बड़ी दीदी - शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय Badi Didi - Hindi book by - Sharat Chandra Chattopadhyay
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बड़ी दीदी

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : सत्साहित्य प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
आईएसबीएन : 81-85830-31-2 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :104 पुस्तक क्रमांक : 1596

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शरत् चंद्र का दो बहनों के जीवन पर आधारित मार्मिक उपन्यास। इस उपन्यास पर फीचर फिल्म भी बनी है।

Badi Didi -A Hindi Book by Sharatchandra Chattopadhyay - बड़ी दीदी - शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

एक

इस धरती पर एक विशेष प्रकार के प्राणी हैं जो मानो फूस की आग हैं। वे तत्काल जल उठते हैं और झटपट बुझ भी जाते हैं। उनके पीछे हमेशा एक आदमी रहना चाहिए, जो जरूरत के अनुसार उनके लिए फूस जुटा दिया करे।
जैसे गृहस्थ-घरों की कन्याएँ, मिट्टी के दीये जलाते समय उनमें तेल और बाती डालती हैं, उसी तरह वे उसमें एक सलाई भी रख देती हैं। जब दीपक की लौ कुछ कम होने लगती है, तब उस छोटी-सी सलाई की बहुत आवश्यकता पड़ती हैं। उसी से बत्ती उकसायी जाती हैं। यदि वह न हो, तो तेल और बाती के होते हुए भी, दीप का जलना नहीं हो सकता।

सुरेन्द्रनाथ की तबीयत भी बहुत कुछ इसी तरह की है। उसमें बुद्धि-बल और आत्मविश्वास सब कुछ है; लेकिन वह अकेला कोई भी काम नहीं कर सकता। जैसे थोड़ा-सा काम वह उत्साहपूर्वक कर सकता है, उसी तरह बाकी काम आलस्य में छोड़कर चुपचाप बैठा भी रह सकता है। इस, मौके पर एक आदमी की जरूरत होती है, जो उसे उकसा दे।
सुरेन्द्र के पिता पश्चिम में किसी जगह वकालत करते हैं। बंगाल से उनका अधिक सम्बन्ध नहीं है। वहीं सुरेन्द्र ने बीस वर्ष की उम्र में एम.ए. पास किया—कुछ तो अपने गुणों के कारण, कुछ अपनी विमाता के गुणों के कारण। उसकी विमाता ऐसी सतर्कता से उसके पीछे पड़ी रहती कि अक्सर वह नहीं समझ पाता कि उसकी खुद की भी कोई सत्ता है या नहीं। सुरेन्द्र नामधारी कोई स्वतन्त्र जीव इस संसार में नहीं—इस विमाता की इच्छा-आज्ञा ही, मनुष्य का रूप धारण करके, सब काम-धन्धे—सोना-जागना, पढ़ना-लिखना, पास होना आदि सब करा लेती है। यह विमाता अपनी खुद की सन्तान के प्रति लापरवाह रहकर भी, सुरेन्द्र की इतनी ज्यादा फिकर करती है, जिसकी कोई सीमा नहीं। उसका खाँसना-खखारना भी उसकी निगाहों से नहीं छूटता। इस विमाता की कठोर रखवारी में, सुरेन्द्र ने नाम करने की पढ़ना-लिखना तो सीख लिया, पर आत्मनिर्भरता कतई नहीं सीख सका। उसे अपने-आप पर थोड़ा भी विश्वास न था। उसे कभी भी यह भरोसा न हो सका कि वह कभी भी कोई काम पूरा कर सकता है। उसे कब किस चीज की जरूरत है, या कब उसे क्या करना है— इसके निर्णय के लिए भी वह पूरी तरह किसी भी एक व्यक्ति पर आश्रित रहता। अकसर तो वह ठीक से यह भी निश्चित न कर सकता था कि उसे नींद आ रही है या भूख लग रही है। जब से उसने होश सम्हाला है तब से आज तक पन्द्रह वर्ष उसने अपनी विमाता पर आश्रित होकर बिताये हैं।

