किर्चियाँ - आशापूर्णा देवी Kirchiyan - Hindi book by - Ashapurna Devi
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आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2007
आईएसबीएन : 8126313927 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :267 पुस्तक क्रमांक : 18

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ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कहानी संग्रह

kirchiyan.

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित आशापूर्णा देवी आधुनिक बांग्ला की अग्रणी उपन्यासकार रही हैं। कहानी-लेखन में भी वह उतनी ही सिद्धहस्त थीं। उनकी आरम्भिक कहानियाँ किशोरवय के पाठकों के लिए थीं और द्वितीय महायुद्ध के समय लिखी गई थीं। प्रबुद्धि पाठकों के लिए पहली कहानी ‘पत्नी ओ प्रेयसी’ 1937 में शारदीया, आनन्द बाजार पत्रिका में प्रकाशित हुई। नारी के इन दो अनिवार्य ध्रुवान्तों के बीच उठने वाले सवाल को पारिवारिक मर्यादा और बदलते सामाजिक सन्दर्भों में जितना आशापूर्णा देवी ने रखा है उतना सम्भवतः किसी अन्य ने नहीं। इसके बाद तो उनके अनगिनत नारी पात्रों माँ, बहन दादी, मौसी दीदी बुआ, अन्य नाते-रिश्तेदार यहाँ तक के नौकर-चाकरों की मनोदशा का सहज और प्रामाणिक चित्रण उनकी कहानियों के प्राण है।
आशापूर्णा जी की छोटी-बड़ी कहानियों में जीवन के सामान्य एवं विशिष्ट क्षणों की ज्ञात-अज्ञात पीड़ाएँ मुखरित हुई हैं। सच पूछिए तो उन्होंने उनको वाणी से कहीं अधिक दृष्टि दी है। इसलिए उनकी कहानियाँ पात्र, संवाद या घटना-बहुल न होती हुई भी जीवन की किसी अनकही व्याख्या को व्यंजित करती हैं।

हिन्दी पाठकों को समर्पित है आशापूर्णा देवी के प्रस्तुत कहानी संकलन का नया संस्करण।

भूमिका

पिछले साठ सालों में अपनी एक सौ सत्तर से भी अधिक औपन्यासिक कृतियों द्वारा अपने सर्व भारतीय स्वरूप को निरन्तर परिष्कृत और गौरवान्वित करने वाली लेखिका श्रीमती आशापूर्णा देवी 8 जनवरी, 1990 को अपने सक्रिय जीवन के 80 वर्ष पूरे कर नौवें दशक में पदार्पण कर रही हैं। बंकिमचन्द्र, रवीन्द्रनाथ और शरत्चन्द्र के बाद बंगाल के अन्दर और बाहर तथा महिला लेखिकाओं में सर्वप्रथम लेखिका के रूप में आशापूर्णा का नाम ही एक ऐसा सुपरिचित नाम है जिसकी हर कृति पिछले पचास सालों में एक नयी अपेक्षा के साथ पढ़ी जाती रही है और जो अपने पाठक को एक नये अनुभव के आलोकवृत्त में ले जाती है। यह आलोक-वृत्त परिक्रम मात्र नहीं होता, उसमें नयी प्रेरणा और दिशा भी होती है।
आशापूर्णा देवी की लेखिका का लेखन-संसार उनका अपना या निजी संसार नहीं है। वह हम सबके घर-संसार का ही विस्तार है। इस संसार को वह नयी-नयी जिज्ञासा के रूप में देखती रही हैं-कभी नन्हीं सी बिटिया बनकर तो कभी एक किशोरी बनकर, कभी नयी नवेली दुलहन के रूप में तो कभी अपनी कोख में एक नयी दुनिया लेकर ममतामयी माँ के रूप में, तो कभी बुआ-मौसी मामी या चाची की भूमिका में..प्रौढ़ गृहिणी बनी घर संसार का दायित्व सँभाले तो कभी दादी-नानी और असहाय वृद्धा बनी किसी अभिशप्तकाल काल-कोठरी में पड़ी सारे समाज के बदलाव को चुपचाप झेलती हुई।

