चमत्कारिक दिव्य संदेश (द्वितीय) - उमेश पाण्डे Chamatkarik Divya Sandesh-2 - Hindi book by - Umesh Pandey
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चमत्कारिक दिव्य संदेश (द्वितीय)

उमेश पाण्डे

प्रकाशक : भगवती पॉकेट बुक्स प्रकाशित वर्ष : 2004
आईएसबीएन : 81-7775-047-X मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :62 पुस्तक क्रमांक : 1670

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भारतीय गूढ़ विद्याओं एवं विधाओं को अत्यधिक सरल स्तर पर आपके समक्ष रखने का प्रयास, जैसे- प्राचीन भारतीय ग्रंथों में से चुने हुए तथ्यपूर्ण प्रसंग...

Chamatkarik Divya Sandesh-A Hindi Book by Umesh Pande

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सम्पादकीय

आज विश्व चन्द्रमा की धरती से भी ऊपर जा रहा है। आधुनिकता और वैज्ञानिकता की मैराथन दौड़ में दुनिया अपने अतीत को विस्मृत किये हुए है। सम्पूर्ण विश्व में भारतवर्ष ही एक मात्र ऐसा देश है जो न केवल आधुनिकता और वैज्ञानिकता की दौड़ में शामिल है बल्कि अपने पूर्व संस्कारों को और अपने पूर्वजों की दी हुई शिक्षा को भी साथ लिये हुए है। आज जहाँ विश्व अपने अतीत की तमाम बातों को भूल चुका है भारतीयों ने वहीं उन्हें सीने से लगाकर रखा है। यही कारण है कि भारत में आज भी पुरातनकालीन बातों को, हमारे धर्मशास्त्रों में वर्णित तथ्यों को, पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ अमल में लाया जाता है। हमारे पूर्वजों के द्वारा दर्शायी बातों को हम सूर्य और चन्द्रमा के अस्तित्व की भाँति प्रामाणिक मानते हैं। हमारे धर्मग्रंथों और प्राचीन शास्त्रों में वर्णित तथ्यों को हम हमारा पथ प्रदर्शक मानते हैं। सही भी है, यही हमारी मुख्य धरोहर हैं।

‘दिव्य संदेश’ में हमारे इन्हीं प्राचीन ग्रंथों से कुछ तथ्य आपके समक्ष रखे जाते हैं; कुछ आध्यात्मिक संदेश आपके मन को सुख और शांति प्रदान करने हेतु संकलित रहते हैं—इस आशा और विश्वास के साथ कि इनसे आप अवश्य ही लाभान्वित होंगे।

सम्पादक


क्यों जपना नाम प्रभु का....?



अजामिल का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। वह गुणी भी था और समझदार भी। उसने वेद-शास्त्रों का विधिवत् अध्ययन किया था, तथा अपने यहाँ आने वाले गुरुजन तथा अतिथियों का सम्मान भी वह श्रद्धापूर्वक करता था साथ ही उनसे ज्ञान चर्चा भी किया करता था। उसके घर में नित्यप्रति देवपूजन, यज्ञ तथा ब्राह्मण भोजन कराया जाता था। पूजन विषयक समस्त व्यवस्थायें स्वयं अजामिल देखता था। वह प्रयास करता था कि पूजन में प्रयुक्त होने वाली सामग्री फल-फूल तथा समिधाएँ पवित्र और श्रेष्ठ हों, एतदर्थ वह वन तथा उपवन में जाकर इन सामग्रियों को एकत्र करता था। एक दिन जब वह वन से पूजन सामग्री एकत्रित कर घर लौट रहा था, तो उसने देखा एक कुंज में कोई युवक स्त्री के साथ प्रेम में लिप्त था। अजामिल ने संस्कारवश अपने आपको यह देखने से रोकने का भरसक प्रयत्न किया किन्तु सफल न हो सका।

