कभी पास कभी दूर - आशापूर्णा देवी Kabhi Pass Kabhi Door - Hindi book by - Ashapurna Devi
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कभी पास कभी दूर

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : सन्मार्ग प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2013
आईएसबीएन : 81-7145-270-1 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :118 पुस्तक क्रमांक : 2553

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एक मर्मस्पर्शी उपन्यास....

KABHI PAAS KABHI DOOR

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

लड़कियाँ माँ बनने के बाद क्या मनोबल खो बैठती है ? आज की कल्याणी को देखकर कौन कहेगा कि कभी उसका ऐसा जबर्दस्त इतिहास था। अब तो लड़कों को शाम को लौटने में देर होने लगती तो खिड़की पकड़कर खड़ी रहती है। उनके खाने-पीने में कमी-बेशी हो गई तो सारे दिन उदास रहती है। अगर मैं हँसता हूँ, कहता हूँ, ‘‘वही अग्निकन्या कल्याणी बागची का आज का यह पतन ?’’
इस पर वह शरमाती तक नहीं है। कहती है ‘‘माँ बनने से क्या होता है यह तुम क्या समझोगी ?’’ इस बात पर क्या उत्तर दिया जा सकता था ?
लेकिन यह अग्निकन्या थी कहाँ ? और चौधरी घराने के जगत नारायण के पोते चौधरी के साथ ऐसा मधुर संबंध स्थापित हुआ कैसे ?


कभी पास कभी दूर

मेरे पास एक दूरबीन है। इस दूरबीन को लेकर मैं अपने मझले लड़के के नए खरीदे तिमंजिले फ्लैट के पश्चिमी ओर की बालकनी में बैठा हूं। मेरे बैठने के लिए एक बेत की कुर्सी रख गए हैं ये लोग। कुर्सी सुंदर, हल्की और नए डिजाइन की है। होनी भी चाहिए वरना ऐसे फ्लैट में अच्छी नहीं लगेगी।
इस समय सुबह है इसलिए इधर धूप नहीं है। पूरब की ओर भरपूर धूप हो रही है। बैशाख का महीना चल रहा है न। यद्यपि अब तो लोग कहते हैं अप्रैल का महीना। खैर कहने न कहने से क्या आता जाता है ?
अप्रैल के महीने में बैशाख की हवा खेलती फिर रही है। जैसा कि मैं दूरबीन से देख भी रहा हूं।
मेरे मझले लड़के का फ्लैट बिल्कुल नए मोहल्ले में है। उसके ब्लॉक के बाद ही अभी भी काफी जगह खाली पड़ी है पर लगता नहीं है कि ज्यादा दिन खाली रहेगी। क्योंकि बालू और मिट्टी का ढेर एक ओर पड़ा हुआ है जो कि भविष्य की ओर संकेत कर रहा है।

बाद की बात बाद में, अभी तो इसकी बदौलत काफी हवा का सेवन किया जा सकता है। यह प्राप्ति क्या कम महत्त्वपूर्ण चीज है ?
सौभाग्य को क्या ‘चीज’ कहना चाहिए ? पर हम लोग भी तो हर बात को समझाने के लिए चीज ही कहते हैं। उस जमीन पर बहुत सारी शाखा प्रशाखाओं के साथ एक चंपा का पेड़ है। एक नीम का पेड़ भी है। क्या चंपा और नीम में एक ही समय में फूल आते हैं ? अगर नहीं तो मेरी दूरबीन पर आकर जो हवा छू रही है उसमें क्यों दोनों फूलों की मिलीजुली गंध है ?
दूरबीन के शीशे से जो कुछ दिखलाई पड़ रहा है, उसमें वैशाखी हवा और ये गंध दोनों मिलकर एकाकार हो रहा है।
मैं दूरबीन का शीशा पोंछ रहा था तभी मझले लड़के की बहू एक कप चाय और दो बिस्कुट लेकर आई। यह हालांकि ब्रेकफास्ट नहीं, ‘फर्स्ट टी’ है। ब्रेकफास्ट थोड़ी देर बाद होगा। तब तक इनकी काम करने वाली’, ‘भाभीजी की मदद करने आ जाएगी। मेरी मझली बहू बड़ी फुर्तीली और कामकाजी है।

