योगासन और प्राणायाम - स्वामी अक्षय आत्मानन्द Yogasan Aur Pranayam - Hindi book by - Swami Akshay Atmanand
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योगासन और प्राणायाम

स्वामी अक्षय आत्मानन्द

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 81-7315-485-6 मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :168 पुस्तक क्रमांक : 2658

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प्रस्तुत है योगासन और प्राणायाम.....

Yogasan aur pranayam

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

कहते हैं, स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है। जब तन ही स्वस्थ नहीं होगा तो मन कैसे स्वस्थ रहेगा। यह पुस्तक स्वस्थ तन-मन के बारे में बताती है। जिन्हें मन के रहस्य को जानने के लिए स्वस्थ शरीर चाहिए, उनके शरीर को अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घायु देने में यह पुस्तक पूर्ण समर्थ है। इस कृति में विभिन्न योगासनों को सरल भाषा तथा रोचक शैली में आकर्षक चित्रों के माध्यम से समझाया गया है। उपयोगिता एवं जानकारी की दृष्टि से यह अति महत्त्वपूर्ण एवं संग्रहणीय कृति है।

योग-जगत के अति श्रद्धास्पद अधिकारी गुरु के रूप में प्रख्यात स्वामी अक्षय आत्मानंद द्वारा योगासन, प्राणायाम, अध्यात्म विज्ञान, सम्मोहन विज्ञान और चिकित्सा विज्ञान आदि पर अत्यन्त सरल-सुबोध भाषा एवं तार्किक शैली में अति रोचक एवं महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की गई है। स्वामी जी का साहित्य इतना लोकप्रिय हुआ है कि उनके ग्रन्थों के कई-कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।

लेखक की बात


‘योग’ भारत की ही एक प्राचीन खोज है। पतंजलि नामक महर्षि की साधना निष्कर्ष ‘अष्टांग योग’ के रूप में हम भारतीयों को पैतृक सम्पत्ति के रूप में, विरासत में मिले थे। लेकिन उसकी सुरक्षा के कोई ठोस उपाय किये बिना ही, हमने वह अमूल्य और अकूत सम्पत्ति ठुकरा दी।
लक्ष्मी व सरस्वती ही उस सम्पत्ति की नियन्ता थीं। ये देवियां निरन्तर भक्तिपूर्वक सेवा-साधना और निष्ठा-भक्ति से ही किसी के पास टिकती हैं। पाखण्ड से इन्हें घोर घृणा है। अतः पाखण्डी के पास बुद्धि व सम्पत्ति स्थायित्व न पाये, तो इसमें दोष किसका?

पूर्वजों के श्रम और साधना के दम पर इतराने वाले हम भारतीय, अपने भारत को दम्भपूर्वक ‘जगद्गुरु’ तो निरुपित करते हैं, परन्तु उसे सिद्ध करने का प्रयास नहीं करते। हमारी इसी दयनीय मानसिक स्थिति ने हमें दर-दर का भिखारी बना दिया है। हमारे पूर्वजों की सम्पत्ति को मांज-धोकर प्रस्तुत करने वाले विदेशी बौने भी हमारे ‘दाता’ हैं और हम हैं उनके सामने काहिल, जाहिल, दीन, याचक मात्र !

अपनी ही मात्रभाषा के शब्दों के उच्चारण को, उनके वास्तविक अर्थ, स्वरूप और सम्बोधन पर ध्यान दिये बिना ही, विदेशी दाताओं के स्टाइल में बोलने वाले हम वास्तव में क्षमा के पात्र भी नहीं हैं।
‘योग’ को ‘योगा’ संबोधन देने वाले भारतीयों को मेरा एक शब्द भी समर्पित नहीं है। यह ग्रन्थ पढ़कर भी उनकी अन्धी आँखें और दिवालिया बुद्धि भले ही कितनी भी दीन-याचना कर ले, इसमें छिपे हुए रहस्यमय कोष को न पा सकेगी।
साधु, योगी, ऋषि, मुनि, मनीषी आदि शब्द निःसंदेह अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त होते हैं, उनकी खोज पद्धतियों के आधार पर ही ये सम्बोधन हुए थे।