वह बार-बार इस प्रेम प्रसंग को देखकर आनन्दित होने लगा। बाद में उसने स्त्री से परिचय प्राप्त किया, और यह ज्ञात होने पर कि वह वैश्या है, अजामिल प्रतिदिन उसके यहाँ जाने लगा। संसर्ग से धीरे-धीरे उसके सत्कर्म प्रभावित होने लगे और वह वैश्या की प्रत्येक कामना की तुष्टि के लिए तरह-तरह के दुष्कर्मों में लिप्त होता गया। उसने चोरी, डकैती और लूट-पाट शुरू कर दी। हत्याएँ करने लगा तथा किसी भी प्रकार से धन प्राप्ति हेतु अन्यायपूर्ण कर्म करके उसे सन्तुष्टि प्राप्त होने लगी। स्थिति यह हुई कि वैश्या से उसे नौ पुत्र प्राप्त हुए तथा दसवीं सन्तान उसके गर्भ में थी। एक दिन कुछ सन्तों का समूह उस ओर से गुजर रहा था। रात्रि अधिक होने पर उन्होंने उसी गांव में रहना उपयुक्त समझा, जिसमें अजामिल रहता था। गाँव वालों से आवास और भोजन के विषय में चर्चा करने पर, गाँव वालों ने मजाक बनाते हुए साधुओं को अजामिल के घर का पता बता दिया। सन्त समूह अजामिल के घर पहुँचा।

अजामिल तो घर पर था नहीं। गाँव वालों ने सोचा था आज ये साधु निश्चित रूप से अजामिल के द्वार पर अपमानित होंगे तथा इन्हें पिटना भी पड़ेगा। आगे से ये स्वयं ही कभी इस गाँव की ओर कदम नहीं रखेंगे। सन्त मण्डली ने उसके द्वार पर जाकर राम नाम का उच्चारण किया घर में से उसकी वही वैश्या पत्नी बाहर आई और साधुओं से बोली—‘‘आप शीघ्र भोजन सामग्री लेकर यहां से निकल जायें अन्यथा कुछ ही क्षणों में अजामिल आ जायेगा और आप लोगों को परेशानी हो जायेगी।’’ उसकी बात सुनकर समस्त साधुगण भोजन की सूखी सामग्री लेकर उसके घर से थोड़ी ही दूरी पर एक वृक्ष के नीचे भोजन बनाने का उपक्रम करने लगे। भोजन बना, भोग लगा और सन्तों ने जब पा लिया तब विचार किया कि यह भोजन किसी संस्कारी ब्राह्मण कुलोत्पन्न के घर का है किन्तु समय के प्रभाव से यह कुसंस्कारी हो चला है।

सन्तों का हृदय कृपालु होता है और वे किसी से कभी कोई वस्तु स्वीकार करने पर उसे हजार गुना करके ही वापस करते हैं। सभी सन्त वापस अजामिल के घर पहुँचे। आवाज दी पुनः उसकी स्त्री ही बाहर आई। उन्होंने कहा—‘‘बहन हम तुमसे एक बात कहने आये हैं। ‘‘स्त्री ने कहा—‘‘कहें।’’ ‘‘तुम्हारे यहाँ जन्म लेने वाले शिशु का नाम ‘नारायण’ रख देना,’’ संतगणों ने कहा। तब स्त्री बोली—‘‘मैं वचन देती हूँ।’’ सन्त चले गये। ईस्वरेच्छा से उसकी दसवीं सन्तान भी पुत्र हुई, और स्त्री ने उसका नाम ‘नारायण’ रख दिया। छोटा होने से वह सभी को बहुत प्रिय था।

अजामिल का अन्त निकट आने पर वह अपने मुख से ‘नारायण’ को ही पुकार रहा था । यमदूत उसे लेने आये और भगवान् नारायण भी उसे लेने आ गये। संवाद हुआ। यमदूतों ने कहा—‘‘भगवान् यह दुष्ट है, पापी है और हम इसे लेने आये हैं।’’ भगवान् ने कहा—‘‘इसने शरीर छोड़ते समय मुझे बड़े प्यार से बुलाया है। मैं ही इसे ले जाऊँगा।’’ अन्त में उसे प्रभु ही अपने साथ ले गये।

