कुछ चेहरे कुछ चिन्तन - धर्मवीर भारती Kuch Chehre Kuch Chintan - Hindi book by - Dharamvir Bharti
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कुछ चेहरे कुछ चिन्तन

धर्मवीर भारती

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 81-7055-382-2 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :230 पुस्तक क्रमांक : 2890

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प्रख्यात कवि-कथाकार और सुधी सम्पादक डॉ. धर्मवीर भारती की यह संस्मरण कृति साहित्य और साहित्येतर दुनिया के अनेकानेक व्यक्तित्वों को जीवंत करने वाली है।

Kuchh chehre Kuchh Chintan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रख्यात कवि-कथाकार और सुधी सम्पादक डॉ. धर्मवीर भारती की यह संस्मरण कृति साहित्य और साहित्येतर दुनिया के अनेकानेक व्यक्तित्वों को जीवंत करने वाली है। एक ओर यदि इसमें उनके अपने अनेक समकालीन रचनाकार मौजूद हैं, जिन्होंने विभिन्न साहित्येतर क्षेत्रों में कार्य करते हुए भारतीय-जीवन मूल्यों में बहुत कुछ नया जोड़ा है। इनमें जयप्रकाश, राममनोहर लोहिया, इंदिरा गाँधी और मौलाना भासानी जैसे राजनीतिज्ञ हैं, हेनरी मूर और सत्यदेव दुबे जैसे मूर्तिशिल्पी और अभिनेता हैं, प्रतिभा नागर जैसी गृहिणी हैं, और हैं चेरी की डालवाले एक आदमी के साथ-साथ बांग्लादेशी क्रान्ति के कुछ ऐसे चेहरे, जो मान्य होकर भी असमान्य हैं।

इसके अतिरिक्त भारत जी ने यहाँ जिन साहित्यकारों के अंतर बाह्य का उदघाटन किया है, वे हैं-वृंदावनलाल वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, फादर कामिल बुल्के, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, भगवती चरण वर्मा , अमृतलाल नागर, श्रीनारायण चतुर्वेदी, कृश्नचंद्र स. ही. वात्स्यायन अज्ञेय, राही मासूम रजा, शरद जोशी, हरिवंश राय बच्चन और विमल मित्र।

आकस्मिक नहीं कि इस पुस्तक में दर्ज उपरोक्त तमाम व्यक्तियों से परिचित होते हुए भी हम उनकी रचनात्मक दुनिया तक ही नहीं जाते, बल्कि जिस समय में वे रचनारच और क्रियाशील हैं, उसके ऐतिहासिक उथल-पुथल से भू गुजरते हैं। जाहिर है, यह भारतीजी की अपनी रचनादृष्टि की ही परिणाम है। उनकी दृष्टि व्यक्ति के अंतर्निहित गुणावगुण को ही नहीं उसके युग परिवेश का भी विश्लेषित-विवेचन करती है। यही कारण है कि यह संस्मरण-कृति सिर्फ चेहरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि युगीन चिंताओं से भी एक साहसिक संवाद करती नजर आती है।

चेरी की डाल वाला आदमी


चीड़ के लम्बे नाजुक पेड़, ढलानों पर खिले सफेद नीले फूल, एक पर एक छायी हुई भूरी-नीली पहाड़ियों, की कटी-फटी शिखर रेखाएँ, घुमावदार पहाड़ी रास्तों और बढ़ते-उतरते आवारा बादलों की पृष्ठभूमि में वह अजब सा लग रहा था; गोया वह वहाँ है नहीं, किसी सचित्र पत्रिका में से काटकर चिपका दिया गया है, सर पर पुलिस की लाल पगड़ी, चिथड़ी खाकी पोशाक, घुटनों तक फटी जुरावें, चटका हुआ खुरदुरा जूता, कमर में पेटी और कन्धे पर सूखी पत्तियों और पुराने कागजातों का बोरा। कमर की पेटी में डण्डे की जगह एक चेरी की फूल लदी डाल, काला झुर्रियों पड़ा बूढ़ा चेहरा।

