अजातशत्रु - जयशंकर प्रसाद Ajatshatru - Hindi book by - Jaishankar Prasad
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अजातशत्रु

जयशंकर प्रसाद

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 1994
पृष्ठ :98
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1436
आईएसबीएन :000000000

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प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

इसमें अंतर्द्वन्द्व नाटकों का प्राण होता है। अजातशत्रु का मूलाधार भी अंतर्द्वन्द्व ही है। मगध,कोशल और कौशांबी में प्रज्वलित विरोध की अग्नि इस पूरे नाटक में फैली हुई है। उत्साह और शौर्य से परिपूर्ण इस नाटक में चरित्रों का सजीव चित्रण किया गया है। इसके प्रमुख पात्र मानवीय गुणों से ओतप्रोत है।

 

प्राक्कथन

‘अजातशत्रु’ के लेखक—जिनसे हिन्दी—पाठक खूब अच्छी तरह परिचित हैं—हिन्दी के उन इने—गिने लेखकों में से जिन्होंने मातृभाषा में मौलिकता का आरम्भ किया है। उनकी कृतियाँ मौलिक हैं; यही नहीं, वे महत्वपूर्ण भी हैं। यों तो उनकी रचना और शैली में सभी जगह उत्कृष्टता है; पर उनके नाटक तो हिन्दी—संसार में एक दम नई चीज हैं। वे आज की नहीं आगामी कल की चीज हैं। वे हिन्दी-साहित्य में एक नये युग के विधायक हैं। न विचारों के खयाल से, न कथानक के खयाल से, न लक्ष्य के खयाल से आज तक हिन्दी में इस प्रकार की रचना हुई है, न अभी होती ही दीख पड़ती है।

हाँ, वह समय दूर नहीं है जब ‘विशाख’ और ‘अजातशत्रु’ के आदर्श पर हिन्दी में धड़ाधड़ नाटक निकलने लगेंगे। परन्तु वे अनुकरण मात्र होंगे। ‘प्रसाद’ जी की कृतियों के निरालेपन पर उनका कोई असर न पड़ेगा।
सम्भव है कि हमारा कथन बहुतों को व्याजवस्तुति मात्र जान पड़े, पर समय इन पंक्तियों की सत्यता साबित करेगा। अस्तु, हम प्रकृत विषय से अलग हुए जा रहे हैं —

बंग-साहित्य-प्रेमियों के एक दल द्वारा अत्यन्त समादृत नाट्यकार द्विजेन्द्र बाबू का कथन है—‘‘जिस नाटक में अंतर्द्वन्द्व दिखाया जाय वही नाटक उच्च श्रेणी का होता है—अन्तर्विरोध के रहे बिना उच्च श्रेणी का नाटक बन नहीं सकता।’’ यह सिद्धांत किसी अंश में ठीक है, क्योंकि ऐसा होने से काव्य में प्रशंसित लोकोत्तर चमत्कार बढ़ता है। किन्तु, यही सिद्धांत चरम है, ऐसा मानना कठिन है; क्योंकि अंतर्विरोध से वाह्यद्वन्द्व जगत्, का उद्भव है और इस वाह्यद्वन्द्व कालक्रम से शीघ्र अवसान होता है—इसी का चित्रण कवि के अभीष्ट को शीघ्र समीप ले आता है।

अन्तर्द्वन्द्वमय अपूर्णता में घटना का अन्त कर देना, उसे कल्पना का क्षेत्र बना देना, छोटी-छोटी घटनाओं पर अवलम्बित आख्यायिकाओं का काम है। यदि नाटक अपने ऊपर यह भार उठावें तो उनसे वृत्तियों को केवल चञ्चलता की शिक्षा मिलेगी, और सन्देह—वाद की पुष्टि होगी। और, चरित्रगठन को उपकरण देने से, तथा मानव-समाज के ज्ञान-साधन में सहायक होने से—जो नाटक का उद्देश्य नहीं, तो निर्देश अवश्य है—वे अंततः वंचित ही रहेंगे।