ईश्वर नाम में वह चमत्कार है जिससे अजामिल जैसे अधम और पातकी भी ईश्वर को प्राप्त हो जाते हैं। इस संसार में सभी को दिन-रात काल का ग्रास बनते हुए देखकर भी मनुष्य विचार नहीं करता कि, मेरी भी एक दिन इसी तरह की गति होगी। इस पृथ्वी पर आने वाले प्रत्येक प्राणी को किसी न किसी दिन यहाँ से विदा होना है। यह संसार एक धर्मशाला है, जिसमें अपना कुछ समय बिताने के लिए हम यहाँ आते हैं। यदि मोह में पड़कर हम इस पर कब्जा करने का विचार करने लगेंगे तो निश्चित रूप से धकिया दिये जायेंगे। यहाँ तो आकर अपना सम्पूर्ण जीवन ईश्वरभजन में ही बिताना समझदारी है।

ईश्वर भजन में सबसे श्रेष्ठ कार्य भगवन्नाम स्मरण है। उनके नाम के निरन्तर जाप से वे प्रसन्न होकर स्वयं अपने भक्त को सँभाल लेते हैं। समस्त जीव उन्हीं पुरुषोत्तम भगवान् से जन्म लेते हैं और अन्त में सब कुछ उन्हीं में लीन हो जाना है।
भगवान ही समस्त सृष्टि के आधार हैं तथा सभी प्राणियों पर कृपा करके उनसे सारे दुःखों का नाश कर देते हैं । उनके विविध नामों का जप करने से उनके विराट स्वरूप का दर्शन धीरे-धीरे होने लगता है। उनके एक नाम के अनन्त अर्थ हैं। इसलिए भगवान् का नाम ही सार्थक है, शेष सभी निरर्थक। शबरी, प्रह्लाद, ध्रुव, मीरा आदि अनेक भक्त हुए हैं, जिन्होंने अपने प्यारे का नाम स्मरण करके अपने साथ ही सभी के उद्धार का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया। संसार के सम्बन्धों की अपेक्षा भगवान से सम्बन्ध बनाओ। जिनता हो सके भगवन्नाम का जप करो उनकी लीलाओं का श्रवण करो। अपनी परम प्रिय वस्तु में जितनी आसक्ति तुम्हें होती है उससे भी अधिक प्रभु में करो। सारे सहारे जवाब दे जायेंगे तब वही एक सहारा बचेगा। तब क्यों नहीं आज और अभी से उनका नाम स्मरण प्रारम्भ कर दें। अजामिल के लिए जब वे आ सकते हैं तो हम उनकी श्रेष्ठ सन्तान हैं। इसलिए प्रेम से बोलो, बार-बार बोलो और बोलते ही रहो—‘नारायण-नारायण !’

महामण्डलेश्वर पूज्यपाद श्री श्रीगिरिजानन्द जी सरस्वती
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जो व्यक्ति नित्य ईश्वर स्मरण करता है उसे मृत्यु के समय भी उनका स्मरण होता है और प्रभु उसका उद्धार करने अवश्य आते हैं।


मोक्ष प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए

एक राजा था फिर भी योगी जैसा जीवन जीने वाला था। उसके राज्य की प्रजा बड़ी सुखी थी। प्रजा को राजा के ऊपर बड़ा ही प्रेम था, कारण कि राजा प्रजा के सुख और दुःख का हमेशा ध्यान रखता था। प्रजा के सुख के लिए वह हमेशा सभी कुछ न्यौछावर करने हेतु तत्पर रहता था ऐसा राजा कौन-सी प्रजा को अच्छा नहीं लगता ?

