न्याय का गणित - अरुन्धति रॉय Nyaya ka Ganit - Hindi book by - Arundhati Roy
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न्याय का गणित

अरुन्धति रॉय

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2013
आईएसबीएन : 81-267-1074-8 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :227 पुस्तक क्रमांक : 2731

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The Algebra of Infinite Justice का हिन्दी अनुवाद.....

Nyay Ka Ganit

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

किसी लेखक की दुनिया कितनी विशाल हो सकती है इस संग्रह के लेखों से उसे समझा जा सकता है। ये लेख विशेषकर तीसरी दुनिया के समाज में एक लेखक की भूमिका का भी मानदंड कहे जा सकते हैं। अरुंधति राय भारतीय अंग्रेजी की उन विरल लेखकों में से हैं जिनका सारा रचनाकर्म अपने सामाजिक सरोकार से उपजा है। इन लेखों को पढ़ने से जो बात उभरकर आती है वह यह कि वही लेखक वैश्विक दृष्टिवाला हो सकता है जिसकी जड़े अपने समाज में हो। जिसके सरोकार वहीं हो जो उसके समाज के सरोकार हैं। यही वह स्रोत है जो लेखक की आवाज को मजबूती देता है और नैतिक बल से पुष्ट करता है। क्या यह अकारण है कि जिस दृढ़ता से मध्य प्रदेश के आदिवासियों के हक में हम अरुंधती की आवाज सुन सकते हैं, उसी बुलंदी से वह रेड इंडियनों या आस्ट्रेलिया के आदिवासियों के पक्ष में भी सुनी जा सकती है।

तात्पर्य यह है कि परमाणु बम हो या बोध का मसला, अफगानिस्तान हो या इराक, जब वह अपनी बात कह रही होती हैं, उसे अनसुना-अनदेखा नहीं किया जा सकता। जोकि वैश्विकता आज एक खतरनाक और डरावनाशब्द हो गया है, इस पर भी सही मायने में वह ऐसी विश्व-मानव हैं जिसकी प्रतिबद्धता संस्कृति, धर्म, सम्प्रदाय, राष्ट्र और भूगोल की सीमाओं को लाँघती नजर आती हैं। ये लेख भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान से लेकर सर्वशक्तिमान अमरीकी सत्ता प्रतिष्ठान तक के निहित स्वार्थों और क्रिया-कलापों पर समान ताकत से आक्रमण करने और उनके जन विरोधी कार्यों को उद्घाटित कर असली चेहरे को हमारे सामने रख देते हैं। अपनी तात्त्कालिकता के बावजूद ये लेख समकालीन दुनिया का ऐसा दस्तावेज  हैं जो भविष्य के इतिहासकारों के इस दौर को वस्तुनिष्ठ तरीके से समझने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे। एक रचनात्मक लेखक के चुटीलेपन, संवेदनशील  सघनता  व दृष्टि सम्पन्नता के अलावा इन लेखों में पत्रकारिता की रवानगी और उस शोधकर्ता का-सा परिश्रम और सजगता है जो अपने तक को प्रस्तुत करने के दौरान शायद ही किसी तथ्य का इस्तेमाल करने से चूकता हो।

यह मात्र संयोग है कि संग्रह के लेख पिछली सदी के अंत और नई सदी के शुरुआती वर्षों में लिखे गए हैं। ये सत्ताओं की दमन और शोषण की विश्वव्यापी प्रवृत्तियाँ, ताकतवर की मनमानी व हिंसा तथा नव साम्राज्यवादी मंशाओं के उस बोझ की ओर पूरी तीव्रता से हमारा ध्यान खींचते हैं जो नई सदी के कंधों पर जाते हुए और भारी होता नजर आ रहा है। अरुंधति रॉय इस आमानुषिक और बर्बर होते खतरनाक समय को मात्र चित्रित नहीं करती हैं, उनके प्रति हमें आगाह भी करती हैं, यह समय मूक दर्शक बने रहने का नहीं है।

 

आभार

 

