छोटे छोटे दुःख - तसलीमा नसरीन Chhote Chhote Dukh - Hindi book by - Taslima Nasrin
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छोटे छोटे दुःख

तसलीमा नसरीन

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
आईएसबीएन : 81-8143-280-0 मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :255 पुस्तक क्रमांक : 2906

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जिंदगी की पर्त-पर्त में बिछी हुई उन दुःखों की दास्तान ही बटोर लाई हैं-लेखिका तसलीमा नसरीन ....

Chhote-Chhote Dukha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

औरत के सीने में दुःख के कंकड़-पत्थर जमा हैं। ये कंकड़-पत्थर दिनों-दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। औरत के सीने में ये हिलते डुलते रहते हैं। हर पल तकलीफ और हाहाकार के सुर छेड़े रहते हैं। जिंदगी की पर्त-पर्त में बिछी हुई उन दुःखों की दास्तान ही बटोर लाई हैं-लेखिका तसलीमा नसरीन ! साथ ही उन्होंने औरत जात को पुकार दी है-‘सीने में अगर बारूद भरा हो तो, धधक उठो ! आग बनकर जल उठो।’

आपकी क्या माँ-बहन नहीं हैं ?


रास्ता-घाट, बस-ट्रेनों में अक्सर, जब लड़के, लड़कियों के प्रति अशोभन आचरण करते हैं, तो लड़कियों के पक्ष में कुछेक लोग जमा हो जाते हैं। आमतौर पर ये लोग लड़कों की लानत-मलामत करते हैं और सदुपदेश देते हैं। लड़कों का तिरस्कार करते हुए, ये लोग कहते हैं-‘आपकी क्या माँ-बहन नहीं हैं ?’’

मर्द, औरत पर अत्याचार कर रहा है, इसमें माँ-बहन का जिक्र करना ज़रूरी क्यों है, यह बात मुझे ठीक-ठीक समझ में नहीं आती। सिर्फ रास्ता-घाट के मर्द ही सलाहकार नहीं बनते, ऐसी बातें बुद्धिजीवी भी करते हैं कि औरत को माँ या बहन के रूप में देखा जाए। मेरा सवाल है-औरत को इन सब रूपों में देखना क्यों ज़रूरी है ? यह सब तो एक क़िस्म का रिश्ता है, औरत का सम्मान करने के लिए। किसी सामाजिक रिश्ते की सीमा में सम्मान करना क्यों ज़रूरी है ? जिस मर्द की माँ-बहन नहीं हैं उनसे सम्मान पाने का, क्या औरत को हक़ नहीं है ? औरत को मर्द की माँ, बहन या बेटी के रूप में विराजकर, अपने लिए सुविधा क्यों वसूल करना होगा ? यह क्या कोई अतिरिक्त सुविधा है ? औरत आपादमस्तक इंसान है और इंसान की मर्यादा पाने पर, उसका भी ज़रूर हक़ बनता है। लेकिन, कहा यह जाता है कि मर्द को औरत का अपमान नहीं करना चाहिए। क्योंकि औरत, मर्द की माँ या बहन का रिश्ता वहन करती है, इसलिए अगर कोई औरत वह ऱिश्ता वहन न भी करती हो, तो भी मर्द को कम से कम इतना तो अहसास होना ज़रूरी है कि जो भी प्राणी, उसके आत्मीय जैसा हो, उस पर ज़ोर-जुल्म बरसाना या असम्मान करना ठीक नहीं है। अगर कुछ करना ही है, तो उस पर करुणा की जाए। माँ-बहन के प्रति मर्द आमतौर पर करुणा ही करते हैं। यही करुणा, मर्द, किसी भी औरत पर बरसाए, यही अहम सलाह है। इस मामले में स्वाभाविक भाव से ही एक सवाल उठ सकता है कि अगर किसी मर्द की माँ-बहन न हो, तो क्या इसी वजह से उसे औरत की बेइज़्ज़ती का हक़ मिल जाता है ?‘‘आपकी क्या माँ-बहन नहीं हैं ?’ इसके जवाब में अगर कोई मर्द यह कह बैठे-‘ना, नहीं है !’ तब ? तब क्या उसका गुनाह, माफी लायक है ?

