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साकेत

मैथिलीशरण गुप्त

5.95

प्रकाशक : साहित्य सदन प्रकाशित वर्ष : 2005
आईएसबीएन : 00000 पृष्ठ :288
मुखपृष्ठ : पेपरबैक पुस्तक क्रमांक : 1995
 

प्रस्तुत है मैथिलीशरण गुप्त की चुनिन्दा कवितायें.....

Saket

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

साकेत

राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है,
कोई कवि बन जाय, सहज सम्भाव्य है।

समर्पण


पितः, आज उसको हुए अष्टाविंशति वर्ष,
दीपावली-प्रकाश में जब तुम गये सहर्ष।
भूल गये बहु दुख-सुख, निरानन्द-आनन्द;
शैशव में तुमसे सुने याद रहे ये छन्द-
हम चाकर रघुवीर के, पटौ लिखौ दरबार,
अब तुलसी का होहिंगे नर के मनसबदार ?
तुलसी अपने राम को रीझ भजो कै खीज,
उलटो-सूधो उगि है खेत परे कौ बीज।
बनें सो रघुबर सों बनें, कै बिगरे भरपूर;
तुलसी बने जे और सो, ता बनिबे में धूर।
चातक सुतहिं सिखावहीं आन धर्म निज लेहु,
मेरे कुल की बानि है स्वाँति बूँद सों नेहु।’’
स्वयं तुम्हारा वह कथन भूला नहीं ललाम-
‘‘वहाँ कल्पना भी सफल, जहाँ हमारे राम।’’
तुमने इस जन के लिए क्या क्या किया न हाय !
बना तुम्हारी तृप्ति का मुझसे कौन उपाय ?
तुम दयालु थे गये कविता का वरदान,
उसके फल का पिण्ड यह, लो निज प्रभु गुणगान।
आज श्राद्ध के दिन तुम्हें, श्रद्धा-भक्ति-समेत;
अर्पण करता हूँ यही निज कवि-धन ‘साकेत’।
‘‘परित्राणाय साधूनां, विनाशाय च दुष्कृताम्,
धर्म संस्थापनार्थाय, सम्भवामि युगे युगे।’’
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इदं पवित्रं पापघ्नं पुण्यं वैदेश्च सम्मितम्,
यः पठेद्रामचरितं सर्वपापैः प्रमुच्यते।’’
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‘‘त्रेतायां वर्त्तमानायां कालः कृतसमोऽभवत्,
रामे राजनि धर्मज्ञे सर्वभूत सुखावहे।’’
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‘‘निर्दोषमभवत्सर्वमाविष्कृतगुणं जगत्,
अन्वगादिव हि स्वर्गो गां गतं पुरुषोत्तमम्।’’
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‘‘कल्पभेद हरि चरित सुहाये,
भाँति अनेक मुनीसन गाये।’’
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‘‘हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता;
कहहिं, सुनहिं, समुझहिं स्त्रुति-सन्ता।’’
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‘‘रामचरित जे सुनत अघाहिं,
रस विसेष जाना तिन्ह नाहीं।’’
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भरि लोचन विलोक अवधेसा,
तब सुनिहों निरगुन उपदेसा।’’

निवेदन


इच्छा थी कि सबके अन्त में, अपने सहृदय पाठकों और साहित्यिक बन्धुओं के सम्मुख ‘साकेत’ समुपस्थित करके अपनी दृष्टता और चपलताओं के लिए क्षमा याचना पूर्वक विदा लूँगा। परन्तु जो-जो लिखना चाहता था, वह आज भी नहीं लिखा जा सका और शरीर शिथिल हो पड़ा। अतएव, आज ही उस अभिलाषा को पूर्ण कर लेना उचित समझता हूँ।
परन्तु फिर भी मेरे मन की न हुई। मेरे अनुज श्री सियारामशरण मुझे अवकाश नहीं लेने देना चाहते। वे छोटे हैं इसलिए मुझ पर उनका बड़ा ही अधिकार है। तथापि, यदि अब मैं कुछ लिख सका तो वह उन्हीं की बेगार होगी।
उनकी अनुरोध रक्षा में मुझे सन्तोष ही होगा। परन्तु यदि मुझे पहले ही इस स्थिति की सम्भावना होती तो मैं इसे और भी पहले पूरा करने का प्रयत्न करता और मेरे कृपालु पाठकों को इतनी प्रतीक्षा न करनी पड़ती। निस्सन्देह पन्द्रह-सोलह वर्ष बहुत होते हैं तथापि इस बीच में इसमें अनेक फेर-फार हुए हैं और ऐसा होना स्वाभाविक ही था।
आचार्य पूज्य द्विवेदीजी महाराज के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करना मानो उनकी कृपा का मूल्य निर्धारित करने की ढिठाई करना है। वे मुझे न अपनाते तो मैं आज इस प्रकार, आप लोगों के समक्ष खड़े होने में भी समर्थ होता या नहीं, कौन कह सकता है—,

