देहरी के पार - विवेकी राय Dehari ke Par - Hindi book by - Viveki Rai
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देहरी के पार

विवेकी राय

प्रकाशक : ग्रंथ अकादमी प्रकाशित वर्ष : 2003
आईएसबीएन : 81-88267-09-0 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :203 पुस्तक क्रमांक : 1633

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प्रस्तुत है श्रेष्ठ उपन्यास...

Dehri Ke Paar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘‘अच्छा, एक बात बताओ, चोट मात्र कंधे पर है और साधारण ही है तो इतने लोग यहां क्यों इकट्ठे हैं ?’’
‘‘मेला है न ! जो उधर से लौटता है, यहाँ हाल-चाल पूछने आ जाता है। गाँव में बहुत हिले-मिले रहते हैं ज्ञानेश्वर बाबू, बहुत लोकप्रिय हैं। जो सुनता है चोट की खबर, दु:खी होता है !...अब आप लोग देर न करें। दिन शेष नहीं है।’’
‘‘अच्छा, बस एक और शंका है, बच्चे ! ये बाबा इतने अधीर होकर तथा फफक-फफककर लगातार रो क्यों रहे है ?’’

जब तक वे वहाँ पहुंचे, एक भारी भीड़ पहुंच गई। एक ऐसी भीड़, जिसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही हैं। उत्तर जानते हुए भी शोकाकुल के चेहरे पर वही प्रश्न-कैसे क्या हुआ ? शिवरात्रि के अवसर पर घटित इस अशिव दिन ने पूरे गाँव-जवार को कँपा दिया। शोक-त्रास और अशुभ-अमंगल चरम सीमा पर पहुँचकर लोगों को इस प्रकार भीतर से मथने लगा कि उसकी अभिव्यक्ति गहरी खामोशी में होने लगी। अधिक देर कहाँ लगी, थोड़ी देर में ही सारी स्थिति सर्वत्र साफ हो गई। एक अति छोटे क्षण की छोटी सी चूक, जो एक घटना के रूप में परिवर्तित हुई और फिर एक दुर्घटना के रूप में उसकी परिणति ऐसी हो गई कि उसका जिक्र करते भी लोग काँप जाते हैं। उसका नाम मुँह से नहीं कढ़ता। जितना बन पड़ता है, लोग उसे छिपाते हैं।

मैं महसूस करता-ये कंधे बहुत मजबूत हैं; हम सबको, पूरे परिवार को सुरक्षित जीवन-यात्रा के लिए आश्वस्त करते हैं। एक गर्व भीतर कहीं सिर उठाकर मचलता है-यह मेरा पुत्र नहीं, मित्र है, अभिभावक है और पिता के अभाव की पूर्ति करता है।...मैंने अपने पिता को तो नहीं देखा, वे मेरे जन्म के डेढ़-दो मास पहले ही परलोकगामी हो गए, किंतु इस पुत्र को देख रहा हूँ, ऐसे ही वे रहे होंगे।..हाँ, तू ऐसा ही है कि मैं निश्चिंत हूँ

इसी उपन्यास से

एक
अनुत्तर यात्रा


वह दिन रोज की तरह नहीं था। उस दिन महाशिवरात्रि थी। लेकिन इस पर्व का कोई रोमांच मेरे भीतर नहीं था और न ही भक्तिभाव की कोई लहर उठ रही थी। एक प्रकार का धुंधग्रस्त और मलिन आलस उच्चाटित मन पर छाया हुआ था।
जैसे-तैसे नित्य-क्रिया के लिए छत परवाले बाथरूम की ओर मैं बढ़ा। पैर उठ नहीं रहे थे। सीढ़ि़यों पर चढ़ते में लगा, भारीपन है, स्नान करना हानिकारक हो सकता है। कपड़े बदलकर पूजा कर लेंगे। आलस-भाव जब कहीं से उठता है तो उसे अनुकूल तर्क, विकल्प और समाधान भी मिल जाते हैं।