फ्रंटलाइन के सम्पादक एन.राम और आउटलुक के सम्पादक विनोद मेहता जिन्होंने मेरे लेखों को हमेशा जगह दी।
हिमांशु ठक्कर, जिन्होंने सबसे पहले मुझे बड़ी होशियारी, सावधानी और लगभग झिझकते हुए-नर्मदा घाटी विकास परियोजनाओं की भयावहता के बारे में बताया था।
श्रीपाद धर्माधिकारी, नन्दिनी ओज़ा, आलोक अग्रवाल जिन्होंने मेरी इस बारे में समझ बढ़ाई और नजरिया स्पष्ट किया।
मेधा पाटकर और बाबा आम्टे, जिनका लचीलापन और प्रतिबद्धता का बखान इस एक लाइन के आभार में नहीं किया जा सकता।
पैट्रिक मकल्ली, जिनकी किताब साइलेंस्ड रिवर्स वह आधार है जिस पर बड़े बाँधों की राजनीति की मेरी समझ आधारित है।
प्रशान्त और शान्ति भूषण जो न केवल मेरे बल्कि हमारे जैसे कई लोगों के न सिर्फ वकील हैं, बल्कि दोस्त भी हैं और हमारे ही राजनैतिक विचार के हैं।

साउथ एंड प्रेस के एंटनी आर्नोव, जिन्होंने इन निबन्धों में प्रयुक्त तथ्यों को खोजा और मिलाया।
डेविड गॉडविन, जिनके बिना मैं अपने सारे लेखों को ड्रॉअर में रखकर यही उम्मीद करती कि किसी दिन कोई उन्हें देखेगा और प्रकाशित करेगा।

दीपक सरकार और अनुराग सिंह का, उनकी दोस्ती और उन बातों की गहरी समझ के लिए, जिनके बारे में मैं लिखती हूँ।
सिल्वी जिनका ज़ेहन हीरे की तरह चमकता है। उनका स्नेह और दोस्ती सूकून के स्थायी स्रोत हैं। झरना झावेरी, सबसे अधिक दमखमवाली संघर्षकर्ता और दोस्तों में सबसे अधिक विनम्र। मेरे साथ सफर करने के लिए शुक्रिया।
जोजो, रघु, अराधना, विवेका, पिया, मितवा और गोलक। परिवार। घर से दूर एक घर के लिए फिलिप और वीणा।
अर्जुन रैना, मेरे निजी जादूगर।

संजय काक, जिनकी अक्ल और शान्ति की मुझे दाना-पानी की तरह जरूरत होती है।
मेरी रॉय सीनियर, जिनकी मैं सबसे अधिक प्रशंसा करती हूँ, मेरी रॉय जूनियर, मेरी बहन और एल के सी-जो मेरे भाई, मेरे दोस्त मेरे पनाहगार के रूप में हमेशा मौजूद रहते हैं।
आप सबका बहुत-बहुत शुक्रिया।

 

कल्पनाशीलता का अन्त

 

‘रेग़िस्तान थर्रा उठा’, भारत सरकार ने हमें (अपनी जनता को) बताया।
‘पूरी पहाड़ी सफेद हो गई’, पाकिस्तान की हुकूमत ने जवाब दिया।
दोपहर तक पोखरण में हवा शान्त हो चुकी थी। दिन में 3 बजकर 45 मिनट पर तीनों उपकरणों को टाइमर ने डिटोनेट कर दिया। जमीन के भीतर करीब 200 से 300 मीटर की गहराई में दस लाख डिग्री सेंटीग्रेट गर्मी-उतनी ही जितनी सूरज में है-पैदा हो गई। देखते देखते उसके इर्द-गिर्द हजारों टन के पत्थर, जमीन के भीतर एक छोटी पहाड़ी वाष्पित हो गई...धमाके साथ फुटबॉल के मैदान के आकार का एक भूखंड जमीन से कई मीटर ऊपर उठने लगा। एक वैज्ञानिक ने उसे देखते हुए कहा, ‘अब मैं भगवान कृष्ण के पहाड़ी को उठाने की कहानियों पर यकीन कर सकता हूँ।’

 

-इंडिया टुडे1

 

