चीड़ों पर चाँदनी - निर्मल वर्मा Chido Per Chandni - Hindi book by - Nirmal Verma
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चीड़ों पर चाँदनी

निर्मल वर्मा

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2005
आईएसबीएन : 81-267-1068-3 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :227 पुस्तक क्रमांक : 2449

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प्रस्तुत है निर्मल वर्मा का यात्रा वृत्तान्त

Cheeron Par Chandani

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

निर्मल वर्मा के गद्य में कहानी, निबन्ध, यात्रा-वृत्त और डायरी की समस्त विधाएँ अपना अलगाव छोड़कर अपनी चिन्तन क्षमता और सृजन-प्रक्रिया में समरस हो जाती हैं... आधुनिक समाज में गद्य से जो विविध अपेक्षाएँ की जाती हैं, वे यहाँ सब एक बारगी पूरी हो जाती हैं।
निर्मल वर्मा के यहाँ संसार का आशय सम्बन्धों की छाया या प्रकाश में ही खुलता है, अन्यथा नहीं। सम्बन्धों के प्रति यह उद्दीप्त संवेदनशीलता उन्हें अनेक अप्रत्याशित सूक्ष्मताओं में भले ले जाती हो, उनको ऐसा चिन्तक कथाकार नहीं बनाती जिसका चिन्तन अलग से हस्तक्षेप करते चलता हो। वे अर्थों के बखान के नहीं, अर्थों की गूँजों और अनुगूँजों के कथाकार हैं।

 

भूमिका

अरसे बाद अपने इन स्मृति-खंडों को दोबारा पढ़ते समय मुझे एक अजीब-सा सूनापन अनुभव होता रहा है—कुछ वैसा ही रीता अनुभव, जब हम किसी जिन्दा फड़फड़ाते पक्षी को क्षण-भर पकड़कर छोड़ देते हैं—उसकी देह हमसे अलग हो जाती है लेकिन देर तक हथेलियों पर उसकी धड़कन महसूस होती रहती है। एक दूरी का अभाव जो सफ़ारी-सूटकेस पर विभिन्न देशों के लेब्लों पर लटका रहता है—उन्हें न रख पाने का मोह रह जाता है, न फेंक पाने की निर्ममता ही जुड़ पाती है।
इन फटे-पुराने लेब्लों के पीछे कितने चेहरे, हाथ से हाथ मिलाने के गरम स्पर्श, होटलों के खाली कमरे छिपे हैं, क्या इनका लेखा-जोखा कभी सम्भव हो सकेगा ?

शिमला के वे दिन आज भी नहीं भूला हूँ। सर्दियाँ शुरू होते ही शहर उजाड़ हो जाता था। आस-पास के लोग बोरिया-बिस्तर बाँधकर दिल्ली की ओर ‘उतराई’ शुरू कर देते थे। बरामदे की रेलिंग पर सिर टिकाए हम भाई-बहन उन लोगों को बेहद ईर्ष्या से देखते रहते जो दूर अजनबी स्थानों की ओर प्रस्थान कर जाते थे। पीछे हमारे लिए रह जाते थे चीड़ के साँय-साँय करते पेड़, खाली भुतहे मकान, बर्फ में सिमटी हुई स्कूल जाने वाली पगडंडी। उन सूनी, कभी न खत्म होने वाली शामों में हम उन अनजाने देशों के बारे में सोचा करते थे—जो हमेशा दूसरों के लिए हैं, जहाँ हमारी पहुँच कभी नहीं होगी। तब कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन अचानक अपने छोटे-से कमरे, ग्रामोफ़ोन, काग़ज़-पत्रों को छोड़कर बरसों ‘सात समुद्र पार’ रहना होगा।