‘साधु’ उन साधकों को पुकारा जाता था जो अपने पूर्वजों के ज्ञान को, उस मूल्यवान् धरोहर को होश और चेतनापूर्वक, अनेक साधनों से अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने की निर्विकल्प साधना में ही अपना जीवन होम देते थे। अतः वे पूज्य हैं। केवल उदर-पोषण की मजबूरी पाकर भी निष्ठापूर्वक कार्य करने वाले निर्लोभी साधक ‘पूज्य’ तो हैं ही। ‘योगी’ उन्हें कहा गया था जो अपने पूर्वजों की खोज और ज्ञान-सम्पदा में काल और स्थितियों के अनुरूप नये अनुभव और व नयी खोज मिलाकर उन्हें समृद्ध बनाते रहते थे।

‘मनीषी’ वे चिन्तनशील बुद्धिजीवी थे जो सांसारिकता और व्यावहारिकता से भी बेखबर रहकर, शब्दों के अर्थों और उनमें निहित रहस्यों की खोज कर, पूर्वजों के ज्ञान-भंडार को अगली पीढ़ी तक नये परिवेश में पहुंचाते थे। इस कार्य में खतरे बहुत थे। समाज के दम्भी, धूर्त और पाखण्डी लोगों द्वारा अपनी पोल खुल जाने के भय से, इन महामना लोगों पर सामूहिक आक्रमण की योजनाएं भी गढ़ी जाती रही हैं।

समाज की विकृति मनोदशा के कारण अधिकांशतः इन वैज्ञानिकों को एकान्त और गुप्तवास का दण्ड भी झेलना पड़ता था। सतत् सावधानी के बावजूद भी ये वैज्ञानिक पाखण्डियों के कोपभोजन बनते ही रहते थे। इस प्रकार साधु, वैज्ञानिक और दार्शनिक, समाज के अंग न रहकर भी, समाज के लिए जिये और समाज द्वारा ही मारे गये।
इन तपस्वियों की ही श्रेणी में ‘मुनि’ भी आते हैं। ये कुछ अधिक समझदार थे ! इन्होंने पूर्वजों का अर्जित ज्ञान और साधना मार्ग मात्र आत्मकल्याण के लिए ही चुना था। इन्होंने समाज को अपनी उपलब्धियों के बारे में न कुछ बताया, न उनके द्वारा सताये गये। बस, ये तो पूरे-जीवन-भर मौन रहे और मुनि कहलाये।

एक तपस्वी श्रेणी ‘ऋषि’ नाम से भी जानी गयी है। इन्होंने समाज के भक्तों और पाखण्डियों दोनों को ही सीधा कर दिया। पूर्वजों के अन्वेषणों में से कुछ ऐसे चमत्कार इन्होंने ढूंढ़ निकाले, जिनके आगे सभी नतमस्तक रह जाते थे। इन चमत्कारों को ही ऋद्धियां-सिद्धियां कहा जाता था। इनके प्रथम अक्षर से, इन्हें ऋषि कहकर पुकारा जाने लगा था।
इन पांच श्रमियों के तपस्वियों में शामिल होने के लिए न तो आपको आमन्त्रित किया जा रहा है और न आप इसके योग्य ही हैं। योगी आप हैं नहीं, हो भी नहीं पायेंगे; क्योंकि अभी आपकी ‘भोग’ की लालसा ही पूरी नहीं हो पायी है। भोग की पूरी शक्ति, वह सामर्थ्य और वैसा सक्षम स्वास्थ देने के लिए ही यह पुस्तक प्रस्तुत है, मैं प्रस्तुत हूं।

-अक्षय आत्मानन्द

योगाभ्यास की शंकाएं और समाधान


‘योगाभ्यास’ शब्द कहने-सुनने और पढ़ने में जितना आसान लगता है, उतना वास्तव में है नहीं। मनुष्य का मन बहुत चंचल है। चंचल मन में कोई दृढ़ता या संकल्पशक्ति टिकती नहीं है। यही कारण हैं कि अति चंचल मन का मानव, किसी भी कार्य में कुशल या सफल नहीं हो पाता। यहीं असफलता उसे हर ‘अंगूर’ को खट्टा कहने की चालाकी सिखा देती है। ऐसे चालाक लोगों के लिए ‘योगाभ्यास’ खट्टे अंगूर ही है।
योगाभ्यास इस विश्व की सरलतम् विद्या है। दृढ़ संकल्प शक्ति से ही इसका प्रतिदिन थोड़-थोड़ा-सा अभ्यास भी आप करते रहें, तो इसकी सहज उपलब्धियों से चमत्कृत हो उठेंगे।