मई, 1998। यह इतिहास की पुस्तकों में लिखा जाएगा, बशर्ते कि हमारे पास इतिहास की पुस्तकें बचें। और हाँ, बशर्ते हमारा कोई भविष्य हो। परमाणु हथियारों के बारे में कोई नई या मौलिक बात कहने के लिए नहीं बची है। किसी कहानीकार के लिए ऐसे मामले को दोबारा बताने से ज्यादा अपमानजनक कुछ और नहीं हो सकता, जिसे वर्षों से दुनिया के दूसरे हिस्सों में दूसरे लोग कई बार बहुत गहराई से, प्रभावपूर्ण तरीके और जानकारी के साथ पहले ही बता चुके हैं।
मैं गिड़गिड़ाने के लिए तैयार हूँ। खुद को पूरी तरह अपमानित करने के लिए तैयार हूँ क्योंकि इन परिस्थितियों में मौन नहीं रहा जा सकता। लिहाजा आपमें से जो लोग इसके लिए तैयार हैं : इस पुराने नाटक में अपनी-अपनी भूमिका चुनकर अपने वेश धारण कर लें, अपने घिसे-पिटे संवाद याद कर इस घिसे-पिटे नाटक में शामिल हो लें। लेकिन हम यह न भूलें कि हम बहुत ऊँचे दाँव लगा रहे हैं। हमारी थकान और हमारी शर्मिन्दगी से हमारा खात्मा हो सकता है। हमारे बच्चों और बच्चों का खात्मा हो सकता है। पर वह शय खत्म हो सकती है जिसे हम चाहते हैं। हमें अपने भीतर उतरकर उस शक्ति को तलाशना है, लड़ने के लिए ताकत जुटानी है।

यहाँ भी हम वक्त से बहुत पीछे रह गए हैं-न केवल वैज्ञानिक और तकनीकी तौर पर (खोखले दावों को भूल जाइए) बल्कि परमाणु हथियारों की असली प्रकृति समझने की अपनी क्षमता के मामले में भी। भयावह विभाग की हमारी समझ निराशा की हद तक पुरानी पड़ चुकी है। भारत और पाकिस्तान में हम सब राजनीति और विदेशी नीति की बेहतरीन बातों पर चर्चा कर रहे हैं, दुनिया को ऐसा जता रहे हैं गोया हमारी सरकारों ने एक नया, बड़ा बम तैयार कर लिया है, एक तरह का शक्तिशाली हथगोला जिससे वे दुश्मन (एक-दूसरे) को खत्म कर डालेंगे और हम सबको सभी तरह के नुकसान से बचाएँगे। हम यह मानने के लिए कितने उतावले हैं। हम कितने आश्चर्यजनक, सीधे-सादे अखलाकमन्द, भोले-भाले लोग बन गए हैं। बाकी मानव जाति (हाँ, हाँ, मैं जानती हूँ, लेकिन फिलहाल उन्हें नजरअन्दाज कर दीजिए; उन्होंने बहुत पहले अपने वोट गँवा दिए), बाकी मानव जाति शायद हमें माफ नहीं कर पाएगी लेकिन बाकी मानव जाति शायद यह नहीं जान पाएगी कि हम कितने थके मायूस दिलजले हैं। शायद उसे एहसास नहीं हो रहा कि हमें कितनी जल्दी एक चमत्कार की जरूरत है। हम दिल की कितनी गहराई से चमत्कार की आस लगाए बैठे हैं।

काश ! काश अगर परमाणु युद्ध एक और सामान्य युद्ध की ही तरह होता। काश ! यह सामान्य बातों-राष्टों और सीमाओं, देवताओं और इतिहास की तरह होता। काश ! हममें से वे लोग जो इससे डरते हैं, नैतिक रूप से कायर होते, जो हमारे विश्वासों के लिए मरने को तैयार नहीं हैं। काश ! परमाणु युद्ध ऐसा युद्ध होता जिसमें देश आपस में लड़ रहे होते और जनता आपस में। लेकिन ऐसा नहीं है। अगर कोई परमाणु युद्ध होता है तो हमारे दुश्मन चीन या अमेरिका, या यहाँ तक कि वे एक दूसरे के नहीं हो सकते। खुद पृथ्वी ही हमारी दुश्मन हो जाएगी। मूल तत्व-आकाश, वायु, पृथ्वी, पावक और जल-हमारे विरुद्ध हो जाएँगे। उनका प्रतिशोध भयावह होगा।