बचपन में मेरा एक प्रिय प्रायवेट खेल था—कुछ-कुछ मॉर्बिड भी। रात को नींद की प्रतीक्षा करते हुए मैं सहसा अपने-आपसे पूछता था—फ़र्ज़ करो, अगले पाँच मिनिट में तुम मर जाओगे, इस बीच तुम कौन-सी चीज़ें याद करना चाहोगे ? मैं तब कुछ इतना घबरा सा जाता था कि जल्दी-जल्दी हड़बड़ाहट में कुछ भी याद नहीं आता था। आज यदि मैं अपने से यह प्रश्न पूछूँ तो मुझे निश्चय है कि स्मृति अनायास उन वर्षों और उनसे जुड़ी घटनाओं के आसपास घूमती रहेगी जिसके कुछ अंश इस पुस्तक में संग्रहीत हैं—यह बात दूसरी है कि पाँच मिनट की ‘मुहलत’ इस प्रक्रिया में एक-दो घंटे तक खिंच जाती है ! उसके बाद भी मृत्यु का न आना एक चमत्कार-सा ही लगता है।

वास्तव में इस भूमिका में मैं इस ‘चमत्कार’ की ही चर्चा करना चाहता था। इन यात्राओं में अनेक ऐसी घड़ियाँ आई थीं जिन्हें शायद मैं आज याद करना नहीं चाहूँगा...लेकिन घोर निराशा और दैन्य के क्षणों में भी यह ख़याल की मैं इस दुनिया में जीवित हूँ, हवा में साँस ले रहा हूँ, हमेशा एक मायावी चमत्कार-सा जान पड़ता था।
महज़ साँस ले पाना-जीवित रहकर धरती के चेहरे को पहचान—पाना यह भी अपने में एक सुख है—इसे मैंने इन यात्राओं से सीखा है....
हर चमत्कार के पीछे ज़रूर कोई-न-कोई ‘एंजिल’ छिपा रहता है—ऐसा मैं विश्वास करने लगा हूँ। यदि इस समय मुझे स्वामीनाथन, बरेन रॉय और आइसलैंडी कवि थोर्गियेर थोर्गियरसौन याद आते हैं—तो उनके प्रति सिर्फ़ अपना आभार प्रकट करने नहीं—बल्कि इसलिए कि उनके बिना शायद कोई भी चमत्कार सम्भव न हो पाता।

 

निर्मल वर्मा

 

ब्रेख्त और एक उदास नगर

 

 

एक पुरानी चीनी कहावत है : हज़ार मील की यात्रा एक छोटे क़दम से आरम्भ होती है। किन्तु कौन-से अनजाने क्षण हम वह कदम, आँखें मूँद, ले लेते हैं, यह आज भी मेरे लिए रहस्य बना है। मुझे आज भी उस रात की धुँधली-सी याद है। ‘धुँधली-सी’ इसलिए कि हम उस रात इतनी बीयर पी चुके थे कि आज उसके बारे में कुछ भी याद रह सका यही आश्चर्य है। सिर्फ इतना याद है कि वह शुरू बसन्त की शाम थी, शहर प्राग था, और मैं अपने आइसलैंडी मित्रों के संग नीचे ‘बेसमेंट’ की एक ‘बार’ में बैठा था। न जाने उस शाम हम कितनी दफा एक ‘बार’ छोड़कर दूसरी, और दूसरी छोड़कर तीसरी में भटकते रहे थे। कभी हम खुद बाहर चले जाते थे, कभी ऐसा भी होता था कि हमें ज़बरदस्ती बाहर कर दिया जाता था।
वह शायद मालास्त्राना का एक छोटा पुराना-सा ‘होस्पोदा’ था। चेक में ‘होस्पोदा’ एक अत्यन्त दिलचस्प शब्द है, और उसका अनुवाद करना बहुत ही उलझन की चीज़ है, जब तक आप स्वयं वहाँ न गए हों। वह प्राग की एक अपनी चीज़ है—न उसमें वह उच्चवर्गीय भद्रता है, जो ‘बार’ शब्द से आती है, और न ही आधुनिक युग का वह सस्ता, छिछलापन, जो ‘रेस्तराँ’ शब्द से जुड़ा है। ‘होस्पोदा’ की अपनी गरम, स्निग्ध-सी आत्मीयता है, जहाँ शराबी आपके गले में हाथ डालकर गाते रहते हैं, जहाँ ‘वेटर’ को अपनी प्रेमिका—या प्रेमिकाओं से ही अवकाश नहीं मिलता। शायद लंदन का ‘टेवर्न’, ‘होस्पोदा’ के सबसे नज़दीक आता है—किन्तु अँगरेज़ों में पीने की संस्कृति कहाँ ?

