प्रसाद के सम्पूर्ण नाटक एवं एकांकी - जयशंकर प्रसाद Prasad Ke Sampurna Natak Evam Ekanki - Hindi book by - Jaishankar Prasad
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प्रसाद के सम्पूर्ण नाटक एवं एकांकी

जयशंकर प्रसाद

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :792
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2296
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है प्रसाद जी के सम्पूर्ण नाटक एवं एकांकी.....

prasad ke sampoorn natak evam ekanki- A Hindi Book of Plays by Jaishankar Prasad - A famous Hindi author

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

नाटककार जयशंकर प्रसाद

हिन्दी नाटक-साहित्य में प्रसाद जी का एक विशिष्ट स्थान है। इतिहास, पुराण-कथा और अर्द्धमिथकीय वस्तु के भीतर से प्रसाद ने राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल को पहली बार अपने नाटकों के माध्यम से उठाया। दरअसल उनके नाटक अतीत कथाचित्रों के द्वारा तत्कालीन राष्टीय संकट को पहचानने और सुलझाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ‘चन्द्रगुप्त’ ‘स्कन्दगुप्त’ और ‘ध्रुवस्वामिनी’ का सत्ता-सघंर्ष राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न से जुड़ा हुआ है।

प्रसाद ने अपने नाटकों की रचना द्वारा भारतेन्दुकालीन रंगमंच से बेहतर और संश्लिष्ट रंगमंच की माँग उठायी। उन्होंने नाटकों की अन्तर्वस्तु के महत्त्व को रेखांकित करते हुए रंगमंच को लिखित नाटक का अनुवर्ती बताया। इस तरह नाटक के पाठ्य होने के महत्त्व को उन्होंने नजरअन्दाज नहीं किया। नाट्य रचना और रंगकर्म के परस्पर सम्बन्ध के बारे में उनका यह निजी दृष्टिकोण काफी महत्त्वपूर्ण और मौलिक है।

प्रसाद जी के नाटक निश्चय ही एक नयी नाट्य भाषा के आलोक से चमचमाते हुए दिखते हैं। अभिनय, हरकत और एक गहरी काव्यमयता से परिपूर्ण रोमांसल भाषा प्रसाद की नाट्य-भाषा की विशेषताएँ हैं। इसी नाट्य-भाषा के माध्यम से प्रसाद अपने नाटकों में राष्ट्रीय चिन्ता के संग प्रेम के कोमल संस्पर्श का कारुणिक संस्कार देते हैं।

प्राक्कथन


1907 ईं. से लेकर 1933 ईं की जिस अवधि में जयशंकर प्रसाद के नाटक लिखे गये हैं वह भारतीय इतिहास का सबसे अधिक उधेड़बुन का समय है। उस युग को विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस, सिस्टर निवेदिता, अरविन्द, दयानन्द सरस्वती, महात्मा गाँधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, तिलक, महात्मा फुले, मदनमोहन मालवीय आदि इस रूप में परिभाषित कर रहे थे कि हर क्रिया, निश्चय, आन्दोलन, सत्याग्रह, सिविल नाफरमनी, स्वदेशी आन्दोलन आदि एक तरफ और स्वाधीनता, स्वतन्त्रता, स्वराज्य, पराधीनता, आत्मगौरव, और स्वदेश प्रेम आदि अवधारणाएँ दूसरी तरफ साथ ही साथ आधायत्मिक, राजनैतिक नैतिक और काल्पनिक अर्थ देती थीं न केवल अर्थ की दृष्टि से बल्कि स्वरूप की दृष्टि से भी। साही ने लिखा है कि ‘छायावाद की हर रचना एक ही साथ नैतिक भी है और कल्पनात्मक भी और राजनैतिक भी।’ (छठवाँ दशक-275) साहित्य में भारतेन्दु हरिशचन्द्र और अध्यात्म में विवेकानन्द का एक स्वर से आर्य साम्राज्य की एकता और आर्य संस्कृति को नष्ट होने से बचाने का, उसके विभिन्न गणों समाजों और जातीयताओं को एक सूत्र में पिरोने का विवेकावादी और आनन्दवादी दोनों प्रयत्न चल रहा था। प्रसाद के नाटकों में ‘प्रायश्चित’ से यह चेतना जिस मुखर रूप में हो आती है उसकी युगभूमि के लिए दो सन्दर्भ पर्याप्त होंगे।

