चित्रलेखा - भगवतीचरण वर्मा Chitralekha - Hindi book by - Bhagwati Charan Verma
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चित्रलेखा

भगवतीचरण वर्मा

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2009
आईएसबीएन : 9788126715831 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :199 पुस्तक क्रमांक : 2415

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भगवतीचरण वर्मा का एक अत्यन्त रोचक उपन्यास

Chitrlekha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

चित्रलेखा न केवल भगवतीचरण वर्मा को एक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने वाला पहला उपन्यास है बल्कि हिन्दी के उन विरले उपन्यासों में भी गणनीय है, जिनकी लोकप्रियता बराबर काल की सीमा को लाँघती रही है।
चित्रलेखा की कथा पाप और पुण्य की समस्या पर आधारित है-पाप क्या है?  उसका निवास कहाँ है ? -इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए महाप्रभु रत्नांबर के दो शिष्य, श्वेतांक और विशालदेव, क्रमश: सामंत बीजगुप्त और योगी कुमारगिरि की शरण में जाते हैं। और उनके निष्कर्षों पर महाप्रभु रत्नांबर की टिप्पणी है, ‘‘संसार में पाप कुछ भी नहीं है, यह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है।’’

उपक्रमणिका


श्वेतांक ने पूछा-‘‘और पाप !’’
महाप्रभु रत्नांबर मानो एक गहरी निद्रा से चौंक उठे। उन्होंने श्वेतांक की ओर एक बार बड़े ध्यान से देखा। ‘‘पाप ? बड़ा कठिन प्रश्न है वत्स ! पर साथ ही बड़ा स्वाभाविक ! तुम पूछते हो पाप क्या है!’’ इसके बाद रत्नांबर ने कुछ देर तक कोलाहल से भरे पाटलिपुत्र की ओर, जिसके गगनचुंबन करने का दम भरनेवाले ऊंचे-ऊंचे प्रासाद अरुणिमा के धुंधले प्रकाश में अब भी दिखलाई दे रहे थे, देखा-‘‘हां, पाप की परिभाषा करने की मैंने भी कई बार चेष्टा की है, पर सदा असफल रहा हूं। पाप क्या है, और उसका निवास कहां है, यह एक बड़ी कठिन समस्या है, जिसको आज तक नहीं सुलझा सका हूं। अविकल परिश्रम करने के बाद, अनुभव के सागर में उतराने के बाद भी जिस समस्या को नहीं हल कर सका हूं, उसे किस प्रकार तुमको समझा दूं ?’’
रत्नांबर ने रुककर फिर कहा-‘‘पर श्वेतांक, यदि तुम पाप को जानना ही चाहते हो, तो तुम्हें संसार में ढूँढ़ना पड़ेगा। इसके लिए यदि तैयार हो, तो संभव है, पाप का पता लगा सको।’’

श्वेतांक ने रत्नांबर के सामने मस्तक नवाकर कहा-‘‘मैं प्रस्तुत हूं।’’
‘‘और कदाचित् तुम भी पाप को ढूँढ़ना चाहोगे ?’’ रत्नांबर ने विशालदेव की ओर देखा।
विशालदेव ने भी रत्नांबर के सामने मस्तक नवाते हुए कहा-‘‘महाप्रभु का अनुमान उचित है!’’
रत्नांबर का मुख प्रसन्नता से चमक उठा-‘‘इसके पहले कि मैं तुम लोगों को संसार में भटककर अनुभव प्राप्त करने को छोड़ दूँ, तुम्हें परिस्थितियों से भिन्न करा देना आवश्यक होगा। इस नगर के दो महानुभावों से मैं यथेष्ट परिचित हूं, और इस कार्य को पूरा करने के लिए तुम लोगों को इन दोनों की सहायता की आवश्यकता होगी। एक योगी है और दूसरा भोगी-योगी का नाम है कुमारगिरि, और भोगी का नाम है बीजगुप्त। तुम दोनों के जीवन को इनके जीवन-स्रोत के साथ-साथ ही बहना पडे़गा।’’
दोनों शिष्यों ने एक साथ उत्तर दिया-‘‘स्वीकार है!’’