तभी भीतर से विरोध उठा-यह गलत है। आज इस सनातन पर्ववाले महापवित्र दिन की मर्यादा और परंपरा का पालन होना ही चाहिए। स्नान होना चाहिए, शंकर भगवान् की पूजा होनी चाहिए, गंगाजल, अक्षत, धतूरे के फल-फूल और बिल्व-पत्र आदि उन्हें अर्पित होने चाहिए। गाँव में रहते हुए लगभग आधी आयु तक इस परंपरा का निर्वाह हुआ है। तब गंगाजल पड़ोस से मिल जाता था। नियमित रूप से अनेक लोग एक दिन पूर्व आठ-दस किलोमीटर दूर गंगातट तक पहुँचते थे और फिर वहाँ से जल भरकर लाते थे। एक भक्त द्वारा लाया पावन जल अनेक भक्तों के काम आता था।
बचपन का यह संस्कार क्या स्लेट पर लिखी इबारत की भाँति पोंछकर साफ किया जा सकता है ? नहीं, वह पत्थर की लकीर-सा चेतना पर अंकित है; परंतु क्या हुआ कि उसका दबाव भी निष्प्रभावी हुआ ? चाहकर भी स्नान नहीं कर सकने के लिए मन ने बहाना बना लिया कि बाद में चलकर भोजन के पूर्व यह कार्य हो जाएगा। मगर शिवजी का दर्शन ? क्या आज मंदिर में चलकर दर्शन भी नहीं होगा ? उत्तर किस धुंध में डूब गया।

बार-बार वही बोझिल, आलस वे ही टालू बहाने, वही अपराध-बोध। अरे रात का अपवित्र शरीर और सुबह का यह दुर्बलता भरा प्रमाद ! क्या हो गया है तुम्हें ? सबकुछ अज्ञान को ही सौंप उसके हाथों नाचोगे ? अच्छा, नाचो।
शौच के लिए लैट्रिन पॉट पर बैठा तो उसके भीतर कहीं छिपी छिपकली उछलकर बाएँ पैर से पीठ पर होते ऊपर चढ़ती खर-खर कर एक क्षण में सिर तक पहुँच गई और फिर वहाँ से उछाल लेकर फर्श पर कूद गई।
अरे, यह क्या हुआ ? शुभ या अशुभ ? या कुछ भी नहीं, यों ही एक घटी सामान्य घटना ? यदि आहट पाकर पॉट के भीतर से भयभीत छिपकली निकल भागी तो इसमें शुभ-अशुभ क्या ? यह सब मन की दुर्बलता है। जो होना होता है वही होता है। इसमें छिपकली की क्या भूमिका होगी ? इस अंधविश्वास की गली में मत अटक हे मेरे मन ! यह मथकर बुरी तरह निचोड़ देती है।

लेकिन जबरदस्त निकली उस गली की वह छिपकली। नीचे आकर मैंने देखा, वह चिंताहरण जंत्री और पंचांग में अपना फलादेश लेकर बैठी है।..ऐसा अशुभ फलादेश ? अंतत: गली की भटकन गले पड़ी। अरे, छत पर उतरते ही न चाहते हुए कैसे मैं पंचांग लेकर बैठ गया ?
जंत्री लेकर पुन: टेबल पर बैठा। इसे चाय पीकर जरा ठीक से देखूँगा। चाय स्वयं ही बनानी थी। चाय ही क्यों, भोजन भी बनाना था। बड़ी बहू बच्चों के साथ अपने नैहर गोरा बाजार गई है। वहाँ इस त्योहार पर हर साल की तरह इस साल भी अखंड रामायण पाठ और हवन आदि का आयोजन है। बड़ा लड़का ज्ञानेश्वर विश्वंभरपुर गया है। नौकर गाँव गया है। मेले का लालच था।
आज के दिन गाँव के पासवाले गाँव कारों में मेला लगता है। यहाँ कवलेश्वर महादेव हैं। कहते हैं, यहीं शिव ने कामदेव को भस्म किया था। सो, वहाँ के मेले का आकर्षण जबरदस्त है। और मैं ? कहीं नहीं गया। सन्नाटे में डूबे और किसी अकेलेपन के अज्ञात मनहूस दबाव को झेलते आवास में पड़ा हूं।