आशापूर्णा की रचनाओं में ऐसी भी अनेकानेक लड़कियाँ, युवतियाँ, महिलाएँ और वृद्धाएँ हैं जो समाज में निर्विकार भाव से उपस्थिति हैं.....अपनी छोटी-सी गृहस्थी में सुखी या दुखी। एकदम सामान्य या तुच्छ दीख पड़ने वाली समस्याएँ या घटनाएँ, पात्र और परिस्थितियों के सहज या जटिल तालमेल से जीवन को नये ढंग से परिभाषित करती हैं। इन गुत्थियों को हर समर्थ कहानीकार सुलझाता है या उसे नया सन्दर्भ प्रदान करता है। लेकिन आशापूर्णा की विशेषता यह है कि वे इनके लिए अलग से कोई नाटकीय प्रयास नहीं करतीं। पात्रों के क्षण विशेष की ऊहा को, मर्म को या उनके उद्दीप्त क्षण को ही वे एकदम से पकड़ लेती हैं और उसे नया अर्थ गौरव देती हैं। जीवन अपने रचाव में एक अलिखित, अन्तहीन और अयाचित नाटक ही है। हमारे सारे सम्बन्ध किसी संयोग से निर्धारित हैं पर भूमिका अनिश्चित अस्पष्ट और अदृष्ट। ऐसे पात्रों की नामालूम सी जिन्दगी और बेमतलब बेवजह दीख पड़ने वाले पात्रों को सार्थकता देती हुई उनकी कहानियाँ जब यकायक सवाल बनकर कोंचने लगती हैं तो वे हमारे अवचेतन को ही नहीं झिंझोड़तीं हमारे समाज को भी आन्दोलित करती हैं। ऐसी ही कहानियों ने बंगाल के अनगिनत पाठकों को पिछली आधी शताब्दी से भी अधिक समय से चमत्कृत कर रखा है।

आशापूर्णा का बचपन और कैशोर्य कलकत्ता में ही बीता। विवाह के बाद वे दो वर्ष तक कृष्णनगर में रहीं। उनके पिता एक कलाकार थे माँ साहित्य की जबरदस्त भक्त। उनके पास अपना कहने को एक छोटा-मोटा पुस्तकालय भी था। घर पर ही ‘प्रवासी’, ‘भारतवर्ष भारती’, ‘मानसी ओ मर्मबानी’, ‘अर्चना’, ‘साहित्य’, और ‘सबुज पत्र’, जैसी पत्र-पत्रकाएँ नियमित रूप से आती रहती थीं। साथ ही बंगाल साहित्य परिषद्, ज्ञान विकास लाइब्रेरी तथा चैतन्य पुस्तकालय से भी पुस्तकें आ जाती थीं। परिवार चूँकि कट्टरपन्थी था इसलिए आशापूर्णा को उनकी दूसरी बहनों के साथ स्कूली पढ़ाई की सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी। लेकिन घर में उपलब्ध पुस्तकों को पढ़ने में कोई रोक-टोक न थी। माँ के साहित्यिक व्यक्तित्व का प्रभाव आशापूर्णा के कृतित्व पर सबसे अधिक पड़ा। उनकी रचनाओं में उनके बाल्य जीवन की स्मृतियाँ कई रूपों में अंकित हुई हैं और परम्परा के मुकाबले आधुनिक भाव बोध को समझने में इस परिवेश ने बड़ा योगदान दिया है। घर पर ही उन्होंने बसुमती साहित्य मन्दिर द्वारा प्रकाशित सारी कृतियों को पढ़ लिया था और कालिसिंह लिखित महाभारत का पारायण करती रही थीं। उन्होंने यह संकल्प भी किया था कि वे रवीन्द्रनाथ की सहस्त्राधिक कविताओं और गीतों को याद कर लेंगी। लेकिन यह एक असम्भव कार्य था।

