अक्षर अक्षर यज्ञ - धर्मवीर भारती Akshar Akshar Yagya - Hindi book by - Dharamvir Bharti
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अक्षर अक्षर यज्ञ

धर्मवीर भारती

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1999
आईएसबीएन : 81-7055-647-3 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :474 पुस्तक क्रमांक : 2838

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पत्रों की दुनिया एक लेखक के निजत्व और उसकी गहन सामाजिकता को उजागर करती है।

Akshar Akshar Yagya a hindi book by Dharamvir Bharti - अक्षर अक्षर यज्ञ - धर्मवीर भारती

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पत्रों की दुनिया एक लेखक के निजत्व और उसकी गहन सामाजिकता को उजागर करती है। ऐसे में अगर वह लेखक डॉ. धर्मवीर भारती सरीखा संवेदनशील कवि-कथाकार और सुधी संपादक हो तो उसके पत्रों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

डॉ. भारती का पत्र-लेखन उनके व्यक्तित्व की ही तरह व्यापक है, और इसे उनके इस पत्र-संग्रह के माध्यम से बाखूबी समझा जा सकता है। इसमें यदि ‘अभ्युदय’ जैसे साहित्यिक पत्रों के संदर्भ में स्व. माखनलाल चतुर्वेदी को लिखे गये पत्रों को देखा जा सकता है तो ‘धर्मयुग’ से जुड़े नये-पुराने लेखकों से संवाद करते हुए उनकी रचनात्मक संपादकीय ऊर्जा को भी अनुभूत किया जा सकता है। ऐसा करते हुए उनके अपने लेखकीय दुःखों की फुसफुसाहटें भी सुनी जा सकती है, लेकिन उनके पीछे के कोलाहल को सुनना यहाँ काफी कठिन है, क्योंकि उस सबको उन्होंने ‘धर्मयुग’ के संपादक जैसे गुरुतर युगधर्म पर कभी तरजीह नहीं दी। यही कारण है कि इन पत्रों में उनके निजी सम्बन्धियों के पत्र प्रायः एकदम नहीं हैं।

दूसरे शब्दों में कहा जाये तो 1960-61 से लेकर आखिर तक ‘धर्मयुग’ भारती जी की एक ऐसी धर्मस्थली रही, जहाँ बैठकर उन्होंने देश-विदेश के लाखों पाठकों का साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संस्कार किया। कहना ना होगा कि उनकी यह पत्रावली उनकी उस जीवन साधना का तो दस्तावेजी साक्ष्य है ही, साथ में इस शताब्दी के लगभग समूचे उत्तरार्ध को भी उसकी घटना-बहुलता में प्रस्तुत करती है।

भूमिका

भारती जी ने कनुप्रिया में लिखा था :
‘‘मंत्र पढ़े बाण से छूट गये तुम तो कनु, शेष रही मैं केवल, काँपती प्रत्यंचा-सी, अब भी जो बीत गया, उसी में बसी हुई, अब भी उन बाँहों के छलावे में, कसी हुई...’’