आकर्षण मेरे भीतर भी कम नहीं था; मगर उस दिन पता नहीं क्या हो गया था ? किसी भी प्रकार की पवित्र पर्व संबंधी भावना से हीन, धुंधग्रस्त, आहत, दबा और मूर्च्छित मन लिये टेबल पर बैठा था भूत जैसा अकेला। घर के सूनेपन ने उस दिन पहली बार धक्का दिया था। जंत्री और पंचांग ने बारंबार भयभीत किया था तथा मन ने बारंबार अपने तर्कों द्वारा सुरक्षा भी प्रदान की थी। छिपकली वाली घटना को मैं वास्तव में भूल जाना चाहता था। वह भूलने ही लायक थी।
जैसे-तैसे चाय बनी, जैसे-तैसे उसे पी गया-परम उच्चाटित सा। बारंबार अपने भीतर स्वयं से एक सवाल पूछता था-शरीर में आज क्यों ऐसा लग रहा है कि दम नहीं है ? कोई उत्तर नहीं था। उसी तरह बेदम, कुछ भोजन बना जैसे-तैसे। एक उत्तर मन ने दिया-यह अकेलेपन से उपजी अशांति है, जो शरीर पर उतरकर ऐसा महसूस कराती है। संभवत: अब पहले जैसा अकेले में रमनेवाला मैं नहीं रहा।

बाहर अखबार आने की आहट मिली। कोई उत्सुकता नहीं ? क्या पढ़ना है ? सब बेकार है। देश पीछे जा रहा है। आज अखबार के प्रति विद्रोह। नहीं पढ़ेंगे उसे।..हुआ करे वह अकेले का मित्र। आज ऊब-उदासी की दोस्ती में रहूँ। अखबार पढ़ना जरूरी नहीं है। लेकिन करें क्या ? रोटी-सब्जी का समय हुआ नहीं। समय कुछ भारी, कुछ थमा हुआ और अपरिचित होकर भयभीत कर रहा था। आधुनिक साहित्य में इसे ‘अकेलापन’ कहेंगे ‘अजनबीपन’ कहेंगे, ‘ऊब-उदासी’ कहेंगे। हाँ, तनाव जैसा कुछ नहीं था।
तो वास्तव में और क्या था उस दिन कि घंटे भर तक अखबार के सामने बैठा रहा और पढ़ता भी रहा परंतु वास्तव में कुछ पढ़ नहीं सका ? अरे, नौ बज गए ! बेकारी से त्राण पाने के लिए अंतत: अखबार सामने खींचकर बैठा ; परंतु बैठा ही रह गया।

अचानक याद आया। आज लड़का ज्ञानेश्वर नौ बजे तक आ जाने वाला था, आया नहीं। क्या वहाँ से मेले के आकर्षण ने खींच लिया ? उसका कितना जबरदस्त लगाव है अपने गाँव से ? मगर आज तो स्थिति कुछ और है। यहाँ पर उसकी ससुराल गोरा बाजार में जो अखंड रामायण का पाठ चल रहा है, उसमें उसे सम्मिलित होना है। बहू कल ही जा चुकी है। बच्चे भी गए हैं। लोग उसे भी रोक रहे थे, मगर भानजी मीनू को इस पर्व पर उसके गाँव विश्वंभरपुर पहुँचाना उसे आवश्यक लगा। विद्यालय से लौटकर मध्याह्न में आया और खा-पीकर कुछ आराम करने के बाद अपराह्न की ट्रेन से बिना किसी पूर्वयोजना के अगले दिन सुबह की ट्रेन से लौट आने के लिए कहकर मीनू के साथ निकल गया। वहाँ जाने के लिए तैयार होकर एयर बैग कंधे पर लटकाए, जल्दी-जल्दी आकर पैर छूने लगा तो मैंने जाना कि विश्वंभरपुर जा रहा है। आश्चर्य हुआ, विद्यालय से आया और चटपट तैयार ! यही उसकी स्टाइल है। पल भर में यात्रा का निर्णय लेता है और फिर बेरोक सफर संपन्न हो जाता है।