आशावूर्णा देवी की आरम्भिक कहानियाँ द्वितीय महायुद्ध के दौरान लिखी गयी थीं। हालाँकि तब उनकी कहानियाँ किशोरवय के पाठकों के लिए होती थीं। प्रबुद्ध पाठकों के लिए जो पहली कहानी लिखी गयी थी वह 1937 ईं. के शारदीया। आनन्द बाजार पत्रिका में प्रकाशित हुई थी, जिसका शीर्षक था ‘पत्नी को प्रेयसी’। नारी के इन दो अनिवार्य ध्रुवान्तों के बीच उठने वाले सवाल को पारिवारिक मर्यादा और बदलते सामाजिक सन्दर्भों में जितना आशापूर्णा देवी ने रखा है उतना सम्भवतः किसी ने भी नहीं रखा है। इसके साथ ही अन्य असंख्य नारी पात्रों माँ, बहन, दादी, मौसी, दीदी, बुआ, घर के और भी सदस्य नाते, और रिश्तेदार यहाँ तककि नौकर-चाकर की मनोदशा का सहज और प्रामाणिक अंकन उनकी कहानियों में हुआ है कि वे सभी हमारे ही प्रतिरूप नजर आने लगते हैं।

 अपनी छोटी-बड़ी कहानियों में आशापूर्णा ने जीवन के सामान्य एवं विशिष्ट क्षणों और ज्ञात-अज्ञात पीड़ाओं को वाणी दी है और वाणी से कहीं ज्यादा दृष्टि दी है। इसलिए उनकी कहानियाँ पात्र, संवाद या घटनाबहुल न होती हुई भी जीवन की किसी अनकही व्याख्या को व्यंजित करती हैं और इस रूप में उनकी अलग पहचान है। आज से ठीक पचास साल पहले जब उनका कहानी संकलन जल और आगुन 1940 ई. में प्रकाशित हुआ था तो यह कोई नहीं जानता था कि बाँग्ला ही नहीं भारतीय कथा साहित्य के मंच पर एक ऐसे सितारे का पदार्पण हुआ है जो लम्बे समय तक आज की कुण्ठा और कुत्सा, संकट और संघर्ष जुगुप्सा और लिप्सा-सबको समेटकर सामाजिक सम्बन्धों के हर्ष और उत्कर्ष को नया आकाश देगा।
 
पिछले पचास-साठ वर्षों में स्वाधीनता आन्दोलन की प्रेरणाओं स्वतन्त्रता प्राप्ति नयी पुरानी सरकार, व्यवस्था परिवर्तन नारी शिक्षा स्वातन्त्र्य कामकाजी महिलाएँ, नगरों का जीवन, मूल्य संकट जैसे तमाम विषयों से जूझने वाली हजारों-लाखों कहानियाँ लिखी और पढ़ी जाती रही हैं। इन सारी कहानियों ने सामाजिक दबावों और एतिहासिक आवश्यकताओं के साथ-साथ पाठकों को एक नयी और निश्चित दिशा दी है। आशापूर्णा की कहानियाँ इस अर्थ में विशिष्ट और सजग हैं कि वे तमाम समस्याओं और छोटे-बड़े आन्दोलनों को पृष्ठभूमि के रूप में रखती हैं ताकि कहानियों की समसामयिकता बनी रहे। लेकिन उनका पहला और अन्तिम सत्य या लक्ष्य पात्र का आत्म-संघर्ष होता है-भले ही उसमें वह पराजित हो जाए। कहानियों के माध्यम से घटनाओं का स्थूल या सूक्ष्म अंकन फतवा या बयानबाजी नहीं होती। उनके पात्र अखबारी या चिकनी पत्रिकाओं के हैरतअंगेज कारनामों वाले पात्र नहीं होते-वे हमारे जीवन के अनखुले पृष्ठों और अनचीन्हें सन्दर्भों को खुलकर व्याख्यायित करते हैं। हम उन्हें पढ़कर अपने माहौल को और भी चौकस नजर से देखने लगते हैं। तब यह अनुभव होता है कि इस जानी-पहचानी दुनिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा हमारी नजरों से ओझल है, इस दृष्टि से यह अनजाना संसार अवश्य ही रहस्यपूर्ण है कि हमारी इकतरफा या एकांगी आँखें इस अनजाने परिवृत्त को उसकी समग्रता में समेट पाने को अक्षम हैं। स्वयं कहानीकार एक ही स्थिति को कई-कई पात्रों और वक्तव्यों से भरने और घूरने की कोशिश करता है।