‘‘अब महाघोर काल उपस्थित है। चारों ओर आग लगी हुई है। दरिद्रता के मारे देश जला जाता है। अंगरेजों से जो नौकरी बच जाती है उन पर मुसलमान आदि विधर्मी भरती होते जाते हैं। आमदनी वाणिज्य की थी ही नहीं, केवल नौकरी की थी सो भी धीरे-धीरे खिसकी। तो अब कैसे काम चलेगा। कदाचित ब्राह्मण और गोसाई लोग कहैं कि हमको तो मुफ्त का मिलता है, हमको क्या ? इस पर हम कहते हैं कि विशेष उन्हीं का रोना है। जो कराल काल चला आता है उसको आँख खोलकर देखो। कुछ दिन पीछे आप लोगों के मानने वाले बहुत थोड़े ही रहेंगें। अब-सब लोग एकत्र हो। हिन्दू नाम धारी वेद से लेकर तन्त्र वरंच भाषा ग्रन्थ मानने वाले तक सब एक होकर अब अपना परम धर्म यह रखो कि आर्य जाति में एका हो। इसी में धर्म की रक्षा है। भीतर तुम्हारे चाहे जो भाव और जैसी उपासना हो ऊपर से सब आर्य मात्र एक रहो। धर्म सम्बन्धी उपाधियों को छोड़कर प्रमुख धर्म की उन्नति करो।’’
(भारतेन्दु समग्र 976)।—भारतेन्दु

‘‘भारतवर्ष में हमारे दो बड़े विघ्न हैं-एक है पुरानी धार्मिक कट्टरता और दूसरा है वर्तमान योरोपीय सभ्यता’’-विवेकानन्द।
जयशंकर प्रसाद के लिखना शुरू करने के पहले ही गाँधी की हिन्द स्वराज्य की अवधारणा अवतार ले चुकी थी और सिस्टर निवेदिता तथा अरविन्द आदि स्वाधीनता तथा स्वराज्य पर मार्डनरिव्यू नारायण आदि पत्रिकाओं में लेख लिख रहे थे। छायावाद की मनोभूमि की बनावट के तत्वों का रेखांकन करते हुए विजय देव नारायण साही ने, इसीलिए दार्शनिक मुद्रा, विराट नाटकीयता तथा नैतिक और कल्पनात्मक स्वप्न लोकों का विशिष्ट अनुपात में सम्मिश्रण और भाषा समस्या जो संस्कृत शब्दावली के माध्यम से मनोभूमि को क्लैसिकल और एब्स्ट्रैक्ट बनाने का कार्य करती रही है का उल्लेख किया है।

 इस मनोभूमि के निर्माण में श्रीधर पाठक, माधव शुक्ल, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, हितैषी, रामनरेश त्रिपाठी, माखन लाल चतुर्वेदी, गयाप्रसाद शुक्ल सनेही, रूप नारायण पाण्डेय और मैथिलीशरण गुप्त की कृतियों की भी मूमिका रही है। इस युग की रचनाओं में ‘लोकसेवा’, ‘लोकधर्म’, ‘लोकमर्यादा’, ‘लोक हृदय की पहचान’, ‘लोकमंगल’, ‘लोकाग्नि’, ‘लोकनीति’, ‘लोककल्याण’, ‘लोकवाद’ शब्द कैनन की तरह प्रयुक्त मिलते हैं। देश की मिट्टी पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े वनस्पतियाँ, नदी नाले, पर्वल-समुद्र, फल-फूल, स्त्री-पुरुष सबको खड़ी बोली पद्य के प्रारम्भिक संघर्षकालीन दौर में सर्जनात्मकता का विषय बनाकर लेखकों और रचनाकारों ने ‘देश वत्सलता’ और स्वदेशानुराग का आकर्षक व्यवस्थित ढाँचा खड़ा कर दिया था। छायावाद ने इस ढाँचे में मनुष्यता का रंग भर सबको मानव बना दिया-मानवीकृत कर दिया। भक्ति काल में जैसे सब कुछ राधाकृष्णमय हो गया था वैसे ही, प्रसाद के समय में सब कुछ मानवमय, और चिन्मय हो गया। कार्नेलिया का ‘कल्याणी’ में पेड़-पौधों को याद करना भारतवासियों को धिक्कारना और प्रेरित करना दोनों है।

