दो नाक वाले लोग - हरिशंकर परसाई Do Naak Vale Log - Hindi book by - Harishankar Parsai
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दो नाक वाले लोग

हरिशंकर परसाई

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
आईएसबीएन : 81-8143-283-5 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :112 पुस्तक क्रमांक : 2871

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इसमें दो नाक वाले लोगों पर व्यंग्य करने का वर्णन है...

Do Nak Vale Log

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मैं उन्हें समझा रहा था कि लड़की की शादी में टीमटाम में व्यर्थ खर्च मत करो। पर वे बुजुर्ग कह रहे थे-आप ठीक कहते हैं, मगर रिश्तेदारों में नाक कट जायेगी।
नाक उनकी काफी लम्बी थी। मेरा ख्याल है, नाक की हिफाज़त सबसे ज्यादा इसी देश में होती है। और या तो नाक बहुत नर्म होती है या छुरा तेज जिससे छोटी-सी बात से भी नाक कट जाती है। छोटे आदमी की नाक बहुत नाजुक होती है। यह छोटा आदमी नाक को छिपाकर क्यों नहीं रखता ?

कुछ बड़े आदमी, जिनकी हैसियत है, इस्पात की नाक लगवा लेते हैं और चमड़े का रंग चढ़वा लेते हैं। कालाबाजार में जेल हो आये हैं। औरत खुले आम दूसरे के साथ ‘बॉक्स’ में सिनेमा देखती है। लड़की का सार्वजनिक गर्भपात हो चुका है। लोग उस्तरा लिये नाक काटने को घूम रहे हैं। मगर काटें कैसे ? नाक तो स्टील की है। चेहरे पर पहले जैसी ही फिट है और शोभा बढ़ा रही है।
स्मगलिंग में पकड़े गये हैं। हथकड़ी पड़ी है। बाजार में से ले जाये जा रहे हैं। लोग नाक काटने को उत्सुक हैं। पर वे नाक को तिजोड़ी में रखकर स्मगलिंग करने गये थे। पुलिस को खिला-पिला कर बरी होकर लौटेंगे और नाक फिर पहन लेंगे।

जो बहुत होशियार है, वे नाक को तलवे में रखते हैं। तुम सारे शरीर में ढूँढ़ों, नाक ही नहीं मिलती ! नातिन की उम्र की दो लड़कियों से बलात्कार कर चुके हैं। जालसाज़ी और बैंक को धोखा देने में पकड़े जा चुके हैं। लोग नाक काटने को उतावले हैं, पर नाक मिलती ही नहीं। वह तो तलवे में है। कोई जीवशास्त्री अगर नाक की तलाश भी कर दे तो तलवे की नाक काटने से क्या होता है ? नाक तो चेहरे पर की कटे, तो कुछ मतलब होता है।

दो शब्द


हरिशंकर परसाई और मैं इसी जबलपुर के निवासी हैं।
जब मैं ‘शुभचिन्तक’ साप्ताहिक का सम्पादन करता था, तब मैंने परसाई जी की आरंभिक रचनाएँ प्रकाशित की थीं।
इसके बाद मेरे-उनके सम्बन्ध बड़े और छोटे भाई के हो गये। मैं बीमार पड़ता तो परसाई रात-दिन मेरी सेवा अस्पताल में करते। और जब परसाई को, जिन पर दो विधवा बहनों और बच्चों की जिम्मेदारी रही, कोई कष्ट होता, तो वे मुझसे कहते और वह कठिनाई में तुरन्त ठीक कर देता। इस तरह के आत्मीय सम्बन्ध विकसित होते रहे।
मैं मूल रूप से साहित्य-सर्जक हूँ। यह संयोग है कि मेरा प्रकाशन भी चल पड़ा और लोग मुझे ‘प्रकाशक ’ कहने लगे।
परसाई की प्रतिभा भारतीय भाषाओं में अद्वितीय है। इतना सजग, तीव्र, तीखा, चेतन व्यंग्य-लेखक देश का गौरव है। उनकी रचनाएँ कई भाषाओं में अनूदित होती हैं- देश में और विदेश में। उनकी प्रखर व्यंग्य-क्षमता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि एक राजनैतिक दल ने उन पर हमला करवा दिया। वे पीटे गये।

