सितारों की रातें - शोभा डे Sitaron ki Ratein - Hindi book by - Shobha De
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सितारों की रातें

शोभा डे

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 9788171788354 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :279 पुस्तक क्रमांक : 2700

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प्रसिद्ध लेखिका शोभा डे का हिंदी में पहला उपन्यास ‘सितारों की रातें’...

Sitaron Ki Raten

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सितारे रात में ही चमकते हैं यह कहें कि हर सितारे का एक अँधेरा भी होता है। लेकिन दर्शक की नजर अकसर सितारों पर ही जाती है, उनके अँधेरों पर नहीं। यह प्रक्रिया हमारी फितरत से भी सम्बंध रखती है, और सीमा से भी। शोभा डे इसी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करती हैं। वे उन अँधेरों को भी उघाड़कर देखती हैं, जिन्हें रोशनी में छुपाया हुआ है। विडम्बना यह है कि लेखिका की आँख देखे और दिखाए गए ये अँधेरे ‘बॉलीवुड’ जिनकी सच्चाइयों को उजागर करते हैं उन्हें अकसर ही ‘गॉसिप’ कहकर नकार दिया जाता है। लेखिका ने इस पुस्तक में मुम्बई की फिल्मी दुनिया के जिन चरित्रों को चित्रित किया है, वे अमूर्त नहीं हैं। उन्हें पहचाना जा सकता है-खासकर इनकी केन्द्रिय चरित्र आशा रानी को। यथार्थ और लेखकीय कल्पना के बावजूद उन्हें हम जीवित और जाग्रत अभिनेत्री के रूप में पहचान सकते हैं। और एक प्रतीकात्मक चरित्र के रूप में भी। उसके इर्द-गिर्द और भी कितने ही तारों-सितारों की पहचान की जा सकती है। दरअसल यह एक रंगीन दुनिया है, जिसका उद्दाम आकर्षण किसी भी कलाकार को किसी भी हद तक ले जा सकता है। देह इस दुनिया में सिर्फ उपभोग और ऊँचाई पर पहुँचाने का माध्यम है। निषेध और नैतिकता यहाँ सिर्फ शब्द हैं। स्त्री है, जो बिछी हुई है और पुरुष है, जो तना हुआ है। कहना न होगा कि अँग्रेजी से अनूदित शोभा डे यह कृति हिन्दी पाठकों के लिए एक नया अनुभव होगा। अलग-अलग फिल्मी चरित्रों की पेशगोई के बावजूद इसे एक दिलचस्प उपन्यास की तरह पढ़ा जा सकता है।

 

किशनभाई

‘लाइट्स ऑफ !’ किशनभाई ने स्टूडियो के चपरासी की कड़क आवाज पर मुँह बिचकाया। पिछले बीस बरसों में उसने न जाने कितनी बार इन शब्दों को सुना था ? हजार बार ? दस हजार बार ? इस समय वह उस गंदे, कस्बाई थिएटर में बैठा था, जहाँ फिल्मों की रिलीज़ होने से पहले उनका प्रिव्यू शो किया जाता है। अँधेरा होते ही किशनभाई ने सफेद रेक्सीन की चप्पलों से अपने पैरों को निकालकर उन्हें आराम दिया, पान पराग का डब्बा उठाया, सावधानी से डकार ली और अपने गले में पड़े पंचमुखी रुद्राक्ष को छुआ। यह हरकत वह हर बार अनायास ही करता था।

हर बार नहीं तो अधिकतर वह ऐसा करता था। और आज रात दिखाई जाने वाली फिल्म तो खास थी। इस फिल्म में केवल उसका पैसा ही दाँव पर नहीं लगा था। किशनभाई की तमन्ना थी कि तेरा मेरा प्यार ऐसा नामवाली यह फिल्म बॉक्स आफिस पर हिट हो। यह सब वह अपनी खातिर नहीं, बल्कि आशा रानी की खातिर चाहता था। अपनी हमदम आशा की खातिर। हाँ, यह सच है कि आशा अब उसकी नहीं रह गई है, किशनभाई ने तुरन्त अपनी गलती को सुधारा। लेकिन यह भी है कि कभी वह उसी की थी। और यही थिएटर है, जहाँ से आशा रानी को शोहरत मिलनी शुरू हुई। उस घटना को वह कभी नहीं भूल सकता। यह उसकी पहली फिल्म थी। और आशा रानी की भी। यह उसकी प्रीमियर हिट थी, और आशा रानी की भी। यह उसका पहला प्यार था, आशा रानी का भी।

