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हमारे पथ प्रदर्शक

ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, अरुण तिवारी

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :174
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1682
आईएसबीएन :81-7315-557-7

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प्रस्तुत पुस्तक में कलाम के जीवन पर आधारित है...

Hamare Path Pradarshak

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मैं क्या हूँ और क्या बन सकता हूँ ? वे कौन लोग थे जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अपना-अपना विशिष्ट योगदान देकर मानव जाति की उत्कृष्ट सेवा की ? कैसे मैं इस मायावी संसार में दिग्भ्रमित हुए बिना अग्रसर हो सकता हूँ ? कैसे मैं दैनिक जीवन में होनेवाले तनाव पर काबू पा सकता हूँ ?

ऐसे अनेक प्रश्न छात्र तथा विभिन्न राष्ट्रपति से उनकी जुड़ी युवाशक्ति भारत के दूरदर्शी राष्ट्रपति से उनकी यात्राओं में अकसर पूछते हैं। राष्ट्रपति डॉ. कलाम की यह नवीनतम कृति ‘हमारे पथ-प्रदर्शक इन सभी प्रश्नों का उत्तर बखूबी देती है।
छात्रों एवं युवाओं हेतु प्रेरणा की स्रोत महान् विभूतियों के कृतित्व का भावपूर्ण वर्णन। कैसे वे महान बने और वे कौन से कारक एवं तथ्य थे जिन्होंने उन्हें महान् बनाया।

अभी तक पाठकों को राष्ट्रपति डॉ. कलाम के वैज्ञानिक स्वरूप एवं प्रगतिशील चिंतन की ही जानकारी रही है, जो उनके महान् व्यक्तित्व का एक पक्ष रहा है। उनके व्यक्तित्व का दूसरा प्रबल पक्ष उनका आध्यात्मिक चिंतन है। प्रस्तुत पुस्तक में डॉ. कलाम की आध्यात्मिक चिंतन प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन है।
यह पुस्तक प्रत्येक भारतीय को प्रेरित कर मानवता का मार्ग प्रशस्त करेगी, ऐसा विश्वास है।

सदाचार स्तोत्र


1. सदाचार से चरित्र में निर्मलता आती है।
2. चरित्र की निर्मलता से घर परिवार में समरसता आती है।
3. घर-परिवार में समरसता से राष्ट्र में व्यवस्था आती है।
4. राष्ट्र की व्यवस्था से दुनिया में गतिशीलता और विकासशीलता आती है।

आमुख


मेरी पुस्तक ‘तेजस्वी मन’ में एक स्वप्न का प्रसंग आता है, जिसमें मैंने पाँच महान् व्यक्तियों सम्राट् अशोक, अब्राहम लिंकन, महात्मा गांधी, खलीफा उमर और आइंस्टाइन का जिक्र किया है। स्वप्न में ये पाँचों प्रबुद्ध व्यक्ति चांदनी में नहाई मरुभूमि में मनुष्य की उन्मतत्ता के संबंध में बातचीत कर रहे हैं-आखिर मनुष्य स्वयं ही मानव जाति के विध्वंस पर क्यों उतारू है, जबकि इस कार्य में अंततोगत्वा उसे ही पीड़ित होना पड़ता है। इस स्वप्न के माध्यम से पुस्तक में सृजानात्मक चिंतन प्रक्रिया पर बल देते हुए श्रेष्ठ मानव मूल्यों का प्रतिपादन किया गया है। पुस्तक का प्रकाशन जुलाई 2002 में मेरे राष्ट्रपति पद ग्रहण करने की पूर्व संध्या पर हुआ था।

भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रपति के रूप में मैंने अपने इस विशाल देश के विभिन्न स्थानों की यात्रा की और नाना प्रकार के लोगों, विशेषकर आध्यात्मिक गुरुओं, के साथ संपर्क स्थापित किया। इससे मानवीय चिंतन के ब्रह्मांड की रचना करने वाली अनेकानेक आकाशगंगाओं के संबंध में न सिर्फ मेरी जिज्ञासा में वृद्धि हुई अपितु मेरी सोच और समझ में भी परिपक्वता आई। हमारे देश के सामाजिक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्वरूपों की समृद्धि तथा उसमें व्याप्त अनेकता उसकी अनुपम विशिष्टता है, जो मेरी चेतना को उसी प्रकार निरंतर तृप्त करती रहती है, जैसे किसी प्यासी भूमि में जलधारा फूटकर उसे सिंचित करे।

