आठवाँ सर्ग - हिमांशु जोशी Aathwan Sarg - Hindi book by - Himanshu Joshi
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आठवाँ सर्ग

हिमांशु जोशी

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 1997
आईएसबीएन : 81-7028-251-9 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :160 पुस्तक क्रमांक : 1505

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प्रस्तुत है आठवाँ सर्ग....

Rajendra Yadav Sankalit Kahaniyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अथ

संक्रमण की विकट स्थिति और ठण्डे कुहासे का वातावरण है, चारों ओर !
स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व जो स्वप्न देखे थे, वे स्वाधीनता के पचास वर्ष बाद भी आज स्वप्नवत्-से ही हैं—आधे और अधूरे ! जब आजादी ही अधूरी थी, राष्ट्र के चिंतन में किंचित सकारात्मक परिवर्तन ही नहीं आ पाया, तो सपने कैसे पूरे होते ?
दिशाहीन नेतृत्व की विफलता, बुद्धिजीवियों की घोर निष्क्रियता, राष्ट्र के पतन की इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रक्रिया में आम आदमी की सक्रिय सहभागिता ने देश को आज उस कगार पर ला खड़ा कर दिया है, जिसके आगे समुचित समग्र विकास के सारे मार्ग अवरुद्ध हो गए हैं। मूल्य बदल गए हैं। प्राथमिकताएं बदल गई हैं। लक्ष्य खो गए हैं। व्यक्ति मात्र अपने तक, अपने हितों तक सीमित होकर रह गया है। निष्ठा, त्याग, सेवा, सौहार्द, स्नेह, श्रद्धा—सारे शब्द अपने अर्थ खो चुके हैं। एक बहुत बड़ा प्रश्न, प्रश्न-चिह्न बन कर उभर रहा है—अन्ततोगत्वा इस सब का क्या होगा ?

नीतिहीन राजनीति देश के उज्जवल भविष्य को ग्रहण बन कर निगल रही है। चारों ओर अनाचार, अनैतिकता का ताण्डव मचा है। इस काजल की कोठरी में, ढूंढ़ने पर भी, अपवादस्वरूप कोई निष्कलंक दृष्टिगोचर नहीं हो पा रहा है। सारी व्यवस्था आपादमस्तक कालिख से ढंकी है।
इससे अधिक पतन और क्या हो सकता है ?
कहते हैं, भोर से पहले अन्धकार अपनी पराकाष्ठा पर होता है। लगता है, शायद इसके बाद का परिवर्तन ही किंचित उजास का कारण बने !

इस सब के मूल में त्रासदी यह है कि व्यक्ति का स्थान आज समूह ने ले लिया है। समूह ही सत्य की आधारशिला बन कर, दृष्टान्त के रूप में उभर रहा है। समूह और गिरोह के बीच की दूरी समाप्त हो गई है। बहुमत यदि दिन को कहे तो हमारा दृष्टिहीन जनतंत्र दिन को ही रात मान लेने के लिए प्रतिबद्ध है। इस दुर्व्यवस्था को आज दिशा ही नहीं, दृष्टि की भी आवश्यकता है। हमें यह चरम सत्य अन्ततोगत्वा स्वीकार करना ही होगा कि मात्र एक अकेले व्यक्ति की सत्ता भी, समूहों की सत्ता से अधिक सार्थक हो सकती है। आज तक विश्व की प्रायः सभी वैचारिक क्रान्तियाँ मात्र अकेले व्यक्तियों ने ही की हैं।

बूंद का महत्व यदि हम आत्मसात कर लें तो सागर भी हमारे लिए दुर्लभ नहीं रहेगा। व्यक्ति स्वयं बदले तो समग्र समाज भी स्वतः बदल जाएगा। क्रांति एवं परिवर्तन की आवश्यकता आज बाहर से उतनी नहीं, जितनी स्वयं हमारे भीतर से है।
वर्तमान स्थितियों एवं परिस्थितियों पर साहित्य तथा समाज के सवालों को यत्र-तत्र कुरेदने का प्रयास किया है। कुछ आत्मीय संस्मरणों को भी छुआ और छेड़ा है। लगभग तीन साल तक ‘धर्मयुद्ध’ में ‘जनपथ’ शीर्षक से एक स्तम्भ लिखता रहा, उसी से चुने के हुए अंश प्रस्तुत हैं यहाँ !
यदि आपको ये कहीं कुछ सोचने के लिए विवश करें, कहीं किंचित छुएं तो समझूंगा कि यह सारा प्रयास सार्थक रहा।