प्रसाद जी के समय में ‘भारतेन्दु द्वारा विकसित हिन्दी रंगमंच की स्वतन्त्र चेतना’ क्रमशः क्षीण हो चुकी थी माधवशुक्ल जैसे लोग नाटय समितियों और राम लीला मंडलियों को जीवित किए हुए थे परन्तु वह भी प्रयाग और कलकत्ता में ही। उनके समय में जैसा कि प्रसादजी ने लिखा है कि तीस बरस पहले (संभवत) 1906 ई. में। जब काशी में पारसी रंगमंच की प्रबलता थी तब भी मैंने किसी दक्षिणी नाटक मंडली द्वारा संस्कृत मृच्छकटिक का अभिनय देखा था उसकी भारतीय विशेषता अभी मुझे भूली नहीं है’’ (दे. रंगमंच)। रामलीला, रासलीला, यात्रा, भाँड़ की परिहास लीला, नौटंकी, कथकली आदि भाव मुद्राओं वाले नृत्यों आदि ने उत्तर भारत में अभिनयात्मक ह्रास के युग में चलते-फिरते रंगमंचों और विमानों की रक्षा की यह भी उनका मानना है, जो पारसी थियेटर से भिन्न परम्परा की लोक स्वीकृति का भी प्रमाण है। प्रसाद जी ने यह भी लिखा है कि पारसी व्यवसायियों ने पहले-पहल नये रंगमंच की आयोजना की। भाषा मिश्रित थी—इन्द्र सभा, चित्र बकावली, चन्द्रवली हरिशचन्द्र आदि के अभिनय होते थे, अनुकरण होता था रंगमंच में शेक्सपीरियन स्टेज’ का’’ (दे. प्रसाद वाङ्मय भाग 4 रंगमंच)। पारसी थियेटर के द्वारा एक प्रकार की विकृत रुचि और भोंडेपन का प्रचार किया जा रहा था।

 उसमें परिवर्तन करके भिन्न-भिन्न रुचि वाले लोगों के लिए सभी कलाओं के योग से अभिनीत नाटक ही एक विद्या या माध्यम से रूप में उन्हें स्वीकार था। उपदेश और मनोरंजन से भी वे उसे बचाना चाहते थे। वे यथार्थवाद के इब्सनीय रूप से परिचित थे और उसके आधार पर भाषा तथा सामाजिक चेतना के छिन्न-भिन्न होकर बिखरने के कारण वेदना की वृत्ति की प्रस्तुति को पश्चिम की नकल से विकसित यथार्थ के कारण आवश्यक नहीं मानते थे। उनको विश्वास था कि अतीत और वर्तमान के आधार पर ही भविष्य का निर्माण सम्भव है। उन्होंने लिखा कि कुछ लोग कहते हैं साहित्यकार को आदर्शवादी होना ही चाहिए और सिद्धांत से ही आदर्शवादी धार्मिक प्रवचनकर्ता बन जाता है। वह समाज को कैसा होना चाहिए, यही आदेश करता है। और यथार्थवादी सिद्धांत से ही इतिहासकार से अधिक कुछ नहीं ठहरता क्योंकि यथार्थवाद इतिहास की संपत्ति है। वह चित्रित करता है कि समाज कैसा है या था किंतु साहित्यकार न तो इतिहास कर्ता है और न धर्मशास्त्र प्रणेता। इन दोनों के कर्त्तव्य स्वतंत्र हैं। साहित्य इन दोनों की कमी को पूरा करने का काम करता है-‘‘उनके अनुसार साहित्य समय की वास्तविक स्थिति क्या है, इसको दिखाते हुए भी उसमें आदर्शवाद का सामंजस्य स्थिर करता है। दुःख दग्ध जगत और आनंदपूर्ण स्वर्ग का एकीकरण साहित्य है; इसीलिए असत्य अघटित घटना पर कल्पना को वाणी महत्त्वपूर्ण स्थान देती है, जो निजी सौन्दर्य के कारण सत्य पथ पर प्रतिष्ठित होती है उसमें विश्वमंगल की भावना ओतप्रोत रहती है। (प्रसाद वाङ्मय भाग 4)।