विशालदेव ! तुम ब्राह्मण हो और तुम्हारी ध्यान तथा आराधना पर अनुरक्ति है; इसलिए तुम्हें कुमारगिरी का शिष्य बनना उचित होगा। और श्वेतांक ! तुम क्षत्रिय हो, तुम्हें संसार में अनुरक्ति है, इसलिए तुम्हें बीजगुप्त का सेवक होना पड़ेगा।’’
दोनों शिष्यों ने एक साथ उत्तर दिया-‘‘स्वीकार है’’

‘‘तुम दोनों के मार्ग निर्धारित हो चुके। अब रहा मैं। तुम लोग मेरी चिंता न करो। जीवन में अनुभव की उतनी ही आवश्यकता होती है जितनी उपासना की। तुम अनुभव प्राप्त करो और मैं तपस्या करूँगा। आज से एक वर्ष बाद तुम दोनों मुझसे यहीं पर मिलोगे। और उस समय फिर से हम अपने निर्धारित कार्यक्रम पर चल सकेंगे।
‘‘पर एक बात याद रखना। जो बात अध्ययन से नहीं जानी जा सकती है, उसको अनुभव से जानने का प्रयत्न करने के लिए ही मैं तुम दोनों को संसार में भेज रहा हूँ। पर इस अनुभव में तुम स्वयं ही न बह जाओ, इसका ध्यान रखना पड़ेगा। संसार की लहरों की वास्तविक गति में तुम दोनों बहोगे। उस समय यह ध्यान रखा पड़ेगा कि कहीं डूब न जाओ।’’
श्वेतांक ने विशालदेव की ओर देखा और विशालदेव ने श्वेतांक की ओर।

रत्नांबर ने कुछ देर तक मौन रहकर फिर कहना आरंभ किया-‘‘जिन परिस्थितियों में तुम जा रहे हो, उनका पहले से ही परिचय करा दूं। कुमारगिरि योगी है, उसका दावा है कि उसने संसार की समस्त वासनाओं पर विजय पा ली है। संसार से उसको विरक्ति है, और अपने मतानुसार उसने सुख को भी जान लिया है उसमें तेज है प्रताप है; उसमें शारीरिक बल है और आत्मिक बल है। जैसा कि लोगों का कहना है, उसने ममत्व को वशीभूत कर लिया है। कुमारगिरी युवा है, पर यौवन और विराग ने मिलकर उसमें एक अलौकिक शक्ति उत्पन्न कर दी है। संसार उसका साधन है और स्वर्ग उसका लक्ष्य। विशालदेव ! वही कुमारगिरी तुम्हारा गुरु होगा।

‘‘और श्वेतांक ! बीजगुप्त भोगी है, उसके हृदय में यौवन की उमंग है और आंखों में मादकता की लाली। उसकी विशाल अट्टालिकाओं में भोग-विलास नाचा करते हैं; रत्नजटित मदिरा के पात्रों में ही उसके जीवन का सारा सुख है। वैभव और उल्लास की तरंगों में वह केलि करता है, ऐश्वर्य की उसके पास कमी नहीं है। उसमें सौंदर्य है, और उसके हृदय में संसार की समस्त वासनाओं का निवास। उसके द्वार पर मातंग झूमा करते है; उसके भवन में सौंदर्य के मद से मतवाली नर्तकियों का नृत्य हुआ करता है। ईश्वर पर उसे विश्वास नहीं, शायद उसने कभी ईश्वर के विषय में सोचा तक नहीं है। और स्वर्ग तथा नरक की उसे कोई चिंता नहीं। आमोद और प्रमोद ही उसके जीवन का साधन है तथा लक्ष्य भी है। उसी बीजगुप्त का तुम्हें सेवक बनना पड़ेगा। श्वेतांक  ! स्वीकार है ?’’