टेढ़े-मेढ़े पहाड़ी रास्ते पर चक्कर खाती हुई बस उतर रही थी। सामने सुन्दर घाटी थी, चीड़ के जंगल थे, बादलों की परतें थीं, पहाड़ी फूल थे। यह पीछे थे; उनके ऊपर थी यह रंगबिरंगी विचित्र मूर्ति जो स्थिर नहीं थी, चल भी नहीं रही थी, बीच रास्तों में खड़ी हाथ कभी ऊपर गिराकर, कभी दाहिने उठाकर, कभी बायें फैलाकर इशारे दे रही थी; मानो चौराहे पर ट्रैफिक कण्ट्रोल कर रही हो, मोटर बस अपनी गति से चलती हुई जरा आगे बढ़कर अड्डे पर खड़ी हो गयी। वहाँ पर मुसाफिरों के परमिट देखे जाते हैं, सवारियों की गिनती होती है और फिर बस चल देती है। बस के रुकते ही वह हाँफता हुआ भागता हुआ पीछे-पीछे आया और ठीक बस के आगे जाकर इंजिन के सामने खड़े होकर उसने अटेंशन की मुद्रा में पैर मिलाये, बदन ताना और खटाक से एक सैल्यूट दिया—‘‘जय हिन्द।’’

‘‘पगला है।’’ किसी मुसाफिर ने दबी जबान से कहा—बाकी अपनी-अपनी सीट पर चुपचाप बैठे रहे। वह चक्कर काटकर बस के बगल में आया और एक खिड़की के सामने खड़ा हो गया। बोला, हाथ को अन्दर करना बस चलने पर खतरा नहीं होना, चोट लगना, पाथर गिरना—खिड़की पर हाथ रखे भद्र महिला बाँह रखे बैठी थीं, उन्होंने बाँह अन्दर कर ली। उसके चेहरे पर सफलता और अधिकार का कृतज्ञता भरा भाव आया और उसने अटेंशन होकर खटाक से सैल्यूट दिया—‘‘जय हिन्द।’’
एक-एक उसने सभी की ओर देखा कुछ इस भाव से कि पहाडी रास्तों का जिम्मा उस पर है, वह न हो तो बसें खड्ड में जा गिरें, मुसाफिर जानमाल से जाएँ—कुछ इस भाव से कि अगर आप आना दो आना उसे दें दें तो वह मना नहीं करेगा।
मुसाफिर सब चुपचाप बैठे रहे। जिससे उसकी नजर मिली उसने मुँह अन्दर कर लिया। पर ऐसा लगता था कि उस पर इस उपेक्षा का कोई असर नहीं। वह तो अपना फर्ज जानता था और प्रतिक्षण अपनी सार्थकता निबाह रहा था।

उसने एक बार फिर चारों तरफ देखा। मुसाफिर अपने में मशगूल थे। उसने अपनी कमर से चेरी की फूल लदी डाली निकाली और उससे बस का रास्ता झाड़ने लगे। फिर सहसा खड़ा हो गया और जोर से बोला—‘‘हमारे मुलुक का आजादी खुशी की बात है, परसनता का बात है। पहाड़ का सीजन जाता है, दीवाली आता है—आना-दो आना बख़्सीस सिपाही फूलासिंह का खातिर।’’

सब चुप, मुसाफिरों पर कोई असर नहीं। ‘‘अरे भाई, तुम्हें कप्तान साहब पूछ रहे थे। तुम्हारे साथी लोग पूछ रहे थे। कभी शहर हो आओ न।’’ ड्राइवर ने उसे छेड़ते हुए कहा।

वह बोलते-बोलते रुक गया। उसके चेहरे पर अजब ममता भरी याद छा गयी क्षण भर को। उसने बड़ी मृदुलता से चेरी की फूल लदी एक नाजुक सी डाल पर हाथ फेरा और फिर गर्व से बिना ड्राइवर की ओर देखे बोला—‘‘जायेगा, जायेगा जरूर, जरूर जायेगा। अभी हमारा तनख्वाह नहीं बटा है। तनख्वाह आयेगा, फूलासिंह जायेगा।’’