मैं नहीं जानती राधा दर्द की किन हदों से, कैसे गुजरी होगी। पर 4 सितम्बर 1997 की वह सुबह मेरी सारी चेतना के एक-एक तंतु को, मेरे सारे शरीर के एक-एक रेशे को किस तरह कँपा गई थी यह मैं ही जानती हूँ। मंत्र पढ़े बाण से छूट गये थे भारती जी ! पर मैं अभागन तो ऐसी प्रत्यंचा थी जो बिना तने ही थर-थर काँप रही थी। मृत्यु का क्षण निकट है इसका जरा भी आभास होता तो जरूर ही नसों की प्रत्यंचा तन गई होती—13 जुलाई 1989 को वह भीषण तनाव महसूस किया भी था—पर 4 सितम्बर को तो यों की यों धरी की धरी सी प्रत्यंचा ऐसा काँपी ऐसी काँपी कि घंटे, प्रहर, दिन, रात बीतते चले गये और थरथराहट थी कि थम ही नहीं रही थी। मेरी बेटी अपने हाथों से अपने पिता को मुखाग्नि देकर उनका अंतिम संस्कार करने के क्षण से ही मेरी बेटी नहीं मानो मेरा पिता बन गई थी—हर पल अपनी छाँह में मुझे समेट लेने को उद्यत और सन्नद्ध ! बेटी का नन्हा अंशुमान जब तक आकर कहे—नानी मेरे पेट में और यहाँ छाती में कुछ हो रहा है। अपने नाना की याद उसकी छाती और पेट में उमेठन पैदा करती थी पर अबोध बालक मेरे अनवरत बहते आँसुओं को जरा-जरा देर बाद अपनी नन्हीं-नन्हीं हथेलियों से पोंछता रहता। पर उसके पोंछे कहाँ पुँछ पा रहा था कलेजे में ठाठें मारकर घुमड़ते दुःख का वह सैलाब ! तमाम मित्र और शुभ चिंतक चिंतित हो उठे थे कि यह क्रम थमा नहीं तो कुछ न कुछ अनिष्ट होकर रहेगा। स्वास्थ्य खराब होने का अंदेशा तो था ही, डर लगने लगा था कि मानसिक संतुलन न खो बैठूँ। जहर को जहर ही मारता है—यह सोचकर मित्रों ने आग्रह किया कि 25 दिसम्बर को भारती जी का जन्मदिन आ रहा है उस दिन कुछ साहित्यिक आयोजन करेंगे। सब मिलकर भारती जी के साहित्य के माध्यम से उन्हें याद करेंगे। यानी की चलों भारती जी की याद में और भी गलो और भी डूबो उतराओ और अचानक एक दिन मुझ पर जाने कैसा जुनून तारी हुआ कि सारी रात मंत्रचालित-सी मैं भारती जी की कविता पुस्तकों को खँगालती रही। चुन-चुनकर मोती निकाले और कमेंन्ट्री के जरिये उन्हें एक सूत्र में बाँध दिया। लीजिये एक अनोखा कार्यक्रम आकार ले चुका था। बस फिर क्या था—विश्वनाथ सचदेव, महेन्द्र कार्तिकेय, सूर्यभान गुप्त, अश्वनी कुमार मिश्र, अनुपम कालीधर, वैभव—सब जुट पड़े उस आयोजन को भव्य रूप देने में। 25 दिसम्बर को सत्यदेव दुबे, पद्मा सचदेव, विनोद शर्मा, कमलाकार सोनटक्के, अमरीशपुरी, इला अरुण, रोहिणी हटंगड़ी, जयदेव हटंगड़ी, राज बब्बर, नादिरा बब्बर, भरत कपूर, राजेश्वरी नीना ने भारती जी की कविताएँ पढ़ीं। अनुपम कालीधर ने बड़े रचनात्मक तरीके से भारती जी पर एक छोटी फिल्म गूँथकर दिखाई, सत्यदेव दुबे के निर्देशन में अमरीश पुरी व अन्य साथियों ने प्रमथ्युगाथा का मंचन किया। इस अनूठे कार्यक्रम का होना था कि जैसे मुझे तो राह ही मिल गई जिंदगी को राह से ले जाने की। उनका बिछोह, उन्हें पाकर यों खो देने की मर्मांतक पीड़ा को उन्हीं के साहित्य संसार में अहर्निश स्वयं को आकंठ डुबाकर ही झेल पाऊँगी—यह सँजीवनी बूटी मेरे हाथ लग चुकी थी। बस उनके यत्र तत्र बिखरे कागज सँभालने शुरू किये। मन ही मन कई तरह के संकलन तैयार करने की योजना बना ली।

