लिबास - गुलजार Libas - Hindi book by - Gulzar
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लिबास

गुलजार

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 81-8361-064-1 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :104 पुस्तक क्रमांक : 2768

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इसमें थियेटर की दुनिया के एक युगल के बिखड़े रिश्तों की कहानी है.....

Libas

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

साहित्य में मंज़रनामा एक मुकम्मिल फॉर्म है। यह एक ऐसी विधा है जिसे पाठक बिना किसी रुकावट के रचना का मूल्य आस्वाद लेते हुए पढ़ सके। लेकिन मंज़रनामा का अंदाजे-बयान अमूमन मूल रचना से अलग हो जाता है या यूँ कहें कि वह मूल रचना का इन्टरप्रेटेशन हो जाता है।

मंज़रनामा पेश करने का एक उद्देश्य तो यह है कि पाठक इस फार्म से रूबरू हो सकें और दूसरे यहाँ की टी. वी. और सिनेमा से दिलचस्पी रखने वाले लोग यह देख-जान सकें कि किसी कृति को किसी तरह मंज़रनामे की शक्ल दी जाती है। टी.वी. की आमद से मंज़रनामों की जरूरत में बहुत इजाफा हो गया है।

कथाकार, शायर, गीतकार, पटकथाकार गुलज़ार ने लीक से हटकर शरतचन्द्र की-सी संवेदनात्मक मार्मिकता, सहानुभूति और करुणा से ओत-प्रोत कई उम्दा फिल्मों का निर्देशन किया जिसमें मेरे अपने, अचानक, परिचय, आँधी, मौसम, खुशबू, मीरा, किराना, नमकीन, लेकिन, लिबास और माचिस जैसी फ़िल्में शामिल हैं।

‘‘लिबास’’ एक ऐसे फ़िल्म का मंज़रनामा है जिस पर 1986 में फ़िल्म बन गई मगर आज तक रिलीज़ नहीं हुई। हालाँकि अफ़साने की सूरत में यह ‘चाबी’ और ‘सीमा’ नाम से प्रकाशित हो चुका है।

‘लिबास’ सीमा और सुधीर नाम के थियेटर की दुनिया में एक युगल के बिखरे रिश्तों की कहानी है जिसके केन्द्र में सीमा का चंचल व्यक्तित्व है। वह बहुत दिनों तक एक ही स्थिति में नहीं रह सकती। यहाँ तक की बोरियत दूर करने के लिए वह अपने पति को छोड़कर दूसरी शादी कर लेती है लेकिन पुनः उसे बोरियत महसूस होने लगती है। मगर शादी लिबास तो नहीं होती कि फट जाए, मैला हो जाए तो बदल लिया जाए।

शब्दों के धनी और संवेदनशील शायर गुलज़ार ने इस मंज़रनामे में थियेटर की दुनिया की झलक दिखाई है। निश्चित ही पाठकों को कृति एक औपन्यासिक रचना का आस्वाद प्रदान करेगी।

लिबास


‘लिबास’ एक वाक़या है जहाँ-जहाँ स्क्रिप्ट पहले लिखी गई और कहानी बाद में। और उससे ज़्यादा दिलचस्प बात यह है कि तलाक़ का मंज़र पहले तख़लीक़ हुआ और शादी बाद में हुई और वह मंज़र भी फ़िल्म के इंटरवल पर आता है। यह कहना भी ग़लत न होगा कि तख़लीक़ की कोई तरतीब नहीं होती। स्क्रिप्ट लिखते वक़्त बहुत से मनाज़िर तरतीब में लिखे जाते हैं और बहुत से बग़ैर तरतीब के जो कहानी का ख़ाका बनते-बनते जुड़ने लगते हैं।

स्क्रिप्ट तैयार होने के बाद फ़िल्म भी बन गई। 1986 में मुकम्मिल हो गई लेकिन आज तक रिलीज नहीं हुई। यह पहली फ़िल्म थी जिसमें मुझे अपनी कहानी पर ख़ुदएतमादी का एहसास हुआ और मुझे किसी बड़े नाम के सहारे की ज़रूरत नहीं महसूस हुई। लिबास को अफ़साने की सूरत में बहुत साल बाद लिखा ‘चाबी’ के नाम से जो बाद में ‘सीमा’ के नाम से भी शाया हुआ।


गुलज़ार

1


रंग मन्दिर नाम का एक थियटर, जिसका बाहरी
हिस्सा एक बड़ा सा ब्लैकबोर्ड जिस पर आज
रात को खेले जानेवाले ड्रामे का नाम, और
डायरेक्टर का नामा नुमायाँ था। उसका नाम था ‘सुधीर’।
पास ही एक कैंटीन में मेज़-कुर्सियाँ लगी थीं।