‘रेणु’ के साथ तीन दिन

जोगबनी की दिशा में, पूरी गति से चिंहाड़ती हुई ट्रेन दौड़ रही है। पायदान पर लटका एक किशोर चीख रहा है ! अन्त में दरवाजा क्या खुलता है, एक नया संसार प्रकट हो जाता है...
‘पी.एन.एम.’ यानी ‘फणीश्वरनाथ मण्डल’ के हाथ में गोदने का निशान है। ‘एम’ माने मुखर्जी नहीं, मात्र ‘मंडल’ है...
सुहास को चेचक हो गया है। ‘रेणु’ की गोद में उसने अपने प्राण त्याग दिए हैं। सुहास भी ‘रेणु’ की तरह बनारस विश्वविद्यालय में पढ़ता है... और...और...
विश्वेश्वर, गिरजा, मातृका, तारिणी की तरह ‘रेणु’ भी मेरा पुत्र है-कृष्ण प्रसाद कोइराला कहते हैं...फणीश्वरनाथ मण्डल को ‘रेणु’ नाम उन्होंने ही दिया...
लतिका जी के द्वार पर, सुबह-सुबह कोई दस्तक दे रहा है। दरवाजा खोल कर देखती हैं—रुग्ण ‘रेणु’ खड़े हैं।
‘अब यहीं रहना है मुझे...यहीं...’
औराही हिंगना..फारबिस गंज...अररिया...पूर्णिमा...सिमरवनी का...हिस्स्...यह ‘तीसरी कसम’ का फक्कड़, भावुक ‘रेणु’ कहीं मिथक का पात्र भी है—कथा का ही नहीं, अपनी जीवन-कथा का भी। गांव की गंवई पृष्ठभूमि पर एक उपन्यास क्या लिख दिया, हिन्दी कथा-साहित्य का नया इतिहास रच दिया है...
लगभग 18 वर्ष हो गए ‘रेणु’ को गए, परन्तु तब की अपेक्षा आज का ‘रेणु’ कहीं अधिक प्रभावशाली है। कहीं अधिक व्यापक है, उसका यश ! कहीं अधिक प्रासंगिक।

अभी-अभी विराटनगर में जिस ‘रेणु’ से हमारा साक्षात्कार हुआ, वह पहले के ‘रेणु’ के मुकाबले में बहुत विराट लगा। हम तीन दिन रहे विराटनगर में—‘रेणु’ छाया की तरह सर्वत्र छाए रहे।
अपने कच्चे घर के अंधियारे कोने में, माइग्रेन से पीड़ित..खेतों में धान बोते, निराई करते...गांव के लोगों से गांव की भाषा में बोलते...उन्हें नाचते-गाते देखते हुए...पटना के अस्पताल में जीवन-मृत्यु के झूले में झूलते...क्रान्तिकारियों के साथ गोली चलाने का अभ्यास करते—‘रेणु’ को नाना रूपों में देखा। और देखा, जोगबनी की ओर दौड़ती ट्रेन ! और बाहर पायदान पर झूलते ‘रेणु’ को !
विराटनगर में ‘रेणु’ तो रुक गए, परन्तु रेलगाड़ी उसी ग़ति से अभी निरन्तर दौड़ रही है। छुक्-छुक् !
हम कोइराला-परिवार के उस पुराने घर के प्रांगण पर खड़े हैं, जहां रेणु ने अपनी किशोरावस्था के कई वर्ष बिताए थे। जहां साधारण-सा बालक फणीश्वर एक दिन ‘राणा’ बनते-बनते ‘रेणु’ बन गया था। यहीं उसने ‘अक्षर-ज्ञान’ प्राप्त किया। यहां की धूल-भरी गलियों में वह भटका। यही है, वह शहर, जिसने ‘रेणु’ को सही अर्थों में ‘रेणु’ बनाने की भूमिका निर्वाह किया।
श्रीमती नोना कोइराला कहती हैं, ‘रेणु हमारे परिवार के आत्मीय, अंतरंग ही नहीं, कहीं मेरे देवर भी थे।’
नोना देवी घर के एक-एक कमरे में ले जाती हैं। ‘यह बड़ा-सा कमरा, जहां वे कोइराला परिवार के अपने समवयस्क किशोरों के साथ पढ़ते ही नहीं, रहते भी थे...।’