‘‘महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य है।’’- शवेतांक एक बार कल्पना से परे ऐश्वर्य की थाह लेना चाहता था।
‘‘और विशालदेव, तुम्हें स्वीकार है ?’’
‘‘महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य है।’’-विशालदेव एक बार यौवन और विराग के मिश्रण से उत्पन्न शक्ति का महत्व जानना चाहता था।
‘‘तो फिर ऐसा ही हो।’’ इतना कहकर रत्नांबर उठ खड़े हुए।
दूसरे दिन कुटी खाली पड़ी थी। गुरु साधना के शुष्क क्षेत्र में और शिष्य अथाह संसार में निकल पड़े थे।

पहला परिच्छेद

छलकते हुए मदिरा के पात्र को चित्रलेखा के मुख से लगाते हुए बीजगुप्त ने कहा-‘‘चित्रलेखा ! जानती हो जीवन का सुख क्या है ?’’
चित्रलेखा की अधखुली आंखों में मतवालापन था और उसके अरुण कपोलों में उल्लास था। यौवन की उमंग में सौंदर्य किलोलें कर रहा था, आलिंगन के पाश में वासना हंस रही थी। चित्रलेखा ने मदिरा का एक घूंट पिया-इसके बाद वह मुस्कराई। एक क्षण के लिए उसके अधरों ने बीजगुप्त के अधरों से मौन भाषा में कुछ बात कही, फिर धीरे से उसने उत्तर दिया-‘‘मस्ती !’’
उस समय प्राय: आधी रात बीत चुकी थी। बीजगुप्त का भवन सहस्रों दीप-शिखाओं से आलोकित हो रहा था, द्वार पर शहनाई में विहाग बज रहा था। केलि-भवन में नगर की सर्वसुंदरी नर्तकी के साथ सामंत बीजगुप्त यौवन की उमंग में निमग्न था और बाहर गहरे अंधकार में सारा विश्व।
बीजगुप्त हंस पड़ा।–‘‘सोच रहा हूं चित्रलेखा, यौवन का अंत क्या होगा ?’’

चित्रलेखा भी हंस पड़ी, पर हंसी क्षणिक थी, अचानक वह मीठी और उल्लास से भरी हंसी वेदना-गंभीरता में परिणत हो गई। उसने भी शायद कभी इसी प्रश्न का उत्तर पाने की चेष्टा की थी, पर प्रश्न इतना भयानक था कि वह उस पर अधिक देर तक सोच न सकी थी। उसका सिर घूमने लगा था और इसके बाद मदिरा के पात्र में उस समय के लिए उसने उस सुखद विचार को डुबो दिया था। आज एकाएक फिर उसी प्रश्न को सुनकर वह चौंक उठी-‘‘जीवित मृत्यु !’’
‘‘जीवित मृत्यु ! नहीं, यह असंभव है। यौवन का अंत है एक अज्ञात अंधकार, और उस अज्ञात अंधकार के गर्त में क्या छिपा है, वह न तो मैं जानता हूं, और न उसके जानने की कोई इच्छा ही है। भूत और भविष्य, ये दोनों ही कल्पना की चीजें है, जिनसे हमको कोई प्रयोजन नहीं, वर्तमान हमारे सामने है, और वह...’’ बीजगुप्त रुक गया, शायद वह आगे के शब्दों को ढूंढ़ने लगा था।

‘‘और वह उल्लास-विलास है, संसार का सारा सुख है, यौवन का सार है।’’ चित्रलेखा ने हंसते हुए वाक्य पूरा कर दिया।
बीजगुप्त ने चित्रलेखा को आलिंगन-पाश में लेकर कहा-‘‘तुम मेरी मादकता हो।’’
चित्रलेखा ने उत्तर दिया-‘‘और तुम मेरे उन्माद हो।’’

चित्रलेखा वेश्या न थी, वह केवल नर्तकी थी।                                                                                                                                                                                                                                           पाटलिपुत्र की असाधारण सुंदर नर्तकी का वेश्यावृत्ति स्वीकार न करना, यह बात स्वयं ही असाधारण थी; पर उसके कारण थे, और उन कारणों का उसके गत जीवन से गहरा संबंध था।