आशापूर्णा को विश्वविद्यालयी किताबों और ज्ञान-विज्ञान की दुनिया नहीं मिली। बचपन से ही, वे एक ऐसी अनजानी लेकिन जिज्ञासा और कौतूहल से भरी दुनिया का साक्षात्कार करती रही हैं, जो रोज एक नये रूप में नये वातायन और वातावरण के साथ उनके सामने उपस्थित होता रहा अपने अनोखे और अजूबे पात्रों का सँभार उनके लिए जुटाता रहा। लेकिन आशापूर्णा देवी ने चयन का अधिकार सुरक्षित रखा और एक स्त्री होने के नाते उन्होंने स्त्री पात्रों की मानसिकता, उसके नारी सुलभ स्वभाव, उसके दर्प, दम्भ, द्वन्द्व और उसकी दासता और अन्यमनस्कता का चित्रण आरम्भ किया। अपने अनगिनत पात्राओं के संसार द्वारा आशापूर्णा ने सामान्य किन्तु अविस्मरणीय पात्रों का एक ऐसा समानान्तर एवं जीवन्त संग्रहालय तैयार किया है जिनका अबाध और जटिल यात्रा का पथ गरीबी, शोषण, कोलाहल, उन्माद, प्रेम-घृणा-अवसाद से परिपूर्ण है लेकिन जीवन और परिवेश के बीच एक संवाद चलता रहता है।

अपने को एक विनम्र और तुच्छ साहित्य-साधिका मानने वाली आशापूर्णा देवी एक लम्बे और विवादास्पद साहित्यिक दौर की साक्षी रही हैं। मूल्यों का संकट और पीढियों का टकराव जैसी समस्याओं को आशापूर्णा ने अपनी विचार वयस्कता से देखा है और अप्रिय निर्णय भी दिये हैं। उन्होंने इस बात की कभी परवाह नहीं की है कि किसी समझौते को तात्कालिक सन्दर्भ में उपयुक्त माना जाए और बाद में वह गलत अन्यायपूर्ण या अनुपयुक्त सिद्ध हो जाए। लेकिन सारी स्थापनाएँ भारतीय परिवेश, मर्यादा और स्वीकृत पारिवारिक ढाँचे के अनुरूप होती हैं। वे समाजशास्त्री, शिक्षाशास्त्री या दार्शनिकों की मुद्रा ओढ़कर बहुत आधुनिका या प्रगतिशील लेखिका होने का मुखौटा नहीं लगातीं। वे अपनी जमीन को और अपने सन्दर्भ को खूब अच्छी तरह जानती हैं लेकिन सम्बन्धों या सन्दर्भों की भावुकता को वे अन्यथा महत्त्व नहीं देतीं-जो कि बाँग्ला के अधिकांश लेखकों की कमजोरी रही है। ऐसा नहीं है कि किशोर-प्रेम, विवाह-पूर्ण प्रेम या विवाहेतर प्रेम सम्बन्धों और इनके विभिन्न प्रतिरूपों पर उन्होंने नहीं लिखा है लेकिन इस बहाने जीवन भर किसी अभिशाप की छाया की तरह इन्हें ढोते रहने और समाज में विशिष्ट बने रहने का ढोंग उन्हें पसन्द नहीं। कहना न होगा, रवीन्द्रनाथ की रचनाओं का, उन दिनों जैसा स्वाभाविक ही था, उनके भी किशोर मन पर जबरदस्त प्रभाव पड़ा था। लेकिन बाद में समकालीन साहित्य और भावबोध के तरह-तरह के दबावों और अनुरोधों का सामना करना पड़ा और साहित्य के संकल्प और सरोकार भी बदलते चले गये।