अतः उसके लिए विमाता को बहुत-से काम करने पड़ते हैं। चौबीस घण्टे में बाईस घण्टे तिरस्कार, फटकार, उलाहने तो थे ही, इनके सिवा इम्तहान के सालभर पहले से ही, सारी रात, उसे जगाये रखने के लिए उसे खुद अपनी नींद और सुख-चैन त्याग देना पड़ता था। भला अपनी सौत की सन्तान के लिए कौन इतना करता है ! मुहल्ले –टोले के लोग एक साँस में भी राय गृहिणी की तारीफ करते नहीं थकते थे।
सुरेन्द्र के लिए उसके कार्यक्रम में, कभी एक भी गलती न होती थी। कभी तिरस्कार व लांछना के कारण सुरेन्द्र की आँखें व मुँह अगर लाल हो जाते, तो राय-गृहिणी उसे बुखार का पूर्व-लक्षण समझकर, उसके लिए तीन दिन के लिए साबूदाना का प्रबन्ध कर देती। उसकी मानसिक उन्नति और शिक्षा के लिए उनकी नजर भी पैनी थी। सुरेन्द्र के शरीर पर साफ और आधुनिक ढंग के कपड़े देखकर वह समझ लेती कि यह शौकीन रुचि का है, बाबू बनकर रहना चाहता है, तो तत्काल ही दो-तीन हफ्ते के लिए धोबी आदि का प्रबन्ध कर देती।

इसी तरह सुरेन्द्र के दिन बीत रहे थे। इसी प्रकार की स्नेहपूर्ण सतर्कता के बीच, कभी-कभी उसके मन में आता कि यह जीवन बचाकर रखने के लिए नहीं; फिर कभी-कभी सोचता—शायद सभी का जीवन शुरु में ऐसा ही बीतता है; लेकिन कभी-कभी आसपास के लोग उसके पीछे लगकर उसके दिमाग में कुछ और ही बातें ठूँस देते।
एक दिन यही हो गया। उसके एक मित्र ने आकर उसे सलाह दी कि अगर तुम जैसा तीव्र बुद्धि का लड़का विलायत जा सके, तो भविष्य में उसे उन्नति का बहुत मौका मिलेगा और स्वदेश आकर वह बहुत-से अपने लोगों का बहुत-सा लाभ कर सकता है। यह सलाह सुरेन्द्र को बुरी न लगी। उसे लगा कि जंगल में पक्षी के मुकाबले में, पिंजड़े में बन्द पक्षी ही अधिक फड़फड़ाता है। सुरेन्द्र की कल्पना की आँखों के सामने एक खुला वातावरण व नया प्रकाश दिखायी देने लगा, और उसके पराधीन प्राण, पिंजरे में बन्द पक्षी की तरह फड़फड़ाने लगे।
अपने पिता के पास पहुँचकर उसने कहा कि चाहे जैसे भी हो, मेरे विलायत जाने का प्रबन्ध होना चाहिए। उसने पिता को समझाया भी कि इसी में हर तरह की उन्नति है। पिता ने कहा कि अच्छा सोचूँगा। लेकिन घर की मालकिन की इच्छा बिलकुल इसके विपरीत थी। वह पिता-पुत्र के बीच आँधी की तरह आयी और इस तरह ठठाकर हंसी कि दोनों ही चकित रह गये।
गृहिणी बोली—‘तो फिर मुझे भी विलायत भेज दो, नहीं तो वहाँ सुरेन्द्र को कौन सम्हालेगा ? जिसे इतनी भी समझ नहीं कि कब क्या खाना होता या कब क्या पहनना होता है, उसे तुम विलायत अकेले भेज रहे हो ? घर के घोड़े व बैल भी इतना समझते हैं कि उन्हें कब भूख लगी है!; पर तुम्हारा सुरेन्द्र तो इतना भी नहीं समझता !’ इतना कहकर वे फिर हँसने लगीं।