एक बार, एक लड़के ने रास्ते में एक लड़की का दुपट्टा खींच दिया और फिक्-फिक् करते हँसता रहा। लोग-बाग़ जमा हो गए।
बहुत-से लोगों ने सवाल किया, ‘‘आपकी क्या माँ-बहन नहीं हैं ?’’
उस लड़के ने जवाब दिया, ‘‘माँ-बहन तो हैं, लेकिन बीवी नहीं है।’
वैसे उस लड़के ने कुछ बुरा नहीं कहा।

औरत को अगर रिश्तों की नज़र से विचार किया जाना है, तो वधू रूप में क्यों नहीं ? माँ-बहन-बेटी की तरह, वधू भी तो एक क़िस्म का रिश्ता ही होता है ! अगर रूप ही कसौटी है, तो सवाल यह है कि सारे रूप क्यों नहीं ? मर्द किसी औरत में माँ का रूप देखेंगे, किसी-किसी औरत में बहन का रूप और किसी-किसी में बीवी का रूप ! मर्द को जिस औरत में बीवी का रूप नज़र आएगा, वे रास्ते-घाट में जब-तब पेट पीठ पर कुहनिया सकते हैं, वैसे ही कुहनियाते रहेंगे।

मर्द की माँ-बहन-बेटी के रूप में परिचित होकर, सम्मान पाना, औरत के लिए अपमानजनक है। औरत की पहचान अब किसी रिश्ते से नहीं, खुद अपने दमख़म पर अर्जित परिचय ही उसका अपना परिचय होना चाहिए। अगर रिश्तों की दुहाई देकर औरत को सम्मान अर्जित करना पड़े, तो वह सम्मान सच्चे अर्थों में उसे सम्मानित नहीं करता।

औरत...आखिर तो औरत जात है ! ऐसी भी एक बात खासी प्रचलित है। औरत का सम्मान तो करना ही चाहिए, क्योंकि वह माँ है। यहाँ तो ठीक-ठीक सम्मान की बात भी नहीं की गई है। ‘चूँकि औरत काफी तकलीफ उठाकर प्रसव करती है। इसलिए उन बेचारियों को लात-झाड़ू मत मारो ! उनको मारे-पीटे बिना भी तो काम चल सकता है।’-मामला यही कुछ है। यहाँ ‘माँ’ कहकर, जो गौरव दिया गया है, मेरे ख़्याल से वह किसी भी बेटी की माँ के लिए गौरव की बात नहीं है। यहाँ मर्दों के जन्म का जिक्र किया गया है। बेटों को जन्म देकर माताएँ महान् काम करती हैं, इसलिए औरतों के उछाल फेंकने के बिना भी तो चल सकता है ? औरतें मातृस्वरूपा होती हैं, यह कहने के पीछे, जो मक़सद काम करता है, वह इसी क़िस्म का होता है।

औरतों का सम्मान करने के बारे में सैकड़ों तरह के तर्क दिए जाते हैं। लेकिन, मर्द का सम्मान करने के लिए किसी तरह का तर्क खड़ा करने की ज़रूरत नहीं पड़ती, दिमाग़ में इस क़िस्म के ख़्याल बिठाने की ज़रूरत ही नहीं होती कि ये मर्द बाप के जात हैं। इन्हें बाप-भाइयों की तरह देखा जाए वगैरह-वगैरह ! मर्द के पक्ष में इन सब तर्कों की ज़रूरत नहीं पड़ती, क्योंकि औरतें किसी तर्क या उदाहरण के बिना ही, मर्द का सम्मान करती हैं, क्योंकि मर्द, इंसान हैं और औरतें, मर्द को इंसान का सम्मान देती आई हैं।