भीतर से पुन: गहरी चिंता उठी-वह आया क्यों नहीं ? पुन: भीतर से ही समाधान उठा-लगता है, मेले में चला गया। यद्यपि कहकर गया था कि मेले में नहीं जाऊंगा और विश्वंभरपुर से प्रात: चलकर नौ बजे तक यहाँ पहुँच जाऊंगा। तब भी यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि मेले के इतने निकट, मात्र चार-पाँच किलोमीटर की दूरी पर पहुँचने के बाद उसके आकर्षण से अप्रभावित रह पाना वैसे भावुक व्यक्ति के लिए सरल नहीं होगा। तिसपर भी बचपन से लेकर अब तक का सालोसाल का सुदृढ़ संस्कार है। आज वहाँ अपने गाँव के आबाल-वृद्ध-वनिता सभी जन जुटे होंगे। उसकी माताजी भी आई होंगी। अड़ोस-पड़ोस के गाँव के सारे चेहरे मेले में उतरे होंगे। सबसे बड़ी बात शिवभक्ति की रही। वैसे पौराणिक महत्ववाले सिद्धपीठ के पास पहुंचकर अपने गाँव के पूज्य कवलेश्वर महादेव को कैसे पीठ दिखाकर चला आए ? वह अवश्य ही वहीं चला गया होगा-और कुछ विलंब से आएगा। उसके लिए चिंता करना बेकार है।

इस चिंतन से चिंता घटी। ज्ञान बाबू की ससुराल में चल रहा कार्यक्रम तो चलता रहेगा, कुछ विलंब से पहुँचने पर भी सम्मिलित हुआ जा सकता है; परंतु शिवभक्त मंदिर के द्वार तक पहुँचकर जो चूक जाता है तो फिर चूक ही गया। नहीं, वह चूक नहीं सकेगा, अवश्य दर्शन करेगा। अभी, छह मास पहले ही तो उसने सावन में ‘काँवरिया’ बनकर ‘बोल बम’ का नारा लगाते हुए बाबा वैद्यनाथ धाम जाकर बाबा को गंगाजल चढ़ाया था।

मेज के पास अकेले बैठे-बैठे अज्ञात ऊब-उदासी और छिपकली कांड के मानसिक दबाव में डूबे-डूबे छह महीने पहलेवाला उक्त प्रकरण जब स्मरण आया तो भीतर का गहन अँधेरा कुछ छँटा। मन चमक उठा। सुखद यादों में बहुत बल होता है। वे क्षण-मात्र में क्या से क्या कर देती है ! याद आया कि सुलतानगंज से गंगाजल की ‘काँवर’ भर पूरे विधि-विधान को निभाते पैदल लगभग एक सौ किलोमीटर दूर बाबा वैद्यनाथ धाम तक की यात्रा उसने संपन्न की थी। वह सावन का शुक्ल पक्ष था। लड़के के साथ पटना से उसकी बहन संतोष और जीजाजी बद्री बाबू भी ‘काँवर’ उठाकर गए थे। काँवरिया बनकर जल ले जाते समय का एक चित्र भी है। उसमें एक विशेष प्रकार की वेषभूषा में काँवरिया बना कंघे पर काँवर रखे यात्रा करते लड़के का चित्र जब देखता हूँ, तब एक विस्मयपूर्ण सुखद अनुभूति होती है। तीनों जब बाबा धाम पहुंचे तो रात में फोन आया-लगभग एक लाख भक्त मंदिर-परिसर में जलाभिषेक के लिए एकत्र हैं और इससे अधिक ‘काँवरिया’ रास्ते में हैं। अथाह भीड़ में कठिन लग रहा है जल चढ़ाना।

पुन: दूसरे दिन शाम को फोन आया-जल चढने वाली क्रिया आज रात में बाबा की कृपा से संपन्न हो गई। किंतु यहाँ गाजीपुर में हम लोगों ने फोन आने के पूर्व ही समझा लिया था कि भगवान् भोलेनाथ की असीम कृपा से जल सकुशल चढ़ गया है और बाबा ने भक्त ज्ञानेश्वर का जलाभिषेक स्वीकार कर लिया है।
उक्त ‘समझ’ उसी दिन के एक घटनात्मक आभास से हुई थी। घटना लगभग तीन बजे दिन की थी। अब भी उसके स्मरण मात्र से रोमांच हो जाता है।

उस दिन महाशिवरात्रिवाली गहन उदासी भरी मनहूस सुबह की वेला में टेबल के पास उदास बैठे-बैठे छह मास पहले वाली वह अपराह्न वेला यादों पर अचानक चढ़ी तो सचमुच रोंगटे खड़े हो गए। ठीक इसी दिन की भाँति उस दिन भी मैं संयोग से आवास पर अकेला था। बहू और बच्चों का दल विद्यालय से लौटा नहीं था। नौकर कहीं बाहर गया था। थोड़ी देर पहले तक मूसलधार पानी बरस रहा था। पानी थम जाने के बाद उमस भरा सन्नाटा छाया हुआ था। समय का उपयोग करने के लिए मैं कुछ पत्रों के उत्तर लिख रहा था। कई दिनों के अनुत्तरित पत्र सामने पड़े थे।