हर रोज व्रेकफास्ट के लिए नया-नया कुछ-न-कुछ बनाती है।
उस समय मुझे भी जाकर मेज पर बैठना पड़ेगा। मेरा मझला लड़का भी खाते-खाते कहेगा, ‘‘बबली यह बहुत बढ़िया बनाती है। बबली, यह बड़ा टेस्टफुल तैयार हुआ है।’’
मझली बहूमां का वैसे नाम है ‘धूपछाया’ पर मेरा लड़का उसे बबली कहकर ही पुकारता है। कारण अकारण बुलाता रहता है। ऐसा लगता है कि बुलाकर उसे सुख मिलता है।
यह नाम बहूमां के मायके में घर का नाम था। परंतु मेरे मंझले बेटे प्रबुद्ध ने उस नाम को यहां लाकर चालू कर दिया है। मेरा बड़ा बेटा, उसकी पत्नी, जब भी छुट्टियों में कलकत्ते आती ‘बबली’ के नाम से ही बुलाते। कहते, ‘‘बाप रे ! धूपछाया के नाम से भी कहीं पुकारा जा सकता है ? यह सब नाम तो ‘बैंक के लाकर’ में बंद करके रख देना चाहिए। खास-खास मौकों पर इस्तेमाल किया, फिर उठाकर रखा।’’
इन लोगों के साथ मेरे बड़े बेटे बुद्ध और बहू तिष्ता की काफी पटती है। जब भी वे लोग आते हैं चारों मिलकर हो-हल्ला करते हैं, घूमते-फिरते हैं, थियेटर सिनेमा जाते हैं खाने-पीने और घूमने फिरने तथा गपशप करने में ही छुट्टी खत्म हो जाती है। हालांकि दोनों भाइयों के प्रेम मोहब्बत का असली कारण है, दोनों बहुओं में पटती है। रिश्ता अच्छा और मधुर बनाए रखा है इन्हीं बहुओं ने। वे लोग अगर ऐसा न करें पर भाई दोनों चाहें तो क्या संबंध अच्छे बने रह सकते हैं ? लगता नहीं है।

मुझे तो देखकर लगता ही नहीं है कि लड़कों की अपनी भी कोई सत्ता है। उनके हावभाव तो कुछ ऐसे होते हैं, ‘‘तुम जो करवाओ मैं वही करूँगा’’, ‘‘तुम जैसा कहने को कहोगी मैं वही कह दूंगा।’’
हालांकि मैं पहले समझ नहीं पाया था। एक दिन कल्याणी ने ही हँसते हुए कहा था। और कहा था, ‘‘मानना पड़ेगा कि हमारी किस्मत अच्छी है इसीलिए जिठानी देवरानी में पटती है, अच्छे संबंध हैं। इसके बाद जब छोटी आएगी तब जाने क्या होगा।’’

पर मेरे बड़े बेटे की बहू ने, मेरे मझले लड़के के इस नए फ्लैट को देखा नहीं है। आखिरी बार जब आई थी, हमारे ‘रिची रोड’ वाले पुराने किराए के मकान में ही रह गई थी।....वह मकान छोटा नहीं है, उसमें सभी आराम से रह सकते हैं। पुराने समय का मकान है, किराएदार भी बहुत पुराने हैं। इसीलिए रिची रोड जैसे आभिजात्य इलाके में मेरे जैसा आदमी आज भी मजे से रह रहा है।
परंतु सबका आराम से रह लेना ही तो आखिरी बात नहीं होती है न ? इसीलिए मेरे मझले लड़के ने यह फ्लैट खरीदा है।
इस फ्लैट के खरीदने की खबर पाकर खूब खुश होकर तिष्ता ने बबली को पत्र लिखा था। हालांकि तभी सास को भी लिखा था।....पत्र आदि लिखने का काम बड़ी बहू ही करती है। बुद्धू से यह सब काम बिल्कुल नहीं होता है। उसके लिए तो चिट्ठी पत्री ‘हऊआ’ है।