इसी सिलसिले में एक दिन भाई महेंद्र कार्तिकेय ने सुझाव दिया कि भारती जी के पत्रों का संकलन तैयार किया जाए। मैं तत्काल ही योजना के प्रति विशेष उत्साहित नहीं हुई। पर शायद महेंद्र भाई को अंदाज हो रहा होगा कि यह काम मुझे खास मशरूफ़ रखने में समर्थ होगा। वह जान चुके थे कि भारती जी को निखालिस याद करके मेरे पूरे वजूद की प्रत्यंचा थर-थर काँपने लगती है, पर यदि उनके साहित्य से संबंधित कोई काम करना हो तो ऊर्जा से भरकर मैं एकदम जुट जाती हूँ। इसीलिए जिद ठाने रहे कि मुझे इस काम को करना ही है। जबरदस्ती मुझसे मित्रों के नाम की सूची बनवाई, फिर कभी स्वयं नए नाम सुझाते, की वह पते खोज-खोज कर देते जो मुझे मिल नहीं रहे थे, प्रायः प्रतिदिन ही फोन करके पूछ लेते कि आज किस-किस को पत्र लिखा या कि आज किस किस के उत्तर मिले। काम मैंने शुरू कर दिया था, पर ड्राइविंग फोर्स महेंद्र भाई ही थे। बिना उनके यह काम पूरा होना संभव नहीं था। उनके प्रति मैं सदैव आभारी रहूँगी।
एक बात ईमान से कहती हूँ कि मैंने स्वयं नहीं सोचा था कि ऐसे-ऐसे महत्त्वपूर्ण पत्र इतनी बड़ी संख्या में मिल जाएँगे। बस फिर तो प्रति दिन बेकली से उनका इंतजार रहने लगा और ज्यों-ज्यों पत्र मिलते गए भारती जी के मनोहारी व्यक्तित्व की नई-नई परतें खुलने लगीं और अनजाने में ही एक नये सिरे से, नए तरीके से, मैं उनके साथ फिर जीने लगी। सबसे ज्यादा हक्का-बक्का रह गयी मैं उस दिन जब भाई लक्ष्मीचंद्र जैन और श्री मती कुंथा जैन के नाम लिखे भारती जी के पत्र मिले। इतने-इतने सारे पत्र ! मानो बम्बई के शुरुआती दिनों का प्रतिदिन का रोजनामचा हो। तब मैं तो दूर कलकत्ता में सुख-सुविधाओं और निश्चिंतताओं के बीच पढ़ती-लिखती हुई और श्री शिक्षायतन कॉलेज में अध्यापन कार्य करती रही और इधर बंबई में एक दम अकेले वे अपने मिशन का यज्ञ पूरा करने के लिए जूझ रहे थे। बम्बई आने के पहले वे प्रयाग विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे वहाँ जब उनका विदाई समारोह हुआ था उसका विवरण लक्ष्मी चंद्र जैन जी को 17 जनवरी 1960 के पत्र में लिखा। विभाग के सभी साथी अपने इतने लाड़ले साथी के दूर जाने से उदास थे पर यह जानकर सुखी थे कि ‘‘यह भी हिंदी का ही महत्त्वपूर्ण काम है कि कुरुचिपूर्ण ढंग से नहीं वरन् सुरुचिपूर्ण ढंग से हिंदी के पाठक समूह को करड़ों की संख्या तक पहुँचाना क्योंकि वही चीज आगे चलकर हिंदा भाषी जनता के वास्तविक विकास का आधार बन सकेगी। धर्मयुग के माध्यम से अगर यह काम सही स्तर पर सही दिशा में हो सका तो हिंदी के विभाग का एक नया अध्याय शुरू होगा।’’ सभी को विश्वास था कि यह काम भारती जी ही कर सकेंगे क्योंकि पुराने से लेकर नवीनतम साहित्य तक में उनकी समान रुचि है। तथा जटिल और गूढ़ साहित्य चेतना से लेकर जनप्रिय शैली तक में उन्हें एक उत्साह-सा है।