वह पुराना घर कोइराला-परिवार ने संग्रहालय की तरह बड़े जतन से सम्हाल कर रखा है। उसी तरह गोबर-मिट्टी से लिपा फर्श, वैसी ही मिट्टी से लिपी दीवारें, दरवाजे—सब वैसे-के-वैसे ! उसी तरह !
बोगनबेलिया की जामुनी रंग के बेलें बरामदे को छू रही हैं। लम्बा-चौड़ा आंगन है। यह वही घर है, जहां से राणाओं के विरुद्ध जन-आन्दोलन का सूत्रपात हुआ था ! जनतन्त्र आने पर, इसी परिवार के तीन भाई, इस देश के प्रधानमन्त्री बने थे ! राजनीति ही नहीं, साहित्य और संस्कृति का भी यह घर संगम बना। कल तक जो किशोर इस कच्चे फर्श पर दरी बिछाकर सोते थे, राजनीति में ही उन्होंने कीर्तिमान स्थापित नहीं किए, बल्कि साहित्य में भी उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। तारिणी और विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला का आधुनिक नेपाली-साहित्य में एक विशिष्ट स्थान है। इसी मिट्टी पर पला फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ के नाम के बिना भारत की राष्ट्र-भाषा हिन्दी के कथा-साहित्य का इतिहास अधूरा है...
तालियों की गड़गड़ाहट से मैं चौंकता हूं। मेरी तन्द्रा टूटती है। यहां न तो जोगबनी की दिशा में बढ़ने वाली, चिंहाड़ती रेलगाड़ी है, न यहां कोइराला-परिवार का पैतृक घर। यह सभागार है, खचाखच भरा हुआ। नेपाली-हिन्दी के अनेक लेखक। दीवार के सहारे भी बहुत से लोग खड़े हैं।
साहित्य के प्रति नेपाल-निवासियों का यह समर्पित-भाव कहीं दूर तक छू जाता है।
मंच पर मातृका प्रसाद कोइराला, श्रीमती नोना देवी कोइराला, भारतीय दूतावास की सांस्कृतिक सलाहकार मोनिका मोहता, ड़ॉ. नामवारसिंह, डॉ. कृष्णचन्द्र मिश्र आदि आदि। किसी भारतीय लेखक का नेपाल की धरती पर, इतने बड़े पैमाने पर, सम्मान का आयोजन संभवतः पहली बार हो रहा है। ‘रेणु’ नेपाल के भी उतने ही आत्मीय हैं, जितने भारत के। दो सहोदर राष्ट्रों के बीच ‘रेणु’ एक सेतु हैं। स्नेह-सूत्र हैं, जो दोनों को जोड़े हुए हैं।
कुछ लेखक नेपाली में बोल रहे हैं तो कुछ हिन्दी में।

