23 हिन्दी कहानियाँ - जैनेन्द्र कुमार 23 Hindi Kahaniyan - Hindi book by - Jainendra Kumar
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23 हिन्दी कहानियाँ

जैनेन्द्र कुमार

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1997
आईएसबीएन : 00000 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :264 पुस्तक क्रमांक : 3019

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प्रस्तुत है कहानी संग्रह...

23 Hindi Kahaniyan a hindi book by Jainendra Kumar : 23 हिन्दी कहानियाँ - जैनेन्द्र कुमार

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भूमिका

जब साहित्य अकादेमी ने मुझे हिन्दी की कहानियों का यह प्रतिनिधि संग्रह तैयार करने का काम सौंपा, तो बहुत काल से मैं असमंजस में रहा। साहित्य का संकलन और मूल्यांकन पाण्डित्य की अपेक्षा रखता है। मझे वह प्राप्त नहीं है। इससे अच्छा था कि यह काम किसी जाने-माने आलोचक को सौंपा जाता।

कहा गया कि कहानी का ऐतिहासिक विवेचन नहीं करना है, अपनी पसन्द की श्रेष्ठ कहानियाँ चुन देनी हैं। तब कुछ रास्ता दिखाई दिया। अपनी रुचि के पीछे तो चला जा सकता है। पर कौन है, जो दावा करे कि उसने हिन्दी की सभी कहानियाँ पढ़ी हैं। फिर हर पाठक समीक्षक है। मेरी रुचि प्रतिनिधि रुचि न हुई तो ? इसलिये चाहा कि बचूँ।

पर बचना हो नहीं पाया। प्रमाण यह संग्रह है। संग्रह के कलेवर की सीमा के कारण मुझ जैसे सीमित पाठक को भी अपने अंकुश पर रखना पड़ता है। अन्य मित्रों के परामर्श को भी सिर-माथे लेना हुआ है। पर उनके परामर्श को विवशता नहीं कहना होगा; उसने मेरी राह सुगम की और मेरे संशय दूर किए। अब यह संकलन और कुछ न भी हो, उन मित्रों से प्रमाणित अवश्य है।

कहानियों के नित नये संकलन तैयार होने और बाजार में दिख जाते हैं। उसमें से अधिकांश से दृष्टि हटा लेनी पड़ती है। कारण, उनकी प्रेरणा में व्यवसाय रहता है। इस प्रेरणा से मुक्त संग्रह कम ही हैं। इस दृष्टि से यह संग्रह हिन्दी के अभाव की पूर्ति करेगा और देश-विदेश में हिन्दी कहानी के वैभव का यत्किंचित् परिचय देगा।

इस संग्रह में आप नयापन खोजेंगे तो कदाचित् आपको निराशा होगी। कहानी में नया या पुराना लिबास के सिवा हो भी क्या सकता है ? मैं तो कहानी को कहानी के रूप में ही जानता-मानता आया हूँ। जीवन के आरम्भ से आज तक कहानी का एक ही उद्देश्य रहा है, जीवन का उपकरणों द्वारा अपने को व्यक्त करना। और जहाँ तक रूपों का प्रश्न है, वह कहानी कहनेवाले या लिखनेवाले पर निर्भर है। हर व्यक्ति अपने आपमें अपवाद है। उसके व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति के रूप में उसकी कहानी की विशिष्टताएँ भी होती हैं। न हों, तो कहानी क्या ? जो सर्वसामान्य को प्राप्त है, उसे देने का प्रयोजन नहीं रहता। इसलिये हर कहानीकार का निजी वैशिष्ट्य है, वह वैशि्ष्ट्य ही उसकी कहानी के आकर्षण की रचना करता है।

यही बात विषयों पर भी लागू होती है। आजकल अक्सर सुना जाता है कि कथा-साहित्य की आधुनिक प्रवृत्ति है आंचलिकता। यानी अंचल-विशेष के जीवन का निरूपण नहीं किया ? किसने स्थानिक की उपेक्षा की ! पर यदि वह वहीं रुक जाय, तो फिर उस अंचल से बाहर वह कहानी ग्राह्य भी किस बल पर होगी ? इसलिए कहानी-कार फैलकर अंचल से ब्रह्माण्ड तक और उतरकर परिप्रेक्ष्य से अन्तर्मन तक पहुँचता है। आज की कहानी सीमा के लिये आंचलिक कहलाए, तो और बात है, विस्तार और अवगाहन के लिए आंचलिक बनने की जरूरत नहीं है। इसी तरह की और भी बातें हैं, जैसे रूप यानी फार्म, शिल्प यानी टेकनीक। पर भाषा की भाँति ही ये सब साधन हैं, साध्य नहीं। युग-विशेष अथवा व्यक्ति-विशेष के कारण उसमें अन्तर परिवर्तन हो तो आश्चर्य क्या है ? पर वे बाह्यताएँ कहानी नहीं है। कहानी उन सबमें व्याप्त और अतिव्याप्त भी है।