तत्कालीन विभागाध्यक्ष डॉ. रामकुमार वर्मा ने उनसे कहा था—‘‘केवल कैरियर या सुविधाएँ या आर्थिक मूल्य ही जीवन की प्रमुख चीज नहीं है। जिस बड़े मिशन के लिये तुम जा रहे हो, वही तुम्हारे वास्तविक जीवन का मूल्य है।’’ बस, मित्रों का विश्वास और गुरुजनों का आशीष ही उनके संबल और साधन थे जिनसे वे बेनेट कोलमैंन संस्थापन की अँग्रेजपरस्त नीतियों और ठेठ व्यवसायिक वातावरण के साथ जूझते हुए एक-एक काँटा खुद चुनकर अकेले अपना रास्ता साफ कर रहे थे। बरसों के बाद अस्सी के दशक में एक साक्षात्कार के दौरान जब उनसे पूछा गया कि धर्मयुग के संपादक के रूप में आपका ध्येय क्या है तो उन्होंने यह कहा था कि ‘‘साधारण से साधारण पाठक गहरे सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरुक होकर जीवन के जटिल संघर्ष का सामना करने योग्य बनता चले। पाठक को धर्मयुग से ज्ञान, जीवन दृष्टि और आस्था मिले।’’ अपने उस यज्ञ को उन्होंने अक्षर-अक्षर पूरा कर लिया। पर यह करने की प्रक्रिया में उन्हें अपना क्या कुछ होम कर देना पड़ा, कितना कुछ त्यागना पड़ा इसका अंदाज पाठकों को नहीं होगा। लक्ष्मी चंद्र जी को ही लिखे 23 फरवरी 1960 के पत्र में उनकी मानसिक तकलीफ की एक झलक मिलती है—‘‘पता नहीं अब कभी जिंदगी के वे दिन कभी लौटेंगे या नहीं जब मैं पढ़ता था, लिखता था, नहीं तो घंटों अपने लॉन में लंबी सूनी उदास सड़कों पर टहल कर सोचता था और नए विचार और मीठी भावनाएँ आतीं और दुनिया में सबके प्रति एक सहज विश्वास और आदर था। और कुंद की फूली हुई डालियाँ और गुलाब के फूल और मुझे प्यार करने वाले और देश-विदेश की नई-पुरानी पुस्तकें थीं। अब तो सुबह आठ बजे भारी सिर और सुस्त तबीयत लेकर उठना है (क्योंकि टेंशन से भरा दिमाग सो कहाँ पाता है भला !) उठकर नहा-धोकर दफ्तर जाना है—दफ्तर जाते ही दस नोट ऊपर के, दस नोट नीचे के, दस झगड़े सब एडीटरों के, दस झगड़े लाइब्रेरी, इस्टेबलिशमेंट और अकाउंट के और उसी बीच पचास फोन कुछ इंचरनल कुछ एक्सटर्नल, और दस मन कूड़ा डाक— और इनमें पाँच बज जाते हैं और कुर्सी से उठता हूँ तो लगता है जैसे दस दिनके बुखार ने कमर तोड़ दी है। यह तो विराट कोल्हू है उसमें हर क्षण अपने को गन्ने की तरह पेरते जाइए।’ ’तकलीफ झेलते गए और एक बड़े मिशन का यज्ञ पूरा करने में लगे रहे। हफ्ते दर हफ्ते धर्मयुग का स्तर और रूप निखरता जा रहा था पर भारती जी की भीतरी बेचैनी ज्यों की त्यों थी बल्कि और ज्यादा गहराती जा रही थी। 1 मई 68 के पत्र में भाई को उन्होंने लिखा, ‘यहाँ की अव्यवस्था से उत्पन्न तनाव और साधन हीनता के बीच धर्मयुग जैसा पत्र निकालना बेहद थकान और आत्मक्षय का काम हो गया है। जो कुछ मेरा वास्तविक धर्म है—सृजन-मौलिक सृजन—उसके लिए कभी भी स्थिति बन पायेगी या नहीं— बड़ा डर लगता है—और खिन्नता और अवसाद मन पर बैठता जा रहा है। साहित्यिक समारोहों में जब विशेष सम्मान का बुलावा आता है तब यह अवसाद और ग्लानि और भी कचोटती है। जो कुछ मैंने धर्मयुग में आने के पहले लिखा-पढ़ा, उसके आधार पर मिले सम्मान को मैं भुनाता जाऊँ यह अन्तःकरण को गवारा नहीं होता। कम तनख्वाह, कम काम, ठोस अध्ययन, सादी अध्यापकी। मुझे वही ज्यादा रास आता था। यह दुनिया मेरी नहीं थी जिसमें भटक आया—’’ यह सारी मानसिक ग्लानि और पीड़ा अपनी जगह सच थी पर यह भी सच था कि उन्होंने अपनी सारी सृजनात्मक ऊर्जा धर्मयुग का उत्तरोत्तर विकास करने में लगा दी थी। अपने युवा काल में ‘अभ्युदय’ और ‘संगम’ में काम करते हुए पद्मकांत मालवीय और इलाचंद्र जोशी से, दादा माखन लाल चतुर्वेदी से सीख-सीख कर उन्होंने जो संस्कार पाये थे, पत्रकारिता का जो सपना अपने मन में सँजो लिया था उस महायज्ञ को अपना सबकुछ दाँव पर लगाकर पूरा करते रहे। धीरे-धीरे उन्होंने अपने धर्मयुग को अपने देश के सभी भाषाओं के बीच सेतु सरीखा बना दिया और शीघ्र ही सुदूर विदेशों में भी धर्म युग की कीर्ति पताका लहराने लगी। ऐसा समय भी आ गया कि धर्मयुग श्रेष्ठ साहित्य, श्रेष्ठ विचार, श्रेष्ठ चिंतन, श्रेष्ठ सांस्कृतिक संस्कार का मानक सरीखा बन गया। धर्मयुग में छप पाना बड़ी उपलब्धि बन गयी। धर्मयुग को यह रुतबा दिलाने के लिए धर्मवीर नाम का संपादक किस कदर तिल-तिल पिस-पिस कर प्रयास करता था इसका अंदाज इन पत्रों को पढ़कर सहज ही लगाया जा सकता है।