खैर, तो कुछ दिन बाद बबली को तिष्ता ने लिखा था, ‘‘देखो जरा। दफ्तर से कहीं कुछ नहीं, झट से मुझे त्रिचुर से बदली करके श्रीलंका भेज दिया। हालांकि प्रमोशन में जबर्दस्त। पर यह सोचकर बुरा लग रहा है कि जाने से पहले एक बार कलकत्ते का चक्कर न लगा सकी। तेरा नया फ्लैट नया रहते-रहते न देख पाई। जरा सोच, इकदम लंकापुरी। अशोक वन में सीता जैसा हाल। बस गनीमत है साथ मेरे रामचंद्र भी है। हालांकि मेरी मां ने लिखा है कि एक बार आएंगी। मेरी छोटी बहन ने कहा है कि एक बार लंका देखकर आंखें सार्थक जरूर करूंगी।...पर हमारे इस घर के मां व पिताजी को दो दिन के लिए हिलाया जा सकता है, ऐसी आशा करनी भी नहीं चाहिए। अब त्रिचुर में तीन साल रही, एक बार भी नहीं आए। ऐसा घर गृहस्थी का आकर्षण है-बाबाः।’’

कल्याणी को घर गृहस्थी की दीवानी कहकर लड़के भी छेड़ते हैं। हमारा मझला लड़का नए फ्लैट में गृह प्रवेश के वक्त ले आया था हमें। उसने कहा भी था कि कुछ दिन रहना लेकिन वह कहाँ रहीं ? नियम रक्षा करने के लिए किसी तरह से तीन दिन रहकर छोटे बेटे तथागत के साथ चली गईं। जैसे रिची रोड वाला मकान उनके बिना रो रहा हो। असल में वह उसे ही अपनी जगह मानती हैं। मुझसे कहा, ‘‘तुम यहां रहो कुछ दिन। तुम्हें भी मेरे खिटखिट से कुछ दिनों के लिए छुटकारा मिलेगा और इन लोगों को भी अच्छा लगेगा।’’ कल्याणी का बातचीत करने का ढंग ही ऐसा है।
मैं आज बीस दिन से यहीं रह रहा हूं। सच पूछिए तो चक्षुलज्जावश ही तो मैंने यहां रुकने का सिद्धांत लिया था। यह लोग इतना आग्रह कर रहे हैं और हम सब चले जाएं....अच्छा लगता है क्या ? मेरे छोटे लड़के के पास है कॉलेज का बहाना, उसकी मां जा रही है छोटे बेटे के खाने-पीने की तकलीफ का ध्यान रखकर, लेकिन मैं ? मैं तो रिटायर्ड आदमी हूं-मेरे पास क्या बहाना है ?

खैर मुझे तो यहां अच्छा ही लग रहा है। काफी खुला-खुला-सा है। जब शुरू-शुरू में हम रिची रोड वाले मकान में आए थे तब जैसा खुला-खुला-सा था।....अब तो उस मोहल्ले में एक सुई भर की जगह नहीं।
हालांकि मेरे छोटे लड़के ने कहा था ‘‘मां के आने की क्या जरूरत है ? मेरा सारा काम सुबोधदा आराम से कर लेंगे।’’ लेकिन कल्याणी अपने बुढ़ापे के इस बेटे के लिए कुछ ज्यादा ही परेशान रहती है। जब कि यह लड़का साल भर में डॉक्टरी पास कर लेगा उसे ही वह स्वास्थ्य के गुरपेंचें सिखाती रहती है। ...बुढ़ापे का नहीं तो क्या ? प्रबुद्ध से पूरे दस साल छोटा है तथागत। जब ‘संभावना’ दिखलाई दी तब शर्म से पानी-पानी हो गई थी कल्याणी। बड़े मझले लड़के के आगे सिर उठा नहीं पाती थी। और जब वही ‘संभावना’ सशरीर उपस्थित हो गया तब ?

सच तो यह है कि उस समय इतना अधिक जतन करने लगी, ध्यान रखने लगी कि मुझे ही लगने लगा कल्याणी कुछ ‘अति’ ही कर रही है। अपने नवजात शिशु को लेकर इतना नखरा करती है जैसे खोया हुआ धन मिल गया है। मुझे भी कभी-कभी संदेह होने लगता।....थोड़ी बहुत शर्म क्या मुझे नहीं आई थी ? पर करा ही क्या जा सकता था ? अब एकाएक एक फंदे में जब फंस ही गए तब उसे मान लेने के सिवा दूसरा उपाय ही क्या था ?
हमारे बड़े मझले लड़के के लिए कभी कोई नौकर-वौकर नहीं रखा गया था। हमने कभी सोचा ही नहीं था। तीन साल के छोटे बड़े दोनों लड़कों के साथ-साथ घर का हर काम कल्याणी ही करती रही थी। लेकिन अब छोटे लड़के के वक्त बोली, ‘‘एक छोटा लड़का-वड़का ढूंढ़ो। मैं हर वक्त इस पर नजर नहीं रख पाती हूं।’’
खैर उस समय तो ढूँढ़ने पर हाफपैंट पहने छोटा लड़का मिल भी जाता था अब तो मिलता ही नहीं है। अब कोई नौकर नहीं कहता है-कहता है ‘काम करने वाला’।