इन उद्धरणों में व्याप्त विश्वदृष्टि या दार्शनिक मुद्रा तथा नैतिक और कल्पनात्मक विजन का समन्वय उनकी समस्त रचनाओं में अन्त प्रवाहित रक्त की तरह है। पौरुष, आनन्द उल्लास और श्रेयमयी प्रेय दृष्टि उनके नाटकों में स्वतंत्रता की कामना के साथ ही अनुस्यूत है। उनके निबन्ध एक प्रकार से उनकी सर्जनात्मकता के व्याख्यान हैं। लगता है जैसे वे उनके नाटकों, काव्य ग्रंथों और उपन्यास, कहानियों में व्याप्त आत्मा की संकल्पनात्मकता को आलोचना की भाषा में रूपान्तरित करते हैं। उनके अन्तिम अधूरे नाटक अग्निमित्र और अधूरे उपन्यास इरावती में उनके निबंध ‘रहस्यवाद’, ‘यथार्थवाद’ और ‘छायावाद’, काव्य और कला, और ‘रंगमंच’ की अनेक स्थापनाओं को अग्रगामिता प्रदान हुई है। जीवन का विकास इस दुःख पूर्ण बुद्धिवाद के बन्दोगृह में अवरुद्ध है। उसे आनंद पथ पर ले चलने की क्षमता तुममें अन्तर्निहित है। दुःखवाद की निद्रा छोड़कर आनन्द की जागृति के लिए मानवता चंचल हो रही है। यह सब उसी के क्षुद्र उपसर्ग हैं, तुम मंगलपूर्ण सृष्टि स्थिति संहार तिरोभाव और अनुग्रह के पंच कृत्य करने में कुशल चिदानंदमयी आत्मसत्ता में विश्वास करो।’’ (प्रसाद वाङ्मय भाग 4, पृ. 790)

अपने समय की दुःखदग्घता के नरक की पहचान करके उस जगत को श्रद्धा सर्ग की कल्पना में रुपान्तरित करने की संकल्पनत्मक अनुभूति की ‘राज्यश्री’ के ‘लोकसेवा’ व्रत या कामायनी के आनन्दसर्ग की समरस स्थिति में, एक स्मितरेखा आलोक मयी मूर्ति की तरह व्याप्त है। अभिनय, सूत्रधार, नियतिनटी, रंगमंच आदि शब्द प्रसाद के जीवन दर्शन के बीज शब्द है जो नाटक को ‘लीला’ का अर्थ देकर रचनाओं का आत्मसाक्षात्कार या आत्मोपलब्धि का पर्याय भी बना देते हैं। दूसरी ओर महाशक्ति के माध्यम से आनन्द की प्रतीति के लिए ‘नाटक’ लिखना और सृष्टि के विधान या क्रम को एक नाटक के रूप में देखना, एक से अपने समय की पराधीनता से मुक्ति का उपाय खोजना, स्वतंत्रता प्राप्त करना और दूसरे से स्व-तंत्रता प्राप्त करना, एक से स्वराज्य और दूसरे से स्व-राज्य में विचरने का संकल्प कितना महत्त्वपूर्ण और कितना परस्पर विरुद्ध दिखता है। काल और कालातीत की एक साथ उपलब्धि ऋजुरेखीय काल के स्वीकार के साथ ही काल के अतिक्रमण की इच्छा और अन्ततः कामना, स्कंदगुप्त, चन्द्रगुप्त, एक घूँट, विशाख आदि में उस अतिक्रमण का प्रसादान्त सकेत प्रसाद से नाटकों को इतिहास और समकालीन अतीत और वर्तमान दोनों बना देते हैं। एक ही साथ इतिहास और नाटक का रचनात्मक निर्वाह भी अन्ततः एक प्रकार के विरुद्धों का सामंजस्य है।