बाह्यद्वन्द्व का—जगत का—हमारे जीवन से विशेष सान्निध्य है। इसी महानाटक से हम अपने चरित्र के लिए उपकरण ग्रहण करते हैं, आदर्श बनाते हैं, अनुकरण करते हैं। अतः जो चरित्र मानवता की साधारण गति के समीप होगा वही उसे विशेष शिक्षा देगा। साथ ही विशेष विनोद की सामग्री जुटावेगा। जो दूर है वह केवल कौतुक और आश्चर्य ही का उद्दीपन करेगा। वह, प्रबल प्रतिघात तथा वृत्तियों को विपरीत धक्के खिलाकर उत्तेजित करके अथवा, बलवंती वासनाओं को दुर्दान्त मानवरूप में अति-चित्र करके समाज में कुतूहल उपजावेगा। उसकी चंचलता बढ़ावेगा और उसमें क्रांति करा देगा। ऐसी ही नाटक, चाहे वे रचना में प्रसादान्त क्यों न हों, मानवता के लिए, परिणाम में विषादान्त होते हैं।

किन्तु जहाँ वासनाओं का चरित्र के साथ उत्थान और पतन तथा संघर्ष होगा, साथ ही उत्कट वासनाओं का आरम्भ होकर शान्त हृदय में अवसान होगा, वह नाटक मरणांत भले ही हो, किंन्तु है मानवता के लिए प्रसादान्त। ‘प्रसाद’ जी के नाटकों में एक यह भी मुख्य विशेषता है।

‘अजातशत्रु’ का अन्तिम दृश्य इसका प्रस्तुत प्रमाण है। यद्यपि अंत में बिम्बसार का लड़खड़ाना यवनिकापतन के साथ उसके मरण का घोतक है; किन्तु, जिन वाक्यों को कहता हुआ लड़खड़ता है वे वाक्य तथा उसी क्षण भगवान गौतम का प्रवेश, बिम्बसार के हृदय की तथा उस अवसर की पूर्ण शान्ति के सूचक हैं।

हाँ, ‘प्रसाद’ जी के नाटक ऐसे ही हैं। वे न तो केवल अन्तर्द्वन्द्व को लेकर मर्त्यलोक में, चतुर्मुख की मानसी सृष्टि की तरह चमत्कार पूर्ण किन्तु निःसार और निरवलम्ब की अवतारणा करते हैं, न केवल वाह्यद्वन्द्व दिखाकर मानवता के सामने पाशव आदर्श रखते हैं, वरन् वे इन दोनों अंगों के समुचित समिश्रण होने के कारण मानवता के उच्चतम आदर्श के पूर्ण व्यंजक हैं। अतएव मानवता की वे एक बड़ी भारी पूँजी हैं।

‘प्रसाद’ के आदर्शों में पवित्रता, उच्चता, भव्यता, आदि देव-ग्रंथ इसलिए हैं कि वे पूर्ण मनुष्य हैं। उनका बिम्बसार, मगधाधिप होने के कारण बड़ा नहीं। उसकी बड़ाई इसलिए है कि वह नीचे लिखे, तथा इसी प्रकार के अन्य वाक्यों द्वारा, उन संकीर्ण सामाजिक नियमों को, जिन्होंने मनुष्य को ऊँच-नीच के भिन्न-भिन्न प्रकार के बन्धनों में जकड़कर मानवता की पवित्रता को पददलित कर रक्खा है, किस जोरों में खण्डन करता है —

‘‘यदि मैं सम्राट न होकर किसी विनम्र लता के कोमल किसलय झुरमुट में एक अधखिला फूल होता और संसार की दृष्टि मुझ पर न पड़ती—पवन की किसी लहर को सुरभित करके धीरे से उस थाले में चू पड़ता-तो इतना भीषण चीत्कार इस विश्व में न मचता।’’

‘‘चुप ! यदि मेरा नाम न जानते हो तो, ‘मनुष्य’ कह कर पुकारो। यह भयानक सम्बोधन (सम्राट) मुझे न चाहिए।’
इतना ही नहीं, उसके जीवन-भर में मानवता ओत-प्रोत है, और उसका पुत्र, क्रूर अजातशत्रु भी अन्त को इसके आगे सिर नवाता है।