हमारे शहर और जंगल, हमारे खेत और गाँव कई दिनों तक जलते-रहेंगे। नदियाँ जहरीली हो जाएँगी। हवा आग हो जाएगी। बयार लपटों की तरह चलेगी। जब सारी जलनेवाली चीजें जल चुकी होंगी और आग बुझ जाएगी तो धुआँ उठेगा और सूरज को ढक लेगा। पृथ्वी अन्धकार में समा जाएगी। तब कोई दिन नहीं होगा। बस लम्बी, अन्तहीन रात होगी। तापमान हिमांक से भी काफी नीचे चला जाएगा और परमाणविक शिशिर ऋतु शुरू हो जाएगी। पानी जहरीली बर्फ में तब्दील हो जाएगा। रेडियोधर्मी पदार्थ रिसकर जमीन में चले जाएँगे और भू-जल को प्रदूषित कर देंगे। जानवर और सब्जियाँ, मछली और पक्षी ज्यादातर जीव-जन्तु मर जाएँगे। केवल चूहे और तिलचट्टे फलेंगे-फूलेंगे और जो थोड़ा-बहुत खाने को बचा होगा उसके लिए मानव क्लोनों से होड़ लगाएँगे।

हम लोगों में से जिन्दा बचे लोग तब क्या करेंगे ? झुलसे, अन्धे, गंजे और बीमार हम कैंसर पीड़ित अपने बच्चों के कंकालों को सँभाले कहाँ जाएँगे ? हम क्या खाएँगे ? हम क्या पीएँगे ? हम कैसे साँस लेंगे ?
मुम्बई स्थित भाभा परमाणु अनुसन्धान केन्द्र के स्वास्थ्य, पर्यावरण और सुरक्षा समूह के प्रमुख के पास एक योजना है। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि भारत परमाणु युद्ध झेल सकता है ?2 उनकी सलाह है कि अगर परमाणु युद्ध होता है तो हमें सुरक्षा के उन्हीं उपायों को अपनाना होगा जिन्हें अपमाने की सलाह वैज्ञानिक परमाणु संयन्त्रों में दुर्घटना की घड़ी में दिया करते थे।
वे सुझाते हैं कि आयोडीन की गोलियाँ लीजिए। दूसरे उपाय हैं-घर के अन्दर रहें, केवल संचित जल और भोजन का सेवन करें और दूध न लें। शिशुओं को पाउडर से बना दूध दिया जाए। ‘खतरे वाले क्षेत्र के लोगों को फौरन नीचे की मंजिल में और मुमकिन हो तो बेसमेंट में चले जाना चाहिए।’

पागलपन की इस हद का कोई क्या कर सकता है ? अगर आप किसी ऐसे पागलखाने में फँस गए हों जहां सारे डॉक्टर बावले हों तो आप क्या कर सकते हैं ?
वे कहेंगे, गोली मारो इसे, यह महज एक उपन्यासकार की कपोल-कल्पना है, कयामत की पेशीनगोई करनेवाली अतिशयोक्तिपूर्ण बात है। ऐसी नौबत कभी नहीं आएगी। कोई युद्ध नहीं होगा। परमाणु हथियार युद्ध के लिए नहीं, शान्ति के लिए हैं। ये खुद को बाज (लड़ाकू) समझनेवाले लोग ‘अवरोधक’ (डिटरेंस) को मूलमन्त्र मानते हैं। (कितने अच्छे पक्षी होते हैं। खामोश। अपनी तरह के। दूसरे को निगल जानेवाले। अफसोस कि युद्ध के बाद इनमें से इक्का-दुक्का ही नजर आएगा। विलुप्त ऐसा शब्द है, जिसे हमें समझने की कोशिश करनी चाहिए और अभ्यस्त हो जाना चाहिए।) अवरोधक पुराना सिद्धान्त है, जिसे पुनः जीवित कर स्थानीय पसन्द के मुताबिक दोबारा प्रचलित किया जा रहा है। शीत युद्ध को तीसरे युद्ध में बदलने से बचाने का श्रेय अवरोध के सिद्धान्त को दिया गया है। तीसरे युद्ध के बारे में एक ही अपरिवर्तनीय तथ्य यह है कि अगर कोई तीसरा विश्व युद्ध होगा तो वह दूसरे विश्व युद्ध के बाद लड़ा जाएगा।