उसकी बगल में बैठे आदमी का कसमसाना पहले ही शुरू हो गया था। किशनभाई ने धीमे से उसे गरियाया। सिंथेटिक कपड़े का नीला कुरता-पाजामा पहने ये दो कौड़ी का भंगी आज रात गोपालजी बना बैठा है। ‘गोपालजी माई फुट,’ उसने फनफनाते हुए धीमे से कहा। वह कोई गोपालजी-वोपालजी नहीं था। वह तो मुंबई की गंदी नालियों का भंगी था, भंगी। और आज वह वही कुतिया का पिल्ला प्रोड्यूसर बना बैठा है। बड़े नाम, बड़े दामवाला प्रोड्यूसर। हरामजादा ! अभी सात साल पहले यही आदमी किशनभाई की प्रोडक्शन कंपनी में यूनिट की जी-हुजूरी किया करता था। हाँ, तब किशनभाई की अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी हुआ करती थी। उसका अपना बैनर था- के.बी. प्रोडक्शंस।

उन दिनों गोपालजी था ही क्या ! महंज एक लफंगा भड़ुआ, जो डायरेक्टर के लिए पान और हीरों के लिए रंडियाँ लाने का काम करता था। किशनभाई को अच्छी तरह से याद है कि कैसे वह इस मक्कार आंखोंवाले ठग को बुलाता था, ‘‘अबे साले !’’ और उससे कहता था, ‘‘जाकर मेरा बीड़ी का बंडल ले आ।’’ उसके ‘ले आ’ कहने की देर होती थी कि बस गोपालजी उसकी कार से डनहिल का पैकिट लाने के लिए यह जा- वह जा। वैसे वह था काम का आदमी, और जुगाड़ू भी कम नहीं था। उसमें यह हुनर था कि हीरोइन के रेशमी पेटीकोट पर इस्तरी कर दे और मजाल है कि कपड़ा कहीं से जल जाए। किसी फिल्म का गाना सूट होना हो तो गोपालजी को बताइए और एक ही दिन में ऊँटों का काफिला हाजिर ! यही क्यों, भूले से कभी मेकअप-मैन बीमार पड़ गया तो यह लौंडों का यार चेहरे पर लीपापोती भी कर देता था। गोपाल ने अपने आपको हरफनमौला बना लिया था। और घिनौना भी।

किशनभाई ने उस दिन को याद किया जब उसने गोपाल को अपनी प्रोडक्शन कंपनी से निकाल बाहर किया था। ऐसा करके अच्छा तो नहीं लगा था उसे, लेकिन करता भी क्या। गोपाल अपनी हद जो पार कर गया था। उसने आशा रानी को ही लाइन मार दी थी। किशनभाई इस बारे में सोचना भी नहीं चाहता था। उसने अपने आपको जबरन वर्तमान में लौटाया। पर्दे पर अब फिल्म के टाइटिल्स चल रहे थे और उसके साथ कान फोड़ देनेवाला संगीत भी। पता नहीं क्यों, सारे के सारे हिन्दी फिल्म वाले शुरू के इतने अहम दृश्यों में अदबदाकर इतना कान-फाड़ू शोर भर देते हैं (कला फिल्में भी तो अछूती नहीं रह पातीं इस हल्ला-गुल्ला संगीत से) ? क्या वे ऐसा इसलिए करते हैं कि दर्शकों को इतना झकझोर दो कि वे फिल्म में ध्यान लगाने को मजबूर हो जाएँ, या फिर उनकी समझ को ही कुंद कर दिया जाए ? जाने दो....उसे क्या लेना-देना। ये हरामजादे चाहते भी यही हैं, और यही उन्हें मिलता भी है।