सामाजिक, परिवेशगत और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों के चलते साहित्यकारों का दायित्व बहुत बढ़ गया है क्योंकि उसकी सकारात्मक अवधारणाएँ ही साहित्य और समाज को नयी दिशा दे सकती हैं। लेखक का अनुभव-वृत्त जितना समृद्ध हुआ है, उसकी संवेदनाशीलता का आकाश बहुत छोटा हो गया है। मानवीय संवेदना को जुगाये रखना आज बहुत जरूरी है। केवल विषय-वस्तु के प्रति न्याय या निर्वाह से या पाठक वर्ग विशेष के लिए लिखते रहने से ही उसके दायित्व की इतिश्री नहीं हो सकती। बदलते सामाजिक और राजनीतिक माहौल में, यह ठीक है कि अन्यान्य दबावों के चलते श्रेष्ठ साहित्यकार भी अपना दायित्व बखूबी निबाह नहीं पा रहे लेकिन आशापूर्णा इससे निराश नहीं हैं। उनका मानना है कि कोई ‘जेनुइन’ लेखक इस बात से आश्वस्त या कि सन्तुष्ट नहीं हो सकता और अब सिर्फ साहित्य ही विरोध का एकमात्र हथियार नहीं रह गया। और न ही सामाजिक मनोरंजन या नैतिक मानदण्ड का। समाज के इस छटा रूप को उजागर करने के साथ-साथ उसके सुष्ठु और श्रेष्ठ मानवीय संस्कार को बनाये रखना भी बहुत जरूरी है। आशापूर्णा के शब्दों में ही, ‘‘लम्बे समय तक साहित्य सृजन के दौरान ऐसा भी हुआ है कि हताशा और निराशा मिली है लेकिन मैंने इस ह्रास और पतन को जीवन का अन्तिम वक्तव्य कभी नहीं माना। मैं जानती हूँ कि अतृप्ति के साथ-साथ पूर्णता भी है। यही समग्रता ही जीवन की रिक्तता और तिक्तता को पूर्णता प्रदान करती है।’’

आशापूर्णा की स्त्री-पात्राओं के बारे में, विशेष तौर पर यह बताया जाता रहा है कि वे न तो असामान्या हैं और न ही विधाता की अनन्य सृष्टि हैं। तो फिर क्या हैं ? क्या लेखिका की मानस प्रतिमा ? नहीं, वह भी नहीं। वे नितान्त और एकान्त रूप से हमारे आस पास की बहू, बेटियाँ या माँ हैं। ऐसा नहीं है कि वे पर्दे में होती हैं, अन्तःपुर में कैद पड़ी रहती हैं या घर की चारदीवारी में बन्द रहती हैं। पर लेखिका की कोशिश यही रहती है कि वे पुरुषों की बनायी हुई दीवारों को तोड़े और खुद को अपनी गुलामी से मुक्त करें। इनका प्रमुख स्वर सकारात्मक और विश्वनीय विरोध है, तमाम सम्बन्धों की मर्यादा को बनाये रखने के साथ-साथ। ऐसी कोई भी पात्रा प्रत्यक्ष रूप से अगर आगे नहीं भी आती तो वह खुद अपने आपसे लड़ती है। उसकी यह लड़ाई व्यक्तिगत नहीं होती...केवल पति...प्रेमी...भाई या बेटे के साथ नहीं लड़ी जाती.....मर्दों की निष्ठुर दुनिया के साथ लड़ी जाती है। लेखिका कहीं भी अपनी तरफ से हस्तक्षेप नहीं करती।

वह संकेत भर करती है। जीवन और कहानी का उतना ही हिस्सा उनके लेखन का या कथा-न्यास का अंग बनता है, जितना कि प्रभाव के लिए हिस्सा उनके लेखन का या कथा-न्यास का अंग बनता है, जितना कि प्रभाव के लिए आवश्यक है। इसलिए ये कहानियाँ अपने संक्षेप या विस्तार में, संवाद या विन्यास में छवियाँ प्रस्तुत करती हैं। उनका पक्ष स्पष्ट तौर पर उनके साथ रहता है जो सम्बन्धों की जड़ता या एकरता को तोड़ती हैं। लेकिन आधुनिका होने के नाम पर उच्छृंखल या पारिवारिक मर्यादाओं की अनदेखी करने का न तो वे प्रस्ताव  करती हैं और न ही ऐसा कोई आयोजन करती हैं जिससे अपनी बात को एक दलील के तौर पर कहना अधिक आसान हो। दरअसल आशापूर्णा की पात्राओं की दुनिया विरोध या बनामवाद से कहीं अधिक अपने रचाव पर विशेष बल देती है। इन पात्रों को पता है कि जो दुनिया उनके इर्द-गिर्द है, वह ठीक वैसी नहीं है, जैसी कि दीख रही है। स्वयं पुरुष जाति उन संस्कारों और अधिकारों से वंचित है, जो उन्हें मिलना चाहिए। अपनी कुण्ठाओं, अक्षमताओं और दुर्बलताओं को जब वे अपनी वामा या पत्नी पर आरोपित करना चाहते हैं तो स्वाभाविक है इस अन्याय का विरोध किया जाए। लेकिन ज्यादातर मामलों में ऐसा नहीं किया जाता ताकि घर की संरचना पुरुष केन्द्रित रहे और रूढ़िगत मर्यादा का पालन होता रहे। आशापूर्णा मर्दों की इसी कुण्ठावृत्ति पर कुठाराघात करती हैं। सम्भव है, इससे जितना कुछ प्रत्यक्ष तौर पर टूटता नजर आता है वह आकस्मिक तौर पर वांछित न हो। लेकिन नारी का मनोबल और आत्म-गौरव जो अप्रत्यक्ष तौर पर टूटने से बचा लिया जाता है, लेखिका का वही अभिप्रेत या वांछित वक्तव्य होता है।