पाठक जानकर हैरान होंगे कि इन पत्रों में से पिचानवे प्रतिशत से भी अधिक पत्र भारती जी के अपने हाथ से लिखे पत्र हैं। हैरानी होती है आखिर देखकर कि आखिर कोई कितना श्रम कर सकता है ! सच्ची बात तो यह है कि अपने पाठकों की रुचि परिष्कृत करने, उनके दिल और दिमाग पर बिना बोझ डाले उन्हें सांस्कृतिक संस्कार देने का काम करते हुए वे जिस तरह अपने लेखकों को बेहतर से बेहतर सोचने और लिखने के लिए प्रेरित करते रहते थे उसके लिए उन्हीं के जैसी चमत्कारिक विलक्षण प्रतिभा का होना ही लाजिमी था। वही प्रतिभा तो समिधा बन गई धर्मयुग के नाम के महायज्ञ की ! अजब थे भारती जी, धर्मयुग का हर पृष्ठ हफ्तों पहले उनके दिमाग के कंप्यूटर पर छप चुका होता था और वे आगे के अंकों की योजना बनाते हुए प्रगट रूप में दफ्तरी कामों की प्रक्रिया में लगे रहते थे। भारती जी के निजी संबंधों के पत्र आपको इस संकलन में नहीं मिलेंगे। अपवादस्वरूप केवल एक पत्र उनके भांजे डॉ. राजीव सक्सेना के नाम है। बाकी उनके किसी संबंधी से कोई पत्र नहीं मिले। जो थोड़े बहुत मिले भी उनमें ऐसा कुछ नहीं था जो भारती जी के किसी विशेष पक्ष पर कोई प्रकाश डालता। असल में भारती जी स्वयं तथाकथित खून के संबंधों से अधिक महत्त्व प्रेम के संबंधों को देते थे। मित्र परिवारों के बीच ही उन्हें माता-पिता, बहन-भाई, भाभी-बहनोई जैसे सब नाते-रिश्ते पूरी गरमाहट के साथ मिल गये थे। उन लोगों के नाम लिखे अनेक पत्र भारती जी के मन की निष्कलुष मिठास को आप तक पहुंचाते मिलेंगे ही। भारती जी द्वारा अपनी माँ को लिखे अनेक पत्र मेरे पास जरूर हैं पर मैंने उन पत्रों को तथा कुछ बहुत घनिष्ठ मित्रों के नाम लिखे कुछ पत्रों के इस संकलन में जानबूझकर शामिल नहीं किया है। क्योंकि उन पत्रों से भारती जी के जीवन के एक कटु प्रसंग के सत्य का उद्घाटन होता है जिसके बारे में उन्होंने कभी किसी को कोई सफाई नहीं दी। क्योंकि वे अपनी ईमानदारी और सच्चाई की इज्जत करते थे। सारा जहर जिस तरह उन्होंने खुद पी लिया उसकी साक्षी मैं हूँ। इस विषपायी नीलकंठ शिव के साथ मैं बयालीस वर्ष जी चुकी हूँ।