अतीत प्रसाद के लिए प्रदत्त या पुरातत्व की दृष्टि से खोदकर निकाला गया मात्र ही नहीं है वह साम्राज्यवाद के दौर में हत दर्प जाति के लिए सांस्कृतिक स्तर पर उत्तेजना और प्रेरणा का भी विषय है। प्रसाद के नाटकों में ‘भारत-भारती’ का आभ्यंतरित रूप ही नहीं मिलता है, वर्तमान राष्ट्रीय शक्ति का एक हद तक मानवीय समस्याओं के संघर्ष में परम्परा की खोज मिलती है। शक्ति के विद्युत्कणों की तलाश और समन्वय की समकालीन दृष्टि का अतीत में प्रेक्षपण ही स्कंदगुप्त, सिंहरण, अलका, देवसेवा, कार्नेलिया, मन्दाकिनी, चाणक्य, चन्द्रगुप्त, हर्ष, ध्रु वस्वामिनी आदि चरित्रों की सृष्टि करवाता है। सृष्टि इसलिए कि इतिहास के अन्तर्गत ये रहे होंगे।

लेकिन इस रूप में ये इन नाटकों की नैतिकता पर चढ़े हुए अग्निवाण ही हैं, जिसे प्रसाद ने निर्मित किया है-विशेष संकेत के रूप में। इतिहास सन्दर्भ और सामग्री दोनों हैं। वह उपादान है निमित्त नहीं, निमित्त तो मूलतः तत्कालीन स्वाधीनता की आकांक्षा और आत्म गौरव की प्राप्ति है। अजातशत्रु के कथा प्रसंग और ‘कामायनी’ के आमुख में प्रसाद ने अपनी इतिहास दृष्टि का संकेत किया है। वे इतिहास को इतिहास सृष्टि के लिए प्रयोग करना चाहते हैं और नाटकों में समन्वित इच्छा शक्ति का, आत्माओं की संकल्पनात्मक अनुभूति का, विश्वात्मा की इच्छा का अनेक स्तरों पर पाठक और श्रोता के सामने घटित को घटमान के रूप में प्रयुक्त करते हैं। इतिहास की यह द्वन्द्वात्मक चेतना हेगेल के डायलेक्टिक और शैवागमदर्शन के द्वन्द्व से मिलकर बनी है। इसके मूल में काल की चक्रीय या सनातन दृष्टि भी है परन्तु वह सनातनता कर्म की साधना कानिषेध नहीं करती है बल्कि संकल्पात्मक बनाती है। द्वन्द्वात्मकता के कोष में संकल्पात्कता का यह वैचारिक बीजारोपण प्रसाद के लिए ही संभव था। अजातशत्रु के कथाप्रसंग का यह उद्धरण ‘कामायानी’ के ‘आमुख’ के साथ मिलाकर देखने पर ऐतिहासिक नाटकों की अर्थगर्भ संकेतात्मकता और इतिहास दृष्टि या कालचेतना के लिए काफी संकेतात्मक है।

‘‘इतिहास में घटनाओं की प्रायः पुनरावृत्ति होते देखी जाती हैं इसका तात्पर्य यह नहीं कि इसमें कोई नयी घटना होती ही नहीं किन्तु असाधारण नयी घटना भी भविष्यत में फिर होने की आशा रखती है। मानव समाज की कल्पना का भंडार अक्षय है क्योंकि वह इच्छा शक्ति का विकास है। इन कल्पनाओं और इच्छाओं का मूल सूत्र बहुत ही सूक्ष्म और अपरिस्फुट होता है। जब वह इच्छा शक्ति किसी व्यक्ति या जाति में केन्द्रीभूत होकर अपना सफल या विकसित रूप धारण करती है तभी इतिहास की सृष्टि होती है। विश्व में जब तक कल्पना इयत्ता को नहीं प्राप्त होती तब तक वह रूप परिवर्तन करती हुई, पुनरावृत्ति करती ही जाती है। समाज की अभिलाषा अनंत स्रोतवाली है। पूर्व कल्पना के पूर्ण होते होते एक नयी कल्पना उसका विरोध करने लगती है और पूर्व कल्पना कुछ काल तक ठहर कर फिर होने के लिये अपना क्षेत्र प्रस्तुत करती है उधर इतिहास का नवीन अध्याय खुलने लगता है। मानव समाज के इतिहास का इसी प्रकार संकलन होता है।’’ अजातशत्रु कथा प्रसंग