दूसरे शब्दों में, हमारे पास अभी वक्त है। बात सही है कि शीत युद्ध खत्म हो गया, लेकिन दस साल तक परमाणु रवैये में ढील से धोखा न खाएँ। यह महज क्रूर मजाक था। इसमें केवल ढीलापन आया था। इससे मुक्ति नहीं मिली थी। इससे कोई सिद्धान्त साबित नहीं होता। आखिर, दुनिया के इतिहास में दस वर्षों की क्या अहमियत है ? बीमारी फिर उभर आई है। इस बार यह बहुत व्यापक है और किसी उपचार का इस पर असर नहीं है। नहीं, अवरोधक के सिद्धान्त में ही कुछ मौलिक खामियाँ हैं।
खामी नम्बर एक यह है कि इसमें मान लिया जाता है कि आपको दुश्मन की मानसिकता की गहरी पकड़ है। इसमें यह मान लिया जाता है कि जो आपको रोक रहा है। (नेस्तनाबूद होने की आशंका से) वही उनको भी रोकेगा। लेकिन उन लोगों का क्या करेंगे जो इससे नहीं रुकनेवाले हैं ? क्या मानव मन की आत्मघाती मानसिकता-‘हम तो डूबेंगे सनम, तुम्हें भी ले डूबेंगे’-कोई अनोखा विचार है ?

वैसे भी, ‘आप’ कौन हैं और ‘दुश्मन’ कौन है ? दोनों केवल सरकारें हैं। सरकारें बदलती हैं। वे मुखौटे पर मुखौटा लगाती हैं। वे हर बार खुद को अलग साँचे में ढालकर अलग रूप धारण कर लेती हैं। मिसाल के तौर पर फिलहाल हमारी सरकार के पास कार्यकाल पूरा करने के लिए भी पर्याप्त सीटें नहीं हैं, लेकिन वह हमसे चाहती है कि हम परमाणु बमों के साथ चालबाजी करने की क्षमता पर विश्वास करें, भले ही वह संसद में मामूली बहुमत बरकरार रखने के लिए इधर-उधर छीनाझपटी कर रही है।

दूसरे नम्बर की खामी यह है कि अवरोधक भय पर आधारित है। लेकिन भय समझ पर आधारित होता है। परमाणु युद्ध से होनेवाली तबाही के पैमाने की सही समझ पर आधारित है। परमाणु बमों में ऐसा कोई अन्तर्निहित, रहस्यवादी गुण नहीं है जो स्वतः शान्ति के विचारों को प्रेरित करता हो। इसके विपरीत, यह उन लोगों का अन्तहीन, अथक संघर्षपूर्ण काम है जिनमें खुलेआम उनकी भर्त्सना करने का साहस है : उनके अभियान और विरोध प्रदर्शन, उनकी फिल्में, उनका गुस्सा-उसी ने परमाणु युद्ध को रोका है या शायद सिर्फ टाला है। अवरोधक हमारे दो देशों के ऊपर छाए अज्ञानता और निरक्षरता के अभेद्य पर्दे के कारण न तो असर करेगा न ही कर रहा है। (देखिए विश्व हिन्दू परिषद् पोखरण के रेगिस्तान की रेडियोधर्मी बालू को पूरे देश में प्रसाद की तरह बाँटना चाहती हैं। ये क्या है-कैंसर यात्रा ?) अवरोधक का सिद्धान्त ऐसी दुनिया में एक खतरनाक चुटकले के अलावा कुछ नहीं है जहाँ परमाणु विकरण से बचने के लिए आयोडीन की गोलियाँ लेने की सलाह दी जाती है।