इसीलिए ऐश्वर्य जैसी कहानी की प्रौढ़ा नायिका जो पारिवारिक अस्मिता से जुड़ी है पति और पत्नी के बीच के सम्बन्ध और विश्वासपूर्ण सम्बन्ध में विघटन पैदा करने वाली कोशिश को न केवल नाकाम कर देती है बल्कि अपनी मर्यादाओं को बनाये रखते हुए कहीं भी अतिरिक्त नहीं प्रतीत होती। इस कहानी के अन्य पात्र मुखर होने के बावजूद एक-दूसरे के विरोधी नहीं। इसमें कोई किसी के विरुद्ध प्रतिकूल आचरण नहीं करता लेकिन अपनी सहजता से...सारी विकृतियों पर विजय प्राप्त कर लेती है। लेखिका ने पारिवारिक सौमनस्य को बनाये रखने के लिए परिवार के केन्द्र में स्थित पात्र को, वह स्त्री हो या पुरुष, हमेशा एक मजबूत सत्ता के रूप में देखना और रखना चाहा है। यदि यह नींव कमजोर हुई तो घर की दीवारें अपने आप हिलने लगेंगी। और इसके लिए सबसे –बड़ा गुणा-धर्म है आत्मविश्वास।

 इसकी सबसे बड़ी कसौटी है-प्रतिकूल परिस्थिति। लेखिका ने यही जताया है कि ये अनाहूत परिस्थितियाँ कितनी भी प्रतिकूल हों....उनका मुकाबला अपने तईं करना है ताकि पर निर्भरता खत्म हो सके। डॉट पेन कहानी में लीलावती जीवन के अन्तिम चरण में अपनी इस असहायता के खिलाफ बिना कुछ कहे-सुने पहल करती है और अपने अभियान में सफल होती है। एक छोटी-सी घटना के द्वारा लेखिका ने घर-परिवार की पारिभाषिकता को जो नाटकीयता प्रदान की है वह अपने शिल्प में तो अनूठी है ही, अपनी परिणति में भी अप्रतिम है। यही कारण है कि लेखिका कहानी की सामान्य और वंछित समाप्ति की औपचारिक घोषणा के बाद से डेढ़ दो पृष्ठों में और आगे बढ़ाती हैं ताकि कहानी किसी रसज्ञ रंजन कहानीकार की प्रदर्शन प्रियता और लेखन चारुता से आगे बढ़कर एक सर्जक के सरोकार से जुड़ सके....अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता और स्वातन्त्र्यचेता मनीषा से एक नया प्रस्थान दे सके।

आशापूर्णा देवी ने विपुल लेखन किया है। पिछले पचास साठ वर्षों से निरन्तर लिखती रही हैं। वे आज भी लिख रही हैं आगे भी लिखेंगी। वैसे स्वास्थ्य बहुत ठीक नहीं रहता। कहीं आतीं-जातीं नहीं। लेकिन हजारों पृष्ठों में फैली सामग्री में न तो उन्होंने अनावश्यक लिखा है और न अपने-आपको दोहराया ही है। और जितना लिखा है उसका बहुलांश श्रेष्ठ साहित्य की कोटि का है और जो उनके अनगिनत पाठकों द्वारा खूब पढ़ा और सराहा जाता रहा है।