राजा को धन का अभिमान नहीं था, वैभव में रस नहीं था, राज्य की धरती बढ़ाने का कोई विचार नहीं था, न ही रानी के साथ बातचीत करने में आनन्द ही था कारण कि उसके मन में एक ही वस्तु की तमन्ना जाग उठी थी और वह वस्तु अर्थात् ‘‘मोक्ष !’’ मोक्ष कैसे मिले ? इस संसार के अनन्त दुःखों से मेरा छुटकारा (मोक्ष) कैसे हो ? यही उसके हृदय की प्रत्येक पल की अभिलाषा थी। वह रोज धर्मसभा करता था, विभिन्न धर्मों के पण्डितों को तथा धर्मगुरुओं को बुलाता था, सभी के साथ धर्म की चर्चा करता, जिज्ञासा भरे सवाल करता और अन्त में मुख्य सवाल यह पूछता कि ‘‘मेरा मोक्ष किस प्रकार से हो ? मोक्ष प्राप्त करने के लिए मुझे कौन से मार्ग पर जाना चाहिए ?’’

प्रत्येक विद्वान अपनी-अपनी समझ के अनुसार जवाब देता था परन्तु अभी तक किसी का भी जवाब राजा के हृदय में बराबर उतर नहीं पा रहा था। वर्ष बीत गये और राजा की मुसीबत बढ़ती गई। उसकी बेचैनी बेहद बढ़ गई किन्तु राजा का मोक्ष तो फिर भी नहीं हुआ। एक दिन एक सन्त नगर में आए, राजा ने सन्त को आमन्त्रण दिया सन्त राजसभा में पधारे। राजा ने उनके पास भी धार्मिक प्रवचन सुना और अन्त में अपना वही महत्व का प्रश्न पूछा। ‘‘गुरुजी ! मेरा मोक्ष किस प्रकार होगा ?’’ सन्त बोले—‘‘आज हमको इस प्रश्न की चर्चा नहीं करनी, चार दिन में बराबर विचार करके तुमको जवाब दूँगा।’’ और फिर अपने निश्चित निवास स्थान पर सन्त चले गये। मध्य रात्रि में जब दो बजे, तब सन्त जागे और सीधे राजमहल की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। सन्त राजमहल की विशाल छत पर जाकर खड़े रहे, इधर राजा अपने शयन खण्ड में जाग रहा था, उसने छत पर किसी के चलने की आवाज सुनी। वह शीघ्र ही छत पर आया और जोर से चिल्लाकर बोला ‘‘कौन है ?’’

शीघ्र ही सन्त राजा के पास आकर खड़ा हुआ। रात्रि में दो बजे सन्त को छत पर आया हुआ देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। राजा के पास आकर सन्त बोले—राजाजी। मैं अपने साथ ऊँट लाया था और मेरा वह ऊँट खो गया है अतः यहाँ इस छत पर से ढूँढ़ने आया हूँ।’’ सन्त की इस बात को सुनकर राजा एकदम हँस पड़ा और बोला—‘‘अरे महात्मन ! आप इतने समझदार होने पर भी इतना भी नहीं समझ सकते, कि राजमहल की इतनी ऊँची छत पर ऊँट भला कैसे चढ़ सकता है ?’’

राजा की बात सुनकर तुरन्त ही सन्त बोले ‘‘तो क्या राजन ! राजमहल में बैठे-बैठे भी कभी मोक्ष मिलता होगा मोक्ष प्राप्त करने के लिये राजसुखों, वैभव का त्याग करके सन्त बनना पड़ता है, एवं उच्च कोटि का साधु जीवन बिताना पड़ता है, ऐसे ही चर्चा करने से सवालों को पूछने से मोक्ष कभी नहीं मिलता है।’’ और समझदार राजा को यह बात अन्तर में उतर गई राजा दूसरे दिन सुबह में ही सन्त के चरणों में झुककर उनका शिष्य बन गया। अतः मोक्ष की साधना करने के लिए बड़ी महान साधना करनी पड़ती है। साधना किये बिना, पुरुषार्थ साधे बिना, कभी भी फल मिलता नहीं है, और उसमें भी मोक्ष प्राप्त करने के लिए तो धर्म का बहुत ही ऊँचे भाव से आचरण करना चाहिए, तब ही मोक्ष मिलता है।

धनंजय जैन


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