हमारी बहस और बातों का छोर शायद छुट्टियों पर आ टिका था। वे लोग, मेरे मित्र, वापस अपने देश लौट रहे थे—आइसलैंड। पिछले अनेक महीनों से उनके संग मेरा बहुत घना सम्पर्क रहा है। उनके छोटे-से देश के प्रति मेरा आकर्षण अनजाने ही एक पहेली-सा बन गया है—स्वयं मेरे लिए।
उनमें एक मेरे मित्र हैं थोर्गियेर—‘सिनेमाटोग्राफ़ी’ के छात्र। उनकी एक कविता मैंने अरसा पहले ‘कृति’ को भेजी थी। शायद हममें से घुमक्कड़ व्यक्ति भी वही हैं। प्राग आने से पहले वह पेरिस में थे, और उससे भी पहले स्पेन में। अन्य मित्र छुट्टियाँ खत्म हो जाने के बाद वापस प्राग लौट आएँगे—सिवाय उनके। वह ‘हमेशा के लिए’ आइसलैंड जा रहे हैं—अपने ‘कोर्स’ को अधूरा छोड़कर। कहीं भी ज़्यादा दिनों तक टिके रहना उनके लिए असम्भव है।
बीयर के गिलास से आँखें ऊपर उठीं..एक हल्की-सी मुस्कराहट उनके होंठों पर आ सिमटी। मैंने सोचा, उन्हें शायद कोई नयी हँसी-मज़ाक की बात सूझी है किन्तु वे चुप रहे; सिर्फ़ गिलास पर मुस्कराहट की छाया झूलती रही।
अन्य मित्र भी मेरी ओर वैसी ही गोपनीय दृष्टि से देख रहे थे, जैसे उनके बीच कोई गुप्त समझौता हो, जिसे वह मुझसे छिपा रहे हों।

‘‘तुम्हें कोई आपत्ति होगी,’’ इस बार थोर्गियेर ने कुछ झिझकते हुए कहा, एक ऐसी झिझक जो गहरी विनम्रता से जुड़ी होती है।
‘‘छुट्टियों में क्या करोगे ?’’ थोर्गियेर ने पूछा।
मैंने अपनी ‘बीयर’ को बहुत प्यार से देखा—उत्तर में। वे हँसने लगे।
‘‘तुम्हें कोई आपत्ति होगी, हमारे संग आइसलैंड चलने में—सिर्फ़ कुछ दिनों के लिए ?’’
यह मज़ाक नहीं था। उन सबके चेहरे बहुत गम्भीर थे। मैं हँसने लगा।
उस रात यह बात ज्यादा आगे नहीं बढ़ी...उनकी गम्भीरता के बावजूद, मैं उसे ज्यादा गम्भीरता से नहीं ले सका। भारत से यूरोप आना भी मुझे इतना असम्भव नहीं लगा था, जितना आइसलैंड जाने की कल्पना करना। मेरे लिए आइसलैंड की यात्रा ‘आउटर स्पेस’ को छूने से कम चमत्कारपूर्ण नहीं थी। इसके बाद कौन कह सकेगा कि हमारे युग में चमत्कार नहीं होते। कम-से-कम मैं उन पर विश्वास करने लगा हूँ।

हम प्राग-बर्लिन की इण्टरनेशनल ट्रेन में हैं—प्राग के स्टेशन पर हमें बहुत से मित्र विदा देने आए थे। टिकट मेरे पास है, वीसा बन चुका है, विदेशी मुद्रा की झंझटें भी लगभग सुलझ गई हैं—किन्तु विश्वास अब भी नहीं होता।
थोर्गियर मेरे संग हैं। कभी-कभी वह मेरे परेशान चेहरे को देखकर मुस्कराने लगते हैं। बाहर प्लेटफार्म पर बहुत-से जाने-पहचाने चेहरे हैं। किसी ने सुझाव दिया कि मुझे अपनी यात्रा की विस्तृत डायरी लिखनी होगी—वह शायद मारिया का सुझाव है। कल रात हम सब संग थे—रात की अन्तिम घड़ियों तक प्राग की सड़कों पर घूमते रहे थे। थोर्गियेर प्राग छोड़ने से पहले प्राग के सब बीयर-घरों और ‘होस्पोदाओं’ को विदा देना चाहते थे—वह हमेशा के लिए प्राग से जा रहे हैं। मैं फिर वापस आऊँगा, किन्तु यह विचार ज्यादा आश्वस्त नहीं करता। लगता है, मैं दुनिया के दूसरे छोर पर जा रहा हूँ।
डायरी लिखनी होगी..