इसी तरह ‘प्रसाद’ के लोकोत्तर चरित पात्रों को भी हम इसलिए श्रद्धा पूर्वक सिरनवाते हैं कि उनमें मानवता का पूर्ण विकास है। उनके बुद्ध इसलिए बुद्ध हैं—इसलिए अवतार हैं—कि वे मानवता के आदर्शों की पूर्ण मूर्ति हैं। यह नहीं कि, अवतार हैं, अतः उनमें इन आदर्शों की पूर्णता उपस्थित हुई है।

कवि की इस प्रतिभा पर बहुत कुछ कहा जा सकता है; लेकिन हम नहीं चाहते हैं कि ‘अजातशत्रु’ पढ़कर पाठक हमारी समीक्षा की जाँच करें।

हाँ, इस नोट के समाप्त करने के पहले एक बात और कहनी है —

भारतवर्ष के किसी भाषा में लिखे जाने वाले नाटकों में, उनके लेखन-घटना–काल के रहन-सहन, चाल-व्यवहार की ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते। उनके पात्रों के नाम—भर तो ऐतिहासिक रहते हैं; लेकिन अपने आचार-व्यवहार से वे वर्तमान काल के मनुष्य—यो भी स्वदेश के नहीं, पश्चिम के जान पड़ते हैं।
किन्तु ‘प्रसाद’ जी इस दोष से प्रायः बिल्कुल बचे हैं। अभी तक हमारे पूर्वजों के सामाजिक जीवन की बहुत ही थोड़ी खोज हुई है। जो कुछ हुई है, ‘प्रसाद’ जी अपने नाटकों में उसका पूर्ण उपयोग करने के भागी हैं।

कथा प्रसंग

इतिहास में घटनाओं की प्रायः पुनरावृत्ति होते देखी जाती है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उसमें कोई नई घटना होती ही नहीं। किन्तु असाधारण नई घटना भी भविष्यत् में फिर होने की आशा रखती है। मानव समाज की कल्पना का भण्डार अक्षय है, क्योंकि वह इच्छा-शक्ति का विकास है। इन कल्पनाओं का, इच्छाओं का मूल सूत्र बहुत ही सूक्ष्म और अपरिस्फुट होता है। जब वह इच्छा-शक्ति किसी व्यक्ति या जाति में केन्द्रभूत होकर अपना सफल या विकसित रूप धारण करती है, तभी इतिहास की सृष्टि होती है। विश्व में जब तक कल्पना इयत्ता को नहीं प्राप्त होती, तब तक वह रूप-परिवर्तन करती हुई पुनरावृत्ति करती ही जाती है। समाज की अभिलाषा अनन्त स्रोतवाली है। पूर्व कल्पना के पूर्ण होते-होते एक नयी कल्पना उसका विरोध करने लगती है, और पूर्व कल्पना कुछ काल तक ठहरकर, फिर होने के लिए अपना क्षोभ प्रस्तुत करती है। इधर इतिहास का नवीन अध्याय खुलने लगता है। मानव-समाज के इतिहास का इसी प्रकार संकलन होता है।

भारत का ऐतिहासिक काल

गौतम बुद्ध से माना जाता है, क्योंकि उस काल की बौद्ध कथाओं में वर्णित व्यक्तियों का पुराणों की वंशावली में भी प्रसंग आता है। इसलिए लोग वहीं से प्रामाणिक इतिहास मानते हैं। पौराणिक काल के बाद गौतम बुद्ध के व्यक्तित्व ने तत्कालीन सभ्य संसार में बड़ा भारी परिवर्तन किया। इसलिए हम कहेंगे कि भारत के ऐतिहासिक काल का प्रारम्भ धन्य है, जिसने संसार में पशु-कीट-पतंग से लेकर इन्द्र तक के साम्यवाद की शंखध्वनि की थी। केवल इसी कारण हमें, अपना अतीव प्राचीन इतिहास रखने पर भी, यहीं से इतिहास काल का प्रारम्भ मानने में गर्व होना चाहिये।