उस समय सुबोध मिला था और आज तक बना हुआ है। छोटे भइया जी का गार्जन और भृत्य बनकर। फिर भी कल्याणी अपने मझले लड़के के नए खरीदे सुंदर फ्लैट में तीन दिन से ज्यादा रहने को तैयार ही नहीं हुई। उसकी इस चक्षुलज्जाहीनता के कारण ही मुझे रहना पड़ा।
मुझे बुरा नहीं लग रहा है।
अभी भी यहां एकांत है। और इसी एकांत के कारण मैं अपनी दूरबीन निकाल सकता हूं।
यह बरामदा बड़ा ही सुंदर है। यहां से वह चंपा और नीम का पेड़ दिखाई पड़ता है। और खूब तड़के कभी-कभी जो पहचानी चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई पड़ती है वह भी शायद उधर ही से आती है। हां, चिड़ियों की बोलियां पहचानी लगती हैं।
परंतु पहचानी आवाज से ज्यादा शक्तिशाली होती है पहचानी गंध। जो कि पल भर में करोडों मील की दूरी तय करके गंध के मूल केंद्र के सामने पहुंचा सकती है।
चंपा और नीम के फूलों की गंध वाली हवा भी मुझे जहां ले जाती है वहां मुझे एक छोटा-सा लड़का दिखलाई देता है। नंगा बदन, बस एक छोटी-सी धोती कमर से लिपटी थी। धोती का बंधन ढीला होने के कारण बार-बार कमर से फिसल रही थी।...एक हाथ से लड़का धोती के पेट के पास पकड़े रखने के प्रयास में अंत में असफल हुआ।
वही दिगंबर लड़का मुंह फाड़े सामने का दृश्य देखता रह गया। यह सब क्या है ? क्यों है ? कब हुआ ?
इसका अर्थ क्या है ?

जाने कब शाम को दादी के पास अन्य भाई बहनों के साथ लेटे-लेटे सो गया था। उसके बाद कब किसने उसे उठाकर मां के कमरे में लाकर सुला दिया था, पता ही नहीं। रात को करवट बदलते वक्त जब नींद पतली हुई, आंख खोलकर देखा, दो तरफ मां पिताजी दोनों थे। आराम और शांति से, निश्चिंत होकर वह फिर गहरी नींद में डूब गया।...अचानक भयंकर शोर और चिल्लाहट सुनकर उसकी आंख खुल गई। कमरा अंधेरा था। दोनों तरफ हाथ फैलाया, कोई नहीं मिला। डरकर चीखना चाहा मां कहकर, लेकिन गले से आवाज ही नहीं निकली।
जबकि कमरे के बाहर लोग कितना चिल्ला रहे थे। लग रहा था बहुत सारे लोग चिल्ल-चिल्लाकर रो रहे हैं....या कि जैसे खूब रात गए एक साथ कई एक सियार बोल उठते हैं, ढेर सारे कुत्ते भौंकने लगते हैं तो बदन कांपने लगता है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं, तब वह मां से चिपट जाता है उनके आंचल में मुंह छिपा लेता है-क्या वैसी ही कोई बात हुई है ? लेकिन इस समय मां कहां है ? पूरा बिस्तर ही तो खाली पड़ा है।

तकिए में मुंह छिपाकर मन-ही-मन चिल्लाने लगा वह लड़का, ‘मां’ मां ! तुम कहां हो ? पिताजी, तुम कहां हो ? इन सब आवाजों से मुझे बहुत डर लग रहा है। तुम लोग मुझे अकेला छोड़कर क्यों उठकर चले गए हो ?’’ मन ही मन चिल्लाते-चिल्लाते सहसा ही उसके गले से एक भयंकर आवाज निकल आई।
तब न जाने कौन दरवाजे के बंद पल्लों को खोलकर भीतर आया। कौन है यह उसे क्या पता ? उसने तो तब तक आंखें ही नहीं खोली थीं। अचानक आंखें खोली तो देखा बाहर सुबह की रोशनी फैली हुई है। लड़का हड़बड़ाकर बिस्तर से उतरकर कमरे से बाहर चला आया। मुट्ठी में धोती पकड़कर भीड़ देखकर वह मुट्ठी ढीली पड़ गई-खुल गई धोती।
उसके विस्मय विस्फारित आंखों के सामने एक अद्भुत दृश्य था....बारामदे के सामने की नीची जगह, जिसे सब कोई आंगन कहते हैं, जहां बरसात के मौसम के अलावा सर्वदा दो बड़े तख्त बिछे रहते हैं और घर के किसी का काम उन्हीं पर होता है।