चित्रलेखा ब्राह्मण विधवा थी। वह विधवा उस समय हुई थी, जिस समय उसकी अवस्था अठारह वर्ष की थी। विधवा हो जाने के बाद संयम उसका नियम हो गया था, पर बात वैसी ही अधिक दिनों तक न रह सकी। एक दिन उसके जीवन में कृष्णादित्य ने प्रवेश किया। कृष्णादित्य क्षत्रिय और शूद्रा का वर्णशंकर पुत्र था। कृष्णादित्य एक सुंदर नवयुवक था, और उसकी सुंदरता में एक विशेष प्रकार का आकर्षण था। कृष्णादित्य ने विधवा चित्रलेखा की तपस्या भंग कर दी।
सुंदरी चित्रलेखा का दबा हुआ यौवन विकसित हो गया, विराग का तेज उल्लास की चमक से दब गया। चित्रलेखा के जीवन का स्रोत बदल गया। कृष्णादित्य ने चित्रलेखा से शपथ ली-‘‘जब तक हम दोनों जीवित रहेंगे, हम दोनों साथ रहेंगे, कोई भी हम दोनों को अलग न कर सकेगा।’’ चित्रलेखा ने कृष्णादित्य की शपथ पर विश्वास कर लिया था। इसके बाद जो होना चाहिए था, वही हुआ।

चित्रलेखा गर्भवती हो गई। गुप्त प्रेम संसार पर प्रकट हो गया। कृष्णादित्य के पिता ने कृष्णादित्य को निकाल दिया और चित्रलेखा के पिता ने चित्रलेखा को। संपन्न पिता का पुत्र कृष्णादित्य गर्भवती सुंदरी चित्रलेखा को लेकर भिखारी की भांति जनरव में निकल पड़ा। त्याज्य नवयुवक को समाज की भर्त्सना और अपमान असह्य हो गए, इस अपमान जनक जीवन की अपेक्षा मृत्यु उसे अधिक प्रिय लगी। रह गई चित्रलेखा, उसे एक नर्तकी ने अपने यहां आश्रय दिया।
चित्रलेखा को एक पुत्र हुआ; पर उत्पन्न होने के साथ ही वह संसार को छोड़ गया। चित्रलेखा का कंठ कोमल था और शरीर सुंदर। जिस नर्तकी ने उसे आश्रय दिया था, उसने उसे नृत्य तथा संगीत-कला की शिक्षा दी। इसके बाद चित्रलेखा भी नर्तकी हो गई। रहा भोग-विलास, चित्रलेखा ने एक बार फिर वैधव्य के संयम को पालने का प्रयत्न किया। कृष्णादित्य और कृष्णादित्य का पुत्र दोनों ही चित्रलेखा के जीवन में आकर निकल गए; पर दोनों ही अपनी-अपनी स्मृति उसके हृदय-पटल पर छोड़ गए।
पाटलिपुत्र का जनसमुदाय चित्रलेखा के पैरों पर लोटा करता था; पर चित्रलेखा ने संयम के तेज से जनित क्रांति को बनाए रखा। बड़े-बड़े शक्तिशाली सरदार और लक्षाधीश नवयुवक उसके प्रणय के प्यासे थे; पर उसको कोई भी न पा सका। जनसमुदाय के सामने वह असाधारण सुंदरी आती थी और विद्युत की भांति चमककर वह उनके सामने से लोप हो जाती थी। जिसने उसे एक बार देखा, उसके हृदय में उसे एक बार फिर देखने की अमिट साध उत्पन्न हो गई।

एक दिन बीजगुप्त चित्रलेखा का नृत्य देखने गया। नाचने-नाचते चित्रलेखा की दृष्टि बीजगुप्त पर पड़ी-एकाएक उसका मुख श्वेत हो गया। उसे ऐसा प्रतीत हुआ, मानो कृष्णादित्य स्वर्ग से उतरकर उसका नृत्य देखने आया है। वह रुक गई और एकटक अपने को तथा अपने सामने बैठे हुए जनसमुदाय को भूलकर बीजगुप्त की ओर देखने लगी। बीजगुप्त युवा था, उसकी अवस्था प्राय: पच्चीस वर्ष की थी। चित्रलेखा के सौंदर्य के वंशीभूत होकर वह भी एकटक उसकी ओर देख रहा था। लोगों के मुख से निकल पड़ा-‘‘अरे यह तो बीजगुप्त है।’’
चित्रलेखा ने भी यह सुना, अपनी भूल पर उसे परिताप हुआ; पर उससे अधिक क्रोध। बीजगुप्त की ओर से आँखें फेरकर वह नृत्य करने लगी। नृत्य समाप्त होने के बाद बीजगुप्त चित्रलेखा के सामने गया, उसने कहा-‘‘क्या कभी आपके स्थान पर आपके दर्शन कर सकने का सौभाग्य प्राप्त कर सकूँगा।’’