औरत को इंसान होने की मर्यादा, उन्हें अपने हक़ के तौर पर मिलेगी, मर्द की माँ-बहन होने के रिश्ते से नहीं ! उस रिश्ते के कैमोफ्लेज में भी नहीं। जो लोग औरत को माँ-बहन के रूप में देखने की सलाह देते हैं मैं उन्हीं लोगों से पूछना चाहती हूँ, औरत को रिश्तों की करुणा लेने की क्या ज़रूरत है ? वह किसी की माँ या बहन होते हुए भी सिर्फ इंसान के रूप में, इंसान के परिचय के जरिए ही क्या सम्मान पाने की योग्यता नहीं रखती ? हम सब जानते हैं, औरत में यह योग्यता मौजूद है, और उसे इसका हक़ भी है। जो लोग उसका यह अधिकार तोड़ना चाहते हैं, उनमें सिर्फ अनपढ़ लोग ही नहीं हैं, पढ़े-लिखे लोग भी शामिल हैं। औरतों को प्रतिक्रियाशील लोगों से कहीं ज़्यादा, मक्कार और बनावटी प्रगतिशील मर्दों के बारे में सावधान रहना होगा, क्योंकि ये लोग औरत के चेहरे पर धीरे-धीरे माँ खाला-बहन का मुखौटा चढ़ा देते हैं। इन सब सामाजिक रिश्तों के बाहर, औरत का कोई परिचय स्वीकार नहीं होता। औरत मानो-जन्म-जन्मांतरों की मेधाहीन, बुद्धिहीन है। चंद रिश्तों का जाल-बिछाकर मर्द, औरत को आटे का लोंदा बना देता है। रोटी-पूड़ी, पराँठे की तरह समय-सुविधा मुताबिक, वह औरत में माँ-बहन खाला वगैरह का रूप गढ़ लेता है। इससे औरत नामक आटे का गोला, तरह-तरह के आकार लेकर, समाज के तवे पर सिर्फ जलती-झुलसती रहती है। पुनश्च : औरत इंसान है-यही हो, औरत का पहला और आखिरी परिचय।

मर्द का लीला-खेल
(1)


आजकल औरतें सड़कों पर अखबार बेच रही हैं। सिर्फ बच्चियाँ और किशोरियाँ ही नहीं, जवान-जहान औरतें, यहाँ तक कि अधेड़ औरतें भी हॉकर का धंधा कर रही हैं। जीविका कमाने के लिए, मेहनत करनेवाली औरतों के तन-बदन पर एक अनोखी दीप्ति झलकती है। मैंने ऐसी दीप्ति, हाथ में फूल या अख़बार लिए, गाड़ियों-सवारियों की तरफ भागती-दौड़ती औरतों में भी देखी है। मुमकिन है, उन औरतों को पैसे कम मिलतें हों, सैकड़ों लोग, सैकडों तरह से उन औरतों को ठग रहे हों; वे औरतें अभाव और मोहताजी से भी मुक्त न हों, लेकिन इन्हीं सब वजहों से उनमें जो आत्मविश्वास भी पैदा होने लगा है, वह भी कितनी औरतों में होता है ? समाज के ऊँचे-ऊँचे तबकों की औरतों की निगाहों में अजब-सा धुँधलापन देखा है। वे औरतें दूसरों पर ही निर्भर रहना चाहती हैं। अलस, बलहीन, अंधी, हीनतर और अवरुद्ध रहना चाहती हैं। सच तो यह है कि यह सब वे औरतें खुद नहीं चाहतीं, ऐसा चाहने के लिए उन लोगों को अवश किया जाता है। वह जो कहते हैं, काँटे से काँटा निकालना ! पुरुषवादी समाज के लोग, औरत की समूची बल-क्षमता, साड़ी, गहना लहसुन-प्याज की गृहस्थी दो-चार कच्चे-बच्चे और चारदीवारों के कमरे देकर, खरीद लेते हैं। देश की अधिकांश पढ़ी-लिखी शिक्षित औरतें, इन सब तुच्छ विषय-वासनाओं के बदले में बिक जाती हैं।
एक अजीब-सी अक्षमता का दामन थामे, विकृत विक्रीत चीज़ की तरह, बस पड़ी रहती हैं।

