दीप शिखा - महादेवी वर्मा Deep Shikha - Hindi book by - Mahadevi Verma
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दीप शिखा

महादेवी वर्मा

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
आईएसबीएन : 9788181434166 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :112 पुस्तक क्रमांक : 2872

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महादेवी द्वारा लिखित कविताओं की विषय वस्तु प्रेम है, परंतु उन्होने प्रेम में मिलन से अधिक विरह को महत्व दिया है...

Diip_Shikha (Vani Prakashan)

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अधिक गूँजती क्यों प्राण वंशी ?
शून्यता तेरे हृदय की
आज किसकी साँस भरती ?
प्यास को वरदान करती,
स्वर-लहरियों में बिखरती !
आज मूक अभाव किसने कर दिया लयवान वंशी ?

अमिट मसि के अंक से
सूने कभी थे छिद्र तेरे,
पुलक के अब हैं बसेरे,
मुखर रंगों के चितेरे,
आज ली इनकी व्यथा किन उँगलियों ने जान वंशी ?

मृणमयी तू रच रही यह
तरल विद्युत ज्वार सा क्या ?
चाँदनी घनसार सा क्या ?
दीपकों के हार सा क्या ?
स्वप्न क्यों अवरोह में, आरोह में दुखगान वंशी ?
गूंजती क्यों प्राण वंशी ?


महादेवी के गीतों का आधिकारिक विषय ‘प्रेम’ है। पर प्रेम की सार्थकता उन्होंने मिलन के उल्लासपूर्ण क्षणों से अधिक विरह की अन्तश्चेतनामूलक पीड़ा में तलाश की। मिलन के चित्र उनके चित्र उनके गीतों में आकांक्षित और संभावित अत: कल्पनाश्रित ही हो सकते थे, पर विरहानुभूति को भी उन्होंने सूक्ष्म, निगूढ़ प्रतीकों और धुँधले बिंबों के माध्यम से ही अधिक अंकित किया। उनके प्रतीकों का विश्लेषण करते हुए अज्ञेय ने कहा : ‘उन्हें तो वैयक्तिक अनुभूतियों को अभिव्यक्ति भी देनी थी और सामाजिक शिष्टाचार तथा रूढ़ बंधनों की मर्यादा भी निभानी थी। यही भाव उन्हें प्रतीकों का आश्रय लेने पर बाध्य करता है।’ महादेवी के गीतों में ऐसे बिम्बों की बहुतायत है जो दृश्य रूप या चित्र खड़े करने की बजाय सूक्ष्म संवेदन अधिक जगाते हैं: ‘रजत रश्मियों की छाया में धूमिल घन सा वह आता’ जैसी पंक्तियों में ‘वह’ को प्रकट करने की अपेक्षा धुंधलाने का प्रयास अधिक है।

महादेवी जी के 51 गीतों के इस चित्रमय काव्य संग्रह का प्रकाशन सेतु प्रकाशन झांसी के संस्थापक संचालक की सुमित्रानन्दन गुप्त के जीवनकाल में सर्वप्रथम सन् 1970 में किया गया था। गीत के पृष्ठभूमि में उसके भाव को लेखिका द्वारा ही चित्रित किया गया। बिना चित्र यह गीत काव्य संग्रह द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सन् 1942 में प्रकाशित हुआ था। पूर्व, प्रकाशित आकार में दीपशिखा शीघ्र ही अलग से प्रकाशित करने की योजना है और इस आकार में इसे प्रकाशित करने की मौलिक योजना भी भाई अरुण जी की ही है। इसके पूर्व महादेवी जी की सम्पूर्ण रचनाओं को ‘‘महादेवी समग्र’’ के 3 खण्डों में तथा ‘‘संकल्पिता’’ का पुर्नप्रकाशन भी वाणी प्रकाशन द्वारा किया जा चुका है। इस सन्दर्भ में श्री जगदीश शर्मा जी नई दिल्ली से प्राप्त मार्गदर्शन व सहयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
सचित्र दीपशिखा के इस लघु संस्करण का पाठकगण स्वागत करेंगे, ऐसी आशा करते हैं।

 

प्रमोद कुमार गुप्त
आशीष गुप्त



दीप मेरे जल अकम्पित,
घुल अचंचल !

सिन्धु का उच्छ्वास घन है,
तड़ित्, तम का विकल मन है,
भीति क्या नभ है व्यथा का
आँसुओं से सिक्त अंचल !