कुछ मुसाफिरों को रस आने लगा। उनके चेहरे की मुस्कान देखकर ड्राइवर बोला—इसने साहब एक चोर भगा दिया। उसका औरत-बच्चा इसका पाँव पकड़े रोता था। ये चोर को जेल से डिसमिस बोला, साहब इसे नौकरी से डिसमिस बोल दिया। इसकी पिछली तनख्वाह अभी घपले में पड़ी है।’’

उसे जैसे चोट लगी। बस से दूर हट गया। बोला उसी मशीनी श्वर में—‘‘आजादी चोर का, आजादी शाह का, आजादी गुण्डा का, आजादी साहब का—’’ ‘‘चुप बे’’—उसकी बात को काटकर क्लीनर बोला, और इंजिन ठण्डा करने के लिए जो कवर खुला था उसे गिरा दिया। अब बस चलेगी। उसके मुँह पर निराशा छा गयी। किसी ने कुछ भी तो नहीं दिया। आना-दो-आना तो दूर, पैसा-दो-पैसा भी नहीं। अब अगली बस चौबीस घण्टे बाद आयेगी। थोड़ी देर में गजब की ठण्ड बढ़ जायेगी। दस मील इधर, दस मील उधर, कोई आदमी न आदमजात, चुंगीवाले भी इस गाड़ी से नीचे चले जायेंगे। उसने एक बार फिर आवाज दी—‘‘सीजन आता है, दीवाली आता है, अजादी का दीवाली खुशी से मनाता है, बच्चा लोग को खिलौना देता है, सिपाही लोग को बख्सीस देता है।’’

मुसाफिर साट पर सँभलकर बैठ गये। अब बस स्टार्ट होगी किसी ने एक सिगरेट की डिब्बी फेंकी। उसने उठायी, खोली, खाली थी। उसकी पन्नी फेंक दी। दफ्ती बोरे में डाल दी।
इंजिन घरघराया, बस चल दी। उसके मुख की निराशा आहत अभियान में बदल गयी। नहीं, कोई कड़वाहट नहीं, कोई शिकायत नहीं। वह बैठ गया और बोरे में हाथ डाला। एक मुट्ठी कागज बिखेर दिये—‘‘फरमान पर फरमान—कागज पर कागज आयेगा, कागज आयेगा--’’

वह फिर बोला—‘‘फूलासिंह का तनख्वाह आयेगा—कागज इधर से कागज उधर से। कागज का आजादी, कागज का चोर।’’
बस ने घुमान ले लिया था, एक फर्लांग रास्ता निकल गया, कि फूलासिंह ने जोर से बोरे को ठोकर मारी, हजारों कागज बिखर गये और प्राणपण से जोर लगाकर फूलासिंह बोला—‘‘फूलासिंह का कागज ऊपर से आयेगा, ऊपर से।’’ और उसने अटेंशन खड़े होकर एक बाँह नीचे गिराकर एक सीधी ऊपर की ओर उठा दी सीधे ऊपर।

कितनी देर तक वह ऐसा खड़ा रहा, नहीं मालूम—चीड़ के लम्बे नाजुक पेड़, घुमावदार पहाड़ी रास्ते; हरे-भरे ढलानों पर कागज से काटकर चिपकायी गयी तस्वीर की तरह वह खड़ा रहा, ज्यों-ज्यों बस आगे बढ़ी पहाड़ियाँ उस पर छाती गयीं, जंगलों ने उसे लपेट लिया; एक विराट हरियाली भँवर में वह डूब गया, ओझल हो गया।

ऐतिहासिक सादगी


शत वार्षिकियों की भीड़-भाड़ और शोर-शराबे में एक कितना बड़ा नाम ख्याल से उतरा जा रहा था—बाबू वृन्दावन लाल वर्मा। गनीमत है कि साहित्य अकादमी ने उन पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की और ‘गगनांचल’ के नये अंक में उनके बारे में विशेष सामग्री (संस्मरण, समीक्षा, साक्षात्कार) आयी।