इन पत्रों को कोलाज में आपको अपने प्रिय कवि, लेखक और चिंतक धर्मवीर भारती के चित्र को प्रकारांतर से मिलेंगे ही, पर अद्वतीय दृष्टि और प्रतिभा सम्पन्न संपादक धर्मवीर भारती की हर मुद्रा, हर धज आपको हर कोण से पूरी पारदर्शिता के साथ साफ दिखाई देगी। आभारी हूँ सभी आदरणीय मित्रों की जिन्होंने मेरे अनुरोध की रक्षा करते हुए बड़े प्रेम से सहेजकर रखे अपने पत्रों को मुझ तक पहुँचाया। अनेक अत्यंत संवेदनशील मित्रों ने भी भारती के हाथ की लिखी तमाम छोटी-छोटी चिटें भी अनमोल हीरे की नाईं अपनी मंजूषा में सँभाल रखी थीं जिन्हें मैं छपने के लिए नहीं दे सकी हूँ। ग्रन्थ का आकार बढ़ता जा रहा था। वैसी नन्हीं-नन्हीं चिटों को छापने का लोभ मुझे संवरण करना पड़ा। मन को खोलकर दिखाया नहीं जा सकता अन्यथा अपने पास वर्षों से सहेजे पत्रों को मुझ तक भेजने वाले सभी आदरणीय मित्र देखकर विश्वास कर लेते कि मैं सचमुच बेहद बेहद कृतज्ञ हूँ उन सबके प्रति ! पूज्य भाई रामविलास शर्मा जी ने भारती जी का एक पत्र भेजते हुए मुझे लिखा कि ‘‘भारती जी का यह पत्र मेरे लिए सौ पुरस्कारों से बढ़कर है।’’ आशीर्वाद सरीखी उनकी यह बात पढ़कर मैं तो रो पड़ी और सच बताऊँ आपको—कि बहुत गर्वित भी महसूस किया—बड़े प्यारे, बड़े महान् थे मेरे अंतरंग मित्र सरीखे मेरे पति !
भारती जी की यह पत्रावली आपके हाथों सौंपते हुए विनम्र भाव से मैं गर्वित भी हूँ और पुलकित भी—सस्नेह स्वीकार कीजिए !

अनीता राकेश

प्रिय अनीता,
खत का जवाब बहुत देर से दे रहा हूँ न ? जब से सुना है कि इम्तहान खत्म होने की दावत तुमने अकेले-अकेले दिल्ली में दे डाली तब से हम लोग बहुत नाराज हैं।
अच्छा सुनो पहले काम की बातें—
1. कहानी भेजो। पारिश्रमिक वही जायेगा जो तुम्हारा हुकुम है !
2.द्वैमासिक के मतलब वही हैं। यानी दो महीने में एक बार। तब तक मसाला काफी इकट्ठा हो जाया करेगा और चुनाव भी कर सकोगी कि कौन-से नाटक लो, कौन-से नहीं।
3. बम्बई आ रही हो। तब इण्टरव्यू जमकर होगा—शत्रुओं को जलाते हुए ! प्रोग्राम लिखना। वैद और उर्मिला आजकल महाबलेश्वर गये हैं। बेदी पोप पाल की फोटो उतारने के बहाने प्रभु जीजस की भेड़ों को भटकाने, बहकाने तथा फुसलाने में लगा है।
दिसंबर 64
सस्नेह भारती

प्रिय अनीता,
इस बार नई कहानियाँ का अंक सचमुच असाधारण रूप से लोकप्रिय हुआ है। क्योंकि मुझे अभी तक मिला नहीं है। यदि चाहती हो कि एक सुरुचिसम्पन्न पाठक तुम्हारी कहानी तुरंत पढ़े और तुम्हारे प्रशंसकों (पाठक रूप...—अन्य रूपों में तो है ही—यह वाक्य राकेश भाई साहब को मत पढ़ाना) में वृद्धि हो तो कमलेश्वर से कहकर दूसरी प्रति तुरंत भिजवाओ।
इस बार तुम्हारी दो कहानियाँ उधार हुईं। एक धर्मयुग के लिए, और एक ऐसी जो नई कहानियाँ के लिए लिखो लेकिन भूल से उसका लिफाफा धर्मयुग आफिस में आकर खुले।
अब केका ठीक है। पुष्पा का आशीर्वाद तुम्हें।
11.3.65
सस्नेह भारती