भारत-बुद्ध के पौराणिक काल के बाद इन्द्रप्रस्थ के पाण्डवों की प्रभुत्ता कम होने पर बहुत दिनों तक कोई सम्राट नहीं हुआ। भिन्न-भिन्न जातियाँ अपने-अपने देशों में शासन करती थीं। बौद्धों के प्राचीन ग्रन्थों में ऐसे 16 राष्ट्रों का उल्लेख है, प्रायः उनका वर्णन भौगोलिक क्रम के अनुसार न होकर जातीयता के अनुसार है। उनके नाम हैं—अंग, मगध, काशी—कोशल, वृजि मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पांचाल, मत्स्य, शूरसेन, अश्वक, अवंतिक, गांधार और कांबोज।

उस काल में जिन लोगों से बौद्धों का सम्बन्ध हुआ है, इनमें उन्हीं का नाम है। जातक-कथाओं में शिवि, सौवीर, मद्र, विराट् और उद्यान का भी नाम आया है। किन्तु उनकी प्रधानता नहीं है। उस समय जिन छोटी-से-छोटी जातियों, गणों और राष्ट्रों का सम्बन्ध बौद्ध धर्म से हुआ, उन्हें प्रधानता दी गई, जैसे ‘मल्ल’ आदि।

धार्मिक क्रांति

अपनी-अपनी स्वतंत्र कुलीनता और आचार रखनेवाले इन राष्ट्रों में कितनों ही में गण-तन्त्र-प्रणाली भी प्रचलित थी—निसर्ग नियमानुसार एकता, राजनीति के कारण नहीं, किन्तु एक-से होनेवाली थी। वैदिक हिंसा-पूर्ण यज्ञों और पुरोहितों के एकाधिपत्य से साधारण जनता के हृदय-क्षेत्र में विद्रोह की उत्पत्ति हो रही थी। उसी के फल-स्वरूप जैन और बौद्ध-धर्म का प्रादुर्भाव हुआ। चरम अहिंसावादी जैन-धर्म के बाद बौद्ध का प्रादुर्भाव हुआ। वह हिंसामय ‘वेद-वाद’ और पूर्ण अहिंसावाली जैन-दीक्षाओं के ‘अति-वाद’ से बचता हुआ एक मध्यवर्ती नया मार्ग था। संभवतः धर्म-चक्र-प्रवर्तन के समय गौतम ने इसी से अपने धर्म को ‘मध्यमा-प्रतिपदा’ के नाम से अभिहित किया और इसी धार्मिक क्रान्ति ने भारत के भिन्न-भिन्न राष्ट्रों को परस्पर संधिविग्रह करने के लिये बाध्य किया।

इन्द्रप्रस्थ और अयोध्या के प्रभाव का ह्रास होने पर, इसी धर्म के प्रभाव से पाटलिपुत्र पीछे बहुत दिनों तक भारत की राजधानी बना रहा। उस समय के बौद्ध ग्रन्थों में ऊपर कहे हुए बहुत-से राष्ट्रों में से चार प्रमुख राष्ट्रों का अधिक वर्णन है—कोशल, मगध, अवन्ती और वत्स। कोशल का पुराना राष्ट्र संभवतः उस काल के सब राष्ट्रों से विशेष मर्यादा रखता था, किन्तु वह जर्जर हो रहा था। प्रसेनजित् वहाँ का राजा था। अवन्ती में प्रद्योत (पज्जोत) का राज्य था। मालव का राष्ट्र भी उस समय सबल था। मगध, जिसने कौरवों के बाद भारत में महान साम्राज्य स्थापित किया, शक्तिशाली हो रहा था। बिम्बसार वहाँ के राजा थे।

अजातशत्रु

वैशाली (वृजि) की राजकुमारी से उत्पन्न, उन्हीं का पुत्र था। इसका वर्णन भी बौद्धों की प्राचीन कथाओं में बहुत मिलता है। बिम्बसार की बड़ी रानी कोशला (वासवी) कोशल-नरेश प्रसेनजित् की बहन थी। वत्स-राष्ट्र की राजधानी कौशांबी थी जिसका खँडहर जिला बाँदा (करवी-सब-डिवीजन) में यमुना किनारे ‘कोसम’ नाम से प्रसिद्ध है।