आज 40-45 वर्ष से अधिक हो गये होंगे, लेकिन क्या उनके ‘गुढ़कुंडार’ की एक बात भी भूली है ! उसके पहले अनेक ऐतिहासिक उपन्यास पढ़े थे। बंगला के अनूदित ‘दुर्गेशनन्दिनी’ भी। (विदेशी भाषाओं से अनूदित ‘ड्यूमा के तीन तिलंगे’ (थ्री मास्केटीयर्स) और ‘ब्लैक ट्यूपलिप’ (काला ट्यूलिप’ अंग्रेजी में सर वाल्टर स्कॉट ‘आइवन हो’। कुछ और भी जो ऐतिहासिक उपन्यास नहीं थे लेकिन उतने ही रोचक थे जैसे रेनाल्ड्स का कई भागों में ‘मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लंडन’। बहुत दिलचस्पी थी मेरी इस तरह के उपन्यासों में राजाओ, रानियाँ, सामन्तों, प्रेमियों, षड्यन्त्रकारियों, वीर नायकों, अविवाहित सुन्दरियों की एक दूसरी दुनिया, जिसकी हर जानकारी दिलचस्प लगती थी, हर षड़यंत्र थर्रा देता था, हर सुन्दरी स्वप्नों में आने लगती थी, हर वीर नायक हमारा हीरो बन जाता था। ढूँढ़-ढूँढ़ कर ऐतिहासिक उपन्यास लाता था पुस्तकालय से और रात-रात जागकर पढ़ता था।

पर उसके बाद सहसा शरतचन्द्र मिले और सब छोड़कर उनके उपन्यासों में मन डूबने लगा। बंगाल के गाँवों के वे पत्र, उनके छोटे-छोटे पारिवारिक दुःख-सुख, नारी मन की सुकुमार संवेदनाएँ, अनकही पीड़ाएँ उनके आगे ऐतिहासिक उपन्यासों के पात्र कुछ दूर के, बेगाने से लगने लगे। लगता था कि ये राजा-रानी, सरदार, सामन्त, वीर योद्धा सब जुटाए गए हैं एक सनसनी खेज कथानक के लिए जो रोचक तो है पर पता नहीं सच्चा है या नहीं। हालाँकि कथानक सच्चे हों या न हों इससे क्या फर्क पड़नेवाला था। ऐसा कौन-सा यथार्थ का खोजी या पक्षधर था, लेकिन वह कैशोर्य की उम्र ही आधे पागलपन की उम्र होती है। कोई चीज क्यों मन पर छा जाती है या क्यों मन से सहसा उतर जाती है, इसका कारण आज तक कोई खोज नहीं पाया।

लेकिन एक दिन स्तब्ध रह गया। अब तक पढ़े गए सारे उपन्यास ऐतिहासिक उपन्यासों में, जिसके घटनाक्रम में, इसके चरित्र चित्रण में कुछ और ही बात थी। इसमें वर्णित राजवंश का कभी नाम भी नहीं सुना था कि सचमुच कोई कुंडार नाम का किला है या यह केवल लेखक की कल्पना है। दूसरे ऐतिहासिक उपन्यासों के द्वारा एक अनजाने काल, अजनबी परिवेश में प्रवेश करता था। एक कहानी पढ़ता था उसमें आह्लादित होता था, दुःखी होता था, रोमांचित होता था—पर इस उपन्यास में अनुभूति ही दूसरी थी, मैं पढ़ते-पढ़ते इलाहाबाद में हूँ ही नहीं, घने जंगलों में बने एक अनगढ़ किले के बुर्ज के पास खड़ा हुआ हूँ। मैं  उस काल में जीवित हूँ। उस परिवेश का अंग हूँ। जो कुछ घट रहा है उसका साक्षी हूँ। ऐतिहासिक रोमांच कथाओं से पाठकों को मुदित या द्रवित करने वाले, उसे मनोरंजन देने वाले ऐतिहासिक उपन्यास दर्जनों पढ़े थे, पर पहला उपन्यास ऐसा पढ़ा था, जो स्वयं पाठक को इतिहास के घटना चक्र के बीच में जीवन्त दर्शक बनाकर खड़ा कर दे। पाठक स्वयं उस परिवेश का अंग बन जाए—उन जंगलों का, अनगढ़ पत्थरों के ढोकों का, किले के काई लगे बुर्जों, गुम्बदों और दीवारों का। और उसके बाद मैं खोज-खोज कर उनकी किताबें पढ़ने लगा। ‘विराटा की पद्मिनी’, ‘झाँसी की रानी’, ‘मृगनयनी’, ‘कचनार’ उनके कुछ सामाजिक लघु उपन्यास भी पढ़ें, पर उनमें वह रस नहीं आया।

