनौती देते हुए काव्य के सच्चे मापदण्ड स्वयं कवि की रचनाओं से ही खोजने का उन्होंने जो उचित आग्रह किया है, वह समालोचन के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन के साथ काव्यालोचन की नयी प्रणाली का भी स्वस्थ सूत्रपात कराता है।

हिन्दी समीक्षा के स्वरूप में उनकी इस मौलिक देन का ऐतिहासिक महत्त्व अक्षुण्ण रहेगा, इसमें सन्देह नहीं।
यदि पुरानी काव्य-लीक के प्रेमी और छायावाद के अकारण विरोधी तथा कथित आलोचकों ने उनकी संश्लेषणात्मक विवेचना का अध्ययन किया होता तो उनकी आलोचना की वह हास्यास्द स्थिति न होती, जो सबके सामने प्रत्यक्ष है।

महादेवी जी की समीक्षा की मुख्य कसौटी अनुभूति, विचार और कल्पना से समन्वित उनका जीवन-दर्शन है, जो समीक्षा की प्रगति के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुआ है। उनकी मान्यता है- ‘किसी मानव समूह को, उसके समस्त परवेश के साथ तत्वतः जानने के लिए जितने माध्यम उपलब्ध हैं उनमें सबसे पूर्ण और मधुर उसका साहित्य ही कहा जाएगा। साहित्य में मनुष्य का असीम, अतः अपरिचित और दुर्बोध जान पड़ने वाला अन्तजर्गत बाह्य-जगत में अवतरित होकर निश्चित परिधि तथा सरल स्पष्टता में बँध जाता है तथा सीमित, अतः चिर परिचय के कारण पुराना लगने वाला बाह्यजगत अन्तर्जगत के विस्तार में मुक्त होकर चिर नवीन रहस्यमयता पा लेता है।

इसी प्रकार हमें सीमा में असीम की और असीम में संभावित सीमा की अनुभूति युगपद् होने लगती है। दूसरे शब्दों में हम कुछ क्षणों में असंख्य अनुभूतियों और विराट ज्ञान के साथ जीवित रहते हैं, जो स्थिति हमारे शान्त जीवन को अनन्त जीवन से एकाकार कर उसे विशेष सार्थकता और सामान्य गन्तव्य देने की क्षमता रखती है। प्रवाह में बनने मिटने वाली लहर नव-नव रूप पाती हुई लक्ष्य की ओर बढ़ती रहती है परंतु प्रवाह से भटककर अकेले तट से टकराने और बिखर जाने वाली तरंग की यात्रा वहीं बालू–मिट्टी में समाप्त हो जाती है। साहित्य हमारे जीवन को, ऐसे एकाकी अंत से बचाकर उसे जीवन के निरन्तर गतिशील प्रवाह में मिलाने का सम्बल देता है।’

‘धरती के प्रत्येक कोने और काल के प्रत्येक प्रहर में मनुष्य का हृदय किसी उन्नत स्थिति के भी पाषाणीकरण को अभिशाप रहा है। इस स्थिति से बचने के लिए उसने जितने प्रयत्न किए हैं, उनमें साहित्य उनका निरन्तर साक्षी रहा है।’

‘दर्शन पूर्ण होने का दावा कर सकता है, धर्म अपने निभ्रान्त होने की घोषणा कर सकता है, परन्तु साहित्य मनुष्य की शक्ति-दुर्बलता, जय-पराजय, हास-अश्रु और जीवन-मृत्यु की कथा है। वह मनुष्य-रूप में अवतरित होकर स्वयं ईश्वर को भी पूर्ण मानना अस्वीकार कर देता है। पर इस स्वेच्छा स्वीकृति या परिवर्तनशीलता से जीवन और उसके विकास की एकता का सूत्र भंग नहीं होता।’
 
 ‘नदी के एक होने का कारण उसका पुरातन जल नहीं, नवीन तरंग-भंगिमा है। देश-विदेश के साहित्य के लिए भी यही सत्य है। प्रत्येक युग के साहित्य में नवीन तरंगाकुलता उसे मूल प्रवाहिनी से विच्छिन्न नहीं करती, वरना उन्हीं नवीन तरंग-भंगिमाओं की अनन्त आवृतियों के कारण मूल प्रवाहिनी अपने लक्ष्य तक पहुँचने की शक्ति पाती है।’

‘इस दृष्टि से यदि हम भारतीय साहित्य की परीक्षा करें तो काल, स्थिति, जीवन, समाज, भाषा, धर्म आदि से सम्बन्ध रखने वाले अन्नत परिवर्तनों की भीड़ में भी उसमें एक तारतम्यता प्राप्त होगी जिसके अभाव में किसी परिवर्तन की स्थिति सम्भव नहीं रहती। समुद्र की बेला में जो धरती व्यक्त है उसी की अव्यक्त सत्ता तल बनकर समुद्र की अपार जलराशि को सँभालती हैं। समुद्र के जल का व्यवधान पार करने के लिए तट की धरती चाहिए और समुद्र को जल का व्यवधान बने रहने के लिए तल की धरती चाहिए। साहित्य के पुरातन और नूतन के अविच्छिन्न सम्बन्ध के मूल में भी जीवन की ऐसी ही धरती है।’

