अछूत - मुल्कराज आनंद Achoot - Hindi book by - Mulkraj Anand
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अछूत

मुल्कराज आनंद

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2014
आईएसबीएन : 9789350641484 मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :144 पुस्तक क्रमांक : 2671

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सामाजिक समानता पर एक अत्यंत प्रेरणाप्रद मार्मिक उपन्यास....

Achoot

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘अछूत’ यानी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के भारतीय लेखक मुल्कराज आनन्द (1905-2004) के कालजयी उपन्यास ‘अनटचेबल’ का हिन्दी अनुवाद! अस्पृश्यता की समस्या भारतीय समाज में युगों से रही है, जिसने एक ओर जहाँ आदमी से आदमी की दूरी बढ़ाई, वहीं सामाजिक प्रकृति का पथ भी अवरूद्ध किया। डॉ. आनन्द जब अपना अध्ययन पूरा कर इंग्लैंड से लौटे, तो वे वर्धा जाकर महात्मा गांधी से मिले थे। इस विषय में गांधी जी से उनकी चर्चा हुई, जिसमें डॉ. आनन्द ने अपने अनुभवों के आधार पर पंजाब में व्याप्त अस्पृश्यता की गंभीर समस्या पर चिंता जताई और पूछा कि इसमें मुक्ति के लिए एक लेखक को क्या करना चाहिए। गांधी जी ने अस्पृश्यता के विरोध में दृढ़ और मार्मिक शैली में लिखने की सलाह दी, ताकि लोगों पर उसका असर हो। उसी से प्रेरित होकर डॉ. मुल्कराज आनन्द ने इस उपन्यास की रचना की जिसे, दुनिया भर में मुक्त कंठ से सराहा गया। इसमें से आज से 75 साल पहले के पंजाब से घटनाएँ और चरित्र लिये गये हैं और अछूतों की दुर्दशा का ह्रदयाग्रही चित्रांकन हुआ है। समय बदल गया है, हालात भी काफी कुछ बदलें हैं, लेकिन अपृश्यता की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। इसलिए यह उपन्यास आज भी प्रासंगिक है। वैसे भी, क्लासिक कृतियों की प्रासंगिक समानता पर एक अत्यंत प्रेरणाप्रद मार्मिक उपन्यास।

प्रस्तावना

 

कुछ वर्ष पहले मेरी ही लिखी हुई पुस्तक ‘ए पैसेज टु इण्डिया’ की एक प्रति मेरे हाथ लगी, जिसे शायद किसी कर्नल ने पढ़ा था। पुस्तक पढ़ने के बाद अपनी भावनाओं के वशीभूत होकर उसने पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर ही लिख दिया; ‘होते ही जला डालो’। उसी से कुछ नीचे उसने लिखा थाः ‘लेखक का दिमाग गन्दा है, देखें पुस्तक की पृष्ठ संख्या 215’। मैंने जल्दी से पृष्ठ 215 पलटा, जहां मुझे ये शब्द दिखाई दियेः ‘चन्द्रपुर के भंगियों ने हड़ताल कर दी, जिसके परिणामस्वरुप आधे कमोड गन्दे पड़े रहे गये।’ उस टिप्पणी के कारण मैंने फौजी समाज से सदा के लिए अपने सम्बन्ध समाप्त कर दिये।

ख़ैर, यदि उस कर्नल ने ‘ ए पैसेज टु इण्डिया’ को गन्दा समझा, तो ‘अछूत के विषय में वह क्या सोचेगा, जिसमें भारत के एक शहर के भंगी के एक दिन की व्यथा-कथा का वर्णन किया गया है ? यह पुस्तक साफ-सुथरी है या गन्दी है ? कुछ पाठक जो स्वयं को साथ-सुथरा मानते हैं, इस पुस्तक के दर्जन-भर पृष्ठों को पढ़ने से पहले ही लाल-पीले हो जाएंगे और कुछ भी कहने का दावा नहीं कर सकेंगे। मैं भी यह दावा नहीं कर सकता लेकिन उसका कारण कुछ और है। मुझे तो यह पुस्तक अवर्णनीय स्वच्छ प्रतीत होती है और मेरे पास इस विषय में कहने के लिए शब्द नहीं है। शब्दाडम्बर और वाक् जाल से बचते हुए पुस्तक सीधे पाठक के दिल तक जाती है और उसे शुद्ध कर देती है। हममें से कोई भी शुद्ध नहीं है, यदि होते, तो हम जीवित न होते। निष्कपट व्यक्ति के लिए सब कुछ शुद्ध हो सकता है और यही उसके लेखन की निष्कपटता है, जिसमें लेखक पूर्णतः सफल हुए हैं।