ऐतिहासिक उपन्यासों का यह मिथकीय व्यक्तित्व-वृन्दावनलाल वर्मा एक दिन अकस्मात् मेरा पता लगाता हुआ, मेरे अतरसुइया वाले घर के दरवाजे की कुण्डी खटखटायेगा, इसकी मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था।
वे परिमल की गहमागहमी वाले दिन थे। मैं मार्क्सवादी समीक्षा के मानदण्डों को अस्वीकार कर चुका था लेकिन समीक्षा या चिन्तन के संदर्भ में कोई भी नयी मार्क्सवादी पुस्तक आये तो उसे पढ़ना और गुनना जरूरी समझता था। एक नयी पुस्तिका अँग्रेजी में अनूदित होकर आयी थी—‘द रोल ऑफ इंडिविजुअल इन हिस्ट्री’, यानी इतिहास-प्रक्रिया में व्यक्तित्व की भूमिका। लेखक थे प्लेखनॉव। पचास-साठ पन्नों की पुस्तिका थी, लेकिन सुस्पष्ट शैली में जोरदार तर्कों के साथ उसने यह स्थापना की थी कि इतिहास में जिन पात्रों की चर्चा होती रही है---राजा, रानी, मन्त्री, सेनापति, श्रेष्ठि; शहीद या नेता, वस्तुतः इतिहास निर्माण में उनकी कोई भूमिका होती ही नहीं। इतिहास तो आर्थिक परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से बनता है। व्यक्ति उसका श्रेय ले ले, पर व्यक्ति की इतिहास निर्माण में कोई निर्णायक भूमिका नहीं होती। उसकी शैली और तर्क प्रणाली में इतना जोर था कि असहमत होते हुए भी आप उसकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे।

खूब बहस चली उस किताब को लेकर परिमल में, खासतौर से विजयदेव नारायण साही, डॉ. रघुवंश, आत्मन और मैं इस बहस में बहुत मुखर थे। कई हफ्ते की बहसों के बाद अकस्मात् किसी ने प्रस्तावित किया कि क्यों न इस सवाल को लेकर परिमल की एक बड़ी कान्फ्रेंस आयोजित की जाये, जिसमें सदस्यों के अतिरिक्त प्रयाग और आस-पास के नगरों के लेखक भी आमन्त्रित हों। लेकिन इतिहास पर गोष्ठी हो और उसमें वृंदावनलाल वर्मा न हों तो उस गोष्ठी का क्या मूल्य ? तय हआ कि दो वरिष्ठ लेखकों को पूरे सम्मान के साथ अवश्य बुलाया जाये—वृन्दावनलाल वर्मा और कन्हैयालाल माणेकलाल मुंशी। सौभाग्य से के. एम. मुंशी उसी वर्ष उत्तर प्रदेश के गवर्नर नियुक्त होकर आये थे। दोनों को बकायदा विशेष आमन्त्रण भेजा गया। पत्र एक से थे। केवल वृन्दावनलालजी को अतिरिक्त वाक्य यह लिखा गया था कि आपका आने-जाने का यात्रा व्यय तथा आतिथ्य का खर्च हम वहन करेंगे और मुंशी जी को यह लिखा गया था कि हम गवर्नर को आमंत्रित नहीं कर रहे, हम, ‘पृथ्वीवल्लभ’ और ‘पाटन का प्रभुत्व’ जैसी विशिष्ट कृतियों के लेखक को लेखकीय बिरादरी के बीच आमंत्रित कर रहे हैं।

