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सम्पूर्ण सूरसागर - खण्ड 1

किशोरी लाल गुप्त

34.95

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
आईएसबीएन : 81-8031-037-x पृष्ठ :621
मुखपृष्ठ : सजिल्द पुस्तक क्रमांक : 2410
 

इस खण्ड में विनय के पद, गोकुल लीला एवं वृंदावन लीला के कुल 1100 पद हैं

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Sampoorn Soorsagar Lokbharti Tika

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

श्रावण शुक्ल सप्तमी सं० 2041 वि० (अगस्त 1984 ई०) को प्रयाग हिंदी साहित्य सम्मेलन में तुलसी-जयंती की अध्यक्षता करने के लिए पधारे गुरुवर आचार्य प० सीताराम चतुर्वदी ने कहा कि तुम हिंदी कविता का इतिहास लिख रहे हो, जब सूर पर लिखने लगो, तब साहित्य लहरी पर रीतिग्रंथ की दृष्टि से सम्यक् विचार कर लेना।

अक्टूबर 1984 में मैंने साहित्य लहरी और नवंबर 1984 में सूर सारावली का पूर्ण अध्ययन किया और मैं भी डा० ब्रजेश्वर वर्मा के चालीस वर्ष पूर्व निकाले गए इस निष्कर्ष से पूर्णतः सहमत हो गया कि ये दोनों ग्रंथ अष्टछापी महाकवि सूर की रचनाएँ नहीं है। मेरे कारण दूसरे थे और एकदम नए थे। मैंने यह भी निष्कर्ष निकाला कि ये दोनों रचनाएँ अकबरी दरबार के गायन रामदास ग्वालिनी के पुत्र सूरदास (नवीन) की रचनाएं हैं। यह सूरदास नवीन भी अकबरी दरबार के गायन थे। ये लोग ग्वालियर के रहनेवाले थे और प्रसिद्ध कवि चंदवरदाई के वंशज ब्रह्मभट्ट थे। सूर नवीन गो० गोकुलनाथ’ वल्लभ’ के शिष्य स० 1667 में हुए थे और इन्होंने सं० 1677 में साहित्य लहरी की रचना की थी।

दिसंबर 84 में मैं अपने द्वितीय पुत्र रवीन्द्र गुप्त के यहाँ मोठ (झाँसी) चला गया। वहाँ से 16 दिसंबर 84 को उरई आया और उरई के हिंदी सेवियों की सभा में मैंने सूर पर अपने विचार प्रकट करते हुए इस नवीन सामग्री का प्राकट्य अपरजनों पर पहली बार किया। यहीं मेरे मन में दो सूरसागरों की बात भी कौंध गई, यद्यपि इसका प्रकाशन मैंने वहाँ नहीं किया। इसकी घोषणा मैंने साकेत महाविद्यालय में संपन्न आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जन्मशती महोत्सव के अवसर पर जनवरी 1984 में वहाँ समवेत अपने साहित्यकार  मित्रों एवं विद्वानों से की।

मैं जनवरी 1985 में ही कल्पवास करते समय प्रयाग के माघ मेले में दोनों सूरसागरों के विश्लेषण में जुट गया। कार्य मार्च 85 में प्रायः उसी समय संपूर्ण हो गया था, तब से अब उसी रूप में पड़ा रह गया था।

इसी बीच सूर और सूर नवीन संबंधी मेरी समस्त शोध’ महाकवि सूर और सूर नवीन’ नाम के हिंदुस्तानी अकेडमी इलाहाबाद द्वारा जून 1991 में प्रकाशित हो गई।

गत 4 जनवरी  1992 को प्रयाग में एक प्रकाशक ने अष्टछापी सूर कृत सूरसागर के प्रकाशन पर विचार करने की बात की, तब मैं इस समस्त सामग्री को पूर्णता प्रदान करने में लग गया। पहले मेरा विचार था कि इस सूरदास की प्रामाणिकता प्रदान करने के लिए दशम स्कंध पूर्वार्द्ध वाले सूरसागर एक दो प्राचीन हस्तलेखों का भी उपयोग करूँगा ऐसे हस्तलेख हैं। पर मेरे लिए दुर्लभ हैं और शरीर निःशक्त भी होता जा रहा है, अतः पूर्ण संकलित संपादित सामग्री को ही पूर्णता प्रदान कर संतोष ग्रहण कर रहा हूं और आशा करता हूँ कि भविष्य में सूर का कोई सुधी अध्येता इस कार्य को सम्पन्न करेगा।


सुधवै, भदोही
मकर संक्रान्ति सं० 2048
15 जनवरी, 1992


किशोरी लाल गुप्त
एम.ए. पी.एच.डी., डी.लिट्.
साहित्य वाचस्पति


पुनश्च



प्रयाग से प्रकाशन तो नहीं हो सका, पर इधर 18 फरवरी 1996 को काशी में हिंदी प्रचारक अधिष्ठान के स्वामी श्री कृष्णचंद्र बेरी से दोनों सूरसागरों के संबंध में मेरी बातचीत हुई। बेरी जी इधर कई वर्षों से सुप्रसिद्ध साहित्यकारों की सस्ती ग्रन्थवालियाँ निकालने में दत्तचित्त हैं। उन्होंने इस ग्रंथावली योजना में दोनों सूरसागरों को निकालने को पुण्य कार्य समझा और मैंने इनके हस्तलेखों का पुनरालोकन प्रारम्भ कर दिया।