परसाई की ये ताज़ा कहानियाँ हैं। वे किसी दिल्ली के प्रकाशक को भी यह संग्रह दे सकते थे; पर मेरे अधिकारपूर्वक कहने से उन्होंने ये कहानियाँ मुझे दे दीं।
विषयों, जीवन-सन्दर्भों और चरित्रों को देखकर मैं मुग्ध हूँ। हर पाठक मुग्ध होगा।
मेरा विश्वास है, वर्तमान सामाजिक जीवन की सड़ाँध, विरूपता, विसंगति पर व्यंग्य, साथ ही जीवन के प्रति आस्था, इन रचनाओं में है परसाई घोर यथार्थवादी लेखक तथा विचारक हैं। उन्होंने व्यावहारिक जीवन में भीषण संघर्ष किया है और लेखन-प्रक्रिया के समय उनका संघर्ष और भी अधिक तीव्रतर बना रहा है। वे जीवन के हर सन्दर्भ के साथ जुड़े हुए हैं। राजनीति, समाज, संस्कृति, साहित्य और कला-सभी उनके लिए यथार्थ वाहक हैं। उनके व्यक्तित्व में कबीर का फक्कड़पन तथा उनके लेखन में निराला की जीवंतता समन्वित है।

मैं पुरानी पीढ़ी का आदमी कहलाता हूँ, पर मैं अभी भी नई से नई प्रतिभा की तलाश में रहा हूँ। भरसक सहायता भी करता रहता हूँ। मैं पीढ़ियों के संघर्ष को नहीं मानता। मैं सृजन की सार्थकता को मानता हूँ।
परसाई जी का सृजन बहुत सार्थक है, इसलिए मैं उन्हें बड़ा लेखक मानता हूँ।

नर्मदा प्रसाद खरे

भूमिका

ये कुछ कहानियाँ, एक-दो निबन्ध, एक-दो फंतासी इस संग्रह में हैं। इसकी अधिकतर कहानियाँ पहले ‘एक लड़की पाँच दीवाने’ नाम से पुस्तक रूप में आ चुकी है। किसी कारण पुस्तक का वह नाम मुझे अच्छा नहीं लगा। मुझे कुछ रचनाएँ और भी उसमें जोड़नी थी। इसलिए अब जब यह संग्रह वाणी प्रकाशन से छप रहा है, तब मैंने इसका नाम ‘दो नाक वाले लोग’ कर दिया है।
पुस्तक के इस नाम-बदल में यह उद्देश्य नहीं है कि उस नाम से भी पुरस्कार ले लिया और इस नाम से भी ले लें। पुरस्कार न उस पर मिला था, न इस पर मिलेगा।
इन रचनाओं के बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहता। पाठक ही कहेंगे। मैं अकसर लेखक मित्रों से कहता हूँ, कि पाठक बड़ी तेजी से समझ में बढ़ रहा है। कहीं ऐसा न हो जाय कि पाठक आगे निकल जाय और हम लेखक पिछड़ जायें।
वाणी प्रकाशन के अशोक कुमार जरूर श्रेय के भागीदार हैं, जो मेरे पीछे पड़े रहे।
हरिशंकर परसाई

पुस्तक के विषय में

‘दो नाक वाले लोग’ सामाजिक जीवन के भीतर किन्हीं कारणों से महत्त्वपूर्ण हो गए व्यक्तित्वों की दोमुंही जिंदगी को बेनकाब करने वाली व्यंग्य-प्रधान लघु कथाओं का संग्रह है। ‘अकाल-उत्सव’ ‘एक के भीतर दो आदमी’, ‘सड़े आलू का विद्रोह’, और ‘नवम्बर दो की आत्मा’ समवर्ती जीवन के भीतर पनप रहे खंडित मध्यवर्गीय और अपर-वर्गीय छद्म को न केवल बेनकाब करने वाली रचनाएँ हैं, अपितु उस यथार्थ को भी प्रस्तुत करती हैं, जो व्यवस्था की अपनी नियति को व्यक्त करता है, जहाँ प्रतिष्ठा-प्राप्ति के लिए ऐसा छद्म और दो मुंहापन जरूरी हो गया है।