आठ-दस दिन में मुंशीजी का उत्तर आ गया कि आमन्त्रण उन्हें स्वीकार है। लेखकीय बिरादरी के बीच लेखक के रूप में जाना ही उनके लिए अधिक सुखकर है। पर वृन्दावनलालजी का कोई उत्तर नहीं आया। हम लोगों ने एक पत्र पुनः उन्हें लिखा, कोई उत्तर नहीं। एक पत्र एक्सप्रेस डेलीवरी से भेजा, कोई उत्तर नहीं। हम लोग चिन्तित हो गये। फिर तो इतिहास पर आयोजित हिन्दी लेखकों की गोष्ठी का कोई अर्थ नहीं होता। ‘गढ़ कुंडार’ और ‘विराटा की पद्मिनी’ पर बात न हो तो हिन्दी साहित्य में बात किस ऐतिहासिक उपन्यास की की जाये ? दूसरे यह भी आशंका थी कि कम्युनिस्ट तो यूँ ही मुंशीजी और परिमल दोनों के खिलाफ हैं। वे यह प्रचार शुरू करेंगे कि मुंशीजी गवर्नर होने के नाते विश्वविद्यालय के कुललपति हैं। उनकी चमचागिरी करने के लिए विश्वविद्यालय के कुछ अध्यापक जो परिमल के सदस्य हैं, उन्हें बुला रहे हैं।

कान्फ्रेंस को छह-सात दिन रह गये तो वृन्दावनलालजी को अर्जेन्ट तार भेजा गया, मगर फिर कोई जवाब नहीं आया। हम लोगों की चिन्ता और घबराहट अब उदासी में बदल गयी। गोष्ठी का मजा जाता रहा। पर अब करनी तो है ही। मुंशीजी आकर इलाहाबाद के राजभवन में ठहर गये थे और हम लोगों को सूचित करवा दिया था कि विषय की रूपरेखा भी हम पहले भेज सकें तो सुविधा होगी। मेरा मन तो इतना बुझ चुका था कि मैंने साहीजी से प्रार्थना की कि हॉल की सज्जा, बैठने का प्रबन्ध, अतिथियों का स्वागत यह सब मैं कर दूँगा, पर मेरा दिमाग ही नहीं चल रहा है, तो विषय की रूपरेखा बनाकर, मित्रों से परामर्श कर वे भेज दें। साहीजी ने रूप रेखा बनाई बड़ी पैनी और सारगर्भित ! मेरी उदासी के बावजूद मुझे सुनाई और मुंशीजी को भेज दी।

उसमें सवाल उठाए गए थे—ऐतिहासिक उपन्यास कितना इतिहास होता है और कितना उपन्यास ? औपन्यासिकता के निर्वाह के लिए क्या कुछ ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छोटी-मोटी फेरबदल जायज है ? ऐसे उपन्यासों में इतिहास केवल रंगमंच के पार्श्व-पट की तरह होता है या किसी अन्य आर्थिक या सामाजिक नियमों का सुनिर्धारित फ्रेमवर्क ? इतिहास के निर्माण में उन लोगों की कितनी भूमिका होती है, जिन्हें सामान्य भाषा में इतिहास पुरुष कहा जाता है ? किसी ऐतिहासिक उपन्यास के पात्र क्या वर्तमान जीवन के ही पात्र होते हैं, जिनका नाम व परिवेश बदल दिया जाता है ऐतिहासिकता का भ्रम देने के लिए ? क्या उपन्यासकार केवल घटनाक्रम या कथानक के माध्यम से पाठक को रसप्लावित करता है या वह उस घटनाक्रम के पीछे, इतिहास के पीछे कोई अर्थ भी ढूँढ़ने के प्रयास करता है ? अपने उपन्यास लिखने के दौरान आपको क्या लगा कि इतिहास केवल आर्थिक परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से परिचालित होता है या उनमें मानवीय पात्रों की जीवन दृष्टि और संकल्पशक्ति का भी महत्व होता है ? प्रश्नावली बहुत सारगर्भित थी, लेकिन यह सोचकर मन बुझ गया कि केवल मुंशी जी ही के विचार सुन पायेंगे, वृन्दावनलालजी के नहीं।