उदयन

इसी कौशांबी का राजा था। इसने मगधराज और अवन्ती नरेश, की राजकुमाकरियों से विवाह किया था। भारत के ‘सहस्ररजनी-चरित्र ‘कथा-सरित्सागर’ का नायक इसी का पुत्र नरवाहनदत्त है।

बृहत्कथा (कथा-सरित्सागर) के आदि आचार्य वररुचि हैं, जो कौशाम्बी में उत्पन्न हुए थे, और जिहोंने मगध में नन्द का मंत्रित्व किया। उदयन के समकालीन अजातशत्रु के बाद उदयाश्व, नन्दिवर्द्धन और महानन्द नाम के तीन राजा मगध के सिंहासन पर बैठे। शूद्रा के गर्भ से उत्पन्न, महानन्द के पुत्र, महापद्म ने नन्दवंश की नींव डाली। इसके बाद मुमाल्य आदि 8 नंदों ने शासन किया (विष्णुपुराण, 4 का अंश)। किसी के मत से महानंद के बाद जब नन्दों ने राज्य किया। इसी ‘नवनंद’ वाक्य के दो अर्थ हुए—नव नन्द (नवीन नन्द), तथा महापद्म और समतुल्य आदि 9 नन्द। इनका राज्य काल, विष्णुपुराण के अनुसार, 100 वर्ष है। नन्द के पहले राजाओं का राज्य-काल, भी विष्णुपुराण के अनुसार, लगभग 100 वर्ष होता है। ढुढ़ि ने मुद्राराक्षस के उपोद्धात में अन्तिम नन्द का नाम धननन्द लिखा है। इसके बाद योगानन्द का मंत्री वररुचि हुआ। यदि ऊपर लिखी हुई पुराणों की गणना सही है तो मानना होगा कि उदयन के पीछे उदयन 200 वर्ष के बाद, वररुचि हुए; क्योंकि पुराणों के अनुसार 4 शिशुनाग-वंश और 9 नन्द वंश के राजाओं का राज्य-काल इतना ही होता है। महावंश और जैनों के अनुसार कालाशोक के बाद केवल नवनन्द का नाम आता है। कालाशोक रुपणों का महापद्म-नन्द है।

बौद्धमतानुसार इन शिशुनाग तथा नन्दों का संपूर्ण राज्य-काल 100 से कुछ अधिक होता है। यदि इसे माना जाए तो उदयन के 100-125 वर्ष पीछे वररुचि का होना प्रमाणित होगा। कथा सरित्सागर में इसी नाम ‘कात्यायन’ भी है। ‘‘नाम्ना वररुचि: किंच कात्यायन इति श्रुतः।’’ इन विवरणों से प्रतीत होता है कि वररुचि 125-200 वर्ष बाद हुए। विख्यात उदयन की कौशांबी वररुचि की जन्म भूमि है।