चित्रलेखा ने बीजगुप्त की ओर देखा, और हंस पड़ी-‘‘नहीं, मैं व्यक्ति से नहीं मिलती। मैं केवल समुदाय के सामने आती हूं, व्यक्ति का मेरे जीवन से कोई संबंध नहीं।’’
बीजगुप्त की आशा का तुषार-पात हुआ, उसका प्रफुल्ल मुख मुरझा गया। फिर भी उसने साहस किया-‘‘व्यक्ति से ही समुदाय बनता है, समुदाय की प्यास उसके प्रत्येक व्यक्ति की प्यास है, फिर यह भेद क्यों ?’’
‘‘भेद जानना चाहोगे तो सुनो। जिसे सब समुदाय का उल्लास कहते हैं, वह समुदाय के व्यक्तियों के रुदन का संग्रह है। निर्बल व्यक्तियों की आहें संगठित होकर समुदाय द्वारा जनित क्रांति का रूप धारण कर सकती है। और साथ ही जहां समुदाय से हानि की कोई संभावना नहीं होती, वहां व्यक्ति का ममत्व-भाव भयोत्पादक केंद्र बन जाता है।’’
बीजगुप्त प्रेम करने गया था, दर्शन पर तर्क करने के लिए नहीं। उसने कहा-‘‘तो फिर यह समझ लूं कि मेरे लिए आपका द्वार बंद है ?’’

बीजगुप्त के मुख पर निराशा की हल्की-सी मुस्कराहट दौड़ गई-‘‘व्यक्तित्व जीवन में प्रधान है और व्यक्ति से ही समुदाय बनता है। जब व्यक्ति वर्जित है, तो उस व्यक्ति को समुदाय का भाग बनना अपना ही अपमान करना है।’’-इतना कहकर तीर की भांति वह वहां से चला गया।
बीजगुप्त चला गया; पर चित्रलेखा के हृदय में वह एक प्रकार की हलचल पैदा कर गया।
दिन-पर-दिन बीतते गये; पर चित्रलेखा ने बीजगुप्त को फिर न देखा। कृत्रिम उपेक्षा धीरे-धीरे दूर होती गई और चित्रलेखा के हृदय में बीजगुप्त की स्मृति प्रबल हो उठी। नित्य ही नृत्य-भवन में बैठे हुए दर्शकों में उसकी आंखें बीजगुप्त को ढूँढ़ती थीं; पर अंत में उन्हें निराश होना पड़ता था।
लाख दबाने की चेष्टा करने पर भी अभिलाषा प्रबल ही होती गई। एक दिन चित्रलेखा ने अपनी दासी से पूछा-‘‘इस नगर में बीजगुप्त नाम का कोई व्यक्ति रहता है ?’’

दासी ने उत्तर दिया-‘‘बीजगुप्त को कौन नहीं जानता ? वह इस नगर का सबसे सुंदर तथा प्रभावशाली युवक-सामंत है।’’
चित्रलेखा ने दासी को एक पत्र दिया और उसे बीजगुप्त को दे देने को कहा।
दासी ने बीजगुप्त को वह पत्र दे दिया। उसमें लिखा था-‘‘चित्रलेखा बहुत सोच-विचार के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि केवल एक व्यक्ति उसके जीवन में आ सकता है। और वह व्यक्ति बीजगुप्त है।’’ पत्र पढ़ते ही बीजगुप्त के सारे शरीर में सुख का हल्का-सा कंपन दौड़ गया। उसी दिन से इन दो प्राणियों का साथ हुआ था; पर फिर चित्रलेखा वेश्या न थी।
बीजगुप्त ने हंसकर कहा-‘मादकता और उन्माद-इन दोनों का सदा साथ रहा है और रहेगा। चित्रलेखा, हम दोनों कितने सुखी हैं। उस समय चित्रलेखा भी हंस रही थी।
इसी समय शहनाई का बजना बंद हो गया, प्रहरी ने उच्च स्वर में कहा-‘‘श्रीमान् ! द्वार पर अतिथि है क्या आज्ञा है ?’’
बीजगुप्त ने आलिंगन-पाश ढीला कर दिया, चित्रलेखा उससे कुछ दूर हटकर बैठ गई। बीजगुप्त ने परिचारिका से कहा-‘‘अतिथियों को यहीं आने दो।’’-इतना कहकर उसने मदिरा का पात्र खाली कर दिया।