जब-जब नेपाल आता हूं, तब-तब ऐसा क्यों लगता है ? नेपाली के प्रति जैसा अपनेपन का भाव भारत में झलकता है, वैसा नेपाल में क्यों नहीं दीखता ?
डॉ. नामवारसिंह ‘रेणु’ के संस्मरण सुनाते हुए कहते हैं-‘रेणु’ ने एक स्थान पर लिखा है—जब भी काठमाण्डो आता हूं, किसी रेस्तरां में बैठता हूं, लोगों से मिलता हूं तो उनके व्यवहार में एक प्रकार का खटखटास-सा लगता है।
यह खटखटास-सा नहीं लगना चाहिए, पारस्परिक व्यवहार में।
जिस ‘रेणु’ के निमित्त इतना विशाल आयोजन हो रहा है, नेपाल में, उनकी श्रेष्ठ कृति ‘मैला आंचल’ का अब तक नेपाली में रूपान्तरित न होना, अनेक प्रबुद्ध श्रोताओं के लिए अचरज का कारण है।
बिहार से, विशेषकर पूर्णियां के आस-पास से अनेक लेखक/प्राध्यापक आए हैं। ‘रेणु’ के प्रति उनका अगाध श्रद्धा-भाव अभिभूत किए बिना नहीं रहता। सम्पूर्ण हिन्दी-भाषी क्षेत्र इस दृष्टि से दरिद्र है। अपने विचारकों, लेखकों, कलाकारों के प्रति उसमें वह आत्मीय-भाव नहीं झलकता, जो बांग्ला, मराठी, मलयालम आदि में दीखता है। इस दृष्टि से बिहार अपवाद है। वहां की उर्बर धरती में वह संस्कार आज भी जीवित है।
विराटनगर में ‘रेणु’ का विराट रूप देख कर सब सम्मोहित हैं। लगातार तीन दिनों तक ‘रेणु’,‘रेणु’,‘रेणु’ सुनते-सुनते कान थक गए हैं...। दिन-रात, सुहब-शाम, हर स्थान पर ‘रेणु’ की उपस्थिति का अहसास कहीं बहुत अच्छा भी लगता है, कहीं थका देने वाला भी।
हवाई-अड्डे पर आकर शायद दूसरा कोई प्रसंग छिड़े, तभी एक सहयात्री किन्हीं अन्य सहयात्री से परिचय कराते हैं, ‘असम की सीमा से लगी नेपाल की पहाड़ियों पर इनके चाय के अनेक बागान हैं...।’
वे हमारी ओर मुड़कर कहते हैं, ‘हर महीने ‘रेणु जी’ को मैं चाय भेजता था। ‘रेणु जी’ मेरा ही चाय पीते थे...।’
निराला के बाद ‘रेणु’ ही ऐसे लेखक हैं, जो जीते जी मिथक बन गए !

दो आकांक्षाएं

शाम के छह बज रहे हैं !
हम कनॉट प्लेस के ‘इण्डियन कॉफी हाउस’ में बैठे हैं। एक अधेड़-से सज्जन आते हैं, कुर्ता-पाजामा पहने। किसी कस्बे के से लगते हैं। बड़े विनम्र भाव से पूछते हैं, ‘क्या आप विष्णुजी को जानते हैं....?’
‘जी, मैं ही हूं !’ विष्णुजी मुस्कराते हुए कहते हैं।
‘अभी मैं ‘सस्ता साहित्य मण्डल’ गया था। वहां किसी ने कहा कि आप इधर ही कहीं ‘टी-स्टाल’ में शाम को बैठा करते हैं। इसीलिए पूछता-पूछता चला आया...।’
एक छोटी-सी पुस्तिका उन्हें सौप कर वह सहसा अन्तर्ध्यान हो जाते हैं।

हां, तो इस ‘टी-स्टाल’ बनाम ‘कॉफी हाउस’ में बयासी वर्षीय विष्णु प्रभाकर गत पचास वर्षों से लगातार बैठ रहे हैं। सप्ताह के सातों दिन बराबर आते हैं। चूंकि रविवार को भी यह खुला रहता है, इसलिए उस दिन भी आना नहीं भूलते।
कहा जाता है कि अजमेरी गेट से मोहनसिंह प्लेस तक आने में उन्हें सत्रह लाल बत्तियां पार करनी होती हैं। भागते वाहनों से अटी, भीड़ भरी सड़कों को पार करके आना उन्हीं के बूते का है !
इस 21 जून को विष्णुजी 83वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। किंतु अभी भी आठ-आठ, दस-दस घण्टे नियमित रूप से अपने पढ़ने-लिखने में लगाते हैं। वैसी ही चिरन्तन खादी की वेश-भूषा, सिर पर गांधी टोपी, कंधे पर खादी का झोला। खरामे ! खरामे !