मानव के मलत्याग करने का व्यवहार भी कैसा अजीब व्यवहार है। प्राचीन यूनानी लोग इसकी कोई परवाह नहीं करते थे। वे बड़े समझदार और प्रसन्न व्यक्ति थे। लेकिन हमारी और भारतीय सभ्यता अत्यन्त विलक्षण बन्धनों में बंध गयी है। हमारा बन्धन मात्र एक सौ वर्षों पुराना है और हममें से कुछ इसे खोलने का प्रयास कर रहे हैं। हमें बचपन से ही मल त्याग करने को लज्जाजनक लगने का प्रशिक्षण दिया गया है, जिसके कारण अनेक गम्भीर बुराइयां पनप गयी हैं-शारीरिक भी और मनोवैज्ञानिक भी। आधुनिक शिक्षा इसका सामना करने का प्रयास कर रही है। भारतीय उलझन कुछ अलग प्रकार की है। अनेक पूर्व-बस्तियों की भांति इस प्रक्रिया को आवश्यक और प्राकृतिक मानते हैं। उनमें इसके प्रति कोई ग्रन्थि नहीं है। लेकिन उन्होंने एक बीभत्स दुःस्वप्न विकसित कर लिया है, जिसकी जानकारी पश्चिम को नहीं है। उनका विश्वास है कि मानव-मल धार्मिक रूप से अस्वच्छ और प्राकृतिक रूप से अरुचिकर है और जो साफ करते हैं, वे समाज से बहिष्कृत है। वास्तव में, मानव-मस्तिष्क किसी भी चीज को घृणित रूप में प्रस्तुत कर सकता है। कोई जानवर इस विषय पर ऐसा कुछ भी नहीं कहेगा, जैसा श्री आनन्द के इस उपन्यास ‘अछूत’ का नायक कहता हैः ‘ वे सोचते हैं कि हम गन्दे हैं, क्योंकि हम उनकी गन्दगी को साफ करते हैं।’

भंगी किसी गुलाम से भी गया-गुजरा है। कोई गुलाम अपने मालिक और अपने काम को बदल सकता है अथवा स्वतंत्र हो सकता है, लेकिन भंगी सदा-सदा के लिए बंधा हुआ है। उसका जन्म ही ऐसी स्थिति में होता है, जिससे वह छुटकारा नहीं पा सकता और उसे धर्म के आधार पर सामाजिक-सम्पर्क से बहिष्कृत माना जाता है। उसे अस्वच्छ माना जाता है और जब कभी वह किसी से छू जाता है, तो छू जाने वाले व्यक्ति भ्रष्ट हो जाते है। उन्हें स्वयं को स्वच्छ करना पड़ता है और अपने नित्यकर्म को दोबारा से व्यवस्थित करना पड़ता है। जब वह सार्वजनिक मार्ग पर चलता है, तो रूढ़िवादियों के लिए घृणित चीज़ बन जाता है और उसका कर्तव्य होता है कि वह पुकार कर लोगों को चेतावनी दे कि वह आ रहा है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि गन्दगी उसकी आत्मा तक पहुंच जाती है और तब वह स्वयं के बारे में सोचता है कि उन क्षणों में उसे क्या होना चाहिए। कई बार यह भी कहा जाता है कि इतना अप्रतिष्ठित हो जाता है कि वह इसकी परवाह ही नहीं करता लेकिन जिन्होंने उसकी समस्या को सोचा-समझा है, उनकी राय ऐसी नहीं है और मैं भी ऐसा नहीं कहता। मुझे याद है, अपने भारत प्रवास के दौरान मैंने देखा कि भंगी अत्यन्त दयनीय दिखाई देते थे, वे दूसरे नौकरों की अपेक्षा अधिक रूपवान होते थे और मैं जिन्हें जानता था, उनमें से एक में कवि जैसी कल्पना भी थी। ‘अछूत’ जैसा उपन्यास कोई भारतीय ही लिख सकता है और वह भी ऐसा भारतीय जिसने अछूतों का भली-भांति अध्ययन किया हो। कोई यूरोपियन भले ही कितना सहृदय क्यों न हो, बक्खा जैसे चरित्र का निर्माण नहीं कर सकता; क्योंकि वह उसकी मुसीबतों को इतनी गहराई से नहीं जान सकता; और कोई अछूत भी इस पुस्तक को नहीं लिख सकता; क्योंकि वह क्रोध और आत्म-दया में उलझ जाता। प्रस्तुत पुस्तक में लेखक श्री आनन्द का एक आदर्श स्थिति में हैं। वह क्षत्रिय हैं और यह आशा की जा सकती है, कि गन्दगी का भाव उन्हें विरासत में नहीं मिला होगा। वह अपने बचपन में उन भंगियों के बच्चों के साथ खेले थे, एक भारतीय रेजिमेण्ट से सम्बद्ध थे। वह उन बच्चों को पसन्द करते हुए ही पले-बढ़े और उन्होंने उस त्रासदी को समझा, जिसे उन्होंने नहीं भोगा था। उनके पास पूरी जानकारी और तटस्थता का उचित सम्मिश्रण है। वह दर्शन के माध्यम से उपन्यास के क्षेत्र में आये हैं और इसीलिए उन्होंने बक्खा के चरित्र को गाम्भीर्य प्रदान किया है। इस कारण उन पर अस्पष्टता का आरोप भी लगाया जा सकता है, लेकिन उनका नायक कोई कपोल-कल्पना नहीं है, अपितु एक जरा-सा बांका, भव्य, असल भारतीय है। उसका डील-डौल भी विशिष्ट है। उसका चौड़ा एवं बुद्धिमत्तापूर्ण चेहरा, मनोहारी धड़ और भारी नितम्ब, जो उसके काम करते समय दिखाई देते हैं अथवा जब वह फौजी जूते पहने पैर पटक कर बाहर के बीचोबीच अपने हाथों में एक कागज में सस्ती मिठाई लिए हुए चहलकदमी करता है।