हाथ हिलते हैं—वे सब हाथ, जो दिन में कितनी बार प्राग के चौराहों पर मेरे हाथों से मिलते थे। हवा में हिलते हुए रुमाल और उनके पीछे धुँधले होते वल्तावा के पुल और पुरानी चर्चों की मीनारें...
मैं आइसलैंड जा रहा हूँ, किन्तु सोच रहा हूँ बराबर प्राग के बारे में। तॉल्स्तॉय का कथन याद आता है—‘वार ऐण्ड पीस’ की कुछ पंक्तियाँ...जब हम किसी सुदूर यात्रा पर जाते हैं—आधी यात्रा पर पीछे छूटे हुए शहर की स्मृतियाँ मँडराती हैं, केवल आधा फ़ासला पार करने के बाद ही हम उस स्थान के बारे में सोच पाते हैं जहाँ हम जा रहे हैं।
किन्तु ऐसे लमहे भी होते हैं, जब हम बहुत थक जाते हैं—स्मृतियों से भी—और तब खाली आँखों के बीच का गुज़रता हुआ रास्ता ही देखना भला लगता है...शायद, क्योंकि बीच का रास्ता हमेशा बीच में बना रहता है...स्मृतिहीन और दायित्व की पीड़ा से अलग।
मैं रेल की खिड़की से बाहर देखने लगता हूँ।

हमारी यात्रा का पहला पड़ाव बर्लिन में है, जहाँ हम दुर्भाग्यवश एक रात से अधिक नहीं टिक सकते। पूर्वी जर्मनी का ‘ट्रान्जि़ट-वीसा’, समय के लिहाज़ से, चौबीस घंटों से आगे नहीं जाता है। सोचता हूँ, वापस आते हुए कुछ दिन अवश्य यहाँ रुक जाऊँगा, और कुछ नहीं तो बर्गोमान-म्यूज़ियम देखने के लिए ही।
किन्तु थोर्गियेर ने बहुत पहले से ही एक योजना तैयार कर ली है। उनकी ‘चिन्तन-धारा’ कब कहाँ कैसा मोड़ लेगी, इसका अनुमान लगाना मेरे लिए हमेशा असम्भव-सा रहा है। बर्लिन में उनके चन्द आइसलैंडी मित्र रहते हैं। उन्हें पहले से ही हमारे आगमन की सूचना मिल चुकी है। (कैसे उन्हें यह सूचना मिली, मेरे लिए यह अब तक रहस्य बना है। थोर्गियेर के आलस्य पर मेरा इतना गहरा विश्वास है कि वह उन्हें चिट्ठी या तार से कोई सूचना दे सकेंगे, यह असम्भव-सा लगता है। वैसे, जैसा मैंने पहले कहा था, चमत्कारों पर मेरा विश्वास होने लगा है।) ‘‘वो लोग वहाँ टिकिट लेकर मौजूद रहेंगे।’’ थोर्गियेर ने कहा।

‘‘कैसे टिकट ?’’ मैं कुछ भी नहीं समझ सका।
‘‘मैं खुद ही नहीं जानता,’’ उन्होंने अधमुँदी आँखों से मुझे देखा, ‘‘शायद किसी थियेटर के।’’
‘‘किन्तु हमारी गाड़ी बर्लिन सात बजे से पहले नहीं पहुँचेगी...थियेटर या कोई भी चीज़ असम्भव है।’’
‘‘स्टेशन से ‘बर्लिन-एन्सेम्बल’ ज़्यादा दूर नहीं, आध घंटे में पहुँच जाएँगे।’’
बर्लिन-एन्सेम्बल ! मैं खुली आँखों से थोर्गियेर को देखता रहा—नहीं, वह मजाक नहीं कर रहे। काश, मैं उन्हें अच्छी तरह पीट सकता। अरसे से यह इच्छा रही है।