विष्णुजी के बिना इस ‘साहित्यिक चौपाल’ की कल्पना ही सम्भव नहीं। एक स्थान पर वे बड़े शान्त भाव से गणेशजी की तरह प्रतिष्ठा के साथ बैठे रहते हैं। और धीरे-धीरे साहित्यकारों की मंडली उनके इर्द-गिर्द गोलाकार में घिरने लगती है। कभी-कभी भीष्मजी शीला भाभी के साथ आ जाते हैं तो अच्छा-खासा गंगा-जमुना का संगम हो जाता है।
लेखकीय संघर्ष क्या होता है ? क्या होता है, स्वाभिमान के साथ जीना—विष्णुजी इसके जीवन्त दृष्टान्त हैं। एक-एक पैसा संजोकर, जिंदगी के इस मुकाम पर आकर एक छोटा-सा मकान बनाया था, जिसमें किराएदार के रूप में एक ऐसा ‘प्रतापी’ पुरुष बैठ गया है, कहते हैं, जिसके नाम से ही मुहल्लेवाले कांपते हैं।
पुस्तकों की रॉयल्टी जो मिलती है, सो मिलती है। रेडियो-दूरदर्शन से भी उनका अब दूर का नाता है। ग्यारह खण्डों में उनका आधा साहित्य छप गया है। शेष दस खण्ड और छपने हैं।
उनकी लालसा है—इक्कीस खण्डों में प्रकाशित अपना समग्र साहित्य छपा देखें तथा फिल्म अभिनेत्री दिव्या भारती पर एक उपन्यास लिखें।
हमारी प्रभु से प्रर्थना है, ये दोनों आकांक्षाएं वे पूरी करें।
विष्णुजी शतायु हों !

रहबर : सात जन्मों के साक्षी

लगभग पैंतीस-चालीस सालों का परिचय रहा है रहबर साहब से। जैसा उन्हें आरम्भ में देखा था, अन्त तक वैसा ही पाया ! लोग एक जन्म भी पूरा कहाँ जी पाते हैं, परन्तु वे पूरे सात जन्म जिए एक साथ। अपने सातों जन्मों की संघर्ष-गाथा लिखी उन्होंने।
कमजोर कद-कांठी का, एक दुबला-पतला आदमी, लाठी के सहारे टेढ़ा-मेढ़ा चलने वाला। लगता है, जिंदगी की राह पर भी वह हमेशा टेढ़ा ही चलता रहा।
दुनिया-जहान से जूझता रहा। ‘आ बैल, मुझे मार’ की तर्ज पर सबको चुनौतियां देता रहा और सबकी चुनौतियां अकेला ही झेलता रहा। किसी को भी उसने बख्शा नहीं।
गांधी पर पुस्तक लिखी थी ‘गांधी बेनकाब !’ फिर ‘नेहरू बेनकाब !’ और ‘गालिब बेनकाब !’ वह कई विभूतियों को बेनकाब करता रहा, बड़ी बेरहमी के साथ।
एक दिन यों ही छेड़ने के लिए हमने कह दिया, ‘रहबर साहब, आप अब ‘रहबर बेनकाब’ कब लिख रहे हैं ?’
पहले तो वह हंसने लगे। फिर अपने स्टाइल में कुछ गंभीर होकर, झटके के साथ हाथ हिलाते हुए बोले, ‘अरे, जनाब, खुद को बेनकाब किए क्या कोई किसी और को बेनकाब कर सकता है ? हम तो पैदा ही बेनकाब हुए हैं...।’ कुछ रुककर फिर कहने लगे, ‘सच कहें तो हमारी बड़ी तमन्ना थी, नकाब पहनने की, पर कभी ऐसी जुगाड़ बनी ही नहीं ! तन ढकने के लिए लंगोटी मिलती रही, यही क्या कम रहा...?’

वह सनातनी रहे। आर्य समाजी रहे। प्रगतिवाद का रंग चढ़ा तो प्रगतिवादियों से भी बड़े प्रगतिवादी हो गए, नक्सलपंथ के निकट पहुंच कर भी रुके नहीं। उनका कहना था कि इतने पर भी उनके सपने सच न हुए तो वे अपना आठवां जन्म लेंगे और हथेली पर सूरज उगा कर रहेंगे !
सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन में जेल गए। आपातकाल के दौर में भी सींखचों में बंद रहे। वहां क्या-क्या नहीं झेला उन्होंने !
स्वाधीनता-सेनानियों की सुख-सुविधाएं उन्हें आसानी से मिल सकती थीं, परन्तु सुख-सुविधाओं से उनका जनम-जनम का बैर रहा। ताम्र-पत्र तक लेने की आवश्यकता उन्होंने नहीं समझी। उनकी इसी जिद का खामियाजा उन्हें ही नहीं, उनके सारे परिवार को उम्रभर झेलना पड़ा।
रहबर साहब के घर चारपाई नहीं थी। पत्नी ने एक बार जिद की तो बोले, ‘जिस दिन क्रांति आएगी, उसी दिन चारपाई भी आ जाएगी !’
वर्षों बाद एक दिन पत्नी ने देखा, बाहर दरवाजे के पास कोई मजदूर चारपाई लिए खड़ा है।
‘हमारी नहीं है। किसी और की होगी !’ पत्नी ने उपेक्षा से मजदूर से कहा।
इतने में पीछे से रहबर साहब आ गए। बोले, ‘हमारी ही है भागवान....!’
‘तो क्या क्रांति आ गई ?’ सरल स्वभाव की पत्नी ने निश्छल स्वर में पूछा।
‘वह भी आ रही है, तुम चारपाई तो सम्हालो !’
अनेक स्तरों पर संघर्ष करते रहे वह।