आदर्श और आचरण के बीच के अन्तर्विरोध से कैसा हास्यास्पद चरित्र बनता है, इसके उदाहरण इस संग्रह की प्रत्येक लघु-कथा के भीतर विद्यमान है। पाठक इनके माध्यम से स्वयं अपने उस परिवेश से परिचित होता है, जो आज के भारतीय जीवन की निरर्थक नियति है, यानी जिसे बदलना आदमी की सार्थक पहचान के लिए आवश्यक है।

एक लड़की, पाँच दीवाने


गोर्की की कहानी है, ‘26 आदमी और एक लड़की’। इस लड़की की कहानी लिखते मुझे वह कहानी याद आ गयी। रोटी के एक पिंजड़ानुमा कारखाने में 26 मजदूर सुअर से भी बदतर हालत में रहते और काम करते हैं। मालिक की जवान लड़की जब निकलती है, वे सब सीखचों से उसे देखते हैं। जीवन के रेगिस्तान में थोड़ी हरियाली आती है। वे उसे देवी जैसी पूजते हैं। अलग-अलग और इकट्ठे उससे प्रेम करते हैं। एक दिन जब वह अपने उच्चवर्गीय प्रेमी के साथ बाहर निकलती है, वे आदतन उसे झाँकते हैं। लड़की कहती है-सुअर कहीं के ! और प्रेमी के साथ चली जाती है।
पर जिस लड़की की कहानी मैं लिख रहा हूँ, वह बड़े आदमी की लड़की नहीं, गरीब मध्यमवर्गीय परिवार की बड़ी लड़की है। पिता सरकारी नौकर है। पत्नी बच्चे पैदा करने में गांधारी की स्पर्धा करती है। गांधारी ने अंधे पति से 100 बेटे पैदा कर दिये थे, इस औरत ने जवानी में ही आँखों वाले पति से 4 पैदा कर लिये हैं। पाँचवें का शिलान्यास हो गया है। मरियल है। पूरा खाने को नहीं मिलता। शरीर में खून नहीं। हड्डी ही हड्डी है।

बड़ी लड़की विशेष दुर्बल नहीं है। वही खाना बनाती है। माँ तो लगातार प्रसूती ही रहती है। लगता है, लड़की खाना, बनाते-बनाते एकाध रोटी ज्यादा निगल लेती होगी। रोटी बड़े-बड़े क्रांतिकारियों को कमजोर बनाती है। चे गुएवारा ने डायरी में लिखा है कि एक बहादुर गुरिल्ला साथी एक दिन चोरी से डबलरोटी के दो टुकड़े खा गया। दूसरे दिन उसे दंड में नाश्ता नहीं दिया गया।
लड़की छरहरी है। सुंदरी है। और गरीब की लड़की है।
मुहल्ला ऐसा है कि लोग 12-13 साल की बच्ची को घूर-घूर कर जवान बना देते हैं। वह समझने लगती है कि कहाँ घूरा जा रहा है। वह इन अंगों पर ध्यान देने लगती है। ब्लाउज को ऊंचा करने लगती है। नीचे कपड़ा रख लेती है। कटाक्ष का अभ्यास करने लगती है। पल्लू कब खसकाना और कैसे खसकाना-यह अभ्यास करने लगती है। घूरने से शरीर बढ़ता है।
आँखें बड़ी ताकतवर होती हैं।
रहीम ने कहा है-