 आशा रानी ने इस शो में आने की जहमत नहीं की थी। इसकी उम्मीद भी नहीं थी उससे। और फिर अब तो उसने आलीशान बँगले में ही एक छोटा-सा थिएटर बनवा लिया था। वहीं डबिंग स्टूडियो भी था। धंधे की अच्छी समझ है, किशनभाई ने सोचा। उसका गुरु कौन है ? गुरु चाहे जो भी रहा हो, उसने आशा रानी की अंटी तो ढीली करवा ही ली थी। किशनभाई के दिमाग में अचानक एक तसवीर उभरी और वह चुपचाप हँस दिया। ‘‘आशा रानी, मेरी जान, अपना नाड़ा खोलो, बटुआ तो तुम बाद में भी खोल सकती हो !’’ वह चाहे जो भी रहा हो, आशा रानी के साथ यही होना चाहिए था। चालू कुतिया ! चलो छोड़ो, सब औरतें ऐसी ही होती हैं। कम-से-कम फिल्मी औरतें तो तमाम ऐसी ही होती हैं। कोई शरीफ नहीं होती। एक भी नहीं।

किशनभाई ने जब पहली बार आशा रानी को देखा था, तब वह कुछ भी नहीं थी। सड़क छाप फिल्मी अखबार ‘धूल का फूल’ कहकर उसकी हँसी उड़ाते थे। वह थी भी तो ऐसी ही- बेढंगी, बेडौल, भारी-भरकम मद्रासी छोकरी। और उस पर उसकी काली चमड़ी। छि: ! किशनभाई को काली लड़कियाँ बिलकुल पसंद नहीं थीं। वह तो हमेशा ‘दूध-जैसी-गोरी’ औरतों का दीवाना रहा है। खुद उसके काले रंग पर अफगान स्नो और ड्रीम फ्लावर पाउडर की परतें चढ़ी रहती हैं। नहाने के बाद उसका नियम है क्रीम-पाउडर थोपने का। आशा रानी ने जब उसको यह सब करते देखा था तो उसकी हँसी रोके नहीं रुकी थी। हँसती ही चली गई थी वह। लेकिन यह बाद की बात है, जब वह बदस्तूर उसकी हो गयी थी। नहीं, उसने इस कुतिया से शादी-वादी तो नहीं की थी। लेकिन फिल्मी हलकों में यह यह बात उड़ गई थी कि किशनभाई ने एक नई चिड़िया फंसा ली है। यह इशारा था बाकी तमाम लोगों के लिए कि अब वे अपने हाथ दूर ही रखें। लेकिन गोपाल ने जान-बूझकर इस फरमान को तोड़ने की कोशिश की थी। गोपाल ने अपने आपको किशनभाई से हमेशा इक्कीस समझा। वह हिमाचल प्रदेश का जो था- गोरा-चिट्टा, हलके रंग की आँखोंवाला।

बहरहाल, अब आशा रानी सामने थी। एक खूबसूरत दृश्य। अच्छे ढंग से फिल्माया गया था उसे। आशा रानी ने शुरू के दृश्यों में तो जान ही ढाल देती है। बेशक, सारे टोटके सीख लिए थे उसने। अपने चेहरे को जितनी अच्छी तरह वह जानती थी, उतना और कोई नहीं। उसे पता था कि उसकी नाक भद्दी है और ठुड्डी भी भारी है। लेकिन उसे यह भी पता था कि कैमरा अगर उसकी आँखों पर हो और उसके होंठ सही अंदाज में खुले हों तो लोग फिर और कुछ नहीं देखते। किशनभाई ने पर्दें पर उसकी तसवीर को बारीकी से देखा और उसे आशा रानी के होठों के ऊपर वह मस्सा दिखाई दे गया। उन दिनों आशा रानी को इससे बहुच चिढ़ थी। ‘‘निकाल दो न,’’ वह अपने मेकअपमैन से मिन्नत करती। फिर किशनभाई ने ही उसे विश्वास दिलाया था कि यह बहुत सेक्सी दिखता है। इसी की वजह से लोगों का ध्यान उसके मुँह पर जाता है। आज कल वह जिसे और काला करने लगी है। किशनभाई कोशिश करने लगा कि वह बीते दिनों के बारे में न सोचे और इस गाने पर ध्यान दे, जिसके बोलों पर वह अपने होंठ चला रही है। अब भी वह वही आशा रानी है, जिसे अपना मुँह ज्यादा खोलने से इसलिए डर लगता था कि कहीं कुत्तों जैसे उसके टेढ़े दाँत पर्दें पर न दिख जाएँ।