अटल बिहारी बाजपेयी

आदरणीय अटल जी,
मेरा शत शत प्रणाम, और लाख-लाख बधाइयाँ। दो दिन तक लगातार दूरदर्शन से चिपका बैठा रहा। कभी चिंता, कभी आक्रोश, कभी आशा, कभी आशंका। एकाध बार तो उठकर दवा लेनी पड़ी ताकि हृदय की तेज धड़कन संयत हो सके पर कल आप जब भाषण दे रहे थे तब तो आपका एक-एक शब्द जैसे पी रहा था। गर्व से सीना फूल गया था, आप पर बहुत गर्व हो रहा था। उच्छृंखल शोर-शराबे के बावजूद, घटिया टिप्पणियों और निराधार आरोपों के बावजूद आपने जिस तरह संयम, धैर्य बनाये रखा, और अपनी गरिमा और ओजस्विता को कायम रख इस चुनौती का जवाब दिया उसके लिए किन शब्दों में कितनी-कितनी स्नेह भरी बधाई दूँ। जब आपने त्याग पत्र देने की बात की तो साहसा तुलसी दास की वह पंक्ति याद आ गई—राजिव लोचन राम चले तजि बाप को राज बटाऊ की नाईं !
संस्कार, सौम्यता, करुणा और देशभक्ति का त्याग-सिंहासन और सत्ता से भी बड़ा होता है यह आपने सिद्ध कर दिया। ये सिद्धांतहीन सत्ता लोभी गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चलेंगे। चुनाव फिर आयेंगे और इस बार आपको पूर्ण बहुमत मिलेगा, मुझे पूरी आशा है। लेकिन वह हो या न हो जो हुआ है, वह आपको अंदर से और समृद्ध, निष्ठावान और संकल्प युक्त बना गया है इसका मुझे पूरा विश्वास है—मैं क्या हूँ ? मैथलीशरण गुप्त की ही पंक्ति दोहरा रहा हूँ।
हे पार्थ प्रण पूरा करो, देखो अभी दिन शेष है !
29.5.96
सदा आपका
धर्मवीर भारती

पुष्पाजी के विनम्र प्रणाम स्वीकार करें।

अरुण माहेश्वरी

प्रिय भाई,
आपका पत्र (5 अगस्त का, स. 1393) मिला। मुझे लगता है कि मैं शायद उस दिन अपनी बात ठीक प्रकार से नहीं समझा पाया। यह तो श्री बांदिवडेकर जी के सामने आपसे तय हुआ था कि आप रचनावली प्रकाशित करेंगे और बांदिवडेकर उसका संपादन करेंगे। जहाँ तक बिशन टंडन जी का प्रश्न है मैंने आपसे यह कहा था कि आप जो एग्रीमेन्ट फार्म बनवाएँ, उसे एक बार टंडन जी को अवश्य दिखाएँ क्योंकि वे मेरी पुस्तकों के प्रकाशन की स्थिति भी जानते हैं और मेरे अंतरंग मित्र भी हैं। इस पत्र की एक प्रति मैं बिशन टंडन जी को भेज रहा हूँ। आप एग्रीमेन्ट फार्म तैयार करके उन्हें यथा शीघ्र भेज दें।
बांदिवडेकर जी ने अपना कार्य प्रारंभ कर दिया है।
28.8.92
आपका,
धर्मवीर भारती

प्रिय भाई अरुण जी,
पुस्तकें तथा आपका पत्र दिनांक 7.1.94 यथासमय मिल गये थे—चूँकि आपने फोन पर कहा था कि चौदह-पंद्रह तारीख के लगभग आप आ रहे हैं अतः मैं प्रतीक्षा कर रहा था। आप नहीं आए तो लगता है कि आप के आने का कार्यक्रम शायद स्थगित हो गया है। पुस्तकें मिल गईं। रजिस्टर्ड पैकेट भी मिल गया। धन्यवाद।
कविता संकलन का कवर छपकर अच्छा लग रहा है। पुष्पा जी की पुस्तक का मुखपृष्ठ भी बहुत आकर्षक है और पहले फ्लैप का मैटर भी बहुत अच्छा है। लेकिन दुर्भाग्य से उसमें प्रूफ की गलतियाँ हैं। उसको देखकर मैं आपसे फिर आग्रह कर रहा हूँ कि बिना हम लोगों को फाइनल प्रूफ दिखाए, कोई पुस्तक न छापें। आशा है ‘यात्राचक्र’ की फाइनल प्रूफ कॉपी तैयार होगी। उसका प्रस्तावित कवर तथा फाइनल प्रूफ भेज दें—मिलने के एक हफ्ते बाद आपको प्रूफ और कवर दोनों स्पीड पोस्ट से लौटा दिये जाएँगे। कृपया फाइनल प्रूफ के साथ ही ‘यात्राचक्र’ का अनुबंधपत्र भी अवश्य भेज दें।
आपके आदेशानुसार प्रतियों का चालान इसी पत्र के साथ भेज रहा हूँ।
20 जनवरी 94
भवदीय
धर्मवीर भारती

