कसौटी - आशापूर्णा देवी Kasauti - Hindi book by - Ashapurna Devi
लोगों की राय

श्रंगार - प्रेम >> कसौटी

कसौटी

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2010
आईएसबीएन : 81-7315-431-7 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :187 पुस्तक क्रमांक : 1569

Like this Hindi book 6 पाठकों को प्रिय

386 पाठक हैं

प्रेम-संबंधों पर आधारित उपन्यास

Kasuti

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत उपन्यास ‘कसौटी’ में दो लघु उपन्यास है। पहला उपन्यास ‘कसौटी’ पति पत्नी के प्रेम-संबंध का अनोखा उदाहरण है। दूसरे उपन्यास में ‘उज्जवल उन्मोचन’ में प्रेम का एक अलग रूप उन्मोचित होता है। ये दोनों उपन्यास मानव-मन की जटिलताओं पर प्रकाश डालते हैं। कभी-कभार जीवन में ऐसा मोड़ आ जाता है, घटनाओं की सक्रियता कुछ ऐसा चक्कर चलाती है कि एकाएक हृदय निरावरण हो जाता है और सत्य अपना स्वरूप उन्मोचित करता है। इन दोनों उपन्यासों में इसी सत्य को बड़ी ही कुशलता और सूक्ष्मता के साथ उकेरा है।