रहिमन मन महाराज के, दृग सों नहीं दिवान।
जाहि देख रीझे नयन, मन तेहि हाथ बिकान।।

मन के दीवान जी होते हैं, नयन। नयनों के उपयोग के ज्ञानी उनका असर जानते हैं। अगर आँखों का असर भीतर पड़ रहा है, तो स्त्री लॉकेट हाथ में लेकर उसे हिलाने लगती है। लॉकेट न हो तो साड़ी के पल्ले को अँगुली पर लपेटने लगती है। थोड़ी कठिनाई उसके साथ होती है, जो स्वेटर बुन रही है। पर ध्यान से देखो तो वह भी दो-चार खाने गलत बुन देती है और उन्हें उकेलकर फिर बुनने लगती है। बाकी चलतू साफ ही कह देती हैं-आज तो आपसे ही आइसस्क्रीम खायेंगे। चलिये।
लड़की को बाकी घूरने वाले अब हताश होकर कहीं और घूर रहे हैं। अब कुल पाँच दीवाने बचे हैं, जो सामने बैठते या चक्कर लगाते हैं। चक्कर लगाता प्रेमी बैठे प्रेमी से सवाया पड़ता है क्योंकि वह मेहनत करता है। फिर परम्परा से कूचे की खाक छानता चला आ रहा है। लड़की अठारह साल की हो रही है। उभार पर है। छज्जे पर आकर देखने लगती है, तो उपस्थित दीवाना समझता है कि मेरे ही लिए खड़ी है और मुझी को देख रही है। पाँचों दीवाने एक साथ सिर्फ शाम को होते हैं, क्योंकि वे दिन में काम पर जाते हैं। दिन में जो हाजिर होता है, वह छज्जा देखता रहता है। आँखें मिलाता है, हावभाव करता है।

सामने एक अधेड़ जनरल मर्चेंट की दूकान है। नीचे क्राकरी की। क्राकरी वाला जवान है, मगर उसकी मुसीबत यह है कि छज्जा सिर के ऊपर पड़ता है। जनरल मर्चेंट के बगल में किताबों की दूकान है, जिसका मालिक 40 साल का खूबसूरत आदमी है। ठीक सामने के दो कमरे के मकान में एक जवान आदमी रहता है जो बीमा कंपनी में काम करता है और 5-6 सौ से ऊपर की कमा लेता है। यह 3-4 घंटे ही बाहर रहता है। बाकी समय घर में काटता है। क्वाँरा है। घर के सामने एक हलवाई की दूकान है। 50 पर पहुँचता होगा, पर वह भी दीवाना है।

दीवाना नम्बर 1


इसे कुल 3-4 घंटे का काम है। माल यहाँ से वहाँ सप्लाई करके वरी हो जाता है और जनरल मर्चेंट की दूकान पर आकर बैठ जाता है। आर्थिक कठिनाई में रहता है। इसने दाढ़ी बढ़ा ली है। दाढ़ी अलग-अलग तरह की होती है-प्रेमी की दाढ़ी अलग, मुल्ला की अलग और मुफलिस की अलग। इसने प्रेमी की दाढ़ी बढ़ा ली है। ‘ट्रिम’ करवाता है। दाढ़ी दीन भी होती है और रोबदार भी। यह दाढ़ी वाले के व्यक्तित्व और आँखों के भाव से मालूम हो जाता है। कुछ दाढ़ियाँ क्षमा-याचना करती मालूम होती हैं। इस प्रेमी का विश्वास है कि दाढ़ी बढ़ा कर आँखों में भिखारीपन लेकर औरत का सामना करो तो वह आकर्षित हो जाती है। यह दाढ़ी और दीनता लिये कभी दूकान पर बैठकर छज्जा देखता रहता है या फिर सामने की सड़क पर टहलता है।

यह सही है कि कुछ औरतों को दाढ़ी पसंद होती है। मैंने सुना है कुछ औरतें पति की दाढ़ी को इतना पसंद करती हैं कि सुबह दाढ़ी में टूथपेस्ट लगा कर उसी से ब्रश कर लेती हैं।
यह प्रेमी सिर्फ देखता है। वह छज्जे पर आक्सीजन लेने आती है, तो दाढ़ी वाला समझता है कि वह उसी को देखने आयी है और दीन हो जाता है। वह करुणा में से प्रेम निकालना चाहता है। करुणा में से प्रेम निकलता भी है। गाँव की चलतू औरत कहती है-इत्ते बड़े-बड़े आदमी के लड़के और मेरे गोड़ (पाँव) पड़े। मेरा तो जी पसीज जाए है। नहीं करते नहीं बनै।
दाढ़ी वाले को कभी-कभी लड़की का सामीप्य प्राप्त होता है। नीचे के नल से लड़की का भाई बालटियाँ भर कर ऊपर ले जाता है। कभी वह नहीं होता, लड़की पानी भरने आती है। तब दाढ़ी वाला प्रेमी पानी की बालटियाँ उठा कर दरवाजे तक रख आता है। वह कहती है-बड़ी तकलीफ की तुमने भैया ! दाढ़ी वाला ‘भैया’ संबोधन से बहुत डरता है। कहीं यह राखी न बाँधने लगे ! दाढी वाले प्रेमी को 7-8 घंटे जनरल मर्चेंट की दुकान पर बैठने के लिए बहाना चाहिए। वह कहता है-बड़े भैया, मैं तो फुरसत में रहता हूँ। कुछ काम हो, तो बता दिया करिये। दुकानदार उसे पार्सल छुड़ाने और माल सप्लाई करने भेज देता है। सेठ ने बाहर का काम करने वाले नौकर को निकाल दिया है।