स्वर-प्रकम्पित कर दिशायें,
मीड़ सब भू की शिरायें,
गा रहे आँधी-प्रलय
तेरे लिए ही आज मंगल।

मोह क्या निशि के वरों का
शलभ के झुलते परों का,
साथ अक्षय ज्वाल का
तू ले चला अनमोल सम्बल !

पथ न भूले, एक पग भी,
घर न खोये, लघु विहग भी,
स्निग्ध लौ की तूलिका से
आँक सबकी छाँह उज्जवल !

हो लिये सब साथ अपने,
मृदुल आहटहीन सपने,
तू इन्हें पाथेय बिन, चिर
प्यास के मरु में न खो, चल !

धूम में अब बोलना क्या,
क्षार में अब तोलना क्या !
प्रात हँस रोकर गिनेगा,
स्वर्ण कितने हो चुके पल !

दीप रे तू गल अकम्पित, चल अचंचल !

पथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला !

घेर ले छाया, अमा बन,
आज कज्जल-अश्रुओं में रिमझिमा लें यह घिरा घन;
और होंगे नयन सूखे,
तिल बुझे औ ‘पलक रूखे,
आर्द्र चितवन में यहाँ
शत विद्युतों में दीप खेला !

अन्य होंगे चरण हारे,
और हैं जो लौटते, दे शून्य को संकल्प सारे;

दुखव्रती निर्माण उन्मद,
यह अमरता नापते पद,
बाँध देंगे अंक-संसृति
से तिमिर में स्वर्ण वेला !

दूसरी होगी कहानी,
शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी,

आज जिस पर प्रलय विस्मित,
मैं लगाती चल रही नित,
मोतियों की हाट औ’
चिनगारियों का एक मेला !

हास का मधु-दूत भेजो,
रोष की भ्रू-भंगिमा पतझार को चाहे सहे जो !

ले मिलेगा उर अचंचल,
वेदना-जल-स्वप्न-शतदल;
जान लो वह मिलन एकाकी
विरह में है दुकेला !

ओ चिर नीरव !

मैं सरित विकल,
तेरी समाधि की सिद्धि अकल,
चिर निद्रा में सपने का पल,
ले चली लास में लय-गौरव

मैं अश्रु-तरल,
तेरे ही प्राणों की हलचल,
पा तेरी साधों का सम्बल,
मैं फूट पड़ी ले स्वर-वैभव !

मैं सुधि-नर्तन,
पथ बना, उठे जिस ओर चरण,
दिशा रचता जाता नुपूर-स्वन,
जगता जर्जर जग का शैशव !

मैं पुलकाकुल,
पल पल जाती रस-गागर ढुल,
प्रस्तर के जाते बन्धन खुल,
लुट रहीं व्यथा-निधियाँ नव-नव !

मैं चिर चंचल,
मुझसे है तट-रेखा अविचल,
तट पर रूपों का कोलाहल,
रस-रंग-सुमन-तृण-कण-पल्लव !

मैं ऊर्म्मि विरल,
तू तुंग अचल, वह सिन्धु अतल,
बाँधें दोनों को मैं चल चल,
धो रही द्वैत के सौ कैतव !

मैं गति विह्वल,
पाथेय रहे तेरा दृग-जल,
आवास मिले भू का अंचल,
मैं करुणा की वाहक अभिनव !

प्राण हँस कर ले चला जब
चिर व्यथा का भार !

उभर आये सिन्धु उर में
वीचियों के लेख,
गिरि कपोलों पर न सूखी
आँसुओं की रेख।
धूलि का तब से न रुक पाया कसक-व्यापार !

सान्त दीपों में जगी नभ
की समाधि अनन्त,
बन गये प्रहरी पहन,
आलोक-तिमिर, दिगन्त।
किरण तारों पर हुए हिम-बिन्दु बन्दनवार।

स्वर्ण-शर-से साध के
घन के लिया उर बेध,
स्वप्न-विहगों को हुआ
यह क्षितिज मूक निषेध !
क्षण चले करने कणों का पुलक से श्रृंगार !

शून्य के निश्वास ने दी
तूलिका सी फेर,
ज्वार शत शत रंग के
फैले धरा को घेर !
वात अणु अणु में समा रचने लगी विस्तार !