भूमिका


बँगला साहित्य-गगन में असंख्य सितारे दीप्तिमान् हैं, जिनमें एक चमकता सितारा अपनी विशिष्टता से अनायास ही हमारी दृष्टि को आकर्षित कर लेता है। इसमें भड़कीली चमक-दमक तो नहीं, पर इसका समुज्जवल प्रकाश निरंतर हमें मंदिर के उस दीये की याद दिलाता है, जो न केवल अंधकार दूर करता है बल्कि जीवन के प्रति एक अटल विश्वास जगा जाता है।
बारहवें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित श्रीमती आशापूर्णा देवी एक ऐसी ही सितारा हैं, जिन्होंने उपन्यास तथा कहानी-लेखन में समान रूप से दक्षता का परिचय दिया। उनका जन्म 8 जनवरी, 1909 को कोलकाता के एक संरक्षणशील परिवार में हुआ था। स्कूल-कॉलेज की औपचारिक शिक्षा उन्हें प्राप्त नहीं हुई। यह परम आश्चर्य की बात है कि जिन्होंने जीवन में उन्मुक्तता का स्वाद नहीं चखा, उनकी दृष्टि में इतना विस्तार कैसे आ गया। शायद यह उनकी साहित्य-प्रेमी माँ की प्रेरणा का फल था कि साहित्य में उनकी गहरी रुचि बचपन से ही हो गई।
उनकी प्रथम पुस्तक ‘जल आर आगुन’ सन् 1940 में प्रकाशित हुई। उन्हें ‘लीला पुरस्कार’ (सन् 1954), ‘मोतीलाल घोष पुरस्कार’ (1959), ‘भुवन मोहिनी स्मृति पदक’ (1963), ‘रवींद्र पुरस्कार’ (1966) तथा प्रथम उपन्यास ‘प्रथम प्रतिश्रुति’ के लिए ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ की उपाधि से विभूषित किया। इसके अतिरिक्त जबलपुर विश्वविद्यालय, रवींद्र भारती विश्वविद्यालय तथा वर्धमान विश्वविद्यालय से उन्हें मानद डी.लिट. की उपाधि प्रदान की गई।
मात्र तेरह वर्ष की अवस्था में उन्होंने लिखना प्रारंभ किया और जीवन के अंतिम दिनों तक लिखती रहीं। अपने सारे कर्तव्य पूरी तरह निभाते हुए, आचार-विचारों तथा पारिवारिक मान्यताओं-परंपराओं को पूर्ण समादर देते हुए भी वे साहित्य-सर्जन के कार्य में सतत प्रयत्नशील रहीं।
चारदीवारी के भीतर रहकर उन्होंने वही जीवन देखा, जो उनकी खिड़की के सामने थी। वह जीवन लाखों-करोड़ों मध्य वर्गीय लोगों का जीवन था और उनका अपना भी। इस जीवन में साधारण दृष्टि से कोई नाटकीयता नहीं थी। घटनाएँ वैसी ही सामान्य जैसी प्रतिदिन हमारे आस-पास घटती हैं। इस एक बेसुरे, स्वादहीन जीवन में आशापूर्णा देवी ने नाटक की रोचकता का आस्वादन किया; तरंगहीन नदी के भीतर से समुद्र की लहरों की तान सुनी। इस प्रकार ‘बिंदु में सिंधु दर्शन’, यही उनके लेखन की विशेषता रही। प्रतिपल घटनेवाली सामान्य घटना कहानी के एक मोड़ पर आकर असामान्य हो गई। जीवन के आस-पास मँडराते अनगिनत चरित्र, जिन्हें हम कोई मूल्य नहीं देते, लेखन के जादुई स्पर्श से वही चरित्र अचानक असामान्य होकर उभरे। पढ़कर ऐसा लगा—‘ऐसा ही चरित्र तो हमने देखा है, पर कभी इस तरह से उसे देखा-समझा नहीं।’ यह आशापूर्णा देवी की अंतर्दृष्टि ही है जो सामान्य में भी असामान्य का दर्शन करती है।