‘‘आज के मनुष्य के समीप तो उसकी वर्तमान संस्कृति का क्रमपूर्ण इतिहास ही होता है; परन्तु उसके इतिहास की सीमा जहाँ से प्रारम्भ होती है ठीक उसी के पहिले सामूहिक चेतना की दृढ़ और गहरे रंगों की रेखाओं से, बीती हुई और भी पहले की बातों का उल्लेख स्मृति पट पर अमिट रहता है; परन्तु कुछ अतिरंजित सा। वे घटनाएँ आज विचित्रता से पूर्ण जान पड़ती हैं संभवतः इसीलिए हमको अपनी प्राचीन श्रुतियों का निरुक्त के द्वारा अर्थ करना पड़ता है जिससे कि उन अर्थों का अपनी वर्तमान रुचि से सामंजस्य किया जाय’’ आज हम सत्य का अर्थ घटना कर लेते हैं। तब भी उसके तिथि क्रम मात्र के सन्तुष्ट न होकर मनोवैज्ञानिक अन्वेषण के द्वारा इतिहास की घटना के भीतर कुछ देखना चाहते हैं। उसके मूल में क्या रहस्य है ? आत्मा की अनुभूति ! हाँ उसी भाव के रूपग्रहण की चेष्टा सत्य या घटना बन कर प्रत्यक्ष होती है। फिर वे सत्य घटनाएँ स्थूल और क्षणिक होकर मिथ्या और अभाव में परिणति हो जाती हैं। किन्तु सूक्ष्म अनुभूति या भाव, चिरंतन सत्य के रूप में प्रतिष्ठित रहता है, जिसके द्वारा युग युग के पुरुषों की और पुरुषार्थों की अभिव्यक्ति होती रहती है।’’ कामायनी—आमुख।

प्रसाद के इतिहास की यह समकालीनता एक प्रकार का सनातनत्व भी लिये है। पुराणों से ली गई कथाओं के भाव के रूप ग्रहण की चेष्टा, जो शुद्ध वर्तमान में होती है सत्य के रूप ग्रहण करने के क्रम में रूपक का अर्थ ले लेती है। ‘जनमेजय के नागयज्ञ’ में जिसे मैं नाटकीयता की दृष्टि से काफी अर्थगर्भ और महत्त्वपूर्ण नाटक मानता हूँ, में यह रूपकत्व देवासुर संग्राम के अन्तनिर्हित रूपकत्व जैसा ही अर्थवान है। यह रूपकत्व उनके सभी नाटकों के इतिहास की घटना के अर्थ को वर्तमान में अन्तरित करने या संकेतिक करने के कारण विद्यमान है वैसे रूपक तो यह है ही।

प्रसाद इतिहास और वर्तमान का प्रयोग ‘प्रितच्छाया’ (दे. जायसी-साही) अलंकार की तरह करते हैं। जैसे अपने सामने रखे हुए दो दर्पण हों लगभग। जायसी के पद्मावत की तरह, जिसका प्रसाद बहुत सम्मान के साथ गाला के प्रसंग में उल्लेख करते हैं और यह प्रसाद की इतिहास दृष्टि को विशेषकर ऐतिहासिक नाटकों के लोक और अलोक, इतिहास और स्वप्नलोक के समान ही रचते हैं। अलाउद्दीन के द्वारा राख के हाथ में उठाने का उल्लेख वे ‘संकेत’ के रूप में करते हैं।