इसलिए अपने चुनाव में मेरा मन कहानी पर ही रहा है, उनकी विधाओं और उपकरणों पर नहीं। उपकरणों पर बल देनीवाली रचना बोध दे सकती है रस नहीं देती। और जो रस न दे, उसे कहानी किस हिम्मत से कहा जाय।

(2)


कहानी भारत की अपनी चीज़ है। वह उपनिषद् में है, पंचतंत्र और हितो-पदेश में भी वही है। इन्हीं के माध्यम से वह विदेशों में फैली, विकसित हुई और नाना रूप धरकर लोक-मन में बसी। आधुनिक कहानी हमने विदेशों से ही प्राप्त की। पर बाहर से उसकी सूचना ही आयी। सूचना आते ही हिन्दी की परम्परा जग पड़ी और उसने फिर अपने को अभिव्यक्त किया। यही कारण है कि यद्यपि हिन्दी की प्रारम्भिक कहानियाँ तुतलाती और अटक-अटक कर चलती हैं, पर दो-चार वर्षों में ही उसने विश्वास से डग भरने शुरू किये। यह विश्वास प्रारंभ की जिस कहानी में बड़ी प्रतिभा से प्रकट हुआ, वह गुलेरीजी की कहानी ‘उसने कहा था’। पहले महायुद्ध की पृष्ठभूमि में लिखी गई यह कहानी अपनी सर्वांगता में ऐसी सुन्दर है कि आज भी आनन्द-विस्मय का कारण बनी हुई है। त्यागमय प्रेम का वह चित्र हमारे आदर्श की पुनर्प्रतिष्ठा के लिये है।

पर ‘उसने कहा था’ एक संयोग हो सकती है। यह कि स्वयं गुलेरीजी की बाकी दो कहानियाँ निष्प्रभ और निस्पन्द हैं, मानो उनमें कुछ कहने को न हो, इस बात का प्रमाण है। सच यह है कि हिन्दी उपन्यास की भाँति हिन्दी कहानी भी प्रेमचन्द से प्रतिष्ठित हुई।

प्रेमचन्द की कहानी मुझे तब भी रुचती थी, आज भी पढ़ते-पढ़ते प्रभावित करती है। पाठक से साझेदारी का-सा व्यवहार, कथ्य की सामाजिक और सुगम भूमिका, बात को कहने का सधा लाघव—हिन्दी कहानी को भारतीय परम्परा से युक्त रखते हैं। प्रेमचन्द का उद्देश्य कहानी कहना तो था ही, देश को जगाना भी था। पर कहने में उन्होंने और किसी उद्देश्य की शर्त नहीं मानी। कौशिक और सुदर्शन में भी यह ध्यान था। इसी त्रयी-की रचनाओं में हिन्दी कहानी का सही आधार आ जाता है। चतुरसेन शास्त्री में इस गुण की मात्रा थी, पर वह पाठक को मानो विश्वास से अधिक प्रभाव में लेना चाहते हैं। इसलिये कहानी प्रकृत से कुछ कृत्रिम होती है। जो हो, प्रेमचन्दोत्तर कहानी में सहसा ध्यान भीतर की ओर चला, सामाजिक से आन्तरिक की ओर। पात्र चरित्र हो उठा। व्यक्ति साधन से अधिक साध्य। आगे चलकर फिर भी कुछ लेखकों में दोबारा उस इतिवृत्तता के दर्शन हुए, पर कहानी में अन्तरंगता का आयाम खुला सो खुला।

(3)