एक बीज के एकदम अंकुरित हो उठने की प्रक्रिया के समान ही एक सही चिंतन प्रक्रिया के चलते सदैव ही कुछ ऐसे आध्यात्मिक निर्देशक स्तंभ प्रकट होते रहते हैं, जो मनुष्य का उपयुक्त मार्गदर्शन करने में सक्षम हैं। युग-काल के कैनवास पर इस आध्यात्मिक निर्देशक प्रक्रिया को ऐसे पथ प्रदर्शकों के प्रादुर्भाव के रूप में देखा जा सकता है, जिनके जीवन का प्रयोजन मानो मानव जीवन को अंधविश्वासों के दलदल से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक स्थिरता प्रदान करना ही हो। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किसी व्यक्ति के अंतःकरण-चिंतन कल्पना संवेग, अनुभूति स्वप्न, अंतर्दृष्टि और प्रेरणा को एक निराकार संचयन प्रक्रम के रूप में देखा जा सकता है। इस रूपक और यथार्थता के मध्य संबंध को यदि थोड़ी संवेदनशीलता से परखा जाए तो ये सभी आत्मा के उस चलचित्र की भाँति प्रतीत होंगे, जिसमें उसके विविध आयाम, स्वरूप सतत रूप से, एक के बाद दूसरे प्रकट होते रहते हैं।
हमारी आत्मा की यह चलचित्रात्मक सुनम्यता न केवल हमें अपने व्यक्तिगत लक्ष्य की ओर आगे ले जाती है, बल्कि मानव, प्रकृति में अंतर्निहित स्वतंत्रता के भावों की झाँकी भी प्रस्तुत करती है। आत्मा ही चिंतक, कर्ता, धर्ता, भोक्ता व नियोक्ता है और सब कुछ उसी में अंतर्निहित है। यह समूचा ब्रह्मांड अंतरात्मा में ही तो बसा है।

विमान चालन से संबंधित अनुसंधानात्मक समस्याओं को हम यूक्लिड ज्यामितीय सिद्धांतों की सहायता से हल करते हैं, जहाँ प्रत्येक आयाम एक सीधी रेखा के रूप में होता है और वह अन्य विमाओं को समकोण पर प्रतिच्छेदित करता है। अधिक जटिल समस्याओं को सुलझाने में हम राइमन ज्यामिति का प्रयोग करते हैं, जिसमें आयाम एक दूसरे को समकोण पर प्रतिच्छेदित करते हुए नहीं अपितु परस्पर अंतर्निहित देखे जाते हैं। आत्मानुभूति के बारे में प्रायः यूक्लिडीय ज्यामिति सरीखे भ्रम-विचार आते रहते हैं, परंतु वस्तुतः आत्मबोध एक राइमन ज्यामिति सरीखा अनुभव है-भावनाओं की अनवरत अंतर्बद्धता। अभी हाल में मैं अपने जन्म स्थल रामेश्वरम् गया था। वहाँ मुझे समुद्र तट पर खड़े होकर कुछ समय तक समुद्री जल तरगों को वैसे ही ताकने का अवसर मिला, जैसा कि मैं अपने बचपन में अकसर किया करता था। पर इस बार प्रत्येक जल तरंग जैसे मुझे मानव जीवन की एक नवीन अंतर्दृष्टि दे रही थी। समुद्र में उठनेवाली प्रत्येक जल तरंगों का स्वयं का अपना एक अस्तित्व होता है, मानो वह अन्य तरंगों से बिलकुल भिन्न हो; परंतु यथार्थ में कोई तरंग अन्य तरंगों या समुद्र से कहाँ अलग होती है।1