योगाभ्यास की आवश्यकता


हठी और अहंकारी व्यक्तियों को कुछ भी समझाना बहुत कठिन है, क्योंकि उन्हें कुछ मानना नहीं है। वे तो केवल वही ठीक और आवश्यक मानते हैं, जो कुछ वे कर रहे होते हैं। किसी सही और सुविधाजनक तरीक़े का भी डटकर विरोध करने में ही वे अपनी भलाई और श्रेष्ठता मानते हैं। इस झूठे अहंकार का परिणाम चाहे जितना भी दुःखद क्यों न हो, वे वही करेंगे, जो उन्होंने ठान लिया है।

ऐसे हठी और अहंकारी व्यक्तियों के लिए यह पुस्तक कदापि नहीं है। ऐसे लोगों से मेरा अत्यन्त विनम्र निवेदन है कि यह पुस्तक पढ़कर अपना मूल्यवान् समय नष्ट न करें, नहीं तो मुझे उनका विरोध सहन करना पड़ेगा।
इस आधुनिक युग में फैली हुई तरह-तरह की बीमारियां, उनकी हज़ारों-लाखों दवाइयां, दवाओं के निर्माता, दवाओं की दूकानें, चिकित्सालय में लगे हुए चिकित्सक और अन्य कर्मचारी, उनकी लूट-खसोट, अफ़लातूनी बातें- इन सबको बन्द कराकर, मैं अपने विरोध में कोई आन्दोलन नहीं खड़ा करना चाहता।

‘शीर्षक’ को समझाने के लिए थोड़ी-सी आवश्यकताएं आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं। हो सकता है, इनमें से कोई आवश्यकता आपकी भी हो। यदि आवश्यकता भी बहुत आवश्क हो, तभी इस पुस्तक को लिखने का श्रम सार्थक होगा। अब आप ही निर्णय करेंगे कि बाज़ार में उपलब्ध योग साहित्य के बीच यह पुस्तक सार्थक है या निरर्थक !
वैसे तो ‘योगाभ्यास’ अथवा ‘योगासन की शुरुआत’ करने का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को है, परन्तु इसे भी व्यवसाय का साधन बना लेने वाले तथाकथित ‘गुरुओं’ ने इस विद्या पर एक जबरदस्त प्रतिबन्ध लगा रखा है। वह प्रतिबन्ध है- ‘योगासन केवल योग्य गुरु के निर्देशन में ही करें या सीखें।’
योगाभ्यास की आवश्यकता आज ही है, परन्तु ‘योग्य गुरु’ उपलब्ध नहीं है। ‘गुरु’ की गुरुता या योग्यता नापने वाला कोई थर्मामीटर आज तक बनाया ही नहीं गया है। फिर योग्य गुरु की तालाश कैसे संभव होगी ?

नकली गुरु आपकी इसी द्विविधा का लाभ उठाकर योगासन का धन्धा खूब जोरों से चला रहे हैं। असली गुरु हिमालय की कन्दराओं में या किन्हीं अज्ञात स्थानों में शान्त बैठे, जीव मात्र के कल्याण का मार्ग खोज रहे है। कहीं आप भी तो योगाभ्यास प्रारम्भ करने के लिए किसी योग्य गुरु के निर्देशन की तालाश नहीं कर रहे हैं ? तो बन्द कर दीजिये ये तलाश ! आज से ही योगाभ्यास शुरू कर दीजिए। गुरु की चिन्ता छोड़िये और इन निर्देशनों से ही काम चला लीजिये। यदि आपमें शिष्यत्व ही सही पात्रता विकसित हो गयी तो ‘गुरु’ स्वयं ही आपको खोज लेगा।

क्या आप जानते हैं ?