पुस्तक की योजना साधारण है, लेकिन इसका अपना रूप-स्वरूप है। सारा क्रियातन्त्र एक ही दिन में अत्यन्त छोटे-से क्षेत्र में पूरा हो जाता है।

छू जाने जैसी अनर्थकारी घटना प्रातःकाल घटित होती है और धीरे-धीरे विष फैलता जाता है। यहां तक कि हॉकी-मैच जैसी सुखद घटनाएं और देहात में घूमना भी पीछे छूट जाता है। अनेक कंटीले उतार-चढ़ाव के बाद हम उस समाधान पर पहुंचते हैं, जहां पुस्तक समाप्त हो जाती है। देखा जाए तो समाधान तीन हैं। पहला समाधान कर्नल सिंह का है-यीशू मसीह। यद्यपि बक्खा का ह्रदय सुनकर द्रवित हो जाता है कि यीशू मसीह जात-पात का लिहाज किये बिना सब लोगों को गले लगा लेते हैं, तथापि वह ऊब जाता है; क्योंकि वह धर्मप्रचारक उसे यह बता ही नहीं पाता कि यीशू मसीह कौन हैं। इसके पश्चात् दूसरा समाधान हैः गांधी। गांधी भी यही कहते हैं कि सब भारतवासी एक समान हैं। गांधी द्वारा यह बताया जाना कि उनके आश्रम में एक ब्राह्मण एक भंगी का काम करता है, बक्सा के ह्रदय को छू लेता है। इसके बाद तीसरा समाधान सामने आता है, जिसे एक आधुनिकतावादी कवि के मुख से कहलवाया गया है। यह समाधान नीरस है, लेकिन सीधा-सादा व स्पष्ट है और अत्यन्त विश्वासोत्पादक। अछूतों को बचाने के लिए किसी देवता की आवश्यकता नहीं है और न किसी आत्म-बलिदान अथवा त्याग की ही जरूरत है। आवश्यकता है, सीधे-सादे और एक मात्र साधन-फ्लशसिस्टम-की। शौचालय बनवाकर और जल-निकासी का उचित प्रबन्ध करके, पूरे भारत में अछूत समस्या जैसी बुराई को समाप्त किया जा सकता है।