इतने अभावों से, इतने आन्दोलनों से जुड़ा यह बेचैन व्यक्ति कैसे इतना लिख पाया, सच नहीं लगता। उन्होंने जहां कुछ महापुरुषों को जी भर कर कोसा, वहां ‘योद्धा संन्यासी स्वामी विवेकानंद’ जैसी कृतियां भी लिखीं।
‘बिना रीढ़ का आदमी’, ‘मुखौटे’, ‘पंखहीन तितली’, ‘आदिम पुरखे’ आदि उनके उपन्यास विशेष चर्चा के विषय बने।
उनका चिन्तन, उनकी तरह अपने ही ढंग का था। ‘मिथक की मौत’ में उन्होंने अपने विचारों को एक दूसरी ही शैली में प्रस्तुत किया था।
‘गांधी बेनकाब’ लिखने की योजना बनाई तो गांधीवादी लेखक विष्णु प्रभाकर से मांग-मांग कर सारी सामग्री गांधी के विरुद्ध जुटा ली।
‘अभाव, संघर्ष और विद्रोह—इन तीनों का सम्मिश्रण था-‘रहबर’ शब्द। जीवनभर अभाव ही अभाव मिले देखने के लिए। पंजाब के एक साधारण-से परिवार में पैदा हुए। अखबार बेचकर, बच्चों के ट्यूशनें पढ़ाकर अपनी पढ़ाई और अपने परिवार की परवरिश जारी रखी। स्थानीय समाचार-पत्रों में कुछ दिन काम किया, पर अधिक अर्से तक चल न पाया ! एक जगह जमकर टिकने के लिए वह पैदा ही नहीं हुए तो यहां कैसे टिकते !
पुस्तकें छपने लगीं तो प्रकाशकों से भी बनी नहीं। इसलिए स्वयं छापना आरम्भ कर दिया। परन्तु बिक्री का कोई जरिया तो था नहीं। इसलिए सौदा भी घाटे का ही रहा।

एक और भी पहलू था, उनके जीवन का। वे जहाँ इतने रूखे, मुंहफट थे, वहां उनके अन्दर से कभी-कभी एक और रहबर झांकता हुआ दिखलाई देता था, जो उतना ही संवेदनशील और उतना ही भावुक था।
कुर्सी पर तिरछे बैठकर, किसी आत्मीय क्षण में, जब वे दोनों हाथों के बीच मजबूती से पकड़ी लाठी के साथ-साथ अपने दोनों पांवों को हिलाते हुए बोलते तो कभी-कभी बहुत भावुक को उठते थे ! तब लगता नहीं था कि ये वही रहबर हैं !
81 वर्ष की उम्र तक जी पाना, इस बेरहम दुनिया में, कुछ कम तो नहीं ! यों अंतिम दिनों में आकर कभी-कभी लगता था, जैसे उन्हें अपने प्रति समाज और साहित्यिक-संसार की उपेक्षाएं कहीं सालने-सी लगी हैं। कॉफी हाउस’ की बहसों में वे कम भाग लेते। अधिकतर चुपचाप बैठे रहते और जब घर चलने का वक्त होता तो उठकर चुपचाप चल देते !
हां, अब कभी लाठी टेकते हुए वे ‘कॉफी हाउस’ में आते दिखलाई नहीं देंगे, न किसी साहित्य-समारोह में किसी कोने पर अकेले बैठे, टुकुर-टुकुर जग का मुजरा देखते हुए ही।
आने वाली पीढ़ियों को कभी सच नहीं लगेगा कि एक ऐसा भी लेखक था कभी, जो जिंदगीभर सच को सच कहने की सजा झेलता हुआ अपनों के ही बीच इतना बेगाना रहा।

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