अपने उपन्यास या कहानी के माध्यम से उन्होंने कभी कोई उपदेश या आदर्श स्थापित करने की चेष्टा नहीं की। उन्होंने जीवन को जिस रूप में देखा उसी रूप में प्रस्तुत किया। उसमें कहीं रत्ती भर भी अतिरंजन नहीं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में निम्नवर्ग के दलितों की कथा नहीं है; उस उच्च वर्ग की कहानी भी नहीं है, आधुनिक साहित्य में आज जिसकी बड़ी चर्चा है। उन्होंने तो उसी जीवन को अपने लेखन का आधार बनाया, जिसका वह एक अभिन्न अंग थी और उसी जीवन की उपलब्धियों को लोगों के सामने रखा।
साधारणतः हम कहानी का रस ग्रंथों में ढूँढ़ते हैं; परंतु यह रस हमारे वास्तविक जीवन के आस-पास भरा पड़ा है, केवल हमें दिखाई नहीं देता। वह अंतर्दृष्टि हमारे पास नहीं है, जिसकी सहायता से ‘सुख-दुःख समस्या’ भरे इस जीवन में से उस रस को निचोड़कर उसका आनंद ले सकें। आशापूर्णा देवी ने अपनी पैनी अंतदृष्टि से उस रस को खोज निकाला और अपनी उत्कृष्ट रचनाओं द्वारा पाठकों को भी इसका रसास्वादन कराया।
इनकी रचनाओं में जीवन की दैनंदिन समस्याओं का उल्लेख है, सीधे-सादे सरल शब्दों में उनका वर्णन है। परंतु जिस प्रकार एक कुशल चित्रकार अपनी तूलिका के स्पर्श से चित्र में जान डाल देता है वैसे ही आशापूर्णा देवी की लेखन-कुशलता सामान्य कथानक को असामान्य बना देती है।
इनकी रचनाओं की सर्वप्रमुख विशेषता है इनका नारी चरित्र-चित्रण। अपने तीन श्रेष्ठ उपन्यास—‘प्रथम प्रतिश्रुति’, ‘सुवर्ण लता’ तथा ‘बकुल कथा’ में इन्होंने तीन युगों से निकलते हुए नारी-जीवन के संघर्ष का चित्रण किया है। ‘सत्यवती’, ‘सुवर्ण लता’ तथा ‘बकुल’ अपने-अपने युग की निर्यातिता नारी के प्रतीक हैं, जो निरंतर कुरीतियों से, असंतुलित समाज-व्सवस्था से तथा पुरुष-प्रधान समाज में घटित नारी-निग्रह से जूझती रहती हैं। अपने- विभिन्न उपन्यासों तथा कहानियों के माध्यम से उन्होंने नारी-चरित्र का मनोविश्लेषण बहुत गहराई से किया है।
आज नारी-मुक्ति, नारी आंदोलन आदि के नित नए नारे सभा समितियों में गूँजते सुनाई पड़ते हैं। वहाँ विद्रोह है, विक्षोभ है, पुरुष-विद्वेष है, जिसके धुएँ में प्रायः नारी अपनी मर्यादा को भी धूमिल कर देती है। आशापूर्णा देवी ने नारी स्वाधीनता के बड़े-बड़े नारे नहीं लगाए, न ही किसी को नीचा दिखाया। समाज के बंधन में रहकर, संसार और लोकाचार निभाकर भी उन्होंने कुछ ऐसे चरित्रों का सृजन किया, जिनमें नारी-मुक्ति की सही छवि है। ‘प्रथम प्रतिश्रुति’ की सत्यवती एक ऐसी ही स्वाभिमानी नारी है। नारी का यह रूप उन्होंने अपनी कहानियों तथा उपन्यासों में बार-बार अंकित किया है। यह नारी समाज-व्यवस्था के विरोध में आवाज उठाती है। शोरगुल और नारों से नहीं, अपनी मृदु परंतु स्पष्ट आवाज में वह अन्याय का विरोध करती है; अंत तक संघर्ष करती हैं, समझौता नहीं करती।
यद्यपि आशापूर्णा देवी ने नारी-चरित्र को अपने लेखन की मूल विषय-वस्तु बनाया, उनकी रचनाएँ केवल इसी विषय पर केन्द्रित नहीं रहीं। मानव-चरित्र की अनजान गलियों पर उन्होंने खूबी से प्रकाश डाला, इस रोचक ढंग से उन्हें उबारा कि पाठक को लगा कि जो दिखाई देता है, वह कुछ भी नहीं। जो उसके भीतर है, उसकी आकस्मिक झलक ही यह बता देती है कि भीतर है अथाह सागर, जिसकी गहराई में छिपे हैं अनमोल मोती, जिनका दर्शन जीवन के किसी मोड़ पर, किसी विशेष क्षण में अकस्मात् ही हो जाता है। ऐसे विशेष पल का स्फुरण आशापूर्णा देवी की कहानियों में हमें बार-बार देखने को मिलता है।