हां, उस लड़के ने तो देखा है, सुबह उठकर दादाजी वहीं बैठते हैं, तंबाकू खाते हैं, चिलम पीते हैं और उस वक्त दादाजी के पास कितने लोग आते हैं। थोड़ी देर बाद वहां बड़े और मझले ताऊजी आकर बैठते हैं। पता नहीं किस तरह की क्या-क्या बातें करते हैं।
इस बीच एक तख्त पर महामाया बुआ घर के सब छोटे-छोटे बच्चों के लिए छोटी-छोटी टोकरी में लाई मूड़की रखती। एक थाली में बहुत सारे लड्डू और कुछ कटे हुए फल भी रख जातीं।
इसका मतलब हुआ दादाजी पूजा कर चुके हैं और यह ‘प्रसाद’ की फल मिठाई है।
उसी के साथ बड़ी ताई एक बड़े से लोटे में भरकर अत्यंत कड़ुआ पानी-सा कुछ ले आतीं और सभी बच्चों के मुंह खुलवा-खुलवाकर एक छोटी गिलसिया भरकर सभी के खुले मुंह में डाल देतीं। सभी हाय ह-य करने लगते। तभी महामाया बुआ एक टोकरी भरकर भीगे चने लेकर आतीं और मुट्ठी भर-भरकर पीड़ितों को बांट देतीं। उस कड़वे घोल को निगलने का पुरस्कार था भिगोया चना। उसके बाद प्रसाद और लाई गुड़, मुड़की।

फिर जाने कब उन दोनों तख्तों पर पानी डालकर उन्हें शुद्ध किया जाता और दादी सब्जी काटने के लिए टोकरी लेकर बैठतीं। उनके आसपास ताइयां, बुआएं और वही महामाया बुआ।

उसी पर सब्जी काटती, जाड़े में धूप सिंकाई होती और कभी-कभी गंगाजल बरियां तोड़ी जातीं।
उसी जगह सारे घर की लड़कियाँ महिलाओं के बाल बांधे जाते। शाम को जब धूप ढल जाती, ठंडी हवा बहने लगती, उसी हवा के साथ फूलों की महक तैरा करती तब दोनों तख्तों पर जमती गपशप की महफिल ताऊजी लोग, दादाजी होते नायक इसी समय बारामदे पर आसनी बिछाकर घर के सारे छोटे बच्चों को खाने के लिए बिठा दिया जाता। दो ही एक जने अपने हाथ से खाते थे बाकी सबको कोई बुआ या मझली ताईजी एक बड़ी थाली में खाना लेकर बैठतीं और बारी बारी से खिलातीं। कोई मुंह हटा लेता या खाना नहीं चाहता तो दबी आवाज में कहतीं, ‘‘खबरदार ! चूं तक मत करना। देख नहीं रहे हो सामने कौन लोग हैं ?’’