कुछ पाठक जो कुछ घटित हो चुका है उसे पढ़ने के बाद पुस्तक के अन्तिम भाग को बकवास कह सकते हैं, लेकिन यह निष्कर्ष ही लेखक को योजना की अनिवार्य अंश है। यह पुस्तक का चरमोत्कर्ष है और इसका तिगुना प्रभाव होगा।
बक्खा अपने पिता के पास और अपने उसी गन्दे बिस्तर के पास लौट आता है। कभी वह महात्मा गांधी के बारे में सोचता है, तो कभी कुछ और। उसके दिन भी फिरेंगे। आसमान में नहीं, तो धरती पर बदलाव अवश्य आयेगा और शीघ ही आयेगा।
ई.एम.फॉर्स्टर

अछूत

 

अछूतों की बस्ती, शहर और छावनी की सीमा से दूर और अलग, दोनों के बीच दो कतारों में बसी, मिट्टी की दीवारों से बने मकानों का एक झुण्ड, जहां सफ़ाई कर्मचारी, मोची, धोबी, नाई पानी लाने वाले, घास काटने वाले तथा हिन्दू समाज के अन्य अछूत रहा करते थे। गली के पास एक नाला था, जिसमें कभी स्वच्छ और पारदर्शक जल बहता था।, लेकिन जो अब पास में बने सार्वजनिक शौचालयों की गन्दगी तथा किनारों पर सूखने के लिए डाली गयी मुर्दा जानवरों की खालों तथा उपलों के लिए गधों, भेड़ों, गायों और भैसों के गोबर के ढेर से निकलने वाली तीखी एवं दमघोटू दुर्गन्ध के कारण दूषित हो गया था। किसी भी मौसम में जल-निकासी की व्यवस्था न होने के कारण वह स्थान दलदल बन गया था, जहां से अत्यन्त घिनावनी बू निकलती रहती थी। सब मिलाकर, इस, छोटी-सी बस्ती के बाहर फैले लोगों और जानवरों के कचरे के ढेर और भीतर पसरे घिनावनेपन और गन्दगी ने इस स्थान को रहने के अयोग्य बना रखा था।

कम-से-कम लक्खा जमादार का बेटा बक्खा तो यही सोचता था, जो अठारह वर्ष का हट्टा-कट्टा नवयुवक था। लक्खा शहर और छावनी के सब भंगियों का जमादार था तथा बस्ती के अन्तिम छोर पर, दूर नाले के किनारे तीन क़तारों में बने सार्वजनिक शौचालयों का सरकारी अधिकारी था। उन दिनों, बक्खा दूर-दराज़ के अपने किसी चाचा के साथ, एक ब्रिटिश रेजिमेण्ट की बैरकों में प्रशिक्षणार्थी के रूप में काम कर रहा था तथा गोरे लोगों के जीवन की तड़क-भड़क से सम्मोहित हो गया था। अंगरेज सिपाही उसके साथ मानवोचित व्यवहार किया करते थे, इसलिए बक्खा अपने को सभी अछूतों से बेहतर मानने लगा था। मोची के बेटे छोटा और धोबी के बेटे रामचरण को छोड़कर अन्य सब अछूत अपने में सन्तुष्ट थे। छोटा अपने बालों में ढेर-सा तेल लगाकर अंगरेजों की भांति एक ओर से मांग निकाला करता था, हॉकी खेलते समय नेकर पहना करता था, अंगरेजों की भांति सिगरेट फूंका करता था तथा धोबी का बेटा रामचरण छोटा व बक्खा की नक़ल उतारा करता था।

शरत्-काल की एक सुबह, जब बक्खा अधजगा लेटा हुआ था, तो अपने घर की हालत पर विचार करने लगा, जहां वह एक पुराने चिपचिपे कम्बल में लिपटा हुआ, बारह फ़ीट लम्बे और पांच फ़ीट चौड़े गीले, धुंधले, एक कमरे वाले मिट्टी से बने मकान के कोने में बिछी एक बदरंग नीली चटाई पर लेटा हुआ था। उस की बहिन उसके पास ही एक चारपाई पर सोई हुई थी तथा उसका बाप और भाई गेरुए रंग की पैबन्द लगी रज़ाई ओढ़े बान की टूटी-फूटी चारपाई पर लेटे ख़र्राटे भर रहे थे।
बुलाशाह शहर में रातें ठण्डी हुआ करती थीं। सदा ही इतनी ठण्डी होती हैं, जितने दिन गरम होते हैं। हालांकि सर्दी-गरमी दोनों में, बक्खा कपड़े पहने हुए सोया करता था, फिर भी, नीचे नाले के पास से आती तेज़तीखी हवा, सवेरे-सवेरे, अधूरे कम्बल को चीरती, उसके नियमित रूप से पहने हुए ओवरकोट, कच्छे, बिरजिस और फ़ौजी जूतों के बीच से होती हुई, उसके शरीर में घुस जाती थी।