एक बात और। ठीक इसी दिन की भाँति उस दिन भी भोजनवाले टेबल पर दक्षिण की ओर बैठा था। आज सामने अखबार पड़ा है और उस दिन पत्र पड़े थे। मन का योग उस दिन भी काम से नहीं हो पाता था। बड़ी देर तक सामने उत्तर की ओर सीढ़ी को निहारता रहा इसी से होकर छत पर जाना होता है। सीढ़ी लोगों को ऊपर ले जाती है, सीढी नीचे लाती है। यह सीढ़ी हमें ढो रही है कि हम इसे ढो रहे हैं ? सीढ़ी एक कविता है।
सीढ़ी के बारे में सोचते-सोचते कब टेबल पर सिर झुकाकर मैं कहीं खो गया, यह पता नहीं चला। अनुभव बताता है कि प्राय: चलते समय या बैठे-बैठे सिर झुका रहता है तो सांसारिक चिंतन-चक्र बहुत तेजी से चलने लगता है। मन डूब जाता है। मैं भी तब कहीं डूबा था और इसी प्रकार डूबे-डूबे कुछ देर बाद सिर उठाय़ा तो जो कुछ देखा, वह अकल्पित और महाभयानक था।

चार सीढ़ी ऊपर, ठीक मेरे सामने एक बहुत बड़ा महाभयानक साँप फन काढ़े बैठा था। फन कुंडली से लगभग एक फुट ऊँचा था। उसकी आँखों की चमक बहुत दहशत पैदा करती थी। कहाँ से आया, कब आया, किधर से आया, तब आकर बैठ गया और क्यों ठीक सामने इस प्रकार निश्चल, निस्पंद मूर्तिवत् बैठा है ? क्या इरादा है ? इस प्रकार के प्रश्न मेरे एकांत को प्रकंपित, उत्तेजित और भयग्रस्त करने लगे।
याद आया, लोग कहते हैं कि निर्भय होकर सांप की आँखों में आँखें डाले रहो, वह कोई हानि नहीं पहुँचाएगा। यह प्रयोग मैंने भी किया; मगर मन भयमुक्त कहाँ रह सका था। लगता था, वह उस सीढ़ी से एक छलाँग लगाएगा और मैं उसकी गिरफ्त में होऊँगा। तब क्या करूँ ? ऐसे ही बैठा रहूँ ? भागूं ? सुरक्षा के लिए किसी को पुकारूं ? या उसे भगाने की युक्ति सोचूँ ? मारने के लिए तो सोच भी नहीं सकता था। वह साक्षात् काल था, महाशक्तिशाली महाकाल।

तब क्या करूँ ? स्तुति करूँ ? उचित यही लगा। तभी एक विचार मन में चमक उठा और दूर तक चमकता चला गया। उसके प्रकाश में ऐसा कुछ सूझने लगा जिसके बारे में क्षण भर पहले कुछ सोचा नहीं था और जो सर्वथा भयमुक्त करने वाला था।...अरे, यह काल नहीं अकाल पुरुष का आलोक है; महाकाल साक्षात् शिव बाबा वैद्यनाथ का पार्षद। हाथ जोड़कर बैठे-बैठे सिर झुक गया। आज बाबा ने भक्त की पूजा, उसका जलाभिषेक वहाँ स्वीकार कर लिया, यह उसकी सूचना है, भय नहीं, हमारे भक्ति-भाव भरे आह्लाद का प्रकरण है। धन्य भाग्य संदेशवाहक का शुभ दर्शन मिला।
ऊपरी तल पर मन भक्ति-भाव में डूबा था, भीतर भी डूबना चाहता था; मगर वहाँ अज्ञात रूप से जो भय का भाव जमा था वह खिसक नहीं रहा था। हाँ, जिस समय हाथ जोड़कर मैं स्तुतिरत था उसी समय देखा कि वह साँप फन झुकाकर नीचे मुड़ा और सरसर-सरसर सीढ़ी के नीचे से उतरकर स्नान घर की ओर जाने लगा।