जिस दिन चांदनी रात होती उस दिन तो समझ में भी आता कि सामने कौन लोग हैं। जिस दिन अंधेरा रहता उस दिन हमें केवल सायायें दिखलाई देतीं। साया देखकर सारे बदन के रोंगटे खड़े हो जाते। उन्हें तब न दादाजी, न बड़े ताऊजी कहने को जी करता, लगता भूत हैं। डर के मारे कोई भी खुले दरवाजे की ओर देखते तक नहीं थे।...
लेकिन उस दिन ? उस वक्त ? अंधेरा तो था नहीं। चांदनी की जगह सूरज की रोशनी फैली हुई थी चारों ओर आंगन पर।...तब फिर उस लड़के का सारा शरीर सिहर क्यों उठा ?
और आंगन में बिछे वे दोनों तख्त कहां गए ? दिखलाई नहीं पड़ रहे हैं ? ...फिर दिखेंगे भी कैसे ? सारा आंगन तो लोगों से खचाखच भरा है। ये लोग हैं कौन ? यहां कहां से आए ? भीड़ लगाए खड़े क्यों हैं ? धक्का धुक्की करके क्या देखने की कोशिश कर रहे हैं ?
लड़का अवाक् होकर देखने लगा कि वे लोग क्या देख रहे हैं। उसी आंगन में एक तुलसी की वेदी है। मंदिर भी कहा जा सकता है। यहां दादी बुआ लोग, मां ताईजी लोग, यहां तक कि दीदियां भी हाथ जोड़कर गले में आंचल लपेट कर, तुलसी के पौधे के सामने बैठकर बिड़बिड़ाकर कहती हैं, ‘‘तुलसी नारायण हो तुम, तुम हो वृंदावन ! तुम्हारे सामने प्रकाश करती हूं, अंतिम समय में करना भला।’ अंतिम समय क्या है यह वह नहीं जानता है पर सुनते-सुनते ये लाइनें रट गई हैं। उसी तुलसी के पौधे के नीचे एक आदमी चटाई बिछाकर क्यों सो रहा है ? और उसे देखने के लिए ही क्या लोगों ने इतनी भीड़ लगा रखी है ?

कौन है ये आदमी ? वहां क्यों सो रहा है ? रात को क्या ज्यादा गर्मी लग रही थी ? ज्यादा गर्म लगने पर सभी आंगन में सोते ही हैं। लेकिन तब तो तख्त पर सोते हैं या फिर रामभजन के घर में जैसी रस्सी की चारपाई है वैसी चारपाई पर। इस तरह जमीन पर तो कोई नहीं सोता है ? कौन है ?
इंसानों की दीवार की आड़ से विशेष कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। लड़के की समझ में नहीं आ रहा था कि कौन है ? और फिर ऊपर से नीचे तक सफेद चादर तानकर सोने की क्या जरूरत है ?
बड़े ताऊजी दिखाई पड़ रहे थे। वे उस सोए हुए आदमी के पास किस तरह से सिर पर हाथ रखे बैठे हैं और उसी आदमी के सिरहाने दादाजी आंखें बंद किए आलथी-पालथी मारे बैठे हैं जैसे वे पूजा के कमरे में बैठते हैं। आंखें बंद करके तनकर बैठते हैं।

सहसा लड़के को लगा यह आदमी सोया नहीं है शायद मर गया है क्या इसी को कहते हैं अंतिम काल ? इसीलिए तुलसी के पास लेटा है कि तुम उसका भला करेगी ? मरने के बाद क्या किसी का भला होता है ?...आश्चर्य ! लड़के ने तो इससे पहले किसी को मरते नहीं देखा था फिर भी उसके मन में यह बात आई कैसे ? ठीक ही होगा। यह आदमी मर ही गया है और इसीलिए दादी, बुआ और दूसरे लोग गला फाड़-फाड़कर रो रही हैं।
लड़का बारामदे से उतरकर वहां तक जा नहीं पा रहा था। क्योंकि आगन में उतरने के लिए जो सीढ़ियां थीं उन पर जाने कितने लोग बैठे थे। ओफः। अचानक इतने लोग आए कहां से ? सत्यनारायण की पूजा में बहुत सारे लोगों को आते देखा है लेकिन वह तो शाम को ? इस वक्त कौन सी पूजा है ?

व्याकुल भाव से अवाक् खड़ा देखता रहा। अच्छा मां कहां गई ? समझ में नहीं आ रहा है। रसोईघर के सामने वाले बारामदे में घूंघट काढ़े कितनी औरतें बैठी हैं। इनमें से मां कौन है वह कैसे समझेगा ?
असल में, केवल रात के अंधेरे में, गहरी निद्रा के बीच, हाथ बढ़ाकर छूते हुए ‘मां’ नामक प्यार को अनुभव कर पाता है वह। उस समय समझ पाता है कि मां नामक एक निजी वस्तु है उसकी।
लेकिन दिन के वक्त वह अनुभूति ढूंढ़े नहीं ढूंढ़ पाता है। रसोई भंडारघर खाने की जगह में घूंघट काढ़े घूमने वाली सभी एक हो जातीं। मां, बुआ, ताइयां। जिनमें सबसे ज्यादा सजीव सतेज लगतीं महामाया बुआ।
पर इस समय तो महामाया बुआ भी दिखाई नहीं पड़ रही हैं।
अचानक एक असहाय अनुभूति ने लड़के को झकझोरा और उसी झपके के कारण वह चिल्लाकर रो उठा। भयंकर रूप से गला फाड़कर।

