श्रेष्ठ हास्य कथाएँ - कन्हैयालाल नंदन Shrestha Hasya Kathayein - Hindi book by - Kanhaiya Lal Nandan
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श्रेष्ठ हास्य कथाएँ

कन्हैयालाल नंदन

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2010
आईएसबीएन : 81-7028-240-3 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :144 पुस्तक क्रमांक : 1513

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प्रस्तुत है हिन्दी के अठारह हास्य-लेखकों की उत्कृष्ट हास्य-कथाएँ....

Shreshtha Hasya Vyagya Kathayein

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हिन्दी साहित्य की चुनी हुई हास्य कथाओं का प्रतिनिधि संकलन-जाने-माने सम्पादक कवि कन्हैयालाल नंदन द्वारा विशेष रूप से सम्पादित। अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा, हरिशंकर परसाई तथा शरद जोशी से लेकर के.पी. सक्सेना, रविन्द्रनाथ त्यागी, लक्ष्मीकान्त वैष्णव, संतोष नारायण नौटियाल आदि अग्रणी लेखकों की श्रेष्ठ रचनाएं हिन्दी साहित्य की श्रेष्ठ हास्य कथाओं का प्रस्तुत संकलन जाने-माने कवि-लेखक-सम्पादक श्री कन्हैयालाल नंदन ने किया  है। इसमें प्रख्यात लेखक श्री अमृतलाल नागर तथा भगवतीचरण वर्मा से आरंभ करके शरद जोशी, हरिशंकर परसाई,  के.पी. सक्सेना, प्रेम जनमेजय, रवीन्द्रनाथ त्यागी, लक्ष्मीकान्त वैष्णव, सन्तोषनारायण, ज्ञान चतुर्वेदी तथा हरीश नवल आदि तक सभी अग्रणी लेखकों की चुनी हुई रचनाओं का संकलन प्रस्तुत है। इस प्रकार पुरानी तथा बाद की पीढ़ियों को एक साथ प्रस्तुत करके इसे हिन्दी साहित्य की हास्य रचनाओं का प्रतिनिधि संकलन ही बना दिया है।

भूमिका

साहित्य में जितने भी रस होते हैं उनमें हास्य भी एक रस है। उसकी परिभाषा है, मीमांसा है, उसके संचारी-व्यभिचारी भाव हैं, उसके प्रकार हैं-मृदु स्मित से लेकर धुंधकारी अट्टाहास तक अनेक श्रेणिया हैं। यानी यदि आप शास्त्रीयता के जंगल में घुसकर हास्य का जायजा लेना चाहे तो उस सामग्री की कोई कमी नहीं है। आप जितना चाहे उसका विस्तृत अध्ययन करें। हास्य पर बाकायदा थीसिसें हैं, उनका अवगाहन करें। इसके अतिरिक्त हास्य का बयोलाजिकल निरूपण करने के लिए वैज्ञानिक शोध-सामग्री भी मिल जायेगी कि हमें हँसी क्यों आती हैं। जब हँसते है तो हमारे शरीर पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है ? हँसने में शरीर कितने परिवर्तनों से गुजरता है ? हंसने की प्रक्रिया से जुड़े हुए शरीर के किन-किन अवयवों में किस प्रकार के हास्य में क्या परिवर्तन होता है ? वैज्ञानिक जीव बड़ा भयंकर होता है।

उसने तो यहाँ तक पता लगा लिया है कि अचानक जब हमारे मुँह से ठहाका निकल पड़ता है तो उसके साथ निकली हुई हवा की रफ्तार क्या होती है ? उसका स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है ? न हँसने वाले अथवा कम हँसने वाले व्यक्ति के मानसिक तनाव कैसे ढीले होते है ? विभिन्न व्यक्तियों में ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ नाम तत्त्व अलग-अलग क्यों पाया जाता है? आदि-आदि। हास्य पर थोड़ी बहुत विधिवत् यानी शास्त्रीय तथा वैज्ञानिक दृष्टि से जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से मैंने जब हास्य के उपर लिखित विवेचन की राह चाही, तो मैंने पाया कि इस सब जानकारी से मैं हँसने वाले व्यक्ति का पोस्टमार्टम करने की क्षमता भले पा सकूँ। लेकिन हँसने की क्षमता नहीं पा सकता। इतना ही नहीं, मुझे लगने लगा कि उस सब सामग्री को पढ़ते-पढते कहीं मेरा ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ मर ही न जाए। क्योंकि मुझे साफ लगने लगा कि जब मैं अपने किसी मित्र को हँसते या मुस्कराते देखता हूँ तो यह सोचने लगता हूँ कि यह हँसी का कौन सा प्रकार है जो उसके माध्यम से पृथ्वीमंडल पर व्याप्त हो रहा है।