जिन पर लड़के-लड़कियाँ बैठे थे। कुछ चाय पी रहे थे, कुछ गप्प हाँक रहे थे।
एक बूढ़ा आदमी..बढ़ी हुई दाढ़ी....एक मैली-सी चादर ओढ़े कैंटीन के अन्दर आए। ये बुजुर्ग कभी स्टेज के नामी कलाकार रह चुके थे। अब काम-वाम नहीं मिलता। उनका नाम जमाल था, लोग जमाल भाई के नाम से जानते थे।
जमाल भाई ने कैंटीन में बैठे एक लड़के से पूछा-
"क्यों मियाँ...कौन सा ड्रामा चल रहा है ?"
"हयवदन’....!"
"हूँ..! देखा बाहर पचास शो हो चुके हैं। ऐसे कौन अदाकार हैं इसमें कि..."
जमाल भाई के कुछ और कहते-कहते लड़के ने पूछा-
"चाय पिएँगे जमाल साहब...?"
जमाल यह सुनकर मुस्करा पड़े और बोले-

"देखें...कैसी बनाते हैं..चाय ये लोग।"
दुकान का लड़का चाय लेकर जमाल साहब के
पास आया। खाली चाय देखकर जमाल ने कहा-
क्या है भाई...खाली पेट तो हम चाय पीते नहीं।
वो दो, एक पैटीज़ इधर बढ़ा देना।"
चाय की चुस्की लेते हुए जमाल साहब ने कहा-
हाँ, तो भाई...कौन कर रहा है ये ड्रामा...?" कोई नए ही लौंडे लगते हैं।"
पास बैठा दूसरा लड़का बोला-
"सुधीर तो काफ़ी पुरानी है जमाल साहब।"
जमाल साहब ने तुरन्त ही पूछा-
"अरे भाई हमसे भी पुराना है क्या ...? हम तो थिएटर की सनद हैं।"
"सनद क्या जमाल साहब ?"

रसीद हैं...डॉक्यूमेंट्री हैं। Projecter पे चढ़ा दो हमें तो स्क्रीन पे हिस्ट्री देख लो थिएटर की।"
यह सुनकर लड़के हँस दिए। जमाल साहब का एक अनोखा अन्दाज़ था बात करने का।
हां तो सुधीर है ! और कौन है ?"
"सीमा उसकी Wife है। ड्रामे में उनकी पत्नी का रोल कर रही हैं।"
"ओह..बोर नहीं हो जाते एक ही रोल करते करते। घर में भी, बाहर भी !"


2



स्टेज पर ‘हयवदन’ नाटक का सीन हो रहा था,
जिसमें सुधीर एक किरदार निभा रहा था।

3


सीमा मेकअप रूप में अपने कपड़े बदल रही थी। पास में एक लड़का खड़ा अपनी लाइनें
याद कर रहा था। सीमा ने बुलाया-
"फ़ारूक़...क्या हो गया था तुम्हें ?"
सीमा ने फ़ारूक़ को छेड़ते हुए कहा

"लाइन भूल गए थे ?...क्या हुआ था...?"
फ़ारूक़ ने सीमा की तरफ देखा और ग़ुस्से से बोला-
भाभी देख लूँगा एक दिन आपको आप जान-
बूझकर नर्वस करती हैं मुझे।"
सीमा ने बनते हुए पूछा-
"मैंने क्या किया था...?"
"आपने मेरा हाथ क्यों नहीं छोड़ा ?"
"तुम छुड़ा लेते।"

"कैसे छुड़ा लेता...? आपने तो ज़ोर से पकड़ लिया था।’’
सीमा यह सुनकर हँस पड़ी और फ़ारूक़ को पुचकारते हुए बोली-
‘‘आप तो बस चूँ-चूँ के पकौड़े हैं। रोमांटिक सीन करते हुए भी तुम्हें याद रहता है कि मैं तुम्हारी, भाभी हूँ...?"
"आपके मियाँ जी सामने रहते हैं सीन में ! कैसे भूल सकता हूँ !"
सीमा ने फ़ारूक़ की आँखों में देखते हुए कहा-
"अगर वो न हों सामने तो...?"
तभी तालियों की आवाज़ सुनाई दी।
"देखा...इस सीन पर दादा ऐसी तालियाँ लेते हैं कि बस पूछो नहीं।"
दूसरे लम्बे सुधीर, जो सीमा का पति था, मेकअप रूम में आया और अपनी पत्नी से, कहा-
Very Good Seema ; कमाल improvise किया तुमने, वो जहाँ रूमाल निकालना था इसे...
फ़ारूक़ को देखकर कहा-
"और घोंचू तुम्हें क्या हो गया था...?"
"भाभी ने हाथ ही नहीं छोड़ा...मैं रुमाल निकालने लगा तो.."
सुधीर तुरन्त बोला-

तो उसने तुम्हारी जेब में रुमाल निकाल के माथा पोंछ दिया तो क्या हुआ। क्यों भूलतें हो वह तुम्हारी बीवी है"
पास ही सीमा खड़ी थी, बोली-
वही तो कह रही थी इससे, मुझे तो सुबह उठ के याद करना पड़ता है कि मेरे असली पति ये हैं और एक तुम हो ऐसे देवर कि कुर्सी से चिपककर बैठे हो जैसे..."
सुधीर बोल पड़ा।
"जैसे चीफ़ मिनिस्टर बैठते हैं छोड़ते ही नहीं।’’ सुधीर सीमा को प्ले की अगली कड़ी समझाने लगा।



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