मेरे मित्र और ‘अग्नि की उड़ान’ (Wings of Fire) के मेरे सहलेखक अरुण तिवारी की मेरे साथ राष्टपति भवन में हुई भेंटों और यात्राओं के दौरान हुए वार्त्तालाप का एक लंबा सिलसिला रहा है। हम अकसर मुगल गार्डन में अमर कुटी (Immortal Hut) में बैठा करते, जहाँ अरुण मुझसे विभिन्न सर्वजीवनोपयोगी विषयों पर सुनते-सुनाते और मेरे विचारों को अपने लैपटॉप कंप्यूटर पर दर्ज करते जाते। बाद में उन्होंने हमारे वार्त्तालापों की चिंतन प्रक्रिया का विस्तार करके उसे एक व्यवस्थित संवाद रूप में प्रस्तुत किया। भारतीय संस्कृति में शिक्षक और शिष्य के संबंध में यह माना जाता है कि शिक्षा के चलते शिष्य के कुछ गुण अपरिहार्य रूप से उसके शिक्षक के गुणों के साथ समाहित हो जाते हैं; अरुण ने शिक्षक में अपने सद्गुण हृदयगम कराकर एक उल्लेखनीय कार्य किया है।

पुस्तक को तीन खंडों में व्यवस्थित किया गया है। प्रथम खंड में अनुभव चिंतन कल्पना संवेग अनुभूति संवेदना बोध, अंतर्दृष्टि और ज्ञान तथा मस्तिष्क एवं संवेग से उत्पन्न होने वाली विभिन्न स्थितियों की अंतरंगता की अवधारणा स्पष्ट की गई है। द्वितीय खंड में कुछ ऐसे महान् व्यक्तियों के जीवन के मूल तत्त्वों  को प्रस्तुत किया गया है, जिन्होंने अलग-अलग कालखंडों में जन्म लेकर मानवजाति के समक्ष भौतिक चिंतन एंव श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया। महान् व्यक्तियों की इस सूची में हमने कुछ आधुनिक लब्धप्रतिष्ठ व्यक्तियों को भी निस्संकोच शामिल किया है। सुदूर अतीत में हुए महिमामंडित व्यक्तियों में महानता के लक्षणों की चर्चा करना बड़ा आसान होता है; परंतु अपने आस-पास उपस्थित अन्य लोगों में महानता देख पाना किंचित कठिन ही होता है। यद्यपि यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। पुस्तक के अंतिम खंड में आत्मिक यात्रा और उसके विभिन्न स्वरूपों को शाश्वत तत्त्व के विस्तार के रूप में वर्णित किया गया है।

पैगंबर मुहम्मद (सल्ल्लाहो अलैहे वसल्लम) ने मानव जाति को सृष्टि में ‘ईश्वर की अंतिम और सर्वश्रेष्ठ’ कृति कहा है। यद्यपि सृजन-श्रृंखला में मानवजाति सबसे बाद में अस्तित्व में आई, तथापि सृष्टि की रचना का मूल प्रयोजन इसे ही बताया गया है। जब अतीत से प्राप्त ज्ञान से हम अपने वर्तमान अनुभव का ताना-बाना बुनते हैं तो वास्तविकता के अस्पष्ट अथवा धूमिल हो जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। इतिहास गवाह है कि मानवता ने युवा पीढ़ी को, बारंबार अज्ञान के अंधकार में अपना मार्ग भटककर, अपनी अतीत की भूलों की पुनरावृत्ति करने के लिए कोसा है। इसी अज्ञानता को दूर करने का एक छोटा सा प्रयास प्रस्तुत पुस्तक में किया गया है।


घट का पानी
कितना ओझा, कितना मैला !
फोड़ो घट को, आओ घाट पर
जीवन की नदिया में डूबो।2


पुस्तक में प्रस्तुत संवाद के सीमित आधार पर  मानव जीवन का यथार्थ लक्ष्य भला कैसे निश्चित किया जा सकता है। यह पुस्तक तो एक सिलसिला भर शुरू कर सकती है। पाठकों से अनुरोध है कि वे स्वयं के अंतर्व्यवहार का बोध करते हुए अपने जीवन के यथार्थ प्रयोजन की निरंतर खोज करते रहें। हम सब इस दुनिया में मुसाफिर ही तो हैं; यह बहुत जरूरी है कि सफर जारी रहे।


-ए.पी.जे.अब्दुल कलाम


खंड 1


शाश्वतता


चलता ही जाता हूँ मैं निरंतर
मंजिल है कहाँ ? बता ऐ खुदा !
जिस शांति, सत्य और ज्ञान की खोज में चलता ही रहा, चलता ही रहा
वह शांति, सत्य, वह ज्ञान अभी नहीं मिला।
ऐ खुदा ! सुन ये दुआ,
मैं रहूँ या ना रहूँ पर यह सफर जारी रहे।




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