हलका फोकस लेंस, पीछे से आती रोशनी, चेहरे की तीन चैथाई तसवीर-इस दृश्य में सब कुछ वैसा ही था जैसा वह चाहती थी। किशनभाई गानों के बोलों में डूब गया। गाने में कुछ खास नहीं था- हालाँकि साउंड ट्रैक में एकाध मिनट तक सेक्सी अंदाज में जोर-जोर साँसें लेने की आवाजें थी। इस दृश्य में आशा रानी ‘जाकुजी’ में दिखाई दे रही थी, उसकी एक पतली टाँग बाहर को निकली हुई थी। यह एक फैंटेसी दृश्य था, जिसमें हीरोइन अपनी सुहागरात का सपना देख रही है। आशा रानी ने सचमुच इस दृश्य में अपना सब कुछ झोंक दिया था। किशनभाई ने देखा, वह अपने बदन पर साबुन रगड़ रही है। कैमरा प्यार से उसके बदन पर घूमता हुआ उसकी छातियों के करीब आकर ठहर गया। क्या छातियाँ हैं ! तभी बगल की सीट पर बैठे गोपाल ने पादा। किशनभाई ने अचकचाकर पहलू बदला। तमाम कोशिशों के बावजूद उसकी मर्दानगी जोर मारने लगी थी। शिट ! वह सोचने लगा, यह कुत्तिया आज भी उत्तेजित कर देती है मुझे।

गोपाल ने उसे कोहनी मारी, ‘‘क्यों जी, क्या चीज है।
किशनभाई ने ऐसा जताया जैसे उसने कुछ सुना ही न हो। उधर दृश्य बदल चुका था। अब एक पाँच-सितारा होटल का हनीमून सुइट सामने था। आशा रानी पूरे सुहाग के जोड़े में थी। पता नहीं हिन्दी फिल्मों की दुलहनें हमेशा उत्तर भारतीय ही क्यों होती हैं ? वही लाल-सुनहरी साड़ी, वही गहने, वही मेहँदी, वही बिंदिया।

जब वह मुंमई में आई-आई थी, कभी लाल कपड़े नहीं पहनती थी। कहती थी, छि: ! इसमें तो मैं और काली लगूँगी।’’ उसके ड्रेस डिजायनर ने उसे समझाया था कि वह शोख रंग के कपड़े पहना करे। लेकिन आशा रानी अड़ गई थी, ‘‘न रे बाबा, मम्मी कहती हैं’ भड़कीले कपड़े मत पहना करो।’’ उन दिनों आशा रानी का जुमला ‘मम्मी कहती हैं’ के तकिया कलाम से शुरू और इसी पर खत्म होता था। क्या यह आज भी ऐसे ही बात करती है ?

कितनी नफरत करता था वह आशा रानी की उस मम्मी से। पिशाचों-जैसी बड़ी-बड़ी कजरौटी आँखों वाली मरखनी गाय थी वह। अपने आपको ‘गीता देवी’ कहती थी। गीता देवी और वह पहली नजर में ही एक-दूसरे से नफरत करने लगे थे। लेकिन गीता देवी नफरत किससे नहीं करती थी। एक दिन  किशनभाई ने उसे गरिया दिया तो आशा रानी ने समझाने की कोशिश की थी। ‘‘मम्मी ऐसी नहीं हैं,’’ उसने कहा था। ‘‘मम्मी मुझे बचाने के लिए यह सब करती हैं !’’ ‘‘किससे बचाने के लिए ?’’ किशनभाई गरजा था। इस पर आशा रानी ने सहजता से जवाब दिया था, ‘‘मर्दों से,’’ और अभी बच्ची ही तो है वह। पंद्रह साल उम्र थी उसकी, और छाती चालीस इंच !
किशनभाई ने फिर एक बार अपना ध्यान पर्दें की ओर मोड़ा। शिट ! तो वह आज भी यह नकली चीजें पहनती है ! उसे इनकी जरूरत नहीं है। सैकड़ों बार उसने आशा रानी से बात कही भी थी। लेकिन मम्मी की जिद्द थी। तमाम प्रोड्यूसरों की भी यही जिद्द थी। ‘‘अच्छा लगता है यार ।’’ उनका कटाव देखकर वे बोले थे। किशनभाई ने इस पर जवाब दिया था, ‘‘क्या अच्छा लगता है, साला पहाड़ दिखता है।’’