भारत और पाकिस्तान के पास अब परमाणु बम हैं और बम रखना वे पूरी तरह से तर्कसंगत मानते हैं। जल्दी ही दूसरों के पास भी पर्याप्त तर्क हो जाएँगे। ईरान, इराक, सऊदी अरब, नॉर्वे, नेपाल (मैं यहाँ उदार होने की कोशिश कर रही हूँ) डेनमार्क, जर्मनी, भूटान, मेक्सिको, लेबनॉन, श्रीलंका, बर्मा, बोस्निया, सिंगापुर, उत्तरी कोरिया, स्वीडन, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, क्यूबा, अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान...और क्यों न हों ? दुनिया के हर देश के पास बम बनाने की खास वजह है। सबकी अपनी सीमाएँ और विश्वास हैं। और जब हमारे भंडार चमकीले बमों से अटे पड़े होंगे और हमारे पेट खाली होंगे। (अवरोधक बहुत महँगा हैवान है) तब हम बमों के बदले भोजन खरीद सकेंगे। और जब परमाणु टेक्नोलॉजी बाजार में पहुँच जाएगी, और जब वह वाकई प्रतिस्पर्धात्मक होगी और कीमतें घटेंगी तो न केवल सरकारें, बल्कि कोई भी-व्यापारी, आतंकवादी, शायद इक्का-दुक्का अमीर हुआ कोई लेखक भी-(जैसे मैं हूँ)- उन्हें खरीद सकता है, अपना निजी शस्त्रागार बना सकता है।

 हमारा ग्रह खूबसूरत प्रक्षेपास्त्रों से दमकेगा। एक नई विश्व व्यवस्था होगी। परमाणु बम समर्थक कुलीन वर्ग की तानाशाही होगी। हम एक दूसरे को धमकाकर आनन्दित हो सकते हैं। यह ऐसी बंगी जंपिंग होगी जिसमें आप बंगी की रस्सियों पर भरोसा नहीं कर सकते या दिन भर रूसी रूलेट खेलने जैसा होगा। वह रोमांच अतिरिक्त फायदा होगा जो यह न मालूम होने से पैदा होता है कि किस पर भरोसा किया जाए। हम उन हरेक ग्रीन कार्ड चाहनेवाले बातूनियों की परभक्षी कल्पना का शिकार हो सकते हैं, जो किसी भी क्षण होनेवाले प्रक्षेपास्त्र हमलों की मनगढ़न्त कहानियों के साथ पश्चिम में नमूदार होते हैं। हम हर आमदू-खामदू किस्म के उपद्रवियों और अफवाह फैलानेवालों के बन्धक बनने की सम्भावना से खुश हो सकते हैं। ये जितने अधिक होंगे उतना अच्छा रहेगा। अगर सच बोला जाए तो सिर्फ और अधिक बम बनाने के लिए। तो देखा आपने युद्ध के बिना भी, हमारे पास आगे बढ़ने के कई कारण हैं।

लेकिन जरा रुकें, और इसका श्रेय उन्हें दें जो इसके हकदार हैं। हमें इन सबके लिए किसका शुक्रिया अदा करना चाहिए ?
जिन लोगों ने इसे बनाया। ब्रह्मांड के मालिक। देवियों और सज्जनों, वह संयुक्त राज्य अमेरिका है ! सब लोग यहाँ आइए, खड़े होइए और नतमस्तक होइए। दुनिया के साथ ऐसा करने के लिए शुक्रिया। अन्तर पैदा करने के लिए शुक्रिया। हमें रास्ता दिखाने के लिए शुक्रिया। जीवन के मूलभूत अर्थ को ही बदल देने के लिए शुक्रिया।
इसके बाद हमें मरने से नहीं बल्कि जिन्दा रहने से डरना है।