उसका रोना सुनकर महामाया बुआ दौड़ी आईं। उसे गोद में उठाते-उठाते स्वयं भी रो पड़ी। लड़का रोते-रोते बोला, ‘‘वह कौन है ? वह वहां क्यों लेटा है ? मुझे डर लग रहा है ?’’
लेकिन यह लड़का खुद कौन है ?
उस समय उसकी उम्र क्या रही होंगी ?
और उसके प्रश्न का उत्तर क्या था ?
हां, इन सब प्रश्नों का उत्तर मिला था। बाद में पांच जनों से सुनते-सुनते याददाश्त की जड़ें मजबूत हो गई थीं।
लड़के की उम्र उस समय साढ़े चार साल थी।
और वही लड़का मैं था। कैसी मजेदार बात है। वही हाय-हाय करके रोता लड़का मैं था ? जो मैं अपने मझले बेटे के नए फ्लैट के पश्चिम की ओर वाले बारामदे में बैठा चंपा और नीम के फूलों के सौरभ में खोता चला जा रहा हूं। इसका मतलब वही साढ़े चार साल वाला लड़का ही वह लंबा चौड़ा नरनारायण चौधरी है। और इस अद्भुत स्थान पर लेटा वह आदमी ?
वे इसी लड़के के पिता थे।

‘‘पिताजी।’’
मेरे मझले बेटे की बहू आकर पुकारती है। बबली का कंठस्वर बड़ा सुरीला है। गले की आवाज ऐसी सुरीली हो सकती है यह बुलाए बगैर पता नहीं चलता है।...मैंने दूरबीन नीचे रखते हुए उसकी ओर देखा। अभी तक नहाई नहीं। जूड़ा वह नहीं बांधती है-उसकी बासी अधऐंठी चोटी पीठ पर पड़ी हुई थी, माथे पर छोटे-छोटे बाल उड़ रहे थे। एक हल्के बैंगनी रंग की साड़ी पहन रखी थी उसने, जिसमें किनारा नहीं था।

उसके चेहरे पर अभी भी बालिका सुलभ लावण्य था।
उसे बबली नाम ही जैसे सूट करता है। पर मैं बहूमां कहकर पुकारता हूं। मुझे यही पसंद है। नाम लेकर तो सभी को पुकारा जा सकता है-पड़ोस की लड़की से लेकर काम करने वाली तक को। ‘बहूमां’ कहकर क्या और किसी को पुकारा जा सकता है ? यही तो इसकी विशेषता है। और इसी में तो मर्यादा है।.....हालांकि मेरी बातें सुनकर लड़के हँसते हैं। कहते हैं मैं गांव वालों की तरह बोला करता हूं। हो सकता है वे लोग ठीक कहते हों। इसी लड़की की ओर तभी न देखकर लगा कि यह अगर सफेद जमीन पर लाल किनारीदार साड़ी पहन घूंघट काढ़कर घूमती होती तो क्या बालिका-सी लगती ?
शायद नहीं। घूंघट के विदा होने से लड़कियों के चेहरे की एक एक रेखा पठनीय हो गई है यह बहुत बडी सुविधा है।
बबली अर्थात् धूपछाया अथवा बहूमां ने जरा कुंठित हँसी-हँसकर कहा, ‘यहां अखबार वाले इतनी देर से आते हैं। आपको जरूर बहुत बुरा लग रहा है। हमेशा की आदत है सुबह-सुबह अखबार पढ़ने की।’’

बात सच है। सुबह की चाय के नशे से कहीं ज्यादा तगड़ा है अखबार पढ़ने का नशा। यह बात जानती ही है। देख चुकी है न।
उधर रिची रोड में, खूब तड़के लपेटा हुआ अखबार दुमंजिले बरामदे की दीवार से आकर टकराता है।....यहां नए मोहल्ले में, पुरुषों के दफ्तर जाने और बच्चों के स्कूल जाने के अलावा कोई काम समय से नहीं होता है। बर्तन मांजने वाली कितना दिन चढ़े आती है, अखबार वाले और भी देर से।...खैर वह सब तो है पर बबली इसके लिए कुंठित क्यों हो रही है ?


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