‘सत्य निर्मित नहीं’ किया जाता, उसे साधना से उपलब्ध किया जाता है, वह आज भी प्रमाणित है। वैदिक ऋषि भी अपनी अन्तश्चेतना में जीवन के रहस्यमय सत्य की अनुभूति प्राप्त करता है और उसे शब्दायित करके दूसरों तक पहुँचाता है।

यह सत्य उसके तर्क-वितर्क का परिणाम नहीं है, न वह इसका कर्तव्य स्वीकार कर सकता है। जो नियति सृष्टि को संचालित करते हैं ऋषि उनका द्रष्टा मात्र है। जीवन के अव्यतक्त रहस्यों के सृजन का तो प्रश्न ही क्या, जब जगत के भौतिक तत्वों की खोज करने वाला आज का वैज्ञानिक भी यह कहने का साहस नहीं करता है कि वह भौतिक तत्त्वों का स्रष्टा है।

कवि या कलाकार को भी जीवन के किसी अन्तर्निहित सामंजस्य और सत्य की प्रतीति इसी क्रम से होती है, चाहे भाषा, छन्द और अभिव्यक्ति पद्धति उसकी व्यक्तिगत हो। जल की एकता के  कारण ही जैसे उसके एक अंश में उत्पन्न कम्पन्न दूसरी ओर तक पहुँच जाता है, वैसे ही चेतना की अखण्ड व्याप्ति अपने ऋत रूप सत्य को भिन्न चेतना खण्डों के लिए सहज सम्भव कर देती है’।

अपने इसी बोध-विचार और जीवन दिर्शन के आधार पर महादेवी जी ने काव्य कला के निवेचन-विश्लेषण में यह आर्ष वाक्य लिखा है। ‘सत्य काव्य का साध्य और सौदर्य उसका साधक है। एक अपनी एकता में असीम रहता है और दूसरा अपनी अनेकता में अनंत इसी से साधक के परिवर्तन-स्निग्धा खण्ड रूप में साध्य की विस्मय भरी अखण्ड स्थिति तक पहुँचने  का क्रम आनन्द लहर पर लहर उठाता हुआ चलता है’। इस कथन में उनकी काव्य संबंधी धारणा स्पष्ट है। व्यक्त अनेकता में अन्तर्निहित एकता की खोज करने वाले की आस्था सामंजस्य और समन्वय पर ही आरुण रहती है। साहित्यलोचन में उनका दृष्टिकोण इसी पृष्ठाधार पर संस्थित है। उन्होंने लिखा भी है –

‘जीवन को सब ओर से स्पर्श करने वाली दृष्टि मूलतः और लक्ष्यतः सामंजस्य-वादिनी होती है। साहित्य का आधार कभी आंशिक जीवन नहीं होता है, सम्पूर्ण जीवन होता है। साहित्य में मनुष्य की बुद्घि और भावना इस प्रकार मिल जाती है जैसे धूप-छाँही वस्त्र में दो रंगों के तार, अपनी-अपनी भिन्नता के कारण ही अपने रंगों से भिन्न एक तीसरे रंग की सृष्टि करते हैं। हमारी मानसिक वृत्तियों की ऐसी सामंजस्यपूर्ण एकता साहित्य के अतिरिक्त और कहीं सम्भव नहीं। उसके लिए न हमारा अन्तर्जगत त्याज्य है न वाह्य, क्योंकि उसका विषय सम्पूर्ण जीवन है, आंशिक नहीं।

मनुष्य के पास वाह्यजगत के सामन एक सचेतन अंतर्जगत भी है, अतः उसका सौन्दर्य-बोध दोहरा और अधिक रहस्यमय हो जाता है। वह केवल परिवेश के सामंजस्य पर प्रसन्न नहीं होता, वरन विचार-भाव और उनसे प्रेरित कर्म की सामंजस्य-पूर्ण स्थिति पर भी मुग्ध होता है।

उसके अन्तर्जगत का सामंजस्य वाह्यजगत में अपनी अभिव्यक्ति चाहता है और वाह्यजगत का सामंजस्य अन्तर्जगत में अपनी प्रतिच्छवि आँकना चाहता है’।
 
साहित्य में सम्पूर्ण तथा व्यापक जीवन की यह माँग उनकी विवेचना में अन्यन्त सफलता के साथ प्रतिफलित हुई है। उनके सभी निर्णय-निष्कर्ष इसी अनुभूत दर्शन, आस्था और विश्वास में परिणाम हैं। जिस प्रकार उनका काव्य जीवन के विराट भाव-बोध को जाग्रत करता है उसी प्रकार उनकी विवेचना अनुभूति बौद्धिक-चिन्तन के उन्मेष को विस्तार देती है। व्यक्ति के अनुभव-चिंतन को समष्टि के साथ संयोजित करने के अन्य अनेक साधनों के साथ उनकी विधायक कल्पना का बहुत बड़ा महत्त्व है, क्योंकि साहित्य में मूर्त-विधान और सौन्दर्य बोध का माध्यम यही मानस व्यापार है।,/div>

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