मैंने राहत की सांस ली। हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए बोला. ‘‘जय हो भोले बाबा!’’ मन में भाव उठा, अवश्य ही यह ऐसा है। अपने इस भाव पर विश्वास करना चाहिए, इसके ऊपर दृढ़ रहना चाहिए, अज्ञात के इस संकेत-संदेश को समझना चाहिए, तर्क-वितर्क और आशंका-शंका को उतार फेंकना चाहिए। दृश्य के पीछे ऐसा बहुत कुछ है; बल्कि यों कहना चाहिए कि सबकुछ है, जो अदृश्य है। संसार की हर भौतिक घटना के पीछे कोई अभौतिक निहितार्थ होता है। कुछ भी अचानक नहीं, सबकुछ अदृश्य के हाथों सुनियोजित है। तो, मन को अब इस जमीन पर दृढ़ रहना चाहिए।
इतने पर भी मैं अभी कुरसी छोड़ नहीं रहा था। कुछ मिनट बीते तो उत्सुकता जगी कि देखें, भोले बाबा कहाँ गए हैं ? आगे बढ़ा तो लगा, भक्ति को शायद अभी भी भय दबा रहा है। पता नहीं वास्तविकता क्या है ?

मन में विचार आया, सोंटा लेकर आगे बढ़ना चाहिए। कोठरी में सोंटा पड़ा था। सावधानी से उसे उठाया, फूँक-फूँककर आगे बढ़ा। सीढ़ी के नीचे कहीं कुछ नहीं, बाथरूम में कुछ नहीं, फिर नाली में सरकने का कोई चिह्न नहीं और बाहर भी बहुत खोजने पर कहीं कोई पता नहीं। कहाँ अंतर्धान हो गया ? उसी प्रकार हाथ में सोंटा लिये फिर-फिर गहन छानबीन की। कोई सुराग नहीं। बाहर फाटक खोलकर गली में झांक लिया। कोई हलचल नहीं। धत्तेरे की। शिव को साँप मान सोंटा लेकर मैं पीछे पड़ गया। कितनी बड़ी भूल हुई। क्षमा करना हे देव। वास्तव में मैंने अब यह मान लिया कि वह बाबा वैद्यनाथ का संदेशवाहक स्वयं शिव-रूप था।

धीरे-धीरे उसका भय मेरे भीतर से समाप्त हो गया। यहाँ तक कि बहू और बच्चे जब गोरा बाजार से आए तो मैंने उस घटना का जिक्र भी नहीं किया। यह भी नहीं कहा कि रात में सावधानी से रहना, एक महाभयानक साँप यहाँ दिखा है। हाँ, यह मैंने बहुत विश्वास के साथ कहा कि वहाँ वैद्यनाथ धाम में ‘बाबा’ ने भक्त का जलाभिषेक स्वीकार कर लिया है। यह संदेश हमें एक ‘देवदूत’ द्वारा मिल गया है। उन लोगों ने इस देवदूत के बारे में विस्तार के साथ जानना चाहा तो मैंने कह दिया कि उसे बाद में बताऊंगा। और हुआ भी ऐसा ही बीच में कोई चर्चा नहीं हुई। घटना को मैं पी गया।

इस महाशिवरात्रि के दिन गहन उदासी और अज्ञात अवसाद-आशंका के एकाकी क्षणों में छह मास पूर्व की वह घटना बैठे-बैठे क्षण भर में आँखों के सामने बैठ गई। मन ने एक सवाल उठाया-आज की इस छिपकली और उस दिन के नागराज में क्या कोई संबंध है ? अगर हाँ, तो क्या संबंध हो सकता है ? और फिर, इस प्रकार की दिमागी कसरत करने की, जबरदस्ती संबंध घटाने की जरूरत क्या है ? हमें कल्पना में जीने की बजाए यथार्थ का सामना करना चाहिए।
तो क्या है आज का यथार्थ ? मैंने सोचा-पहली बात यह कि आज एक महान् पर्व है और मैंने स्नान नहीं किया है। शरीर अपवित्र है, मन अति उदास है। एकांत का कोई अज्ञात आशंकित दबाव निरंतर मुझे निचोड़े जा रहा है। उठकर चलूँ स्नान करूं तो संभवत: कुछ स्फूर्ति आए। मैंने ऐसा सोचा तो अवश्य, मगर उठ नहीं सका। अनमने, अलसाए हुए अखबार खोलकर पुन: समाचारों पर झूठे-मूठे तैरने लगा। बीच-बीच में स्नानवाली लहर भीतर हलके-हलके उठती रही, परन्तु हर बार मन कहता-हो जाएगा स्नान, क्या जल्दी है ! पूरा दिन अपना है।