आशा रानी की छातियाँ बहुत ही बड़ी थीं। किशनभाई इस बात को दावे के साथ कह सकता था। आखिर उसे सेंट माइकेल्स से वे सारी चोलियाँ किसने लाकर दी थीं ? जब कभी वह लंदन जाता, आशा रानी उससे यही मिन्नत करती थी, ‘‘मेरे लिए और कुछ मत लाना....बस गुदगुदे खिलौने और ‘ब्रे-सी-यार्स’ ’’ (इसे वह इसी अंदाज में बोलती थी)। किशनभाई बड़े गर्व के साथ सेल्सगर्ल्स से कहता था कि वे काली लेस, तीन चौथाई कप, जाली वाली 38 नंबर की ब्रा ढूँढ़ने में उसकी मदद करें। और वह इस कल्पना में खो जाता था कि ये सेल्सगर्ल्स जरूर उसकी तकदीर से रश्क कर रही होंगी।

और, कपड़ों के खिलौनों का कैसा अंबार लगा रखा था उसने ! तौबा ! पीली बिल्लियाँ, नीले खरगोश, पीली आँखों वाले रेशमी काले तेंदुए, बिंदियों वाले पांडा, क्या कुछ नहीं था उसके पास; यहाँ तक कि चार फुट का एक जिराफ भी था उसमें। ‘‘यह मेरा चिड़िया घर है !’’ आशा रानी किसी सड़कछाप फिल्मी अखबार के बीच पन्नों के लिए एक टेड़ी बियर पकड़कर पोज देती हुई बड़ी अदा से हँसकर कहती।

किशनभाई की समझ में यह कभी नहीं आया कि वह खिलौने की इतनी दीवानी क्यों हैं। ‘‘तुम्हें मेरे बचपन के बारे में नहीं मालूम,’’ वह किसी गुड़िया को छाती से लगाए उससे कहती, ‘‘मेरे पास खेलने को कभी कुछ नहीं रहा- कोई खिलौना नहीं, कुछ भी नहीं।’’ यह कहानी वह पहले भी सुन चुका था। एक पिता था, जिसने उन्हें छोड़ दिया था। एक माँ थी, जिस पर तीन-तीन लड़कियों को पालने की जिम्मेदारी आ पड़ी थी। गरीबी थी, अभाव था, संघर्ष था। किशनभाई को उसके लिए ये चीजें लाना बुरा नहीं लगता था। हालाँकि जब उसके मँगाए बड़े-बड़े और फुलफुले बंदरों को कस्टम से निकलवाने के लिए चलता तो अपनी नजर में वह कुछ-कुछ मूर्ख दिखता था। किशनभाई कड़वाहट से भरकर सोचने लगा कि अब उसे न जाने कौन से जानवर अच्छे लगते होंगे।

पहला दृश्य आशा रानी के चेहरे के क्लोज़अप के साथ खत्म हो गया। वह आज भी उन बेहूदा नकली पलकों और रंगीन कांटैक्ट लेंसों का इस्तेमाल क्यों करती है ? क्यों ? उसकी आँखे तो वैसे ही सुंदर हैं। अमावस की रात के आसमान से भी ज्यादा काली। किसी अक्षत-योनि कन्या-सी भोली। आश्चर्य की बात थी यह। इतने सारे मर्दों और इतनी सारी फिल्मों का तर्जुबा कर लेने के बाद, आज भी वह उतनी ही नाजुक, भोली और बेदाग दिखती थी।
किशनभाई एक चौथाई पान पराग खा चुका था। वह पेशाब जाने के लिए फटाफट उठा। उसे पता था कि फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे नहीं देखने से कोई फर्क पड़ जाएगा। शायद इस बीच एक ओर बेसुरा गाना होगा, बलात्कार या डकैती का एकाध सीन हो।


 


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