अब न लौटाने कहो
अभिशाप की वह पीर,
बन चुकी स्पन्दन हृदय में
वह नयन में नीर !
अमरता उसमें मनाती है मरण-त्योहार।

छाँह में उसकी गये आ
शूल फूल समीप,
ज्वाल का मोती सँभाले,
मोम की यह सीप !
सृजन के शत दीप थामे प्रलय दीपाधार !

सब बुझे दीपक जला लूँ !
घिर रहा तम आज दीपक-रागिनी अपनी जगा लूँ !

क्षितिज-कारा तोड़ कर अब
गा उठी उन्मत्त आँधी,
अब घटाओं में न रुकती
लास-तन्मय तड़ित् बाँधी,
धूलि की इस वीण पर मैं तार हर तृण का मिला लूँ !

भीत तारक मूँदते दृग
भ्रान्त मारुत पथ न पाता,
छोड़ उल्का अंक नभ में
ध्वंस आता हरहराता,
उँगलियों की ओट में सुकुमार सब सपने बचा लूँ !

लय बनी मृदु वर्त्तिका
हर स्वर जला बन लौ सजीली,
फैलती आलोक-सी
झंकार मेरी स्नेह गीली,
इस मरण के पर्व को मैं आज दीपावली बना लूं !

देखकर कोमल व्यथा को
आँसुओं के सजल रथ में,
मोम-सी साधें बिछा दीं
थीं इसी अंगार-पथ में,
स्वर्ण हैं वे मत कहो अब क्षार में उनको सुला लूँ !

अब तरी पतवार ला कर
तुम दिखा मत पार देना,
आज गर्जन में मुझे बस
एक बार पुकार लेना !
ज्वार को तरणी बना मैं; इस प्रलय का पार पा लूँ !

आज दीपक राग गा लूँ !

हुए शूल अक्षत मुझे धूलि चन्दन !

अगरू-धूम सी सांस सुधि-गन्ध-सुरभित,
बनी स्नेह-लौ आरी चिर अकम्पित;
हुआ नयन का नीर अभिषेक-जल-कण !

सुनहले सजीले रँगीले धबीले,
हसित कंटकित अश्रु-मकरन्द-गीले,
बिखरते रहे स्वप्न के फूल अनगिन !

असित-श्वेत गन्धर्व जो सृष्टि लय के,
दृगों को पुरातन, अपरिचित हृदय के,
सजग यह पुजारी मिले रात औ’ दिन !

परिधिहीन रंगों भरा व्योम-मंदिर,
चरण-पीठ भू का व्यथा-सिक्त मृदु उर,
ध्वनित सिन्धु में है रजत-शंख का स्वन

कहो मत प्रलय द्वार पर रोक लेना,
वरद मैं मुझे कौन वरदान देगा ?
हुआ कब सुरभि के लिए फूल बन्धन ?

व्यथाप्राण हूँ नित्य सुख का पता मैं,
धुला ज्वाल से मोम का देवता मैं,
सृजन-श्वास हो क्यों गिनूँ नाश के क्षण !


आज तार मिला चुकी हूँ !

सुमन में संकेत-लिपि
चंचल विहग-स्वर-ग्राम जिसके,
वात उठता, किरण के
निर्झर झुके, लय-भार जिसके,
वह अनामा रागिनी अब साँस में ठहरा चुकी हूँ !

सिन्धु चलता मेघ पर,
रुकता तड़ित् का कंठ गीला,
कंटकित सुख से धरा,
जिसकी व्यथा से व्योम नीला,
एक स्वर में विश्व की दोहरी कथा कहला चुकी हूँ !

एक ही उर में पले
पथ एक से दोनों चले हैं,
पलक-पुलिनों पर, अधर-
उपकूल पर दोनों खिले हैं,
एक ही झंकार में युग अश्रु-हास घुला चुकी हूँ !

रंग-रस-संसृति समेटे,
रात लौटी, प्रात लौटे;
लौटते युग कल्प पल,
पतझार औ’ मधुमास लौटे;
राग में अपने कहो किसको न पार बुला चुकी हूं !
निष्करुण जो हँस रहे थे
तारकों में दूर ऐंठे
स्वप्न-नभ के आज
पानी हो तृणों के साथ बैठे,
पर न मैं अब तक व्यथा का छंद अन्तिम गा चुकी हूँ।


कहाँ से आये बादल काले ?
कजरारे मतवाले ?

शूल भरा जग धूल भरा नभ,
झुलसीं देख दिशायें निष्प्रभ,
सागर में क्या सो न सके यह
करुणा के रखवाले ?