मैंने सूरसागरों के विश्लेषण का कार्य जनवरी 1984 में किया था। तब मेरे सामने दो ही सूरसागर थे- नागरी प्रचारिणी सभा और पंडित सीताराम चतुर्वेदी वाले। अब मेरे सामने लखनऊ एवं बंबई के भी सूरसागर हैं। मैंने इन दोनों का इस पुनरावलोकन के समय उपयोग कर लिया है लिया और इसके बहुत परिणाम निकले हैं।


सुधवै, भदोही
चैत्र नवरात्र प्रतिपदा सं० 2043
20 मार्च, 1996


किशोरी लाल गुप्त
एम.ए. पी-एच.डी., डी. लिट्.
साहित्य वाचस्पति


एक और पुनश्च


10 अप्रैल 2002 को बेरी जी ने मेरी पांडुलिपियाँ लौटा दीं। 6 अगस्त 2002 को प्रकाशन की व्यावस्था लोकभारती के श्री दिनेश ग्रोवर जीने लेकर मुझे संकट मुक्त कर दिया। माध्यम बने डॉ. बदरीनाथ कपूर, काशी। काशी के ही श्री नन्दलाल सिंह एवं उनके पुत्र श्री अनिल कुमार सिंह ने मुद्रण में त्वरा दिखाई। एतदर्थ मैं इन चारों महानुभावों का आभारी हूँ।

सुधैव, भदोही
1 अगस्त, 2003


किशोरी लाल गुप्त


सूर सारस्वत



उक्ति चोज अनुप्रास, बरन अस्थिति अति भारी
वचन प्रीति निर्वाह, अर्थ अद्भुत तुकधारी
प्रतिबिंबित बिबि दृष्टि, हृदय हरि लीला भासी
जनम करम गुन रूप, अर्थ सरना परकासी
विमल बुद्धि गुन और की, जो यह सुन श्रवननि करै
सूर-कबित सुनि कौन कबि, जो नहीं सिर चालन करैं


-नाभादास, भत्तमाल 73

 

भूमिका


1. अष्टछापी सूरदास


सूरदास सारस्वत ब्राह्मण थे। इनका जन्मस्थल सीही है, जो दिल्ली से प्रायः 12 किलोमीटर दूर हरियाणा राज्य में है। यहाँ जनमेजय ने नाग यज्ञ किया था। प्राणनाथ कवि ने अपने अष्ट सखामृत में इनके जन्मस्थान और जाति का उल्लेख किया है।


श्री वल्लभ प्रभु लाडिले, सीही-सर जलजात
सारसुती-दुज-तरु-सुफल सूर भागत विख्यात


इनके माता-पिता का नाम अज्ञान है। यह जन्मांध थे। इनका जन्म इनके गुरु महाप्रभु वल्लभाचार्य के जन्म दिन से 10 दिन बाद था। सूर जन्म तिथि स० 1535 वैशाख सुदी 5 है।


प्रगटे भक्त सिरोमनि राय
माधव शुक्ल पंचमी ऊपर, छट्ठ अधिक सुख पाय
संवत पंद्रहा पैंतिस वर्षे, कृष्ण-सखा प्रगटाय
‘रसिकदास’ मन आस पूरण ह्वै, सूरदास भुव आय।

सूर के बाप निर्धन थे। परिवार का पोषण उनके लिए कष्टकर था। सूर छह वर्ष की ही वय में घर छोड़कर सीही से चार कोस दूर अन्य गाँव में चले गए। यह अच्छे शकुन-विचारी थे। अपनी इसी दैव-दत्त प्रतिभा के बल पर यह वहाँ के जमींदार के कृपा-पात्र हो गए और उसी की छत्र-छाया में शकुन-विचार के बल पर अपने दिन बिताने लगे। यहाँ रहते-रहते उन्हें 12 वर्ष बीत गए और 18 वर्ष की वय में इनके मन में उच्चाटन हुआ। अपना सब कुछ माता-पिता को बुलाकर दे दिया और नए स्थान की खोज में चल पड़े। अब तक यह ‘सूर स्वामी’ हो गए थे। पद बनाने लगे थे और गाने-बजाने कथा-कीर्तन करने लगे थे।

सूर मथुरा में मिश्रांत घाट पर आए। कुछ दिनों वह वहाँ रहे भी। पर नगर की भीड़-भाड़ से शीघ्र ही ऊब गए और आगरा मथुरा के बीच रुनकता में यमुना के तट पर स्थिति गऊघाट पर कुटी बनाकर रहने लगे। इस रेणुका-क्षेत्र में यह 32 वर्ष की वय तक रहे।

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