‘प्रसाद’ से अज्ञेय तक हिन्दी कहानी की एक और समवर्ती धारा है, जो प्रेमचन्द के समानान्तर बहती रही। कथ्य में, कथानक से अधिक मर्मस्थितियों के चित्रण और मानसिक उद्घाटन पर बल देती रही है। शिल्प में काव्यात्मक प्रतीक-व्यंजना पर। उसका वातावरण वायव्य रहा है और सांकेतिक संशय से किंचित् आच्छन्न। सत्य से अधिक जैसे उनसे रूप का आकर्षण है। घटना की वास्तविकता कम है, भावना का आरोपण अधिक। दूर से समेटने की चेष्टा में यह कहानी रंगीन होकर भी कुछ धुँधली हो गई है। प्रेमचन्द की घटनागत कहानी को आज भी कसौटी पर चढ़ाया जा सकता है। पर इन लेखकों की किसी-किसी कहानी को ही। यद्यपि युग के साथ चलने में यह अन्देशा रहता ही है कि उसका अर्थ युग के सहारे ही टिकेगा, अन्यथा खोया लगे। फिर भी इन लेखकों ने जीवन की कथा की बड़ी मार्मिक कहानियों में बाँधा और चित्रों में रंग-वैविध्य का सफल आयोजन किया। संगृहीत रचनाएँ उसका परिचय दे सकेंगी। मैंने यद्यपि अपनी पसन्द की ही कहानियाँ यहाँ दी हैं, फिर भी यह भरसक चेष्टा की है कि लेखक का सही प्रतिनिधित्व हो और कहानी ऐसी हो, जो युग की प्रभविष्णुता से ऊपर उठ आई हो।

कहानी मन्तव्य-प्रधान भी हो सकती है, किन्तु तब जब मन्तव्य व्यापक हो और कहानी में व्याप्त हो। ऐसी कहानी कम ही सफल होती है। फिर भी ‘तत्सत्’ इस संग्रह में दी गई है।

(4)


प्रेमचन्द हमारे समस्त हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक युग-निर्माता रहे हैं। उनके अन्तिम दिनों में ही प्रगतिवाद और समाजवाद के स्वर गूँजने लग गये थे। बाद में हिन्दी साहित्य में एक धारा इन वादों के सहारे बड़े जोर से बह निकली। लगता था, मानो उसके बहाव में सब कुछ बह जायगा। कहानी-कार के भी पैर उखड़ गए। वह सिद्धान्तों को कहानी का रूप देने लगा। सहानुभूति के पात्र निश्चित हुए, आक्रोश के भी। जैसे साहित्य भी पक्षधर हो। आज जब वह लहर बहकर चली गई है, तब लगता है कि वह स्वयं अपने को बहा ले गई है, साहित्य जहाँ का तहाँ है। और कहानी भी उन्हीं आधारों पर टिकी है, जिन पर पहले टिकी थी। जिन कहानीकारों ने उस लहर में भी कहानी का साथ न छोड़ा, उनमें यशपाल विशिष्ट है।

पिछले दशक में उदित नये कहानीकार को संग्रह में स्थान न दिया जा सका। कारण उनके साथ न्याय करने में संग्रह के कलेवर के साथ अन्याय हो जाता। वह कमी अगले संग्रह में पूरी की जा सकती है।

निवेदन समाप्त करने के पहले हिन्दीतर पाठकों की सुविधा के लिए ‘उग्र’ और राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह के सम्बन्ध में दो पंक्ति कह देना उचित है। इन दोनों की उपलब्धियाँ मूल कथा से भी अधिक शैली के क्षेत्र में हैं। नहीं कहा जा सकता कि मूल का कितना रस अनुवाद द्वारा मिल सकेगा।

जैनेन्द्र कुमार

कफ़न प्रेमचन्द


झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अन्दर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देनेवाली आवाज निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अन्धकार में लय हो गया था।

घीसू ने कहा—‘‘मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।’’
माधव चिढ़कर बोला—‘‘मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नहीं जाती ? देखकर क्या करूँ ?’’
‘‘तू बड़ा बेदर्द है बे ! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफाई !’’
‘‘तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।’’

चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम । माधव इतना काम-चोर था कि आध घण्टे काम करता तो घंटे-भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मजदूरी नहीं मिलती थी। घर में मुट्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की कसम थी। जब दो-चार फाके हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियाँ तोड़ लाता और माधव बाजार से बेच लाता। और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। जब फाके की नौबत आ जाती, तो फिर लकड़ियाँ तोड़ते या मजदूरी तलाश करते। गाँव में काम की कमी न थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसी वक्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी सन्तोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता।