करवट बदलते हुए, बक्खा कांप उठा, लेकिन फिर भी उसने सर्दी की विशेष परवाह नहीं की, चाहकर भी उसे सहता रहा; क्योंकि अपने फ़ैशन के लिए वह किसी भी सुख का त्याग कर सकता था। फ़ैशन से उसका अभिप्राय भारत में अंगरेजों और भारतीय फ़ौजियों द्वारा पहने जाने वाली पैण्टों, बिरजिसों, कोटों, पट्टियों और जूतों आदि के ढंग से था। एक बार उसके पिता ने गाली देते हुए उससे कहा था, ‘‘मां के लाडले ! एक रज़ाई ले ले, बान की चारपाई पर बिस्तर बिछा ले और गोरे अंगरेजों के उस कम्बल को उतार फेंक, वरना उस पतले-से कपड़े में ठण्ड से मर जायेगा।’’

लेकिन बक्खा आधुनिक भारत की औलाद था। यूरोपियन पहनावा उसके मन पर अपना प्रभाव जमा चुका था, कठोर साधना ने उसकी प्राचीन भारतीय चेतना को कुचल डाला था और उन तर्कों को नष्ट कर दिया था कि भारत में ढीली-ढीली वेशभूषा ही मनुष्य के शरीर के लिए सर्वाधिक उपयोगी होती है। जब वह पहले-पहल अपने चाचा के साथ ब्रिटिश रेजिमेण्ट की बैरकों में रहने गया था, तो बक्खा ने अंगरेज सिपाहियों को आश्चर्य और विस्मय से देखा। अपने प्रवास के दौरान भी उसने अंगरेज सिपाहियो के जीवन को देखा था, जो अपने कम्बलों में लिपटे, अजीब क़िस्म के छोटे-छोटे केनवस के बिस्तरों पर सोया करते थे, परेड पर जाते थे फिर अपने हाथों में चांदी मढ़े छोटे-छोटे डब्बे लिये और मुंह में सिगरेट दबाये बाज़ारों में सैर किया करते थे। बक्खा ने भी उन्हीं की भांति जीने की चाहत पाल ली। उसे बताया गया कि वे साहब थे-ऊंचे लोग। बक्खा को लगा कि उनके-जैसे कपड़े पहनकर कोई भी साहब बन सकता है। इसलिए जहां तक हो सकता था, उसने हर बात में उनकी नक़ल करना आरम्भ कर दिया। एक अंगरेज सिपाही से पैण्ट मांग ली। उसी सिपाही ने बक्खा को अपनी बेकार पड़ी एक बिरजिस भी दे दी। एक हिन्दू सिपाही ने तो उसे एक जोड़ी जूते और पट्टियां भी देने की कृपा कर दी। दूसरी चीज़ों के लिए, वह शहर में फटे-पुराने कपड़े बेचने वाले के यहां जाता था और बड़ी हसरत-भरी निगाहों से उस दुकान को देखा करता था। जब वह बालक था, तो लकड़ी के एक स्टाल पर चढ़ गया, जहां छांटकर अलग कर दी गयीं लाल और ख़ाकी रंग की वर्दियां, टोपियां चाकू, कांटे, बटन, पुरानी किताबें तथा एंग्लो-इण्डियन जीवन का पुराना फुटकर सामान रखा रहता था। बक्खा उन सबको छूने के लिए लालायित रहा करता था। लेकिन दुकानदार के पास जाकर किसी चीज़ की क़ीमत पूछने की हिम्मत नहीं कर पाता था कि कहीं उसकी क़ीमत ऐसी न हो, जिसे वह चुका न सके अथवा कहीं उसकी बातों से दुकानदार यह न समझ ले कि वह किसी सफ़ाई कर्मचारी का बेटा है। इसलिए वह दुकानदार के उस विचित्र संग्रम को देखता रहता था और अपने आपसे चुपचाप कहा करता थाः ‘मैं भी साहब-जैसा दिखूंगा, उनकी तरह चलूंगा, जैसे वे चलते हैं, दो-दो की जोड़ियों में, छोटा मेरा साथी होगा। लेकिन मेरे पास इन चीज़ों को ख़रीदने के लिए पैसे नहीं हैं।’ तब उसकी कल्पना टूटकर बिखर जाती थी और वह हतोत्साहित होकर दुकान से चला आता था। फिर उसे अंगरेजों की बैरकों से कुछ राशि मिल गयी। जो वेतन मिला था, वह उसे अपने पिता को देना था, लेकिन उसने अंगरेज फ़ौजियों से जो बख्श़ीश इकट्ठी की थी, वह दस रुपये थी। हालांकि वह फटे-पुराने कपड़े बेचने वाले दुकानदार के यहां से अपनी इच्छानुसार सब चीजें नहीं ख़रीद सकता था, फिर भी, उसने एक जैकेट, एक ओवरकोट और एक कम्बल-जिसे ओढ़कर वह सोया करता था-ख़रीद लिये। इसके बाद भी उसके पास कुछ राशि बच गयी, जिससे वह ‘रेड-लेम्प’ सिगरेट का आनन्द ले सकता था। उसका बाप उसके फुज़ूलख़र्च पर नाराज़ हुआ था और उसे अछूत बस्ती के लड़के-यहां तक कि छोटा और रामचरण भी-बक्खा की इस नयी वेशभूषा का मज़ाक उड़ाया करते थे और उसे ‘पिलपिली साहब’ कहा करते थे। निःसन्देह, बक्खा जानता था कि उसके जीवन में उन अंगरेजी कपड़ों के सिवा और कुछ भी अंगरेजी नहीं था, लेकिन वह अपने उस नये ढंग को बनाये रखना चाहता था और हर हालत में भारतीयता से बचे रहने की कोशिश करते हुए दिन-रात उन कपड़ों से चिपका रहता था। भले ही रात में सर्दी से कांपता रहता लेकिन भारतीय रज़ाई को बेकार ही समझता रहा।