अर्धरात्रि के समय कौन-से अतिथि आ सकते हैं, बीजगुप्त इस विषय पर सोच रहा था; उसी समय श्वेतांक के साथ रत्नांबर ने बीजगुप्त के कोलि-गृह में प्रवेश किया। रत्नांबर को देखकर बीजगुप्त ने उठकर अभिवादन किया और चित्रलेखा ने अपना मस्तक नीचा कर लिया।
केलि-गृह को एक बार अच्छी तरह से देखने के बाद रत्नांबर की आंखें चित्रलेखा पर रुक गईं। थोड़ी देर तक रुककर रत्नांबर ने कहा-‘‘नगर की सर्वसुंदरी और पवित्र नर्तकी अर्धरात्रि के समय बीजगुप्त के केलि-गृह में ! आश्चर्य होता है-‘इतना कहकर रत्नांबर आसन पर बैठ गया। श्वेतांक खड़ा ही रहा।

बीजगुप्त ने रत्नांबर से पूछा-‘‘महाप्रभु ने किस कारण दास पर कृपा करने का इस समय कष्ट उठाया ?’’
रत्नांबर हंस पड़े-‘‘बीजगुप्त ! तुमसे सब बातें स्पष्ट रूप से कहूंगा। आज मेरे इस शिष्य ने मुझसे प्रश्न किया कि पाप क्या है ? मैं इसका उत्तर देने में असमर्थ हूं। तुम मेरी सहायता कर सकते हो। तुम मेरे शिष्य रहे हो, मैंने कभी तुमसे कोई गुरु-दक्षिणा नहीं ली। पाप का पता लगाने के लिए ब्रह्मचारी की कुटी उपयुक्त स्थान नहीं है; संसार के भोग-विलास में ही पाप का पता लग सकेगा। तुम्हारा भवन और तुम्हारा समाज-इन चीजों से श्वेतांक को भिज्ञ कराना आवश्यक है इसलिए मैं इसको तुम्हारे सेवक-रूप में उपस्थित कर रहा हूं। मैं चाहता हूं कि तुम इसे सेवक-रूप में स्वीकार करो, पर एक बात याद रखना-यह तुम्हारा गुरु-भाई भी हो सकता है।’’

‘‘महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य है। -बीजगुप्त ने अपना मस्तक नमा दिया।
‘‘अच्छा ! मैं जाता हूं-मेरा एक काम पूरा हो गया। और श्वेतांक, यह याद रखना कि बीजगुप्त तुम्हारे प्रभु हैं और तुम इनके सेवक। इस वैभव को भोगो और फिर पाप का पता लगाने का प्रयत्न करो। अच्छा और बुरा-यह तुम्हारे सामने आयेगा; पर इस कसौटी पर ध्यान रखना कि अच्छी वस्तु वही है जो तुम्हारे वास्ते अच्छी होने के साथ ही दूसरों के वास्ते भी अच्छी हो। और बीजगुप्त ! तुमसे केवल यही कहना है कि श्वेतांक के दोषों को क्षमा करना। यह अभी अबोध है, संसार में यह अभी पदार्पण ही कर रहा है।–इतना कहकर रत्नांबर केलि-भवन से चले गए।

रत्नांबर के जाने के बाद बीजगुप्त ने श्वेतांक को बड़े गौर से देखा-‘‘तुम्हारा नाम श्वेतांक है और तुम आज से मेरे सेवक हुए।’’ इतना कहने के बाद बीजगुप्त के मुख पर हल्की-सी मुस्कराहट दौड़ गई। चित्रलेखा की ओर संकेत करके बीजगुप्त ने कहा-‘‘जानते हो श्वेतांक, यह कौन है ?’’
श्वेतांक की आंखें रात्रि के समय प्रकाश से जगमगाते हुए सुसज्जित केलि-भवन में चित्रलेखा के मादक सौंदर्य को देखकर चकाचौंध हो गई। उसने कहा-‘नहीं।’’

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