और उसके हँसने से हवा का ‘डिस्प्लेसमेंट’ किस रफ्तार (वेलासिटी) से हुआ। ऐसा करने में जाहिर है कि जिस बात पर हँसी आ रही होती है, उसका आनन्द लेने का मौका मेरे हाथ से निकल गया होता है। हाथ लगती है केवल हास्य की ‘चीड़फाड़’। सो सज्जनों मैंने अपनी हास्य की वह गहन ज्ञान-पिपासा कान पकड़कर अपने मन से निकाल बाहर की। मैं चाहता तो यहाँ इन पन्नों में उस गहन ज्ञान की गगरी फोड़कर आपको भी हास्याप्लावित कर सकता था। लेकिन इस संकलन को आपके हाथ में देने से पूर्व यह सावधानी बरतना चाहता हूँ कि आपका ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ मरने न पाये और आप इस संकलन में संकलित कथाओं का सहज, अकृतिम रूप में हास्यानंद ले सकें। हास्य में शास्त्रीय अथवा वैज्ञानिक चौखटे में बंद आनंद का वर्गीकरण करने के लिए इस असार संसार में बहुत लोग पड़े हैं।

सही बात तो यह होती है मैं अपनी बात यहीँ समाप्त करके आपके और इस संकलित रचनाओं के बीच से हट जाता। लेकिन हास्य और व्यंग्य को एक ही तराजू में तौलकर फेंक देने की प्रवृत्ति से अलग व्यंग्य और हास्य के बीच के झीने पर्दे के पार जाकर एक हास्य-कथा संकलन को तैयार करने में मेरा सारा हास्यरसीय ज्ञान जिस तरह मात खाता रहा है उसका कुछ ज्ञान पाठकों के पास तक पहुँचाना चाहता हूँ।

असल में जिस उत्साह से यह संकलन देने का निश्चय मन में आया था, इस संकलन के लिए कहानियों का चयन करते समय वह उत्साह तिरोहित होता रहा। मैं इस कोशिश में था कि केवल वही कथाएं इस संग्रह के लिए चुनी जाएं जिनमें हास्य ही हास्य हो (और अदालती लहजे में बोलें तो ‘हास्य के अलावा कुछ न हो।’ यानी कि व्यंग्य से सर्वथा अलग शुद्ध हास्य पैदा करने वाली कहानियों का संकलन किया जाए)। जाहिर है कि जिस तरह के हास्य की परिकल्पना मन में थी वह उस हास्य से सर्वथा भिन्न था जो चुटकुला-प्रधान साहित्य की सृष्टि से उत्पन्न किया जाता है। अथवा भोंड़े और कुरुचिपूर्ण विषयों पर नाटकीयता ओढ़कर लिखी गयी रचनाओं से हिन्दी साहित्य के हास्यकोष को स्फीत करने में निरंतर होड़ लगाये है। मैं ऐसी हास्य रचनाएं चुनकर देने के प्रयास में था जिन्हें पढ़कर किसी भी श्रेणी के पाठक को हँसी आ सके (जिसको कैसी भी रचना पढ़कर हँसी नहीं आती, उसका तो कोई इलाज भी नहीं है)। कभी-कभी ऐसा हास्य ‘एब्सर्डिटी’ से भी निकलता है अथवा किसी चरित्र विशेष की बेवकूफियों से भी उपजता है। इसलिए इस तरह की रचनाओं को भी सम्मिलित करने का आग्रह मन में रखा। लेकिन मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की। व्यंग्य के डैने इतने विशाल हैं कि उसे हास्य के घर से निकाल सकना नामुमकिन होता गया।