(2)


ढाका शहर के एक महिला मैजिस्ट्रेट को क़त्ल कर दिया गया है। क्योंकि उसने लियाक़त अली ख़ान नामक एक मैजिस्ट्रेट को ब्याह करने से इनकार कर दिया था। इसलिए मैजिस्ट्रेट शाहिदा को लियाक़त के हाथों मरना पड़ा। ब्याह से इनकार करने का नतीजा यह निकला। मेरा ख्याल है, लियाक़त और शाहिदा में मित्रता या प्रेम जैसा कुछ था। इसीलिए लियाक़त ने अपना हक़ इस्तेमाल किया, ज़ोर-ज़बर्दस्ती से काम लिया। मर्द जिस-तिस रिश्ते के बहाने पर ज़ोर-जबर्दस्ती करते हैं। वह रिश्ता चाहे पिता का हो, भाई का हो, दोस्त का हो, पति या पुत्र का हो। उन लोगों ने तय कर लिया है कि औरत उनके हुक्म का अक्षर-अक्षर पालन करेगी। अगर कोई पालन न करे; फर्ज़ करें बेटी अपने पिता की अवज्ञा करती है-तब बेटी अगर बालिग़ उम्र की नहीं है, तो पिता उसे धर-पकड़कर, जोर-जबरदस्ती उसका ब्याह कर देता है या कमरे मे क़ैद कर देता है। वैसे बेटा अगर अवज्ञा करे, तो न तो उसका ज़ोर-जबर्दस्ती ब्याह किया जाता है, न उसे घर बंदी बनाया जाता है; न उसके पैरों में बेड़ी पहनाई जाती है, बल्कि मध्य और उच्च-वित्त समाज में उस बाग़ी बेटे को विदेश भेज दिया जाता है। यानी बाग़ी बेटे का भविष्य और उजला बनाया जाता है; उसे आत्मनिर्भर बनाने का इंतज़ाम किया जाता है, जबकि बेटी को परनिर्भर बनाया जाता है यानी उसका सर्वनाश कर दिया जाता है। वैसे औरत अगर अनुशासनहीन न भी हो, तो भी उसके अभिभावक उसका सर्वनाश करने को हर वक्त तैयार बैठे होते हैं। हाँ, औरत अगर अनुशासनहीन हुई, आज्ञा-उल्लंघन करने वाली हुई, तो उसका सर्वनाश ज़रा जल्दी ही कर देते हैं।

भाई भी हमेशा बहनों पर ही ज़ोर आजमाते हैं। गृहस्थी में भाइयों की फरमाइशें बजा लाने की जिम्मेदारी बहनों पर ही होती है। खुद न खाकर, भाइयों के लिए बचा रखना, भाई को मछली का बड़ा टुकड़ा खिलाकर, खुद मामूली-सा कुछ मुँह में डाल लेने का ‘कल्चर’ अभिभावक ही सिखा देते हैं। ऊपर से पिता की ज़मीन-जायदाद में, जो बूँद भर हिस्सा नसीब होता है, उस पर ज़ोर-ज़बर्दस्ती दख़ल जमाने में मर्द बेजोड़ होते हैं। पति के ‘हक़’ और ज़ोर-ज़बर्दस्ती का ज़िक्र करना तो बिल्कुल ही फिजूल है ! मुझे पक्का विश्वास है कि हर शादीशुदा औरत को बखूबी जानकारी है कि उन्हें किसकी उँगलियों के इशारे पर चलना है; उन्हें किसके हुक्म पर अंधी-बहरी और अपाहिज या लाचार होकर ज़िंदा रहना है ! वैसे एकाध व्यतिक्रम भी होता है, लेकिन व्यतिक्रम कोई उदाहरण तो नहीं होता। जब पूरे समाज की ही यह हालत है, तो मित्र या प्रेमी या किसी और रिश्ते के बहाने ज़ोर-जबर्दस्ती भला क्यों न की जाए ? लियाक़त ने भी यह समझ लिया था कि वह मर्द है; वह जो भी कहे, शाहिदा को वह सब मानना ही होगा। शाहिदा ने उसकी बात नहीं मानी। उस मर्द की बात मानने से, उस औरत ने शायद इसलिए इनकार कर दिया, क्योंकि वह शिक्षित और स्वनिर्भर औरत थी, वह अपनी इच्छा-अनिच्छा का मोल चुकाने को तैयार थी। लेकिन लियाक़त यह बात क्यों मानने लगा ? वह अपनी शारीरिक ताकत, छुरे की ताकत और पुरुषांग की ताक़त न लगाता तो वह कैसा मर्द बच्चा है ? मर्द तो ऐसा ख़ास जंतु है, जो अपने दाँत, नाखून और निगाहों की हिंस्रता के जरिए अपना पौरुष जाहिर करना चाहता है ! मैंने हमेशा यही देखा है कि मर्दों में मनुष्यता काफी कम होती है। मनुष्यत्व और पुरुषत्व में शायद चिरकालीन विरोध होता है।