जयशंकर प्रसाद की इस गहरी चिन्तनशीला ने हिन्दी नाटकों को पहली बार बौद्धिक, अर्थवत्ता प्रदान की। उनके नाटकों की भूमिकाएँ जहाँ एक ओर उनकी अनुसंधान परक तथ्यान्वेषी दृष्टि का संकेत करती हैं वहीं इतिहास को एक अंगरखा भी संधान परक तथ्यान्वेषों दृष्टि का संकेत करती हैं वहीं इतिहास को एक अंगरखा भी पहनाती है। यद्यपि जयशंकर प्रसाद जी ने स्कंदगुप्त की भूमिका में लिखा है कि ‘‘पात्रों की ऐतिहासिकता के विरुद्ध चरित्र की सृष्टि, जहाँ तक सम्भव हो सका। नहीं होने दी गई है। फिर भी कल्पना का अवलम्ब लेना ही पड़ा है केवल घटना की परम्परा ठीक करने के लिए।’’ उन्होंने भूमिकाओं में अनेक स्रोतों के द्वारा अपने समकालीन सामाजिक राजनैतिक यथार्थ का समरूपी खोजने का संभव प्रयत्न किया। पराधीनता और पराधीनता से मुक्ति के ही समरूपी न केवल अतीत में खोजे गए बल्कि सांस्कृतिक पराधीनता के अनेक कारणों के भी समरूपी और समस्थानिकों की पहचान करके उन्हें वर्तमान के लिये, आँखें खोलने वाले, ‘शक्ति संचारक के रूप में प्रस्तुत किया गया। चन्द्रगुप्त की भूमिका, जो चन्द्रगुप्त नाटक की तरह, जैसा की प्रो.रामस्वरूप चतुर्वेदी ने उल्लेख किया है कई बार लिखी गयी है, इस संदर्भ में अधिक महत्त्वपूर्ण है। प्रायश्चित, विशाख, जनमेजय का नागयज्ञ, आदि नाटकों के परिचय और प्राक्कथनों का इस दृष्टि से भी विशेष महत्त्व है। धार्मिक मतवाद, जाति उपजातियों के झगड़े, सांप्रदायिक समस्यायें, धर्मोन्माद, देश के छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजन की प्रवृत्तियों के बहुपक्षीय समाधान नाटकों में खोजने का प्रयत्न उनकी विशेषता है।

अपने समय को परिभाषित करने के क्रम में अपने अतीत के प्राणतत्त्व को आत्मसात करते चलना उनका स्वभाव था। विचार, भाषा, शिल्प, यथार्थवाद को आत्मसात करते चलना उनका मानवीय चेतना, दार्शनिकता, रंगमंचीयता आदि की दृष्टि से वे सतत जागरूक रचनाकार हैं। उर्वशी चम्पू से लेकर ध्रु स्वामिनी तक की यात्रा नाटक की दृष्टि से अनवरत विकास और सतत जागरूकता की यात्रा है। 1909 ई. में प्रकाशित उर्वशी चम्पू को उन्होंने ‘बाल्य रचना’ मानते हुए पद्य के ब्रज भाषा में होने पर प्रकारान्तर से एक हिचक और कमी का अनुभव किया है। रचना में भी प्रेमतत्त्व का सम्प्रेषण है। कुछ कल्पित प्रसंगों के अलावा चम्पू में वैचारिकता और समकालीनता का अभाव है नाटकीयता के तत्त्व भी कम हैं। सज्जन पाँच दृश्यों का नाट्य प्रयत्न है जिसमें संस्कृत और पारसी थियेटर की नाट्य रूढ़ियों का प्रयोग किया गया है।

प्रारम्भ नान्दा पाठ नट का प्रयोग, भरत वाक्य और पारसी थियेटर की तरह से गानेवालियों का प्रथम दृश्य में उपयोग तथा गीतों का संगीतात्मक प्रयोग मिलता है। पंचम दृश्य में द्रोपदी युधिष्ठिर के काव्यात्मक संवाद केशव की याद दिलाते हैं, नाटक के प्रारम्भ और अन्त दोनों में सत्कविता और सज्जनता के सम्बन्धों को रेखांकित किया गया है। युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा और सज्जनता को एक मूल्य के रूप में प्रस्तुत करना लेखक का लक्ष्य रहा है। ‘कल्याणी परिणय’ 1912 ई. में नागरी प्रचारिणी पत्रिका में प्रकाशित हुआ था बाद में 1931 में कुछ संशोधनों के साथ चन्द्रगुप्त में समायोजित कर लिया गया। इस नाटक में पहली बार पहले दृश्य में ही चाणक्य अन्धकार हट रहा जगत जागृत हुआ’ के द्वारा प्रकृति और जागरण दोनों का संकेत किया गया है। गीत साभिप्राय प्रयुक्त है। चाणक्य का स्मरण भी भारत के गौरवमय अतीत का स्मरण है जिसमें क्या से क्या हो गया कि ध्वनि है।