इस प्रक्रिया में दो बातें सामने आयीं कि अच्छे हास्य की रचना भी वही कर रहे हैं या करने में असमर्थ हैं जो व्यंग्य के भी धनी और उस क्षेत्र के प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। दूसरे यह कि अगर हास्य की श्रेष्ठ कहानी ढूढ़नी है तो व्यंग्य की बघार से बचना बड़ा मुश्किल है। व्यंग्य उसमें गंध की तरह बसा हुआ लगता है। चुनाव करते समय ऐसा भी नही था। किस इस हास्य-संकलन के लिए व्यंग्य को मैं अछूत मानकर छोड़ने के फेर में था। काफी उदार मन से  कहानियों का चयन किया गया, जिससे हास्य, उच्चस्तरीय शिष्ट हास्य, का कथानात्मक वैविध्य भी उभरे और पाठक को सुख भी मिले। सच कहूँ तो मात्र हास्य ढूँढ़ते-ढूँढ़ते खोपड़ी खाली हो गयी। इस भ्रम जाल में जब काफी भटक लिया तब बात कहीं बात बनने के करीब पहुँची। वह कितनी बनी, कितनी नहीं बनी, यह तो पाठक ही जानेंगे। मेरे मंतव्य की ईमानदारी में कोई कसर न रह जाए, इसका विनम्र प्रयास मैंने जरूर किया है।

इन कहानियों के माध्यम से जीवन की तमाम हास्य स्थितियों का जायजा मिलेगा; इतिहास से लेकर रोजमर्रा के जीवन तक (बिना किसी प्रकट और प्रत्यक्ष उद्देश्य से भी) हास्य के दायरे टटोले गये हैं। जोकि यह कहने में संकोच हो रहा है, किंतु सचाई संकोच के साथ ही सही, कही जरूर जानी चाहिए इसलिए कहना चाहता हूँ कि हिन्दी कथा साहित्य में हास्य कथाएं-मसखरेपन और शब्द कौतुक तथा भोंड़ेपन से अलग सुरुचिपूर्ण हँसी देने वाली कथाएं-बहुत कम लिखी जाती हैं। उसका एक कारण तो यह है कि हमारी ज़िन्दगी की जद्दोजदह ज्यादा बढ़ जाने के कारण जिंदगी से ही हास्य गायब होता जा रहा है, जबकि होना यह चाहिए कि जैसे-जैसे जद्दोजहद और तनावों का ताना-बाना बढ़े उसको मुलायम करने वाले तत्त्व हास्य की रचना भी बढ़े। लेकिन हास्य-रचना को बढ़ाए कौन ! एक तो हर किसी को खुदाबन्द ताला यह करम नहीं आता फरमाते कि हर स्थिति में हँसी के मुकाम तलाश ले। और फिर ज़रूरी नहीं कि जिन्हें मुकाम तलाश लेने का हुनर हासिल हो, वे उसकी तर्जेबयानी में भी इस तरह माहिर हों कि पढ़ने वाले को हँसी आये बिना न रहे।

एक दूसरा पेंच भी पैदा हो गया है। हास्य रचनाकार को पता नहीं कब से और क्यों गंभीर रचनाकारों की तुलना में हल्के से हीन-स्थल पर रखने का चलन शुरू हो गया। आप याद करें-बेढब बनारसीजी हास्य के रचनाकारों में ही माने जाते रहे, लेकिन उनके समय के गम्भीर रचनाकारों के मन में भी उनके लिए कोई चलताऊ साहित्यकार जैसा स्थान नहीं बना। वे जहां भी गये पंत-प्रसाद की तरह आदरणीय रहे। लेकिन अब हास्य की वह साख नहीं रही। मसखरे चुटकुले बाजो ने हास्य हाईजैक कर लिया है। हास्य रचनाकार हल्का-फुल्का रचनाकार समझे जाने की प्रवृत्ति का शिकार होता गया है। इसलिए इस दिशा में गम रखने वाले प्रतिभापुत्र भी थोड़े दिनों बाद हास्य से कन्नी काटने लगते हैं। व्यंग्यकारिता को लोग फिर भी गनीमत मानते हैं।

इस स्थिति को खराब करने में यह कहें कि हास्य की जनरूचि में सस्तापन लाकर उसकी और उसके रचनाकार दोनों की मिट्टी पलीद करने में चुटकुला-प्रधान कवि उसकी और उसके रचनाकार दोनों की मिट्टी पलीद में चुटकुला प्रदान कवि सम्मेलनी कलियों ने जो ऐतिहासिक योगदान किया है, उसका हिन्दी साहित्य में कोई सानी नहीं हैं। ऐसी स्थिति में हास्य की साहित्यिक सृष्टि करने की हिम्मत करने वालों का दायित्व और अधिक बढ़ जाता है। मजा यह है कि इस दायित्व की गंभीरता को भी अच्छी तरह वही समझते हैं जो समाज की अनेक विसंगतियों को व्यंग्य के नश्तर लगाकर ठीक करने में जुटे हुए हैं तो कभी-कभी शुद्ध हास्य का भी निस्तार करते हैं। लेकिन ऐसे रचनाकारों की रचनाओं में हास्य और व्यंग्य की अलग-अलग छंटाई कर सकना बड़ा मुश्किल मालूम होता है। उसी मुश्किल का जिक्र मजबूरन मुझे करना प़ड़ा !
इस मजबूरी में मैं इसलिए फँस गया क्योंकि मैं यह भूल गया कि ज़िंदगी खालिस हँसने जैसी कोई चीज़ नहीं है। जैसे खालिस रोने जैसी कोई चीज़ ज़िन्दगी में नहीं होती। कौन जाने किसी हास्य रचना की करुण अंतर्धारा किसी को ऊपर से नीचे तक हिलाकर रख दे। हंसी बिलकुल ही गायब हो जाए। इसलिए हंसना और हंसाना दोनों ही व्यक्ति-सापेक्ष और परिस्थितिजन्य मामले हैं।