दीवाना नंबर 2


यह 30 साल के लगभग है। गोरा और साधारणत: देखने में अच्छा है। इसे दूसरों से कुछ ज्यादा सुभीते भी हैं और कुछ असुविधाएँ भी। सुभीता यह है वह रुपये उधार दे देता है, पर उधार लेने लड़की का बाप आता है। वह चाहता है, लड़की आये। कहता है-तुम क्यों तकलीफ करते हो ? बच्चों को भेज दिया करो। पर बाप खुद ही उधार लेने आता है, या लड़की की माँ आ जाती है। असुविधा इस दीवाने को यह है कि लड़की ऊपर रहती है। वह उसे देख नहीं सकता। पीछे की तरफ जाता है, तो वहाँ ऊपर लकड़ी की जाली लगी है। लड़की उसे दिखती नहीं है। मजबूरी में वह पुस्तक-प्रेमी हो गया है। वह सामने कि किताब की दुकान पर बैठता है एकाध घंटे और मुआवजे के रूप में गुलशन नंदा की कोई किताब खरीद लाता है।
इधर एक तरीका उसने और निकाला। सब्जी का ठेले वाला थोड़ी दूर पर, जहाँ रोज काफी सब्जी खरीदने वाले परिवार रहते हैं, खड़ा होता है। क्राकरी वाले ने सोचा कि ठेले वाला यहाँ भी खड़ा हो, तो वह सब्जी खरीदने नीचे आया करेगी। उसने ठेले वाले से कहा-इधर भी खड़े रहा करो। उसने उम्मीद की कि भाव-ताव को लेकर बात होगी। कभी उसके पास पैसे न होंगे, तो मैं उधार में दिला दूँगा और बाद में चुकता कर दूँगा।

ठेले वाले ने कहा-यहाँ, भाई साब, खरीदने वाले ही नहीं है।
दीवाने ने कहा-हैं क्यों नहीं ? एक-दो रोज देखो।
ठेले वाला दरवाजे के पास खड़ा होकर आवाज लगाने लगा। लड़की ऊपर से आयी। उसने पूछा-आलू क्या भाव दिये ?
इतने में दीवाना क्राकरी के ग्राहक को छोड़ कर ठेले के पास आ गया। प्रेम में बड़ा त्याग करना पड़ता है। ग्राहक खोना पड़ता है।
ठेले वाले से कहा-ठीक भाव से देना। और लड़की से आँखें मिलाने लगा।
लड़की ने कहा-पाव किलो आलू दे दो। सब्जी वाला निराश हुआ। क्राकरी वाला नैतिक संकट में आ गया।
उसने कहा-ए, एक किलो दे दो। बाकी पैसे कल ले जाना।

सब्जी वाले ने भरोसा कर लिया। उसने एक किलो तौल दिये। पर सब्जी वाले को रोज वहाँ रोकने के लिए इतनी खरीद काफी नहीं थी। क्राकरी वाले ने लड़की के बाकी पैसे दिये और घर के लिए दो-तीन किलो सब्जी और खरीद ली। उसे भरोसा हो गया कि सब्जी वाला अब रोज यहाँ खड़ा होगा और मेल-जोल बढ़ेगा।
पर प्रेम का रास्ता काँटों का रास्ता है। पता नहीं, इस सनातन मार्ग पर कब कांक्रीट की सड़कें बनेंगी। अभी भी प्रेम में काँटों भरी पगदंडी पर से चलना पड़ता है। योजना आयोग को अगली योजना में प्रेम की कांक्रीट की सड़कों का प्रावधान करना चाहिए।