आँसू का तन, विद्युत का मन,
प्राणों में वरदानों का प्रण,
धीर पदों से छोड़ चले घर,
दुख-पाथेय सँभाले !

नाँघ क्षितिज की अन्तिम दहली,
भेंट ज्वाल की वेला पहली,
जलते पथ को स्नेह पिला
पग पग पर दीपक बाल !

गर्जन में मधु-लय भर बोले,
झंझा पर निधियाँ धर डोले,
आँसू बन उतरे तृण-कण ने
मुस्कानों में पाले !

नामों में बाँधे सब सपने,
रूपों में भर स्पन्दन अपने,
रंगों के ताने बाने में
बीते क्षण बुन डाले !

वह जड़ता हीरों से डाली,
यह भरती मोती से थाल,
नभ कहता नयनों में बस
रज कहती प्राण समा ले !

यह सपने सुकुमार तुम्हारी स्मित से उजले !

छूकर मेरे सजल दृगों की मधुर कहानी,
इनका हर कण हुआ अमर करुणा वरदानी,
उड़े तृणों की बात तारकों से कहने यह
चुन प्रभात के गीत, साँझ के रंग सलज ले !

लिये छाँह के साथ अश्रु का कुहक सलोना,
चले बसाने महाशून्य का कोना कोना,
इनकी गति में आज मरण बेसुध बन्दी है,
कौन क्षितिज का पाश इन्हें जो बाँध सहज ले।

पंथ माँगना इन्हें नहीं पाथेय न लेना,
उन्नत मूक असीम, मुखर सीमित तल देना,
बादल-सा उठ इन्हें उतरना है जल-कण सा
नभ विद्युत के बाण, सजा शूलों को रज ले !

जाते अक्षरहीन व्यथा की लेकर पाती,
लौटाना है इन्हें स्वर्ग से भू की थाती,
यह संचारी दीप, ओट इनको झंझा दे,
आगे बढ़ ले प्रलय, भेंट तम आज गरज ले !

छायापथ में अंक बिखर जावें इनके जब,
फूलों में खिल रूप निखर आवें इनके जब,
वर दो तब यह बांध सकें सीमा से तुमको,
मिलन-विरह के निमिष-गुँथी साँसों की स्रज ले !

तरल मोती से नयन भरे !

मानस से ले, उठे स्नेह-घन,
कसक-विद्यु पुलकों के हिमकण,
सुधि-स्वाती की छाँह पलक की सीपी में उतरे !

सित दृग हुए क्षीर लहरी से,
तारे मरकत-नील-तरी से,
सूखे पुलिनों सी वरुणी से फेनिल फूल झरे !

पारद से अनबीधें मोती,
साँस इन्हें बिन तार पिरोती,
जग के चिर श्रृंगार हुए, जब रजकण में बिखरे !

क्षार हुए, दुख में मधु भरने,
तपे, प्यास का आतप हरने,
इनसे धुल कर धूल भरे सपने उजले निखरे !


विहंगम-मधुर स्वर तेरे,
मदिर हर तार है मेरा !

रही लय रूप छलकाती       तुझे पा बज उठे कण-कण
चली सुधि रंग ढुलकाती,       मुझे छू लासमय क्षण-क्षण !
तुझे पथ स्वर्ण रेखा, चित्रमय    किरण तेरा मिलन, झंकार-
संचार है मेरा !           सा अभिसार है मेरा !

धरा से व्योम का अन्तर,    न कलरव मूल्य तू लेता,
रहे हम स्पन्दनों से भर,     हृदय साँसें लुटा देता,
निकट तृण नीड़ तेरा, धूलि का     सजा तू लहर-सा खग,
आगार है मेरा !         दीप-सा श्रृंगार है मेरा !

चुने तूने विरल तिनके,    गगन का तू अमर किन्नर,
गिने मैंने तरल मनके,     धरा का अजर गायक उर,
तुझे व्यवसाय गति है,     मुखर  है शून्य तुझसे, लय-भरा
प्राण का व्यापार है मेरा !      यह क्षार है मेरा !
 
उड़ा तू छंद बरसाता,     बिछी नभ में कथा झीनी,
चला मन स्वप्न बिखराता,    घुली भू में व्यथा भीनी,
अमिट छवि की परिधि तेरी,     तडित् उपहार तेरा, बादलों-
अचल रस-पार है मेरा !      सा प्यार है मेरा !










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