गाड़ी बर्लिन की ओर भाग रही थी—मध्य-यूरोप का प्रकृति-दृश्य आज तक निरपेक्ष दृष्टि से नहीं देख सका। वैसे रेल की खिड़की के बाहर सबकुछ शान्त और समतल है—सब एक ही जगह रुकी-सी और फिर तेज़ी से बदलती हुई ‘स्टिल-लाइफ’ ! मैं मध्य-यूरोप में हूँ—जर्मिनी में—और यह 1961 की गरमियाँ हैं—दूर-दूर फैले हुए खेतों पर जून की उजली, उनींदी-सी धूप और भूरी मिट्टी की गन्ध। एक बोझिल-सी गन्ध, जिसमें पूरी एक मृत पीढ़ी का अतीत भरा है। मैं दो बार-लन्दन और पेरिस जाते हुए जर्मनी के बीच से गुज़रा हूँ—किन्तु कभी यहाँ उतरने को मन नहीं हुआ। कोई अदृश्य-सा भय, एक अजीब-सी झिझक सामने खड़ी हो जाती है। युद्ध को खत्म हुए एक लम्बा अरसा बीत गया। कोई भी आज उसे याद नहीं करता। घिसी-पिटी कहावत है—गड़े मुर्दे को उखाड़ना ठीक नहीं, यह एक बुरी आदत है। किन्तु मैं, जो एक सुदूर देश से यूरोप आया हूँ—मुझे कई बार ऐसा लगता है कि जो समय सबके लिए, यहाँ के निवासियों के लिए बीत गया है, वह मेरे लिए अभी तक जीवित है, प्रतीक्षारत है, और जब तक मैं उसे अन्य प्राणियों की तरह भोग नहीं लूँगा, वह मुझसे छूटेगा नहीं। गड़े मुरदे ? वे हर आदमी के भीतर हैं—जब कभी मध्य-यूरोप से गुज़रता हूँ, मुझे उनका ठंडा स्पर्श महसूस होने लगता है। मैं पूर्व-ग्रह ग्रस्त नहीं हूँ, किन्तु आज भी मैं किसी जर्मन को देखता हूँ, तो मेरे भीतर एक फिज़ूल, बेमानी-सी बेचैनी होने लगती है।

यह बेचैनी एक हद तक उस बेचैनी से मिलती है, जो मुझे बहुत पहले मान और काफ़्का की कथाओं को पढ़ने से होती थी। आज सोचता हूँ, तो आश्चर्य होता है कि मैंने इस ‘बेचैनी’ को यूरोप आने से पूर्व कभी ठीक से समझने का प्रयत्न नहीं किया। यह आकस्मिक नहीं है कि दोनों लेखक मध्य-यूरोप के दो अलग-अलग भागों से सम्बन्धित थे—जर्मनी और चेकोस्लोवाकिया। यहाँ से गुज़रते हुए पहली बार महसूस होता है कि यूरोप का यह खंड ज़िंदगी के उन अज्ञात, गोपनीय रहस्यों से गुम्फित है, जिन्हें आज तक फ्रान्स, इंग्लैंड या स्पेन ने स्पर्श नहीं किया।
धूल का अन्धड़ आने से पूर्व जैसे समूचे शहर में एक पीला, दम घोटनेवाला, आशंकित धुँधलका—धुँधलका भी नहीं—उजाले का गिलगिला-सा फैल जाता है, जब हम सूनी सड़क पर किसी अज्ञात घर की दीवार से सटे खड़े रहते हैं—और हर वह चीज़ जो बहुत साधारण और परिचित है—एक भयावह, विकृत छाया के लिये सामने से गुज़र जाती है—मेरे लिए मध्य-यूरोप का यह बहुत पुराना, परिचित स्मृत-चित्र है, जो आज भी रेल की खिड़की के बाहर देखते हुए उभर आता है।