लियाक़त अगर शाहिदा से ब्याह भी कर लेता, तो भी शाहिदा को तिल-तिल करके मरना ही होता। उसके भीतर के लगातार क्षरण को कोई देख भी नहीं पाता। लोग-बाग़ यही समझते कि क्या शानदार जोड़ी है ! लोग-बाग तो आज भी आँखों के नीचे झलकते सियाह धब्बे या उसकी पीठ पर मार के नीले निशान सँजोए औरत को बेझिझक सुखी ही समझते। लियाक़त असली मर्द-बच्चा निकला ! उसने मर्दों जैसा ही काम किया। बेहद ठंडे दिमाग से, उसने उस औरत का खून कर डाला।

मुनीर को अगर फाँसी हो गई, तो मर्दों को अच्छा सबक़ मिलेगा। लेकिन, लियाक़त को क्या कोई सबक मिला ? नहीं, कोई सबक़ नहीं मिला। मेरा ख़्याल है, दुनिया में किसी भी मर्द को, कभी, कोई सबक़ नहीं मिलेगा। मौका मिलते ही, वे लोग औरत की गर्दन पर छुरा बिठा देते हैं। ऐसे लोगों को फाँसी तो क्या इन्हें नंगा करके गले में रस्सी बाँधकर सड़कों पर सरे-आम घुमाना चाहिए ताकि हर इंसान उनकी परिणति देखे, ताकि इन लोगों का सड़ा-गला गोश्त सियार-चील खा डालें। ऐसे लोगों को फाँसी पर लटका देना, तो एक तरह से उन लोगों को बचा लेने जैसा है। दो-एक लोगों के अलावा, किसी ने भी नहीं देखा, किसी ने भी नहीं समझा, लियाक़त जैसे बदमाश का कलेजा भी बूँद भर भी नहीं काँपा।–ना ! फाँसी से काम नहीं चलेगा, जघन्य इंसानों के लिए जघन्य से जघन्य सज़ा का इंतजाम करना चाहिए। इस सज़ा के लिए आंदोलन न करना पड़े। अदालत के दरवाजे तक जाकर, नारेबाज़ी न करना पड़े। आखिर कितने अत्याचारियों के लिए महिला-परिषदों को चीखना-चिल्लाना होगा ? ये लोग तो देश के चप्पे-चप्पे में अत्याचार बरसा रहे हैं। इन अत्याचारियों की गिनती क्या उँगलियों की पोरों पर की जा सकती है ? खूनी मर्द क्या इक़बाल मुनीर, या लियाक़त ही हैं ? अफ़जल, शफीक, रियाजुद्दीन, सिराज, खोका, जुल्मत, वगैरह ने क्या खून नहीं किया ? आप लोग तलाश कर देखें, खून इन लोगों ने भी किया है !