मूल बृहत्कथा वररुचि ने काणभूति से कही, और काण भूति ने गुणाढय से। इससे व्यक्ति होता है कि यह कथा वररुचि के मस्तिष्क का आविष्कार है, जो संभवतः उसने संक्षिप्त रूप से संस्कृति में कही थी; क्योंकि उदयन की कथा उसकी जन्मभूमि में किवदन्तियों के रूप में प्रचलित रही होगी। उसी मूल उपाख्यान को क्रमशः काणभूति और गुणाढय ने प्राकृत पैशाची भाषाओं में विस्तावूर्वक लिखा। महाकवि क्षेमेन्द्र ने उसे बृहत्कथा-मंजरी नाम से, संक्षिप्त रूप से, संस्कृत में लिखा। फिर काश्मीरराज अनंतदेव के राज्य-काल में कथा-सरित्सागर की रचना हुई। इस उपाख्यान को भारतीयों ने बहुत आदर दिया और वत्सराज उदयन कई नाटकों और उपाख्यानों में नायक बनाए गए। स्वप्न-वासवदत्ता, प्रतिज्ञायौगंधरायण और रत्नावली में इन्हीं का वर्णन है। हर्षचरित में लिखा है—‘‘नागवनविहारशीलं च माया मतंगांगान्निर्गता महासेनसैनिका वत्सपतिं न्ययशिंषु: :।’’ मेघदूत ने भी–‘‘प्राप्यावंतीनुदयनकथाकोविदग्रामवृद्धान्’’ और ‘प्रद्योतस्य प्रियदुहितरं वत्स-राजोत्र जहे ’’इत्यादि है। इससे इस कथा की सर्वलोकप्रियता समझी जा सकती है। वररुचि ने इस उपाख्यान—माला को सम्भवतः 350 ई. पूर्व लिखा होगा। फिर भी सातवाहन नामक आंध्र-नरपति के राजपंडित गुणाढय ने इसे बृहत्कथा नाम से ईसा की पहली शताब्दी में लिखा। इस कथा का नायक नरवाहनदत्त इसी उदयन का पुत्र था।

बौद्धों के यहाँ इसके पिता का नाम ‘परंतप’ मिलता है। और ‘मरन परिदीपित उदेनिवस्तु’ नाम से आख्यायिका है। उसमें भी (जैसा की कथा सरित्सागर में) इसकी माता का गरुण-वंश के पक्षी द्वारा उदयगिरि की गुफा में ले जाया जाना और वहाँ एक मुनिकुमार का उसकी रक्षा और सेवा करना लिखा है। बहुत दिनों तक इसी प्रकार साथ रहते-रहते मुनि से उनका स्नेह हो गया और उसी से वह गर्भवती हुई। उदयगिरि (कलिंग) की गुफा में जन्म होने के कारण लड़के का नाम उदयन पड़ा। मुनि ने उसे हस्तीवश करने की विद्या, और, और भी कई सिद्धियाँ दीं। एक वीणा भी मिली। (कथा-सरित्सागर के अनुसार वह, प्राण बचाने पर, नागराज ने दी थी) वीणा द्वारा हाथियों और शबरों की बहुत-सी सेना एकत्र करके उसने कौशाम्बी को हस्तगत किया और अपनी राजधानी बनाया। किन्तु बृहत्कथा के आदि आचार्य वररुचि का कौशाम्बी में जन्म होने के कारण, उदयन की ओर विशेष पक्षपात-सा दिखाई देता है। अपने आख्यान के नायक को कुलीन बनाने के लिए उदयन को पांडव-वंश का लिखा है। उनके अनुसार उदयन गांडीवधारी अर्जुन की सातवीं पीढ़ी में उत्पन्न सहस्रानीक का पुत्र था। बौद्धों के मतानुसार ‘परन्तप’ के क्षेत्रज पुत्र उदयन की कलीनता नहीं प्रकट होती। परन्तु वररुचि ने लिखा है कि इन्द्रप्रस्थ नष्ट होने पर पांडव-वशियों ने कौशांबी को राजधानी बनाया। वररुचि ने यों सहस्रानीक से कौशांबी के राजवंश का आरम्भ माना है। कहा जाता है, इसी उदयन ने अवंतिका को जीत कर उसका नाम उदयन-पुरी या उज्जयनपुरी रक्खा। कथा-सरित्सागर में उदयन के बाद नरवाहनदत्त का ही वर्णन मिलता है। विदित होता है, एक-दो पीढ़ी चलकर उदयन का वंश मगध की साम्राज्य-लिप्सा और उसकी रण-नीति में अपने स्वतंत्र अस्तित्व को नहीं रख सका।