उनकी रचनाओं का अनुवाद हिंदी तथा विभिन्न आंचलिक भाषाओं में हुआ, जिसके फलस्वरूप उनकी रचनाएँ बँगला भाषा के सीमित दायरे से बाहर निकलकर भारतीय साहित्य के प्रकाश में सुशोभित हो रही हैं। पचास वर्ष की लम्बी साहित्य साधना में एक ओर श्रीमती आशापूर्णा देवी के उपन्यासों में नारी-चरित्र के जटिल भावों का मंथन और अमृत की उपलब्धि है तो दूसरी ओर उनकी छोटी कहानियों में जीवन के विभिन्न पहलुओं के भीतर से मानव-चरित्र का अनोखा रूपायण देखने को मिलता है।
प्रस्तु उपन्यास ‘कसौटी’ में दो लघु उपन्यास हैं। पहला उपन्यास ‘कसौटी’ पति-पत्नी के प्रेम-संबंध का एक अनोखा उदाहरण है। इस उपन्यास के मुख्य पात्र शांतनु और पल्लवी हैं। शांतनु का पत्नी-प्रेम निरंतर प्रवहमान धारा की तरह अविरल बहता चला जाता है। पल्लवी उस धारा में स्नान करती है, परंतु उसे इसका आभास तक नहीं होता है। शांतनु का प्रेम एक ऐसे निस्वार्थ प्रेम की मिसाल है, जो सिर्फ देना जानता है, लेना नहीं।
शांतनु की निस्संतान पत्नी मानसिक बीमार है और इसी अस्वाभाविक मनःस्थिति के कारण वह अपनी कमजोरी को अस्वीकार करती है तथा अपनी क्षमता को प्रमाणित करने के लिए कौशिक को एक कसौटी के रूप में इस्तेमाल करती है। यह परीक्षण पल्लवी की आँखों का परदा उतार देता है और वह जीवन की सच्चाई से परिचित होती है।
दूसरा उपन्यास ‘उज्जवल उन्मोचन’ में प्रेम का एक अलग रूप उन्मोचित होता है। यहाँ मुख्य पात्र सुमन और सुजय दो भाई हैं। सुमन का स्नेह वर्षा की वह सुशीतल, सरस धारा है, जो उसके भाई सुजय पर निरंतर बरसती रहती है। यह प्रेम कुछ आशा नहीं रखता, केवल ढाल बनकर अपने प्रियजनों की रक्षा में तत्पर रहता है। लेकिन उसका छोटा भाई ‘सुजय’ उन चरित्रों में से है जिन्हें केवल लेना आता है, देना नहीं। वह एक मेरूदंडहीन व्यक्ति है, जो अपनी पत्नी और उसके रिश्तेदारों से प्रभावित होकर न केवल अपने देवता समान भाई को गलत समझता है बल्कि स्वयं अपने हृदय की भावना को भी समझ नहीं पाता है। भाई के लिए हृदय में उठ रही तड़प को वह क्रोध और घृणा के रंग में रँगने की कोशिश करता है।
अंत में कहानी एक ऐसा नाटकीय मोड़ लाती है, जहाँ आकर वह अपने स्वरूप से परिचित होता है और उसके उज्जवल स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित होता है, उसका देवता-स्वरूप बड़ा भाई सुमन, जो अब स्नेह के बंधन को तोड़कर जा चुका है।
ये दोनों उपन्यास मानव-मन की जटिलताओं पर प्रकाश डालते हैं। जिस प्रकार बादल के घिर जाने से हमें दिन की पहचान ठीक से नहीं होती उसी प्रकार हमारा अहंकार, हमारी कमजोरियाँ, हमारे झूठे दिखावे अकसर हमारे चरित्र की उज्ज्वलता को ढक देते हैं। कभी-कभार जीवन में ऐसा मोड़ आ जाता है, घटनाओं की सक्रियता कुछ ऐसा चक्कर चलाती है कि एकाएक हृदय का निरावरण हो जाता है। झूठी गलतफहमियों, झूठे अहंकारों के बादल छँटकर दूर हो जाते हैं और सत्य अपना स्वरूप उन्मोचित करता है।
आशापूर्णा देवी ने इन दोनों उपन्यासों में इसी सत्य को बड़ी कुशलता के साथ उभारा है।