इसी बीच बाहर घंटी बजी। कोई आ गया। द्वार पर खड़ा है। मगर उठते नहीं बन रहा था। अब आज अकेले होने का दंड था कि उठना पड़ेगा, जाना पड़ेगा और फाटक खोलना पड़ेगा।
देखा-डॉ.शकुंतला राय हैं।
‘‘आइए।’’ कहते हुए दरवाजा भिड़ाकर मैं चुपचाप मुड़ गया और आकर पुन: कुरसी पर निर्भाव बैठ गया। वे भी अपना बैग टेबल पर रखकर सामने वाली कुरसी पर चुपचाप बैठ गई। उनका कुछ उड़ा-उड़ा उतरा हुआ अति गंभीर चेहरा बता रहा था कि बात कुछ है।

‘‘क्या समाचार है ?’’ सन्नाटा भंग करते हुए मैंने पूछा।
उत्तर में उन्होंने अपने बैग से कागज का एक पुरजा निकाला और उसे हाथ में लिये-लिये कुछ सहमकर पूछा, ‘‘क्या कोई यहाँ से विश्वंभरपुर गया है ?’’
‘‘हाँ, गया तो है, लड़का ज्ञानेश्वर गया है और उसे अब तक आ जाना चाहिए था, मगर आया नहीं। लगता है शिवरात्रि के मेले में चला गया। आज तो वहाँ अपना सारा गाँव जुटा होगा। खैर, आप क्यों पूछ रही हैं ? क्या बात है ?’’ कुछ आशंकित होकर मैंने पूछा।
‘‘और बहू कहाँ है ? बच्चे भी नहीं दिखाई पड़ रहे हैं ?’’ फिर कुछ बात नहीं, कुछ प्रश्न ही सामने आए।

उलझन जैसी लगी, परंतु मैंने शांतिपूर्वक उत्तर दिया, ‘‘सभी गोरा बाजार गए हैं, बहू विनीता राय के नैहर। वहाँ आज महाशिवरात्री के अवसर पर अखंड रामायण पाठ चल रहा है।...पाठ में सम्मिलित होने के लिए ही विश्वंभरपुर से ज्ञानेश्वर को आ जाना चाहिए था; मगर अब तक नहीं आया।...अरे हाँ, आप वहाँ क्यों किसी के जाने के बारे में पूछ रही थीं ?’’
‘‘क्या बताएँ, कुछ देर पहले रेलवे का एक आदमी आया और बाहर काम कर रहे वकील साहब (उनके पति श्री अखिलेश नारायण राय) को एक चिट्ठी दे गया। अरे, चिट्ठी भी क्या है, कागज का एक टुकड़ा है-पुरजा जैसा, परंतु चिट्ठी की तरह। सो, उस बेढंगी चिट्ठी के ऊपर ‘पत्राधिकारी’ लिखकर नीचे आपका नाम लिखा है।’’ इतना कहकर डॉ.राय ने एक बार उस चिट्ठी की ओर देखा, जो उनके दाएँ हाथ में थी और फिर उसी प्रकार भारी मन से कहने लगीं, ‘‘चिट्ठी को पहले वकील साहब ने पढ़ा और यह कहते हुए मुझे दिया कि इसका तो कोई अर्थ ही समझ में नहीं आ रहा है। फिर मैंने भी उसे पढ़ा और बार-बार पढ़ा, मगर कुछ हासिल नहीं हुआ। इसे आप देखिए न, क्या लिखा है।’’