आशापूर्णा स्त्री को उसके चिरपिचित नायिका रूप या नख-शिख सौन्दर्य रूप में नहीं देखना चाहती हैं जैसाकि समाज की ही नहीं, लेखकों की भी प्राथमिकता रही है। इस दृष्टिकोण ने साहित्य और इसके पाठक को मानसिक तौर पर विकलांग कर दिया है। यही वजह है कि वह कोई निर्णय नहीं ले सकती। उसके मत्थे कर्तव्य और मर्यादा की तो ढेर सी चीजें लाद दी गयी हैं लेकिन अपने तईं कोई भी निर्णय लेने का अधिकार वह चाहती भी नहीं, जो उसे दान, उपहार या पुरस्कार में मिले। अपने यथोचित अधिकार के लिए वह खुद लड़ेगी और अपने को इस योग्य साबित करेगी। अपने ढेर सारे उपन्यासों में आशापूर्णा ने, जिसमें प्रथम प्रतिश्रुति बकुल कथा और सुवर्णलता को सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली, वंचना बोध और तिरस्कार झेलती नारी की इसी दुर्द्धर्ष यात्रा की लम्बी गाथा को उकेरा गया है, जिसमें तोप तमंचे या तलवार का पराक्रम या राज्यों के उत्थान पतन का बखान तो नहीं है लेकिन नारी की अस्मिता की नयी पहचान कराने का सकारात्मक और सामाजिक उपक्रम है।

इन रचनाओं ने, जैसा कि कहा गया बंकिम, रवीन्द्र और शरत की त्रयी के बाद बंगाल के पाठक वर्ग और आशापूर्णा देवी के मामले में, प्रबुद्ध महिला पाठकों को सर्वाधिक प्रभावित और समृद्ध किया है। प्रथम प्रतिश्रुति की नायिका सत्यवती इसी अचलायतन को तोड़ना चाहती है।1 वह आशापूर्णा देवी के शब्दों में ही प्रतिवाद का प्रतीक है...जो स्त्री पात्र को भी पुरुष पात्र जैसी प्रतिष्ठा और गौरव प्रदान करना चाहती है।’’

सत्यवती (प्रथम प्रतिश्रुति) का वैचारिक आग्रह एक दूसरे प्रकार के परिवेश के विरुद्ध था और वह एक नये समाज के निर्माण का आधार भी बना। जबकि सुवर्णलता कहीं अधिक प्रोढ़ और गतिशील थी और वह स्वयं आशापूर्णा देवी के निजी जीवन और दर्शन को प्रतिकृत करती थी। इस पात्र (सुवर्णलता) के चरित्र की
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1.    भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किये जाने के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका में प्रथम प्रतिश्रुति की संस्तुति में जो कुछ लिखा गया, उसका एक अंश उद्धृद करना यहाँ समीचीन जान पड़ता है-
‘‘प्रथम प्रतिश्रुति में बंगीय नारी को उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से लेकर क्रमिक विमुक्ति के इतिवृत्त को उद्घाटित किया गया है। समूची कथा एक तेजस्वी उपन्यास के रूप से विकसित हो उठी है, जिसका केन्द्र बिन्दु कथा-नायिका सत्यवती है। उसका जीवन और संघर्ष है, और हैं वे उपाय-साधन जिनके द्वारा उसने क्रमशः उन्मुक्तता उपलब्ध की। कृति में तत्कालीन बाँग्ला नारी की मनोहारी छवियाँ ही नहीं उकेरी गयी हैं, लेखिका ने मानव स्वभाव पर ऐसी सटीक टिप्पणियाँ भी प्रस्तुत की हैं, जिनकी प्रासंगिकता बहुत व्यापक है। इसमें रूपायित हो आयी है वह प्रक्रिया जिससे भारतीय नारीत्व उचित गरिमा पा सकी है।’’