:एक:


टैक्सी !
टैक्सी !
एक साथ ही दोनों ने आवाज दी। एक भारी पुरुष-कंठ और दूसरा तीक्ष्ण, परंतु सुरीला नारी कंठ। एक साथ ही दो हाथ भी उठे। एक, सूट-बूट और गरम कोट पहने एक महाशय का और दूसरा, ‘स्लीवलेस’ ब्लाउज फीते जैसे घेरे से सम्पूर्ण मुक्त, निरावरण मखमल-सा, सुगठित....
है तो दिसंबर ही, तारीख भी कुछ आगे ही जा चुकी है; मगर उससे क्या, औरतों को तो ठंड नहीं लगती। जुकाम भी नहीं होता। यह उनपर ईश्वर का वरदान है। देश-विदेश कहीं भी देख लीजिए, पुरुष ऊपर से नीचे तक लिपटा पड़ा है और नारी—बस उतना ही जितना ढककर रखना जरूरी हो। फैशन कहकर इसकी निंदा नहीं कर सकते। गाँव की गलियों में, जहाँ दीन दरिद्र किसान-मजदूरों का डेरा है, वहाँ भी औरतों को ठंड नहीं लगती। मर्द फिर भी जैसे-तैसे एक सूती चादर ही लपेट लेते, पर औरतों के शरीर पर लिपटा तो वही छोटा सा आँचल, वह भी चिथड़ों जैसी स्थिति में।
उनके पास वस्त्र का अभाव है।
पर इन लोगों का ?...स्वभाव है।
अलमारियों में गरम कपड़ों के ढेर को कीड़े काट-खा रहे हैं, कोई बात नहीं।
औरतों के साथ विधाता की क्या साँठ-गाँठ है और औरतों को उन्होंने कौन-सी विशेष शक्ति प्रदान कर रखी है, यह तो देवताओं को भी ज्ञात नहीं। फिलहाल टैक्सी बुलाने वाले इन दो स्त्री-पुरुषों के वार्तालाप से ऐसा कुछ प्रतीत तो नहीं होता।
दोनों की पुकार एक साथ ही गूँज उठी। दोनों हाथ भी एक साथ ही उठे। गनीमत है कि टैक्सी ड्राइवर दोनों को ही अनसुना कर आगे नहीं निकल गया। जोर से ब्रेक लगाया उसने।
संयोगवश सूट-बूटवाले महोदय के पास ही रुका। उन्होंने भी मौके को हाथ से जाने नहीं दिया।, झटपट सवार हो गए; क्योंकि वह महिला तब भी कुछ दूरी पर ही थी।
मगर दूरी अधिक देर तक नहीं रही। कंधे से लटक रहे बटुए को कसकर पकड़ लिया उसने और हवा में उड़ते सूखे पत्ते की तरह पल भर में पहुँच गई। आते ही तीखे स्वर में बोली, ‘‘यह क्या हुआ ? बुलाया मैंने और चढ़ आप बैठे !’’
टैक्सी में बैठे महाशय ने एक बार शिकायत करनेवाली की ओर देखा, फिर शांत भाव के साथ कहा, ‘‘ऐसी बात है। सॉरी ! मैं उतर जाता हूँ।’’ और तुरंत ही उतरने लगे।
मगर वह महिला इस ‘सॉरी’ से प्रभावित नहीं हुई। उच्च स्वर में बोली, ‘‘दया दिखाने की आवश्यकता नहीं है। पहले किसने बुलाया था, यह स्पष्ट हो जाए; जो कुछ हो, कायदे से हो—यही मैं चाहूँगी।’’
भद्र महोदय के गंभीर चेहरे पर एक हलकी, कौतुकपूर्ण हँसी की झलक पल भर के लिए उभर आई। वह बोले, ‘‘शायद आपने ही पहले...’’कहते-कहते जेब से पैसे निकालने लगे और ड्राइवर से बोले, ‘‘हाँ, साहब कितना देना होगा आपको ?’’
‘‘साहब’ घड़ी देखकर बोले, ‘‘जो रेट है वही दे दीजिए।’’
‘‘हाँ, रेट तो है ही। गाड़ी की सीट को भी न छुओ, मगर रोक लो गाड़ी को तो उसका हर्जाना भरने का कानून तो है ही।’’
ड्राइवर ने महिला की ओर देखकर कहा, ‘‘फिर आप ही आ जाइए, झटपट।’’ और उसने मीटर डाउन कर दिया। मगर महिला नहीं चढ़ी और वही राग अलापने लगी, ‘‘आप ही आ जाइए’ का मतलब ? यह कोई दया-भिक्षा की बात है क्या ? पहले किसने बुलाया, यह ठीक-ठीक बताइए ?’’
ड्राइवर के चेहरे पर व्यंग्य की झलक थी; किंतु उसे दबाकर लापरवाही से वह बोला, ‘‘याद नहीं।’’