सर्दी के कारण उसके सशक्त शरीर में तीखी कंपकंपी दौड़ गयी और उसके रोंगटे खड़े हो गये। उसने करवटे ली और अन्धकार में ही न जाने किस चीज़ की प्रतीक्षा करता रहा। वे रातें बड़ी भयंकर हुआ करती थीं। कितनी ठण्डी और कष्टदायी ! उसे दिन अच्छे लगते थे; क्योंकि दिन में सूरज चमकता था और अपना काम निबटाने के बाद वह अपने कपड़े धो सकता था तथा सड़क पर घूम सकता था, जो उसे अछूत बस्ती के विशिष्ट व्यक्तियों और उसके दोस्तों की ईर्ष्या का पात्र बना देता था। लेकिन रातें ! ‘मुझे अवश्य ही दूसरा कम्बल चाहिए, ‘बक्खा ने स्वयं से कहा।’ तब बापू मुझसे रज़ाई लेने के लिए नहीं कहेगा। वह हमेशा ही मुझे डांटता रहता है। मैं उसके लिए इतना काम करता हूं। वह मेरी सारी तनख़्वाह ले लेता है। उसे सिपाहियों से डर लगता है। वे उसे गालियां देते हैं, वह मुझे गाली देता है। जब वे उसे जमादार बुलाते हैं, तो वह ख़ुश हो जाता है। अपनी इज़्जत पर कितना नाज़ है उसे ? हर किसी से सलाम पाने के लिए ही वह निकलता है। मैं एक पल के लिए भी आराम नहीं करता, फिर भी वह मुझे गालियां देता है। अगर मैं लड़कों के साथ खेलने के लिए जाता हूं, तो वह खेल के बीच में ही आने के लिए आवाज़ लगाकर मुझे बुला लेता है और शौचालय साफ़ करने के लिए कहता है। वह बूढ़ा है, साहब लोगों के बारे में कुछ भी नहीं जानता। अब वह मुझे ही जाने के लिए कहेगा। कितनी सर्दी है ? वह बिस्तर में पड़ा रहेगा, रक्खा और सोहनी भी सोये रहेंगे, जबकि मुझे शौचालयों को साफ़ करने के लिए जाना होगा।’ शरीर में उठ रहे दर्द के कारण बक्खा के काले, चौड़े और गोल चेहरे पर झुर्रियां उभर आयीं और उसके शानदार नाक-नक़्श भद्दे दिखाई देने लगे। लेकिन अपने बापू की आवाज़ से उसे घृणा थी। उठने से पहले बापू के धमकी-भरे आदेश की प्रतीक्षा में बक्खा लेटा ही रहा।