हँसी का यह झरना देखकर राय महाशय तनिक लज्जित ही हुए। सुरेन्द्र ने मन-ही-मन सोचा कि इस अकाट्य दलील के आगे किसी प्रकार की पैरवी नहीं चल सकती। अतएव विलायत जाने की आशा ही उसने छोड़ दी। यह बात सुनकर उसका वह सलाहकार मित्र बहुत दुखी हुआ। बेचारा यह भी न बता सका कि विलायत जाने का और भी कोई तरीका है या नहीं ! लेकिन अन्त में उसने कहा कि इस प्रकार की दासता में पड़े रहने से तो अच्छा यह है कि भीख माँगकर ही खाया जाय ! और यही तय हुआ कि जो आदमी इस सम्मान से एम.ए. पास कर सकता है, वह अपना पेट पालने के लिए किसी का आश्रित नहीं रह सकता।
घर आकर सुरेन्द्र यही बात सोचने लगा। फिर वह जितना ही सोचता, मित्र की बात उसे उतनी ही ठीक समझ में आती। तो भीख माँग कर खाना ही अच्छा है ! सभी लोग अपनी इच्छा से विलायत तो नहीं जा सकते, लेकिन इस तरह जीवन और मृत्यु के बीच रहकर भी सबों को दिन नहीं बिताने पड़ते।
इसी निश्चय के अनुसार, एक दिन गहरी रात में सुरेन्द्र स्टेशन पहुँचा और टिकट कटाकर कलकत्ता की गाड़ी पर सवार हो गया। डाक से उसने पिता के पास चिट्ठी भेज दी कि वह कुछ दिनों के लिए स्वेच्छा से घर छोड़ रहा है। बेकार ही उसकी खोज करने से कोई फायदा न होगा, क्योंकि अगर उसका पता लग भी गया, तो भी वह घर लौटेगा —ऐसी सम्भावना नहीं है।
राय महाशय ने गृहिणी को वह पत्र दिखा दिया। बोले—‘देखो, अब सुरेन्द्र बड़ा हो गया; पढ़-लिख भी चुका है। अब उसके पंख निकल रहे हैं। अब भी वह न उड़ेगा, तो भला कब उड़ेगा ?’
फिर भी उसकी तलाश की गयी। कलकत्ता में जो भी जान-पहचान के लोग थे, उन्हें चिट्ठी लिखी गयी। लेकिन कोई फल न निकला। कहीं भी, किसी को भी सुरेन्द्र का पता न लगा।

दो


कलकत्ता पहुँचकर, जन-कोलाहल से भरी सड़कों पर सुरेन्द्र घबरा गया। वहाँ न तो डाँट-फटकार लगाने वाला कोई था, न कोई दिन-रात शासन करने वाला था। मुंह सूख जाने पर कोई देखने वाला न था मुँह भारी होने पर भी कोई ध्यान न देता। यहाँ अपने-आप ही अपने को देखना पड़ता था। यहाँ भीख भी मिल जाती है। करुणा भी मिल जाती है। रहने को जगह भी है। सिर्फ अपनी कोशिश चाहिए। कोई अपनी ही इच्छा से किसी के बीच नहीं आता।
यहाँ आकर ही पहले-पहल उसे यह ज्ञान हुआ कि जीने का प्रयत्न भी खुद को ही करना पड़ता है। आश्रय के लिए खुद ही जगह ढूँढ़नी पड़ती है, और नींद व भूख में भी अन्तर है।
अपना घर छोड़े कई दिन हो गये। गली-गली मारे फिरने से उसका शरीर बहुत शिथिल हो गया था, और पास के रुपये भी खत्म हो गये थे। शरीर के कपड़े भी गन्दे होकर फट गये थे। रात को सोने का भी कहीं ठिकाना नहीं था सब सोचकर सुरेन्द्र की आँखों में पानी भर आया। घर चिट्ठी भेजने की हिम्मत नहीं पड़ती। बहुत शरम आती है। और इससे भी बढ़कर, जब उसे अपनी विमाता का चेहरा याद आता तो घर जाने की इच्छा शायद ही होती। वह यह सोचकर ही डर जाता कि वह कभी वहाँ था।
एक दिन अपने ही जैसे एक दरिद्र को अपने पास देखकर उसने कहा-‘क्यों भाई, यहा तुम लोग कैसे खाते-पीते हो ?’
वह आदमी भी मूर्ख ही था, अन्यथा वह सुरेन्द की अवश्य ही हँसी उड़ाता, पर उसने कहा—‘नौकरी करके खाते हैं। भला कलकत्ते में काम की क्या कमी !’’

सुरेन्द्र ने पूछा—‘‘क्या मुझे भी नौकरी दिलवा सकते हो ?’
‘तु क्या काम जानते हो ?’’
सुरेन्द्र तो बताने लायक कोई भी काम नहीं जानता था। अतः चुपचाप सोचने लगा कि क्या बतावे। फिर उसी आदमी ने पूछा—
‘‘तुम भले घर के लड़के हो न ?’
उत्तर में सुरेन्द्र ने सिर हिला दिया।
‘तो लिखना-पढ़ना क्यों नहीं सीखा ?’


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