किसी को किसी बात पर हँसी आती है, किसी को किसी बात पर। श्री हरिशंकर परसाई के अंदाज में कहें तो पकौड़ी जैसी नाक देखकर भी हँसा जाता है, स्थूल काया को देखकर भी हँसी आ जाती है, आदमी कुत्ते जैसा भौंकने लगे तब भी हंसी आती है और साइकिल पर तीन आदमी सवारी गांठें और गिरें, तो भी लोग हँसते है। हँसने की स्थितियों की भली चली। हिन्दी साहित्य में आपस के प्यारे संबंध-साला, साली, पत्नी, भाभी आदि भी हँसी के बिंदु बनाये गये हैं। और हँसाने के उपक्रम में लोगों ने ‘चोच’ ‘कुल्हड’, ‘भोंपू’ आदि अनेक उपनाम तक रखे हैं। कुछ ऐसे महारथी भी मैंने देखे है जो अपनी रचना सुनाते हुए ‘गधा’ आने पर रेकने और ‘भैंसा’ आने पर रभाने का नाटक भी करके बताते हैं ताकि श्रोताओं को हँसी आ सके। मैं अपनी हँसी को क्या कहूँ, जो मुझे ऐसे जनावरी उपक्रमों पर हँसी आने के बजाए सिर पीट लेने को मन करता है। हास्य के लिए इतना हास्यास्प्रद होने की कोई आवश्यकता नहीं होना चाहिए। लेकिन ‘चाहिए’ और ‘है’ दोनों अलग-अलग स्थतियाँ हैं। उन्हें भी हास्य नाम पर हिन्दी साहित्य झेल रहा है।

बाबू संस्कृति और अफसरशाही के अनेक हास्यजनक स्थितियों को जन्म दिया है। अनेक हास्य रचनाकार उनसे लाभान्वित भी हो चुके हैं। लेकिन जब मैंने ग्रामीण हास्य और कस्बाई हास्य और नगरीय तथा महानगरीय हास्य जैसी वर्गीकृत हास्य-अफसरशाही के  बारे में सुना-जाना, तो उसकी ’हायरार्की’ और उसका यह भौगोलिक रचना-विधान मेरे मन की नयी खिड़कियाँ खोल गया।

हास्य के इस बहुआयामी स्वरूप को नमन करते हुए संग्रह का नया संस्करण विनम्र भाव से पाठकों के हाथों में दे रहा हूँ। लेकिन उससे पहले मैं संग्रह के सभी सहयोगी रचनाकारों के प्रति अपना आभार प्रकट करना चाहता हूँ। अगर उनका हार्दिक लगाव मुझसे न होता, तो मैं यह संग्रह न तो तैयार करने का उपक्रम करता और न यह तैयार ही हो पाता।
इतना जरूर है कि संग्रह के प्रथम संस्करण के दो दशक बाद हास्य कथा क्षेत्रों में कुछ नये रचनाकारों की उपस्थिति ने संग्रह के कलेवर में थोड़ी वृद्धि को आवश्यक बना दिया। हास्य कथाओं के नवीनतम परिदृश्य़ से पाठक जुड़ सकें, यह मुझे मिला, वह उनकी आत्मीयता और हास्य-व्यंग्य का अनूठा उदाहरण है। शब्द से उसे छोटा नहीं करना चाहता।
नये रूप में संकलन की सुरूचिपूर्ण ढंग से पाठकों तक पहुँचाने में राजपाल प्रकाशन गृह के पितृपुरूष विश्वनाथ जी के स्नेह का जो हाथ है, वह अनिर्वचनीय है।
उसी स्नेह के साथ संग्रह आपके हाथों में है।
इत्यलम्।

-कन्हैयालाल नन्दन   

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