सामने की बेंच पर थोर्गियेर आँखें मूँदें लेटा है...मैंने अपनी सिगरेट जला ली। शाम घिरने लगी है। बाहर आबादी के चिह्न नज़र आने लगे हैं—मिलों की चिमनियों के परे टिमटिमाती रोशनियाँ और घरों की छतें—कहीं सिर्फ़ मलबे और ईंटों के ढूह, आधे टूटे हुए मकान और सूनी, कंकाल की आँखों-सी खिड़कियाँ। बमों और गोलियों के निशान अब भी वैसे ही हैं—मैं थोर्गियेर का कन्धा हिलाने लगा हूँ। वह अब भी सो रहा है।
बर्लिन का प्लेटफ़ॉर्म—रात !
भीड़ में थोर्गियेर का मित्र दूर से ही हमें देख लेता है। थोर्गियेर का सामान कम नहीं है—तीन बड़े-बड़े सन्दूक, फ़िल्म और फ़ोटोग्राफी के कैमरे, इफल-बैग और थैले। मेरा सूटकेस अलग है। काफ़ी चीख़-पुकार के बाद ठेले पर सामान चढ़ाया जाता है और हम क्लॉक-रूम की तरफ़ चलने लगते हैं।

हमें बहुत जल्दी चलना चाहिए। समय बहुत कम है, पन्द्रह मिनिट—शायद उससे भी कम। थोर्गियेर के मित्र के पास हमारे टिकिट हैं—बर्लिन-एन्सेम्बल के। सीधे स्टेशन से थिएटर दौड़ना होगा, दूसरा कोई चारा नहीं। कुछ घंटों के बाद हमारे ‘वीसा’ की अवधि खत्म हो जाएगी। हमें अभी तक मालूम नहीं कि हमारा रात का ठिकाना कहाँ रहेगा।
किन्तु इस क्षण मैं आनेवाली रात के बारे में नहीं सोच रहा। सोच रहा हूँ, बर्तोल्त ब्रेख्त के बारे में, जिनका नाटक हम देखने जा रहे हैं। मेरी एक पुरानी दबी साध थी बर्लिन-एन्सेम्बल में ब्रेख्त का नाटक देखने की।

शायद, मेरे लिए बर्लिन आने का सबसे बड़ा आकर्षण भी यही रहा है। बीसवीं सदी के यह सबसे महान नाट्यकार—जिनकी तुलना शेक्सपियर से की जाती है—नात्सी सत्ता स्थापित हो जाने के बाद जर्मनी से बाहर चले गए। उन्होंने अपने सबसे महत्त्वपूर्ण और लोकप्रिय नाटकों, ‘गेलिलियो’, ‘मदर-करेज’ इत्यादि की रचना अपने देश के बाहर, निर्वासित-काल में की—एक स्थान से दूसरे स्थान भटकते हुए। साहित्यिक बहसों और आलोचनाओं में जब-जब कम्युनिस्ट लेखकों पर ‘कट्टरता’ या ‘संकीर्णता’ का आरोप लगाया जाता है, तब अक्सर मेरा ध्यान ब्रेख्त पर चला जाता है। नाटक की समस्त परम्परागत मान-मर्यादाओं को तोड़कर उसे—बीसवीं सदी के विशिष्ट प्रतीक के रूप में—सर्वथा नया मोड़ देनेवाला यह जर्मन लेखक एक फ़ासिस्ट-विरोधी, कम्युनिस्ट भी हो सकता है, पश्चिम के आलोचकों के लिए यह हमेशा एक विवादास्पद बना रहा है।

आश्चर्य नहीं कि अभी तक समाजवादी देशों में भी उनके क्रांतिकारी प्रयोगों का ठीक से मूल्यांकन नहीं हो पाया। पश्चिम के साहित्यकार ब्रेख्त के महान् कृतित्व को स्वीकार करते हैं—उनके कम्युनिस्ट व्यक्तित्व को नहीं। पूर्वी देशों के आलोचक उनके कम्युनिस्ट व्यक्तित्व की सराहना करते हैं, किन्तु उनके कृतित्व के सम्बन्ध में, शायद, पूरी तरह से आश्वस्त नहीं।
शीत-युद्ध का रुग्ण वातावरण एक महान् लेखक के इर्द-गिर्द कितना अपहासास्पद विरोधाभास निर्मित कर सकता है, ब्रेख्त इसके सजीव उदाहरण हैं।  

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