प्रिय अरुण जी,
प्रूफ पढ़कर भिजवा रहा हूँ। इस बार जिसने भी प्रूफ पढ़ा उसे धन्यवाद दें क्योंकि गलतियाँ अपेक्षाकृत बहुत कम थीं। अब तुरंत दो चीजें भेज दें। एक, इसका पहला फर्मा और दूसरा इसका मुख पृष्ठ। दोनों ही देखकर मैं तुरंत लौटा दूँगा।
आशा है कि यात्राचक्र के चित्रों वाला फर्मा भी पुनः छपवा लिया होगा। उस पुस्तक की भी लेखकीय प्रतियाँ भिजवा दें। काफी लोग बार-बार पूछ रहे हैं। उसे समीक्षार्थ कहाँ-कहाँ भेजना है इसकी सूची मैं आपको पुस्तक मिलते ही भेज दूँगा।
नए वर्ष में आप खूब स्वस्थ और प्रसन्न रहें, और अपने लेखकों को प्रसन्न, संतुष्ट रखें यही नववर्ष की शुकामना स्वीकार करें। सन्दर्भ—कुछ चेहरे कुछ चिन्तन।
30.1.95
सस्नेह
धर्मवीर भारती

प्रिय भाई अरुण,
पहला फर्मा और मुखपृष्ठ भेज रहा हूँ। मुखपृष्ठ वही चुना है जिसमें एक चेहरे का आभास है। उसके पीछे पेंसिल से स्वीकृत लिख दिया है। दूसरे जिसके पीछे अस्वीकृत लिखा है उसे भी साथ रख दिया है। उसे न छापें।
अपने कूरियर को बताएँ कि स्पीड पोस्ट से आपकी सामग्री 1 मार्च को भेजी वह मुझे 3 मार्च की शाम को मिल गई है। 4 और 5 मार्च को छुट्टी थी। आज 7 मार्च को स्पीड पोस्ट से भेज रहा हूँ। प्राप्ति सूचना फोन से दे देंगे।
‘शब्दिता’ की पांडुलिपि मार्च में सम्मान समारोह के समय लेता आऊँ इसकी कोशिश करूँगा। उसका मुखपृष्ठ तो गोविंद जी से पहले ही तय हो चुका है।
7 मार्च, 1995
सस्नेह
धर्मवीर भारती

प्रिय अरुण,
संदर्भ प्रकाशन जगत का पहला अंक मिला। शुरुआत अच्छी है। आशा है इससे वाणी प्रकाशन की पुस्तकों की सूचना पाठकों तक पहुँचेगी। आप सपरिवार घर आए बहुत अच्छा लगा। बच्चे बहुत प्यारे हैं। उन्हें और आपकी पत्नी को अनेक आशीर्वाद। सस्नेह धर्मवीर भारती प्रिय अरुण जी, 27 अप्रैल ’96 शब्दिता की पांडुलिपि भेज रहा हूँ। कुल 29 लेख संकलित हैं, और संख्यांकित पृष्ठ हैं 158। पहले 8 पृष्ठों का संयोजन तो आप कर ही लेंगे। पहुँच की सूचना भेज सकें या फोन कर दें तो निश्चिन्त हो जाऊँ।
इस बार मार्च में 22, 23, 24 को दिल्ली में था पर आपसे भेट नहीं हो पाई। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में एक-एक दिन में 3-3 कार्यक्रम हो रहे थे और उनके बाद एक पल का समय नहीं बच पाता था। परिवार कैसा है ? बच्चों को हमारा आशीर्वाद दें।
13 फरवरी 96
सस्नेह धर्मवीर भारती

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