बासाबों में नीलोफर नामक एक औरत का उसके पति ने क़त्ल कर दिया। वह पति इन दिनों बहाल-तबीयत घूमफिर रहा है ! उसे कौन पकड़नेवाला है ? उसके पास पैसों का ज़ोर है; सबसे ज़्यादा सरकार का ज़ोर है ! जिसके पास सरकार का ज़ोर है; वह चाहे जितना भी बड़ा चोर-डाकू-बदमाश या खूनी हो, वह ठीक पार पा जाता है। सरकार ने अपने प्यारे बंदों के लिए, बड़े प्यार से एक पुलिया बना रखी है। अल्लाहताला के पुलसेरात से कहीं ज़्यादा मज़बूत है यह पुलिया !

सेवक की अपूर्व सेवा


8 जुलाई को एक राष्ट्रीय दैनिक के पहले पन्ने पर पटुआखाली के एक लॉन्च-यात्री के बलात्कार की ख़बर छपी है ! सबसे मजेदार बात यह है कि इस लॉन्च-यात्री का बलात्कार किसी चोर-डाकू या लॉन्च के मस्तान लड़कों ने नहीं, दारूबाज बदमाशों ने नहीं, बल्कि उस लॉन्च की सुरक्षा के लिए तैनात ‘अंसार’ यानी पहरेदारों ने किया। वे लोग मुसम्मात बेगम नामक एक बीस-बर्षीया औरत को अपने केबिन में खींच ले गए और उन लोगों ने ज़ोर-जबर्दस्ती उसका बलात्कार कर डाला। वे कुल पाँच लोग थे। पाँच-पाँच अंसारों ने बारी-बारी से उस औरत का बलात्कार किया। पूरा लॉन्च लोगों से भरा हुआ, लेकिन वे लोग ज़रा भी परेशान नहीं हुए। इन सेवकों के पुरुषांग उस भीड़भरे लॉन्च में एक महिला यात्री के लिए तन गए। खैर, पुरुषांग तनने में मुझे कोई एतराज नहीं है। वे लोग सेवक भले हों, आखिर हैं तो मर्द, पुरुषांग तो तनेगा ही ! वह औरत अगर उनकी उत्तेजना में साथ देती, अगर ऐसा हुआ होता कि पाँच लोगों से संगम करने में, मुसम्मात बेगम को कोई एतराज नहीं होता, तब इस बात को लेकर, समूचे देश में, कोई भी बवाल नहीं उठाता ? बवाल उठाने का सवाल ही नहीं उठता। पारस्परिक रिश्ते में अगर दोनों की रज़ामंदी हो, तो हर इंसान को यह आज़ादी है कि वह किसी भी गहराई में उतर जाए। लेकिन ज़ोर जबर्दस्ती कोई भी रिश्ता स्थापित नहीं किया जा सकता। ज़ोर-जबर्दस्ती कोई भी रिश्ता नहीं बनाना चाहिए। लोग-बाग़ समाज के सभ्य होने का दावा करते हैं। अगर यह सभ्य समाज है, तो जोर-ज़बर्दस्ती रिश्ता भला क्यों कर संभव है ? अभी कल ही सरकार द्वारा नियुक्त किए गए ‘अंसार’ जिसका मतलब ही है, ‘‘स्वेच्छासेवी’, वह भला किसी यात्री के बलात्कार के लिए कैसे आमाद हो सकता है ? यात्रियों का सेवक ही, यात्रियों की सुरक्षा के विपरीत काम भला कैसे कर सकता है ?