गोष्ठी के दो दिन पहले मैं सारे इन्तजाम में लग गया था, लेकिन चूँकि आधे मन से इन्तजाम में लगा था इसलिए थक भी गया था। रात को सोया भी तो बहुत देर तक नींद नहीं आयी। मामाजी के घर में रहता था। बाहर का कमरा था, जो बैठकखाने के काम भी आता था, उसी में खिड़की के पास मेरा तख्त पड़ा रहता था और खिड़की के ऊपर मेहराबदार आलमारी में मेरी किताबें, कापियाँ।

रात देर में सोया था सुबह बहुत आलस लग रहा था, रात-भर के बाद खिड़की से थोड़ी-सी ठण्डी हवा आ रही थी। मैंनें आँख खोली फिर बन्द कर ली। बस, यह देखा कि खिड़की के पास कोई व्यक्ति बगल में बिस्तरा दबाए खड़ा है। होगा कोई। मैंने फिर करवट बदलकर आँखें बन्द कर लीं कि कुण्डी खड़की। मैंने उठकर दरवाजा खोला। बिस्तरा चबूतरे पर रखकर वे सज्जन बोले—‘‘यह धर्मवीर भारती का मकान है ?’’ ‘‘जी कहिए’’ मैंने पूछा तो बोले, ‘‘कहना क्या है ? आपने बुलाया था मैं आ गया हूँ’’, ‘‘मैंने बुलाया था ?’’ मैंने फिर प्रश्न किया तो बोले, ‘‘आप धर्मवीर भारती हैं न ? मैं वृन्दावनलाल वर्मा हूँ, यह बिस्तरा कहाँ रखूँ ?’’ मैं तो मानो आकाश से गिर पड़ा। गढ़ कुंडार और मृगनयनी का लेखक मेरे गरीब दरवाजे पर इस तरह बिना किसी पूर्व सूचना के।

उनका बिस्तरा संभालकर रखा। मुँह-हाथ धोने के लिए पानी लाया, तो वे बोले—‘‘मुँह-हाथ धो चुका हूँ, नाश्ता भी स्टेशन पर कर लिया है। सिर्फ दाढ़ी बनवाऊँगा।’’ उनके ठहरने का प्रबन्ध हरिमोहनदास टण्डन की कोठी में किया गया था। मैंने रिक्शा बुलाया तो बोले—‘‘पैदल ही चलूँगा।’’ बिस्तरा हाथ में लटकाये वे चल दिये। रास्ते भर मुझसे पूछते रहे कि मैं इतना दुबला क्यों हूँ। बादाम के साथ दूध नियमित लेना चाहिए। कम से कम दो मील रोज दौड़ना चाहिए और नियमित व्यायाम करना लेना चाहिए। पढ़ने-लिखने के अर्थ यह नहीं हैं कि इन्सान सूखकर काँटा बना रहे।

बहरहाल उनके आने से गोष्ठी में चमक आ गयी। हम सबका उत्साह भी चौगुना हो गया। लगभग दो-ढाई सौ लेखक थे—ज्यादातर प्रयाग के, कुछ वाराणसी, लखनऊ, कानपुर के भी। गवर्नर के. एम. मुंशी आये लेकिन राजकीय औपचारिकता का नाम निशान नहीं। अपने ए. डी. सी. तथा सिक्यूरिटी गार्ड को अहाते के बाहर छोड़ दिया था। अहाते से हॉल तक पैदल चलकर आये और रस्म के मुताबिक जूते उतारकर हॉल में आये। हम लोगों ने जूते सँभालकर रखना चाहा, पर उन्होंने स्वयं जूते उठाए और यथास्थान रख दिये।