करते तुलसीदास भी कैसे मानस-नाद ?-
महावीर का यदि उन्हें मिलता नहीं प्रसाद।

विज्ञवर बार्हस्पत्यजी महोदय ने आरम्भ से ही अपनी मार्मिक सम्मतियों से इस विषय में मुझे कृतार्थ किया है। अपनी शक्ति के अनुसार उनसे जितना लाभ मैं उठा सका, उसी को अपना सौभाग्य मानता हूँ।
भाई, कृष्णदास, अजमेरी और सियारामशरण की प्रेरणाएँ और उनकी सहायताएँ मुझे प्राप्त हुईं तो ऐसा होना उचित ही था स्वयं वे ही मुझे प्राप्त हुए हैं।
‘साकेत’ के प्रकाशित अंशों को देख-सुनकर जिन मित्रों ने मुझे उत्साहित किया है, मैं हृदय से उनका आभारी हूँ। खेद है, उनमें से गणेशशंकर जैसा बन्धु अब नहीं।
समर्थ सहायकों को पाकर भी अपने दोषों के लिए मैं उनकी ओट नहीं ले सकता। किसी की सहायता से लाभ उठा ले जाने में भी तो एक क्षमता चाहिए। अपने मन के अनुकूल होते हुए भी कोई बात कह कर भी नहीं कर सका। जैसे नवम् सर्ग में उर्मिला का चित्रकूट-सम्बन्धी यह संस्मरण-


मँझली माँ से मिल गई क्षमा तुम्हें क्या नाथ ?
‘पीठ ठोक कर ही प्रिये, मानें माँ के हाथ।

परन्तु इसी के साथ ऐसा भी प्रसंग आया कि मुझे स्वयं अपने मन के प्रतिकूल उर्मिला का यह कथन लिखना पड़ा—

मेरे उपवन के हरिण, आज वनचारी।

मन ने चाहा कि इसे यों कर दिया जाये—

मेरे मानस के हंस, आज वनचारी

परन्तु इसे मेरे ब्रह्म ने स्वीकार नहीं किया। क्यों, मैं स्वयं नहीं जानता !
उर्मिला के विरह-वर्णन की विचार-धारा में भी मैंने स्वच्छन्दता से काम लिया है।
यों तो ‘साकेत’ दो वर्ष पूर्व ही हो चुका था ; परन्तु नवम् सर्ग में तब भी कुछ शेष रह गया था और मेरी भावना के अनुसार आज भी यह अधूरा ही है। मैं चाहता था कि मेरे साहित्यिक जीवन के साथ ही ‘साकेत’ की समाप्ति हो। परन्तु जब ऐसा न हो सका, तब उर्मिला की निम्नोक्त आशा-निराशामयी उक्तियों के साथ उनका क्रम बनाये रखना ही मुझे उचित जान पड़ता है-

कमल, तुम्हारा दिन है और कुमुद, यामिनी तुम्हारी है,
कोई हताश क्यों हो, आती सबकी समान वारी है।
धन्य कमल, दिन जिसके, धन्य कुमुद, रात साथ में जिसके,
दिन और रात दोनों, होते हैं हाय ! हाथ में किसके ?

मैथिलीशरण गुप्त

जय देवमन्दिर-देहली
सम-भाव से जिस पर चढ़ी,--
नृप-हेममुद्रा और रंक-वराटिका।
मुनि-सत्य-सौरभ की कली—
कवि-कल्पना जिसमें बढ़ी,
फूले-फले साहित्य की वह वाटिका।
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राम, तुम मानव हो ? ईश्वर नहीं हो क्या ?
विश्व में रमें हुए नहीं सभी कहीं हो क्या ?
तब मैं निरीश्वर हूँ ईश्वर क्षमा करें ;
तुम न रमो तो मन तुममें रमा करे।
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मंगलाचरण


जयति कुमार-अभियोग-गिरा गौरी-प्रति,
स-गण गिरीश जिसे सुन मुसकाते हैं—
‘‘देखो अम्ब, ये हेरम्ब मानस के तीर पर,
तुन्दिल शरीर एक ऊधम मचाते हैं।
गोद भरे मोदक धरे हैं, सविनोद उन्हें,
सूँड़ से उठाके मुझे देने को सिखाते हैं,
देते नहीं, कन्दुक-सा ऊपर उछालते हैं,
ऊपर ही झेलकर, खेल कर खाते हैं।’’

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