‘‘ओए बखिया ! ओए, सूअर की औलाद ! उठ !’’ बापू की ख़र्राटे से टूटी आवाज़ आयी। ‘‘उठ और शौचालयों पर पहुंच जा, वरना सिपाही नाराज़ हो जायेंगे।’’
अपने सहज स्वभाववश बूढ़ा प्रतिदिन सुबह, एक पल के लिए ही सही, पर जाग जाता था और फिर दोबारा उसी तेल से चिकटी, घनी, मोटी, बदरंग, चिन्दियों वाली रज़ाई में नींद लेने के लिए घुस जाता था।

बक्खा ने बापू को चिल्लाते हुए सुना, तो अपनी आंखों को आधा खोला और अपने सिर को ज़मीन से ऊपर उठाने का प्रयास किया। गाली सुनकर वह क्रोधित हो उठा; क्योंकि उस दिन वह सवेरे से ही गिरा-पड़ा अनुभव कर रहा था। उदासी के कारण उसके चेहरे की हड्डियां पीला पड़ गयी थीं। उसे अपनी मां की मौत के बाद वह सुबह याद आ गयी, जब हालांकि वह जागा हुआ था, लेकिन यह सोचकर कि वह सोया हुआ है, उठेगा नहीं, उसका बापू उस पर चिल्ला उठा था। उस दिन के बाद उसके बापू ने उसे प्रतिदिन-सुबह-सवेरे जगाने का नियम बना लिया। शुरू-शुरू में तो वह उसकी पुकार पर कोई विशेष ध्यान नहीं देता था, लेकिन अब जान-बूझकर उसकी परवाह नहीं करता था। ऐसा नहीं था कि वह उठ नहीं सकता था, साधारणतया वह बड़े सवेरे ही जाग जाता था। उसकी मां ने उसे जल्दी जाग जाने की आदत डाल दी थी। वह उसे पीतल का पूरा गिलास भरकर गरमागरम चाय दिया करती थी, जो उनके एक कमरे के मकान के कोने में दो ईंटों से बने चूल्हे पर मिट्टी की हांडी में बनी होती थी। उस गरमागरम और मीठी चाय का स्वाद कितना मज़ेदार होता था। उसे याद करके बक्खा के मुंह में सदा पानी भर आता था। सुबह होने से पहले, रात में ही, जब उसे पीने के लिए चाय मिल जाती थी। चाय पीने के बाद वह अपने कपड़े बदलकर शौचालयों की सफ़ाई करने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी चला जाता था। जब उसकी मां मर गयी और परिवार की देखभाल का भार उसके कन्धों पर आ गया, तो सुबह-सवेरे ऐसी गिलास-भर चाय और आराम के लिए कोई समय ही नहीं बचा। इसलिए, बड़े चाव से बीते दिनों की याद करते हुए उसने चाय के बिना ही काम चलाना सीख लिया, जब वह न केवल स्वादिष्ट नाश्ते का आनन्द करता था, बल्कि दुनिया-भर की शानदार चीज़ें भी उसे मिल जाती थीं। वे बढ़िया कपड़े, जो उसकी मां लाया करती थी, शहर में कभी-कभार घूमने जाना और खेलने के लिए ख़ाली दिन ! उसे प्रायः अपनी मां का ध्यान आया करता था। छोटे क़द की, काली, सादे कुरते और एक लहंगे-ओढ़नी में लिपटी और झुकी हुई, वह भोजन पकाया करती थी और घर की सफ़ाई किया करती थी। हांलांकि वह भी बक्खा के यूरोपियन कपडों को पसन्द नहीं करती थी, लेकिन फिर भी वह कितनी अच्छी थी, कितनी प्यारी, कितनी उदार ! सदा ही कुछ-न-कुछ देती रहती थी, उसके लिए कपड़े ख़रीदती थी, ममता की साक्षात् मूर्ति ! यह सोचकर कि वह मर चुकी थी, बक्खा कभी उदास नहीं हुआ। वह जिस संसार में रहता था, वहां दुःख को आमन्त्रण नहीं देना चाहता था, अपने विलायती कपड़ों और ‘रेड-लेम्प’ सिगरटों की दुनियां में। उसे लगता था, कि उसका मां उस दुनिया की नहीं थी, उसकी उस दुनिया से कोई रिश्ता नहीं था।