यह मानना ही भायवह भूल है कि परमाणु हथियार तभी खतरनाक होते हैं जब उनका इस्तेमाल किया जाता है। यह तथ्य ही कि उनका वजूद है, हमारे जीवन में उनकी मौजूदगी ही इतनी तबाही मचाएगी जितनी कि हम कल्पना नहीं कर सकते। परमाणु हथियार हमारे चिन्तन पर छाए हुए हैं। हमारे व्यवहार को नियन्त्रित करते हैं। हमारे समाजों को चलाते हैं। हमारे सपनों की दिशा निर्धारित करते हैं। वे खुद को हमारे मस्तिष्क में मांस टाँगनेवाली खूँटियों की तरह गहरे धँसा लेते हैं। वे इस पागलपन के संरक्षक हैं। वे परम उपनिवेशवादी हैं। इतिहास के श्वेततम व्यक्ति से श्वेत। श्वेत का हृदयस्थल।
मैं यहाँ भारत और वहाँ, थोड़ी दूर पाकिस्तान के हर आदमी, औरत और संवेदनाशील बच्चे से यही कह सकती हूँ कि इसे निजी तौर पर समझें। आप जो भी हों-हिन्दू मुसलमान शहरी कृषक-इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। परमाणु युद्ध के बारे में एकमात्र अच्छी बात यह है कि मानव जाति के पास यह इकलौता सबसे अधिक समतावादी विचार है। कयामत के दिन आपसे आपकी पहचान के प्रमाण नहीं माँगे जाएँगे। तबाही कोई भेदभाव नहीं बरतेगी।

बम आपके पिछवाड़े में नहीं है। यह आपके शरीर में है। मेरे शरीर में है। किसी को नहीं, न किसी राष्ट्र को न किसी अधिकार को, न किसी आदमी को और न ही किसी देवता को इसे यहाँ रखने का अधिकार है। हम रेडियोधर्मी हो गए हैं। अभी तो युद्ध शुरू भी नहीं हुआ है। लिहाजा खड़े होइए और कुछ कहिए। इसकी चिन्ता मत करिए कि यह पहले कहा जा चुका है। आप इसे निजी मामला मानिए।

 

बम और मैं

 

 

मई 1998 के शुरू में (बम से पहले) मैं तीन हफ्ते के लिए घर से बाहर थी।
जब मैं बाहर थी तो मेरी मुलाकात एक ऐसी सहेली से हुई जिसे मैं अन्य बातों के अलावा उसकी गहरी आत्मीयता को क्रूरता की हद तक साफगोई के साथ मिलाने की क्षमता के लिए प्यार करती हूँ।
उसने कहा, ‘मैं तुम्हारे बारे में, गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स के बारे में सोच रही थी-इसके भीतर, इस पर, इसके नीचे इसके चारों ओर, इसके ऊपर-क्या है।’

वह कुछ देर के लिए खामोश हो गई। मैं असहज हो गई थी और मुझे नहीं लग रहा था कि मैं उसकी बाकी बातें सुनने के लिए तैयार हूँ। लेकिन वह अपनी बात कह डालने पर आमाद थी। ‘इस पिछले साल-असल में एक साल से भी कम समय में-तुम्हें बहुत कुछ मिला-प्रसिद्धि, पैसा, पुरस्कार, प्रशंसा, आलोचना, निन्दा, उपहास, प्यार, नफरत, गुस्सा, ईर्ष्या, दरियादिली-सब कुछ। इस तरह से यह बिलकुल मुकम्मल कहानी है। अपनी अतियों में नाटकीय दिक्कत यह है कि इसका केवल एक यथोचित अन्य है, या हो सकता है।’ उसकी निगाहें मुझ पर टिकी थीं, जो तिरछी और अन्वेषी चमक से दमक रही थीं। वह जानती थी कि मुझे मालूम है कि वह क्या कहने जा रही है। वह बावली थी।
वह कहनेवाली थी कि मेरे साथ भविष्य में जो भी होगा वह इसकी कभी भी बराबरी नहीं कर सकेगा। यह कि मेरा पूरा जीवन कुछ हद तक कमोबेश असन्तोषजनक होनेवाला है। लिहाजा, इस कहानी का इकलौता मुकम्मल अन्त होगा मृत्यु। मेरी मौत।