बात यह हुई कि जब क्राकरी वाला जवान दोपहर को सब्जी लेकर घर पहुंचा और उसके पिता ने सब्जी देखी, तो डाँटा-तुझसे किसने कहा था कि सब्जी ला ? यह कचरा उठा लाया।
बात यह है कि पिता रिटायर्ड बेकार आदमी हैं। वह सुबह झोला लेकर सब्जी-बाजार चल देते हैं। दस दुकानें हैं और बढ़िया सब्जी खरीदते हैं।
नतीजा प्रेमी के लिए बुरा हुआ। दूसरे दिन से उसने सब्जी खरीदना बंद कर दिया और ठेले वाले ने वहाँ रुकना बंद कर दिया। अब ऊपर के परिवार को सब्जी चाहिए, तो छोटी लड़की दूर खड़े ठेले से पाव किलो आलू खरीद लाती है। अब इस दीवाने को कुल इतना सहारा है कि सामने की किताब की दुकान पर बैठे, देखे और नजर बचा कर हलका-सा इशारा कर दे।
दीवाने अपने बरताव से लड़की को चतुर बनाये दे रहे हैं। भोली लड़की सुविधा की होती है। उसे पटाना आसान होता है। पर ये दीवाने उसे काइयाँ बना रहे हैं। यह इन्हीं के हित के विरुद्ध जा रहा है। अब वह लड़की आसान नहीं रही।

दीवाना नंबर 3


यह सामने वाला हलवाई है। निहायत गंदी चड्डी और मैल से काली बनियान पहन कर भट्टी के सामने सवेरे बैठ जाता है। दाढ़ी खिचड़ी है और कई दिन बनाता नहीं है। दाँत पीले हैं, नाक को नाक नहीं, आलू बंडा कहा जा सकता है। जलेबी के बाद वह आलू बंडे और...और भजिये बनाता है।
यह विकट दीवाना है। छज्जे की तरफ देखते हुए कड़ाही में चमचा चलाता है। जलेबी जल भी जाती है। कभी कच्चे-कच्चे आलू-बंडे निकाल लेता है। तेल खाली जलता रहता है और वह छज्जे पर लड़की को देखता रहता है। फिर उसे जलेबी दिखा कर अपने पीले दाँतों से हँसता है। समझता है, गरीब की लड़की है, आकर जलेबी ले जायेगी। पर वह नहीं आती। एक दिन छोटी लड़की को उसने जलेबी दे दी थी। कहने लगा-सब लोग बाँट कर खाना। उसका मतलब था, वह मेहबूबा भी खा ले। पर मेहबूबा ने छोटी को डाँट दिया-फिर उससे जलेबी लेगी, तो पिट जायेगी।

इधर यह दीवाना पीले दाँत निकाले और नथुने फैलाये छज्जे की तरफ देख रहा था कि वह अब आयी, पर वह नहीं आयी। तब दीवाना दुकान के इस कोने, उस कोने खड़ा होकर देखने लगा कि भीतर ही दिख जाये। लड़की सब कुछ भीतर से देख रही थी। आखिर वह बाहर छज्जे पर आकर खड़ी हो गयी और हलवाई की तरफ देख लिया। वह कृतार्थ हो गया। उस वक्त वह आकर कहती है कि मैं तुम्हारा तला हुआ हाथ खाऊँगी, तो वह पंजा तल कर उसे खिला देता।
लोग उससे पूछते हैं-तुम्हारी उम्र कितनी है ? 50 के पार तो होगी ? वह कहता है-30 से ऊपर नहीं है। पाँच साल से भट्ठी के सामने बैठ रहा हूँ, इसलिए उमर ज्यादा लगती है। पाँच साल पहले देखते। अच्छे-अच्छे घरों की मरती थी। दो-तीन तो जल कर मर गयी थी मेरे प्रेम में।
जब वह छज्जे पर आती है, हलवाई पीले दाँत निकाल कर, थुथने फैला कर साँड की तरह दूर से सूँघता है कि तैयार हुई कि नहीं।





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