आपको योगासन सीखने की क्या आवश्यकता है ? क्या बिना योगासन सीखे आपके जीवन की आवश्यकताएं पूरी नहीं हो रही हैं ? फिर, आप भगवान् बुद्ध भी तो नहीं हैं, जो राजपाट, सुख-वैभव, पुत्र-पत्नी सब कुछ छोड़कर केवल यह पता लगाने दर-दर भटकते और मुसीबतें झेलते रहें कि आदमी बीमार क्यों पड़ता है या वृद्ध क्यों होता है या मरता क्यों है ?
इतिहास में, कथा-कहानियों में, धार्मिक ग्रन्थों में इन तीन ज्वलन्त प्रश्नों का कोई सीधा समाधान नहीं होता। बौद्ध धर्मावलम्बी भी इसे नहीं जानते। फिर भी सिद्धार्थ को ही बुद्ध ‘भगवान्’ तो मानते ही हैं।
यदि आप मुझसे ही इन प्रश्नों के उत्तर पूछेंगे तो मुझे बताना ही पड़ेगा, परन्तु गनीमत है कि आप अपनी मर्जी से इन प्रश्नों के उत्तर नहीं पूछ रहे हैं ! यह तो मैं ही हूं, जो ‘‘खुजा कर ‘खाज’ बना रहा हूं !’’
हो सकता है कि आप भी एक ऐसे सफल ‘जिज्ञासु’ हों, जो बहुत-सी विद्याओं की जानकारी इकट्ठी कर ‘विद्वान’ या ‘महान’ कहलाना चाहते हों।

‘योग’ की प्रतिष्ठा इन दिनों विदेशों में बहुत बढ़ी है। वैज्ञानिकों ने इस विषय पर अनेकानेक ‘शोध’ किये हैं और बड़ी चौंकाने वाली संभावनाओं की घोषणा की है। कहीं आप भी इनसे प्रभावित होकर ही तो ‘योगासन’ सीखना नहीं चाहते ? इस पर कोई रोक नहीं है, शौक से सीखिये, परन्तु ज़रा ठीक से ही सीख लीजिये।

आप किसी दुष्ट रोग के चंगुल में फंस गये हों या डॉक्टरों के खर्चीले इलाज कराते-कराते थक गये हों और ऐसे में किसी ने आपको योग की अद्भुत क्षमताओं से प्रभावित कर दिया हो-कारण कुछ भी हो या फिर आप योग के सच्चे जानकार की खोज कर रहे हों-थोड़े समय के लिए ही सही, आपको ‘योग’ की आवश्यकता है और यह आवश्यकता है और अधिक सक्षमता से ‘भोग’ करने के लिए।

‘योग’ की खोज में योगी है, भोगी है, रोगी है। केवल ‘स्वस्थ’ व्यक्ति ही इसकी खोज में भाग-दौड़ करने से बचा है। मैं उन्हें भी दौड़ में शामिल करना चाहता हूं। इसके लिए मैं एक प्रश्नावली उनके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं। इन प्रश्नों की वास्तविकता समझ लेने पर, शायद आप भी इस खोज में सम्मलित हो सकेंगे।

मूलभूत अनभिज्ञता


क्या आप सही ढंग से खाना जानते हैं ? क्या आप जानते हैं कि सांस कैसे ली जाती है ? क्या आपको बैठना, उठना या खड़े रहना आता है ? क्या आपकों मनमाफ़िक सोना आता है ?
इन मूलभूत प्रश्नों की सरलता से धोखा मत खाइये। उत्तर देने में जल्दी मत कीजिये। ईमानदारी से सोच-समझकर ही उत्तर दीजिये।

खाना हमारी पहली आवश्यकता है। पैदा होने के बाद से ‘खाकर’ ही तो हम आज तक जीवित हैं। खाना-पीना तो हमारा जन्मजात गुण है। अब इस उम्र में हमें कोई खाना सिखाये, यह मज़ाक नहीं तो और क्या है ?
वास्तव में खाकर ही तो हम आज तक ज़िन्दा है। कितना खाते हैं, क्या खाते हैं, कैसे खाते हैं; ये सब प्रश्न तो बेमानी हैं। वास्तव में जितना खाते हैं, जैसे पौष्टिक पदार्थ खाते हैं, जिस प्रकार या जब-जब भी खाते हैं, सब मल बनाकर निकाल देते हैं। इस मल पर पलने वाला सुअर मस्त हो रहा है और हम पस्त हो रहे हैं। तो क्या सुअर खाना जानता है, हम नहीं ? सारे पोषक तत्व यदि मल के रूप में बाहर निकलते रहेंगे तो उन्हें जज़्ब करना हमें कौन सिखायेगा, कब सिखायेगा ?

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