यह खयाल मुझे भी आया था। हाँ, खयाल आया था। यह तथ्य कि यह विश्वव्यापी चमक-दमक मेरी आँखों की चमक वाहवाही फूलों के गुच्छे फोटोग्राफर, मेरी जिन्दगी में रुचि लेनेवाले पत्रकार (जो अभी तक एक भी कोई सही तथ्य नहीं निकाल पाए हैं), मेरी चापलूसी करनेवाले सूट-बूटवाले लोग, अनगिनत तौलियोंवाले होटल के चमचमाते बाथरूम इसमें से कोई दोबारा कभी नहीं मिलेगा। क्या मैं इसके लिए तरसूँगी ? क्या अब यह मेरी जरूरत बन गई है ? क्या मैं शोहरत की भूखी थी ? क्या मुझे यह सब न रहने पर तकलीफ होगी ?

मैंने इसके बारे में जितना सोचा उतना ही स्पष्ट होता गया कि अगर मशहूर बने रहना मेरी स्थायी स्थिति बन गई तो यह मुझे मार डालेगी। यह अपने शिष्टाचारों और स्वच्छता से मेरा गला घोंट देगी। मैं यह मानती हूँ कि मैंने अपनी प्रसिद्धि के इन चन्द लम्हों का भरपूर आनन्द लिया है, लेकिन मुख्यतः इसलिए कि वह महज चन्द लम्हे थे। क्योंकि मैं जानती थी (या लगा कि मैं जानती हूँ) कि जब भी मैं ऊबूँगी, घर जा सकती हूँ और इस पर हँस सकती हूँ। बुजुर्गियत के साथ ही गैरजिम्मेदार। चाँदनी रात में आम खाऊँगी। शायद कुछ नाकाम किताबें-जो बिलकुल न बिकें-लिखकर उनके बारे में प्रतिक्रिया देखूँगी। एक साल तक मैं दुनिया भर में घूमती फिरी हूँ।

 पर हमेशा घर और वहाँ की अपनी जिन्दगी के बारे में सोचती रही हूँ। मेरे सम्भावित प्रवास के बारे में सारी पूछताछ और भविष्यवाणी के विपरीत मैं खयालों के उसी तालाब में गोते लगा रही थी। वही मेरी खुराक थी। मेरी ताकत थी। मैंने अपनी सहेली को बताया कि मुकम्मल कहानी जैसी कोई चीज नहीं होती। मैंने कहा, कुछ भी हो इन चीजों के बारे में उसका नजरिया बाहरी था, यह धारणा कि किसी व्यक्ति की खुशी या यूँ कहें कि सन्तुष्टि चरम पर है (और अब उसका नीचे आना लाजमी है) क्योंकि वह संयोगवश ‘कामयाब’ हो गई है। यह इस अकल्पनाशील विश्वास पर आधारित थी कि हर व्यक्ति कुल मिलाकर दौलत और शोहरत पाने का ही सपना देखता है।

मैंने उससे कहा कि तुम बहुत लम्बे समय तक न्यूयॉर्क में रही हो। दुनिया वहीं तक सीमित नहीं है। दूसरे सपने भी हैं। ऐसे सपने जिनमें नाकामी ही सम्भाव्य फल है। सम्माननीय है। कभी-कभी इस नाकामी के लिए जद्दोजहद भी मुनासिब है। ऐसी दुनियाएँ, जिनमें मान्यता ही काबिलियत या मानवीय गुणों का इकलौता मापदंड नहीं है। मैं ऐसे कई योद्धाओं को जानती और सराहती हूँ, ऐसे लोग जो मुझसे कहीं ज्यादा मूल्यवान हैं, जो हर रोज युद्ध के लिए निकलते हैं यह जानते हुए भी कि वे सफल नहीं होंगे, सच है कि वे ‘कामयाब’ शब्द के बेहद आदी, पर अर्थों में काम ‘कामयाब’ हैं, लेकिन किसी भी तरह से कम सन्तुष्ट नहीं हैं।


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