बलात्कार के बाद भी, हमारे सेवक बलात्कार के गुनाह के लिए सज़ा पाने के लिए राज़ी नहीं हैं, इसलिए जब यह ख़बर अंसार ऐडजुटेंट को दी गई, तो पाँचों सेवक-बलात्कारियों को ‘सस्पेंड तो कर दिया गया, लेकिन मुअत्तल करना तो आखिरी बात नहीं है, उन लोगों पर बलात्कार का मुकदमा भी तो चलाया जाना चाहिए। सबसे बड़ी हैरत की बात तो यह है कि बलात्कार की शिकार औरत के समेत अंसारों को जब ऐडजुटेंट कार्यालय में लाया गया, तब अंसारों ने जैसे ज़ोर-ज़बर्दस्ती औरत का बलात्कार किया था, उसी तरह ज़ोर-ज़बर्दस्ती ही बलात्कार की शिकार उस औरत को वहाँ से ग़ायब कर दिया गया। चूंकि बलात्कार की शिकार वह औरत उपस्थित नहीं थी, इसलिए सूचना यह मिली कि पुलिस साहब लोग मुकदमा दर्ज नहीं कर पाए यानी बलात्कार का कोई मामला दर्ज़ नहीं हो सका। इस बलात्कार की ख़बर लॉन्च के तमाम यात्री जानते हैं; लॉ़न्च-मालिक भी जानता है; पुलिस जानती हैं, अंसार ऐडजुटेंट भी जानती है, जिस वजह से उन पाँचों को ‘सस्पेंड’ भी किया गया है, अब पुलिस के लिए उस बलात्कार की शिकार औरत की भला क्या ज़रूरत है ? वह औरत तो खुद ही पुलिस स्टेशन जाने को तैयार थी, तब उसे हटा क्यों दिया गया ? अब तो उनके खिलाफ दो-दो मुकदमें ठोंके जाने चाहिए एक बलात्कार के खिलाफ, दूसरा लड़की गायब करने के खिलाफ ! वे लोग बलात्कार भी करेंगे, बलात्कार की शिकार को चालाकी से गायब भी कर देंगे और उनके खिलाफ कोई मामला भी नहीं होगा। ऐसा इस सभ्य देश में, अगर वह देश सभ्य है, तो नहीं होना चाहिए। वैसे यह देश उचित-अनुचित की परवाह नहीं करता। सरकार अगर सबसे बड़ी सेवक है, उसने ही तो आम जनता का बलात्कार किया है, शायद इसलिए अपने छोटे-मोटे सेवकों के बलात्कार को वह क्षमा-सुकर नजरिए से देखती है। इसके अलावा और क्या वजह हो सकती है ? इसके अलावा अंसारों के गुनाह के लिए, सज़ा देने के पक्ष में और कोई तर्क हो सकता है भला ?

मुझे यह सोच-सोचकर हैरत होती है कि इस देश की प्रधानमंत्री, एक औरत हैं। हैरत है कि इस देश के विरोधी दल की नेता भी एक औरत है। उन लोगों को घर बाहर के इन बलात्कारों की क्या कोई ख़बर नहीं मिलती ? या मिलती भी है, तो उन लोगों के दिल में कोई आग नहीं लहकती ? या उन लोगों को बलात्कार, कोई उपयोगी चीज़ लगती है ? या इसमें नाराज होने लायक कोई बात नहीं लगती। देश की प्रधानमंत्री एक अदद महिला होने के बावजूद, देश में अबाध रूप से वधू-हत्या, बलात्कार, अपहरण, एसिड फेंकने, दहेज के लिए अत्याचार, बाल-विवाह वगैरह का सिलसिला जारी है। अभी भी औरत के खिलाफ तरह तरह के कानून तलवार ताने खड़े हैं। औरत होकर भी औरत का दर्द समझने की क्षमता जिसमें या जिन औरतों में नहीं है, वे लोग इंसान की और क्या सेवा कर सकती हैं ! अगर वे ही लोग शोषित-अत्याचारित के पक्ष में खड़ी नहीं हो सकतीं। तब उन लोगों ने किसका पक्ष लेने के लिए महान सेवक की जिम्मेदारी उठाई है ? क्या अमीर अत्याचारी, सुविधाभोगी और गुनाहगारों का पक्ष लेने की जिम्मेदारी ली है ?


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