‘‘याद नहीं ! यह याद रखना आपकी ड्यूटी नहीं है क्या ? जो पहले बुलाएगा ? उसी का पहला हक—यह मानते हैं कि नहीं ?’’
‘‘क्या मुसीबत है ! ये तो उतर ही गए हैं। बैठिए न आप।’’
महिला फिर भी जैसे लड़ने को तैयार। बोली, ‘‘उतर ही गए’, जैसे कोई कृपा कर दी। आप क्यों नहीं बता सकते कि किसने पहले बुलाया था ?’’
अब ड्राइवर के स्वर में रूखापन आ गया। बोला, ‘‘देखिए, इतनी बात ही क्यों ? चलना है तो चलिए, नहीं तो मुझे छोड़ दीजिए। आसमान की हालत देखी है आपने ?’’
बात सही थी, आसमान की हालत गंभीर थी। एक तो जाड़े की शाम का असमय उतरता अँधेरा, ऊपर से आसमान जैसे एक भारी स्लेट पत्थर की चादर बनकर सिर पर छाने को उतर रहा था।
फिर भी महिला चढ़ी नहीं। दरवाजे पर हाथ टिकाकर उसी अप्रसन्न मुद्रा में बोली, ‘‘मैं कोई नाजायज फायदा उठाने के पक्ष में नहीं हूँ, अगर इन्होंने ही पहले बुलाया हो तो। मगर ये तो शिष्टाचार की खातिर भी ‘नहीं-नहीं, ऐसा कुछ नहीं।’ कह सकते थे। मगर यह सबकुछ किए बिना ही तुम्हारे हाथ पर पचास रुपए का एक नोट टिका दिया इन्होंने।’’
‘‘यही तो मुश्किल है। छुट्टे नहीं हैं क्या ?’’
‘‘नहीं हैं।’’
महिला अब भी ‘न इधर, न उधर’ की हालत में खड़ी थी।
ड्राइवर चुस्त नौजवान, शायद ग्रेजुएट भी था। मन-ही-मन सोचा—शायद इसका दिमाग खराब है ? किंतु फिर कुछ सोचकर बोला, ‘‘बारिश आने वाली है। मुश्किल में पड़ जाएँगे आप लोग। कौन किधर जाएँगे ?’’
भद्र महोदय बोले, ‘‘लेक मार्केट।’’
महिला भी तभी बोल उठी, ‘‘भवानीपुर।’’
‘‘अच्छा ! फिर क्या मुश्किल है ? शेयर में चले जाइएगा। आ जाइए। अच्छा ही हुआ।’’
किंतु वह जिद्दी महिला तीखे स्वर में बोल उठी, ‘‘किसके लिए ?’’
‘‘समझ लीजिए, आप ही लोगों के लिए।’’
‘‘अगर मैं समझ लूँ, इसमें मुझे हैरानी हुई।’’
‘‘माफ कीजिएगा। आप लोगों जैसी सवारी मैंने जिंदगी में कभी नहीं देखी। ओ, लो, हो गई न बारिश शुरू ! मैं गाड़ी बढ़ाता हूँ।’’
एक बर्फीली हवा टकराकर निकल गई। कुछ बूँदाबाँदी भी शुरू हो गई। तभी गाड़ी स्टार्ट हो उठी। दोनों ही मशीन की तरह एक साथ गाड़ी में आकर बैठे। अब कोई बातचीत नहीं। दोनों ने अपने-अपने हाथ का सामान उतारकर अपनी बगल में रखा। एक ने रखा अपना बटुआ और दूसरे ने रखी किसी वाणिज्यिक संस्था की अंग्रेजी पत्रिका।
पीछे की सीट पर महिला, ड्राइवर की बगलवाली सीट पर महाशय।
इस घटना की शुरुआत हुई थी यादवपुर के मोड़ पर। लग रहा था, रास्ते में ही बारिश आ जाएगी; मगर आई नहीं। बर्फीली हवा के साथ हलकी फुहार आई और चली गई।
गाड़ी का चालक पुरुष था। स्वाभाव से ही स्वजाति के प्रति सहानुभूतिशील था। महिला के बेतुके हठ के आगे उस भद्र पुरुष का संयमित आचरण उसके मन में ही सहानुभूति जगा रहा था। वह आवश्यकता से अधिक विनीत स्वर में बोला, ‘‘कहाँ उतरना होगा, बता दीजिएगा, सर ?’’
थोड़ी दूर जाते ही भद्र पुरुष ने गाड़ी रोकने के लिए कहा।
लेक मार्केटवाली सड़क के किनारे छोटी-छोटी दुकानों की कतार के बीच से जानेवाली एक गली के सामने आ पहुँची टैक्सी।
ड्राइवर के हाथ में पचास रुपये का वही नोट था। उसने मीटर देखकर बाकी पैसे लौटा दिए। फिर मीटर को घुमाकर वह महिला से बोलने वाला ही था, ‘अब आप बता दीजिएगा।’ मगर तब तक कंधे पर बटुआ लटकाकर वह भी उतर पड़ी और बोली, ‘‘मैं भी यहीं उतर जाऊँगी।’’