उन्होंने चिट्ठी अर्थात् कागज के उस छोटे से टुकड़े को मेरी ओर बढ़ा दिया। दृष्टि पहले ऊपर ही पड़ी। बेशक मेरे ही नाम की चिट्ठी है, परंतु लिखने वाला कौन है ? नाम-ग्राम तो स्पष्ट है, परंतु भीतर का संदर्भ तो गजब रहस्यमयी और अबूझ है। एक बार, दो बार और अनेक बार चिट्ठी को उलट-पलटकर देख गया, कुछ हाथ नहीं लगा, कुछ साफ-साफ समझ में नहीं आया। हाँ, पत्र जैसे-जैसे समझ से बाहर होता गया वैसे-वैसे मेरा खून सूखता गया, बुद्धि कठुआती गई और मन गिरता गया।
मैंने घबराकर डॉ.शकुंतला राय से कहा, ‘‘चिट्ठी की बातें कुछ समझ में नहीं आ रही है। क्या किया जाए ? यदि बड़े लड़के ज्ञानेश्वर की तबीयत खराब है तो प्रह्लाद रायजी उसे किसी सवारी से चिकित्सार्थ गाजीपुर लाते, न कि इस प्रकार की सूचना देते। यदि उनके घर का कोई प्राणी बीमार है तो यहाँ से सबको क्यों बुलाते ? दो चार दिन पूर्व छोटा लड़का दिनेश विश्वंभरपुर गया, वहाँ कोई विवाद था और यदि उसके साथ कुछ हुआ है तो फिर ज्ञानेश्वर का वहाँ होना ही पर्याप्त है। वह पूर्ण समर्थ है, हम सबको क्यों बुलाया जाता ?’’

उन्होंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। मौन निर्भाव, कहीं डूबी, कुछ खोई-खोई-सी मेरी ओर देखती रहीं। इधर मैं था कि बीमारी का नाम सुनते ही सूख गया। यही मेरी कमजोरी है। घर के किसी सदस्य की छोटी-मोटी बीमारी भी मुझे हिला देती है। अपनी बीमारी पर तो मैं बहुत दृढ़ रहता हूँ। बराबर लगता है, आई है तो जाएगी; परंतु किसी और की व्याधि अत्यधिक घबरा देती है। इतनी गहरी संसक्ति या राग-बोध ? सबके योग-क्षेम का उत्तरदायित्व अपने ऊपर महसूस करते हो तो फिर तुम आस्थावादी कैसे ? क्या दूरस्थ स्वजन की आरोग्य बाधा आज की इस विशेष घबराहट का कारण है ? जो भी हो, मैं आकुल व्याकुल तो हो ही गया।

तर्क के अथाह प्रवाह के बीच कहीं थाह नहीं मिल रही थी। हर अनुमान खंडित हो जाता था और हर संभावना कहीं-न-कहीं से कट जाती थी। भीतर, बहुत भीतर, कहीं गहरे में एक भयानक आशंका भी थी, जो अस्पष्ट रूप से सिर उठा-उठाकर दब जाती थी या दबा दी जाती थी-नहीं, यह नहीं, ऐसा कैसे ?..होगी कोई बात। प्रह्लाद भाई बहुत झल्लाहट भरे कटु सत्यवादी व्यक्ति हैं। कुछ होगी सामान्य सी बात और झक में आ गया तो लिख दिया-‘सब लोग चले आएँ।’ मगर यह चिट्ठी ले कौन आया ?

क्षण भर तक कहीं डूबे रहने के बाद मैंने अपना सिर उठाया तो देखा-डॉ.शकुंतला राय सामने निर्भाव उदासी में डूबी मेरी ओर सूखी-सूखी आँखों से देख रही हैं।
‘‘मैंने पूछा, ‘‘यह चिट्ठी कौन लाया था ?’’

‘‘पता नहीं कौन था, मेरा नाम पूछते-पूछते आया था। बाहर वकील साहब मिल गए। उन्हें देकर चला गया। बता रहे थे, देखने से वह रेलवे का कोई कर्मचारी लग रहा था।’’
‘‘तो क्या कोई गाड़ी उस समय आई थी ?’’
‘हाँ, एक गाड़ी आई थी। सीटी सुनाई पड़ी थी।’’
‘‘तब यह भी संभव है कि वैसी पोशाक में उसी गांव का कोई व्यक्ति हो और आते समय उन लोगों से मिल गया हो तो उसके हाथों चिट्ठी भेज दी।...मगर ऊपर मेरा नाम लिखा है और वह दे गया आपके यहाँ। इसका क्या अर्थ है ?’’ मैंने पूछा।





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