‘‘क्या तू उठ गया है ? उठ जा, हराम की औलाद !’’ उसके बाप की चिल्लाहट दोबारा आयी, जिसके कारण बक्खा उदास हो गया।
‘फिर से घौंस !’ बक्खा ने ज्यों ही अपने बापू की आवाज़ को दमे की खांसी के साथ दबते हुए और सांस रोककर चिल्लाते हुए सुना तो वह थोड़ा-सा हिला और बापू की ओर हठीलेपन से कमर घुमाते हुए अंधेरे गन्दे भीड़-भरे छोटे कमरे की ओर से मुंह फेर लिया। उसे लगा, मानो वह कमरा भी बापू की गालियों के साथ ही आया था। उसे लगा कि उसी हड्डियां अकड़ गयी हैं और सर्दी के कारण उसका शरीर सुन्न पड़ गया है। एक क्षण के लिए उसे लगा कि उसे बुख़ार है। उसकी आंखों के कोर से गरम-गरम आंसू ढुलक पड़े। उसका एक नथुना रुक गया था। उसने हवा में सूं-सूं की, ताकि अपनी सांस को ठीक कर सके। उसका गला भी सूज गया था। उसने जिस हवा में सासं लिया था, लगता था, उसने भी उसकी श्वासप्रणाली को अवरुद्ध कर दिया था। बक्खा ने हवा को निगलना आरम्भ कर दिया, ताकि नाक और गले को कुछ आराम मिल सके, लेकिन जब एक ओर का अवरुद्ध नथुना खुल गया, तो दूसरी ओर का बन्द हो गया। खांसी के कारण उसके गले के भीतरी तन्तु हिल गये और वह जहां लेटा हुआ था, वहीं कोने में, उसने ज़ोर से थूक दिया। अपनी कोहनी पर झुककर उसी चटाई के नीचे अपनी नाक साफ़ की, जिस पर वह लेटा हुआ था। फिर वह अपनी दोनों टांगों को खींचकर पुनः लेट गया और अपने पतले-से कम्बल में सिकुड़ गया। उसका सिर उसके बाज़ुओं में था और उसे बहुत सर्दी लग रही थी। वह दोबारा झपकी लेता रहा।

‘‘ओए बक्खा ! ओए तू बदमाश ! भंगी की औलाद ! आ, और मेरे लिए एक शौचालय साफ़ कर।’’ बाहर से कोई चिल्लाया।
बक्खा ने अपने शरीर पर से कम्बल उतार फेंका, अपनी टांगें घसीटीं, आधी नींद में ही अपने बाज़ुओं को हिलाया और अपनी आंखें मलते हुए वह जमुहाई लेते हुए यकायक उठ खड़ा हुआ। एक क्षण के लिए वह झुका, अपनी चटाई और कम्बल को लपेटा, दिन-भर के काम-काज के लिए जगह बनायी और फिर बाहर खड़े आदमी को दोबारा चिल्लाते हुए सुनकर दरवाज़े की ओर भाग चला।

अपने बायें हाथ में पीतल का एक छोटा-सा लोटा थामे और केवल एक लंगोट लगाये, एक पतला-सा छोटा व्यक्ति खड़ा था, जिसके सिर पर एक सफ़ेद गोल टोपी थी, पांवों में खड़ाऊं थीं और उसने अपने लंगोट के कपड़े को नाक तक उठाया हुआ था। यह हवलदार चरतसिंह था, 38 वीं डोगरा रेजिमेण्ट का प्रसिद्ध हॉकी-खिलाड़ी, जो अपने मजाक के लिए भी प्रसिद्ध था। वह बवासीर का पुराना मरीज़ था।
‘‘बक्खा, बदमाश ! शौचालय साफ़ क्यों नहीं है ? एक भो ऐसा नहीं है, जहां कोई जा सके। मैं सब तरफ़ हो आया हूं। तू जानता है, मेरी बवासीर के लिए तू ही ज़िम्मेदार है। इन्हीं गन्दे शौचालयों पर बैठने से मुझे यह छूत की बीमारी लगी है।’’

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