अगर दोनों साधु होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की जरूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका ! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई सम्पत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जीये जाते थे। संसार की चिंताओं से मुक्त ! कर्ज से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई भी गम नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ कर्ज दे देते थे। मटर, आलू की फसल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ-साल की उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक्त भी दोनों अलाव के सामने बैठ कर आलू भून रहे थे, जो कि किसी के खेत से खोद लाये थे। घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहान्त हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जबसे यह औरत आई थी, उसने इस खानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बेगैरतों का दोज़ख भरती रहती थी। जबसे वह आई, यह दोनों और भी आरामतलब हो गये थे। बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निर्व्याज भाव से दुगनी मजदूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों शायद इसी इन्तजार में थे कि वह मर जाय, तो आराम से सोएँ।

घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा—‘‘जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी ? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या ? यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है !’’
माधव को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलुओं का बड़ा भाग साफ कर देगा। बोला—‘‘मुझे वहाँ जाते डर लगता है।’’
‘‘डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।’’
‘‘तो तुम्हीं जाकर देखो न ?’’
‘‘मेरी औरत जब मर रही थी; तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं; और मुझसे लजायेगी कि नहीं ? जिसका कभी मुँह नहीं देखा; आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूँ ! उसे तन की सुध भी तो न होगी ? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी न पटक सकेगी !’’
‘‘मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हुआ, तो क्या होगा ? सोंठ, गुण, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में !’’

‘‘सब कुछ आ जायगा भगवान् दें तो ! जो लोग अभी पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपये देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था; मगर भगवान् ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।’’

जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज्यादा सम्पन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो यही कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज्यादा विचारवान् था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाज़ों की कुत्सित मण्डली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी कि बैठकबाजों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मण्डली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते !

दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि उन्हें ठण्डा हो जाने दें। कई बार दोनों की जबानें जल गईं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा बहुत ज्यादा गर्म मालूम न होता था; लेकिन दाँतों के तले पड़ते ही अन्दर का हिस्सा जबान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज्यादा ख़ैरियत इसी में थी कि वह अन्दर पहुँच जाय। वहाँ उसे ठण्डा करने के लिए काफ़ी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते।

घीसू को उस वक्त ठाकुर की बारात याद आई, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक बात थी, और आज भी उसकी याद ताजा थी। बोला—‘‘वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लड़कीवालों ने सबको भरपेट पूड़ियाँ खिलाई थीं, सबको ! छोटे-बड़े सबने पूड़ियाँ खाईं और असली घी की ! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, रायता, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला, कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज चाहो, माँगो, जितना चाहो, खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म गोल-गोल सुवासित कचौड़ियाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ से रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिये जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी ? खड़ा हुआ न जाता था ! चटपट जाकर अपने कम्बल पर लेट गया। ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर !’’

माधव ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मजा लेते हुए कहा—‘‘अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।’’
‘‘अब कोई क्या खिलाएगा ? वह जमाना दूसरा था। अब तो सबको किफायती सूझती है। सादी-ब्याह में मत खर्च करो, क्रिया-कर्म में मत खर्च करो। पूछो, गरीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे ! बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, खर्च में किफायत सूझती है !’
‘‘तुमने एक बीस पूरियाँ खाई होंगी ?’’
‘‘बीस से ज्यादा खाई थीं !’’
‘‘मैं पचास खा जाता !’’
‘‘पचास से कम मैंने न खाई होंगी। अच्छा पट्ठा था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है।’’
आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलियाँ मारे पड़े हों।

और बुधिया अभी तक कराह रही थी।

2


सवेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठण्डी हो गई थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टंगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था।

माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों जोर-जोर से हाय-हाय करने लगे और छाती पीटने लगे। पड़ोसवालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आये और पुरानी मर्यादाओं के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे।

मगर ज्यादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह गायब था, जैसे चील के घोसले में मांस।

बाप-बेटे रोते हुए ज़मींदार के पास गये। वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार उन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा—क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है ? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता ! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता !’’

घीसू ने ज़मीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा—‘‘सरकार ! बड़ी विपत्ती में हूँ। माधव की घरवाली रात को गुजर गई। रात भर तड़पती रही सरकार ! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दगा दे गई। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक ! तबाह हो गए। घर उजड़ गया। आपका गुलाम हूं, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह तो सब दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ ?’’


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