इतना था सौहार्द सभी हम एक थे।
एक अकेले हमीं रहे, न अनेक थे।।
करुणा का था राज्य, प्रेम ही धर्म था
युद्धानन्द विनोद एक ही कर्म था
न था किसी में मोह, कभी न विवाद था
मिलता अविरत स्वच्छ सुधा का स्वाद था
भीत शीत की भी न मार्ग की मन्त्रणा
यह कुचक्र मय चाल न थी, न कुमन्त्रणा


प्रसाद ने इसी नाटक में कार्नेलिया—एक विदेशी महिला—के मुख से ‘भारत भूमि की प्रशंसा करवाई है। ‘चन्द्रगुप्त’ में यह अधिक सर्जनात्मक और आत्मीयता युक्त है। इसमें प्रयुक्त यह वाक्य कि भारत की पवित्र भूमि केवल हत्या, लूट, रक्त और युद्ध से वीभत्स बनायी जा रही है। वाह कैसा सुन्दर देश है। मुझे इस भूमि से जन्म भूमि सा प्रेम होता जा रहा है’’ स्वदेशानुराग की वृद्धि की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है नाटक में चरित्रांकन व्यक्तित्व के अनुकूल नहीं है। प्रायश्चित जो 1914 में इन्दु में प्रकाशित हुआ था एक दृष्टि से जयशंकर प्रसाद के प्रारम्भिक रुझानों से भी प्रायश्चित है। यह नाटक प्रसाद जी का जिसमें राष्ट्र प्रेम को मूल्य मानकर देशद्रोह का प्रायश्चित आत्मवध माना गया है। इसमें भावना का एकांगीपन अधिक है, नाटक में उस प्रकार की बौद्धिकता नहीं है। जैसे स्कन्धगुप्त, चन्द्रगुप्त आदि में मिलता है। चरित्रों में अन्तर्द्वन्द्व और आत्मसंघर्ष की शुरूआत अवश्य है। पात्र भी अधिक नहीं है यद्यपि कि क्रिया व्यापार और वस्तु विन्यास विखरा हुआ है। कुल छः दृश्यों का नाटक है।

प्रायश्चित में प्रारम्भ में दो विद्या धारियाँ आती हैं जो लगभग पारसी थियेटर की शैली में नाटक के कार्य व्यापार की सूचना देने के साथ ही साथ हिन्दू साम्राज्य के सूर्य के अस्त होने और आर्य साम्राज्य के नाश के कारणों का उल्लखे करती हुई यह भी कहती हैं कि क्या यह किसी नीच भारतवासी का कार्य है।’ नाटक के प्रारंभ के इस संवाद का निम्नलिखित अंश महत्त्वपूर्ण है जो एक प्रकार से नाटक का संदेश भरी है। प्रतिहिंसा का प्रसाद बाद के नाटकों में अच्छा नहीं मानते हैं परन्तु अहिंसा को वे गुलामी का कारण अवश्य मानते हैं। उनके उपन्यासों और प्रारम्भिक काव्यों से भी ऐसे तरुण संघों के समर्थन का भाव मिलता है जो देश को राजनैतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से सम्पन्न करना चाहते हैं स्कन्दगुप्त, चाणक्य और चन्द्रगुप्त में ही नहीं कंकाल तितली और इरावती में भी इसके प्रयत्न है।

पं. सखी ! हिंसा कैसी बुरी वस्तु है। देख इसने कैसा भयंकर कार्य किया।’’
दू.सीधी। इस रही सही ‘प्रतिहिंसा’ को भी भारतवासियों के लिये ईश्वर की दया समझ। जिस दिन इसका लोप होगा उस दिन से तो इनके भाग्य में दासत्य करना लिखा है।’’
   





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