किन्तु विष्णुपुराण की एक प्राचीन प्रति में कुछ नया शोध मिला और उससे कुछ नई बातों का पता चलता है। विष्णुपराण के चतुर्थ अंश के 21 वें अध्याय में लिखा है कि ‘तस्यापि जनमेजश्रुतसेनोप्रसेन-भीमसेना: पुत्रश्चत्वारो भविष्यंति ।1। तस्यापरां शतानिको भविष्यति यो सौ....विषयविरक्तिचितो...निर्वाणमाप्सयति।2। शतानीकादश्वसेध-दत्तो भविता। तस्मादप्यधि सीमकृष्ण: अधिसीमिकृष्णात्। निचक्षः यो गंगायापहृते हस्तिनापुरे कौशांव्यां निवत्स्यति।’’


इसके बाद 17 राजाओं के नाम हैं। फिर ‘‘ततोप्यपर: शतानीक: तस्माच्च उदयनः उदयनादहीनरः’’ लिखा है।


इससे दो बातें व्यक्त होती हैं। पहली यह कि शतानीक कौशांबी में नहीं गये, किन्तु निचक्ष-नामक पांडव-वंशी राजा हस्तिनापुर के गंगा में बह जाने पर कौशांबी गये। उनसे 29 वीं पीढ़ी में उदयन हुए। संभवतः उनके पुत्र अहीनर का ही नाम कथा—सरित्सागर में नरवाहनदत्त लिखा है।

दूसरी यह कि शतानीक इस अध्याय में दोनों स्थान पर ‘‘अपरशतानीक’’ करके लिखा गया है। ‘‘अपरशतानीक’’ का विषय-विरागी होना, विरक्त हो जाना, लिखा है। संभवतः यह शतानीक उदयन के पहले का, कौशांबी का राजा है। अथवा बौद्धों की कथा के अनुसार इसकी रानी का क्षेत्रज पुत्र उदयन है, किन्तु वहाँ नाम—इस राजा का—परंतप है। जनमेजय के बाद जो ‘‘अपरशतानीक’’ आता है, वह भ्रम सा प्रतीत होता है, क्योंकि जनमेजय ने अश्वमेघ-यज्ञ किया था, इसलिए जनमेजय के पुत्र का नाम अश्वमेधदत्त होना कुछ संगत प्रतीत होता है। अतएव कौशांबी में इस दूसरे शतानीक की ही वास्तविक स्थिति ज्ञात होती है, जिसकी स्त्री किसी प्रकार (गरुण पक्षी द्वारा) हरी गई। उस राजा शतानीक के विरागी हो जाने पर उदयागिरी की गुफा में उत्पन्न विजयी वीर उदयन, अपने बाहुबल से, कौशांबी का अधिकारी होगा। इसके बाद कौशांबी के सिंहासन पर क्रमशः अहीनर (नरवाहनदत्त), खंडपाणि, नरमित्र और क्षेमक—ये चार राजा बैठे, इसके बाद कौशांबी के राजवंश या पांडव—वंश का अवसान होता है।

अर्जुन से सातवीं पीढ़ी में उदयन का होना तो किसी प्रकार से ठीक नहीं माना जा सकता, क्योंकि अर्जुन के समकालीन जरासंध के पुत्र सहदेव से लेकर, शिशुनाग-वंश से पहले के जरासंध-वंश के 22 राजा मगध के सिंहासन पर बैठ चुके हैं। उनके बाद 12 शिशुनाग-वंश के बैठ, जिनमें छठे और सातवें राजाओं के समकालीन उदयन थे। तो क्या एक वंश में, उतने ही समय में, तीस पीढ़ियां हो गईं, जितने कि दूसरे देश में केवल सात ही पीढ़िया हुईं ? यह बात कदापि मानने योग्य न होगी। संभवतः इसी विषमता को देखकर श्रीगणपति शास्त्री ने ‘अभिमन्योः पंचविंश संतानः’ इत्यादि लिखा है। कौशांबी में न तो अभी विशेष खोज हुई है, और न विशेष शिलालेख इत्यादि ही मिले हैं। इसलिए संभव है, कौशांबी के राजवंश का रहस्य अभी पृथ्वी के गर्भ में दी दबा पड़ा हो।


कथा—सरित्सागर में उदयन की दो रानियों का ही नाम मिला है, किंतु बौद्धों के प्राचीन ग्रंथों में उसकी तीसरी रानी मागन्धी का नाम भी आया है।


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