‘‘अरे ! आपने तो भवानीपुर कहा था न ?’’
‘‘तब कहा था, अब नहीं कह रही हूँ। कहिए, कितना देना है ?’’
‘‘आपस में ही तय कर लीजिए, कितना शेयर करेंगे। मेरे पास और समय नहीं है।’’ गाड़ी स्टार्ट कर दी उसने और कनखियों से देखकर बोला, ‘‘अकेले जाने की हिम्मत नहीं हुई क्या ?’’ बड़ी देर से पल रही नाराजगी ऐसे ही निकल आई होगी शायद।
बस ! साँप की पूँछ पर पाँव रख दिया जैसे। छुरी जैसी तेज आवाज में तुनककर वह महिला बोली, ‘‘हिम्मत का मतलब ?’’
‘‘मतलब यही कि अकसर आप लोग टैक्सी ड्राइवरों को गुंडा समझ लेती हैं। रात के अँधेरे में अकेले जाने में....’’
‘‘क्या ? क्या कहा ? मैं टैक्सी में जिसके साथ चढ़कर आई वे मेरे ‘गार्जियन’ थे क्या ? मैंने अकेले ही टैक्सी रोकी थी कि नहीं ?’’
मगर इसका जवाब सुनाई नहीं पड़ा। गाड़ी तब तक हवा हो चुकी थी।
क्रोधित स्वर में वह बोली, ‘‘ये लोग आजकल इतने बदतमीज हो गए हैं।’’
‘‘क्या बात है ? व्यर्थ में अपना दिमाग गरम करने से क्या लाभ ? अब जाना किधर है ? और गाड़ी मिलेगी।’’ कहते-कहते उन्हीं दुकानों के बीचवाली पतली गली से भीतर की ओर जाने लगे वह महाशय।
महिला भी आराम से उनके पीछे-पीछे चलने लगी और अगले मोड़ पर उससे भी पतली एक सड़क की ओर मुड़ते देखकर तीखे स्वर में बोल उठी, ‘‘इससे अच्छी और कोई जगह नहीं मिली क्या ?’’
‘‘कहाँ मिली !’’
‘‘नालायक यों ही थोड़े ही कहती हूँ। कोई भला आदमी यहाँ रह सकता है ! ऐसी खूबसूरत जगह की खोज मिली कहाँ से ?’’
‘‘वह जानकर आपको क्या लाभ होगा मैडम ?’’
‘‘रहने दो नखरा। जरा देखूँ, इस कूड़े-करकट में कहाँ पर...’’ कहते-कहते बढ़ती गई वह महिला। ‘कूड़ा-करकट’ कहना गलत नहीं होगा। दुकान के पीछे से लगी थोड़ी सी जगह है, जिसपर दुनिया भर के पैकिंग बक्सों के टुकड़ों पर लगी लोहे की काँटियाँ सिर उठाकर पड़ी हैं। साथ पड़ी हैं कुछ रस्सियाँ, कुछ ‘पॉलिथिन शीट’ के टुकड़े।
‘‘अचानक यहाँ उतरने का विचार क्यों आया ?’’
‘‘कहा न, तुम्हारे निकम्मेपन की हद देखने के लिए।’’
‘‘उसमें फायदा ही क्या—और नुकसान भी क्या ?’’
‘‘वह बताना जरूरी नहीं समझती।’’
‘‘जरूरी ! अच्छा, ‘जरूरी’ शब्द का काम क्या ?’’
कीचड़ भरी जगह को पार करते-करते महिला ने नाक-भौं सिकोड़कर कहा, ‘‘यह चूहे का बिल मिल कैसे गया ?’’
‘‘भाग्य से।’’
‘‘भाग्य से ?’’ नाक और भौं सिकोड़ ली उसने। वह तीखी नाक सिकुड़ने की ही आदी थी जैसे।
मगर महाशय के चेहरे पर भावों का कोई विशेष उतार-चढ़ाव नहीं था। निर्विकार भाव से बोले, ‘‘और नहीं तो क्या ! इसके लिए भी कम पापड़ बेलने पड़े क्या ! एक अलग बाथरूम हो, इतनी ही तो माँग थी। उसी के लिए एड़ी-चोटी एक करनी पड़ी। अब जरा सा ऊपर उठना पड़ेगा।’’
सामने ईंटों से बना एक पैसेज, वहाँ एक लोहे की सीढ़ी। बहुत बुरी भी नहीं, कुछ पुताई भी की गई थी उसपर।
‘‘प्रतिदिन यह पर्वतारोहण होता है ?’’
‘‘बुरा ही क्या है ?’’
मगर आरोहण के बाद देखा गया डेरा उतना बुरा नहीं था। एक ‘मजेनाइन फ्लोर’ का कमरा। साइज छोटा-मोटा नहीं। शायद डबल गैराज के ऊपर बना हो—काफी खुला-खुला भी। प्रवेश-द्वार देखकर अनुमान लगाना कठिन था कि खिड़की खोलने से मेन रोड दिखाई पड़ेगा।



अन्य पुस्तकें

To give your reviews on this book, Please Login