विशेषताएँ बार-बार उनकी कृतियों में अलग-अलग पात्रों में निरूपित हुई हैं और इस धारावाहिकता में जीवन और जगत् के प्रति लेखिका के दृष्टिकोण की बार-बार पुनरावृत्ति भी हुई है। घटनाओं की तात्कालिकता और समस्याओं का सारा दबाव एक रचनाकार को निरन्तर झेलना पड़ता है और इस कार्य में सबसे अधिक सहायता लेखिका को उसके अपने अर्जित अनुभव और जीवन के प्रति अपने विश्वास से मिलती है। यह ठीक है कि अपने-अपने अभिगम में सत्यवती और सुवर्णलता अलग-अलग ढंग से कार्यशील हैं लेकिन जीवन के श्रेयस के प्रति वे अपने दायित्व को खूब अच्छी तरह निबाहती हैं। उनकी सीमाओं में और परितिस्थियों के तात्कालिक दबाव में इससे अधिक की प्रत्याशा की जा सकती थी लेकिन तब उनकी भूमिका आरोपित और अविश्वसनीय हो जाती। रचनाकार या आलोचक अपनी मानसिक प्रौढ़ता या विचार वयस्कता के नाते और अपने बोध, विचार प्रत्यक्ष या प्रतिबद्धता के अनुरूप अलग-अलग माँग रख सकते हैं और इस दृष्टि से किसी पात्र को सर्वतोभद्र भी बनाया जा सकता है। लेकिन आये दिन हम जिन लोगों से मिलते-जुलते हैं या विशिष्ट चरित्रों के बारे में जानते हैं या जानना चाहते हैं-क्या उनकी तमाम विकृतियों या कमजोरियों से परिचित हैं। जीवन की यह अस्पष्टता ही रचनाकार की पूँजी है और इस छायाभास को ही वह रूप और रंग, स्वर और तेवर प्रदान करता है। इसकी पारदर्शिता को बनाये रखते हुए जहाँ इसमें इन्द्रधनुषी रंगिमा भरता है वहीं इसकी स्वस्थ आलोचना भी करता है।

आम पात्रों की सोच, सूझ और समझ को साहित्यिक भाषा में निरूपित करना और भी कठिन है क्योंकि इन पात्रों की मानसिकता का अधिकांश अनुच्चारित होता है। भाषा या मुहावरे को तदनुरूप गढ़ पाना और संयोजित कर पाना एक कठिन रचनाकर्म है और इसमें अर्जित योग्यता ही लेखक या लेखिका की सफलता है। आशापूर्णा देवी ने समाज के विभिन्न स्तरों पर, से असंख्य पात्रों की मनोदशाओं का चित्रण किया है, जो अबोले हैं, बड़बोले हैं या जो स्वयं बोलते दूसरे उनके बारे में हजार तरह की बातें करते हैं। आशापूर्णा ने भाव, भाषा और मुहावरें के साथ-साथ संवाद के शिल्प को और कथा-न्यास को एक नयी जमीन दी है। इस दृष्टि से वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर शरत्-चन्द्र, विभूतिभूषण, मुखोपाध्याय, माणिक बन्द्योपाध्या समरेश बसु, ‘कालकूट’ के समकक्ष जा ठहरती हैं-जिन्होंने भाषा को उसके खुरदरेपन में जीते हुए भी उसमें निहित कविता और छन्द को जुगाये रखा है। आशापूर्णा जी ने इस युक्ति को इतनी स्वाभाविकता से अपने कथा-न्यास में सँजोया है कि इस पर अलग से एक प्रबन्ध लिखा जा सकता है। अपनी कहानियों में पात्रों के संवाद को और उसकी आशा को वे एकवचन के साथ-साथ बहुबचन में परिणत कर देती हैं। तब किसी पात्र का कोई संवाद आत्म-कथन या उसका छोटा सा अंश वामन से विराट में परिणत हो जाता है। वह प्रश्न वक्तव्य जीवन दर्शन सत्य प्रत्यय और मन्त्रधर्मा हो जाता है और साथ ही एक कविता का सच भी प्रतीत होता है। संवाद या कथन का यह उत्कर्ष उनकी रचनाधर्मिता की विशिष्ट पहचान है और इस संग्रह की बहुत सी कहानियाँ इसकी साक्षी हैं।


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