 गोष्टी शुरू हुई। विषय की रूपरेखा वे पढ़ चुके थे और लगा कि उन्होंने विषय पर खूब विचार भी किया है। केवल आर्थिक परिस्थितियों से इतिहास बनता है, उसमें मनुष्य की सूझ-बूझ और संकल्प का कोई महत्त्व ही नहीं होता, इस विचार को उन्होंने बिलकुल गलत बताया।

बाद में बोले वृन्दावनलालजी। अपनी सहज शैली में मुस्कराते हुए—‘‘अच्छा हुआ कि ये सब प्रश्न सुनने के पहले मैंने दो-चार उपन्यास लिख लिए। ये इतने सारे प्रश्न सामने होते और इनका समाधान ढूँढ़ने में लग जाता तो न गढ़ कुंडार पहुँच पाता न मृगनयनी या विराटा की पद्मिनी से भेंट हो पाती।’’ और फिर उन्होंने अपने रोचक अनुभव सुनाने शुरू किये। कैसे पहुँचे वे अपने कथा-स्थलों तक। कहाँ से मिले उन्हें ये पात्र, किस कथा का अन्त उन्हें पसन्द नहीं था, लेकिन इतिहास में वही था तो वे क्या करते ? मन्त्रमुग्ध से हम सुन रहे थे। उनका वक्तव्य किसी उपन्यास से कम रोचक नहीं था काश की उन दिनों टेप रिकार्डर का अविष्कार हो चुका होता और उनका वह वक्तव्य टेपांकित कर लिया गया होता, तो आज वह साहित्य की अमूल्य निधि होता। हम अपने कथा-साहित्य के इस इतिहास पुरुष का क्या समुचित सम्मान कर पाये ?
बहुत वर्षों बाद मुझे स्कॉटलैण्ड जाने का मौका मिला। साहित्य में मेरी रुचि जानकर वे लोग मुझे ले गये घाटी के कगार पर। पहाड़ी के शिखर पर वह शिला दिखाई जिस पर सर वाल्टर स्कॉट घण्टों बैठकर कथा-चिन्तन किया करते थे। उन झीलों, किलों और खण्डहर हुए राजमहलों को दिखाया, जिनका जिक्र उनके उपन्यासों में आता है। ये सारे स्थान राष्ट्रीय-स्मारक घोषित कर दिये गये हैं और वहाँ सारा विवरण बोर्ड पर पेण्ट करके लगवा दिया गया है।

और हमने अपना महान् उपन्यासकार की स्मृति में क्या किया ? जंगलों में छिपा गढ़ कुंडार धीरे-धीरे खण्डहर होता जा रहा है। उन स्थानों की कभी खोज खबर ही नहीं ली गयी जिन पर उन्होंने उपन्यास लिखे। जिसके सान्निध्य में आतिथ्य और निष्कपट स्नेह का सौभाग्य मुझे मिला था, स्वयं मैं उनकी शतवार्षिकी भूल गया तो किसी दूसरे को क्या उलाहना दूँ !
जब स्टेशन उन्हें पहुँचाने गया तो कुतूहलवश पूछा कि मेरी दो-दो चिट्ठियों और तार का जवाब उन्होंने क्यों नहीं दिया ? हँसकर बोले, ‘‘भाई, देहात का आदमी हूँ। तुमने पत्र-तार सब झाँसी भेजे। मैं झाँसी में था ही नहीं। गाँव में इस बार खूब आम-जामुन आये हैं। उन्हें उतरवा कर झाँसी लाने के लिए बैलगाड़ी में भरवा रहा था।’’
कितने सादे, कितने आडम्बरहीन, कितने सहज हुआ करते थे हमारे साहित्य के ये महान् लोग। उनकी स्मृति को शत्-शत् प्रणाम।


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