आस्कर वाइल्ड की कहानियाँ - धर्मवीर भारती Oscar Wilde Ki Kahaniyan - Hindi book by - Dharamvir Bharti
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आस्कर वाइल्ड की कहानियाँ

धर्मवीर भारती

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2004
आईएसबीएन : 81-263-0891-5 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :103 पुस्तक क्रमांक : 1370

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प्रस्तुत है आस्कर वाइल्ड की कहानियाँ...

Oscar Wilde Ki Kahaniyan

प्रसिद्ध अँग्रेजी लेखक आस्कर वाइल्ड उन थोड़े से लेखकों में से हैं जिनका लेखन और व्यक्तित्व दोनों ही विवादास्पद रहे हैं। लेकिन एक शैलीकार के रूप में उन्हें सभी ने मान्यता दी है। उन्होंने जीवन के शुभ पक्षों को अपनी रचनाओं में प्रश्रय दिया और मानवीय विरूपता के  विरोध में करुणा, आध्यात्मिक सौन्दर्य और सहानुभूति जैसे जीवन-मूल्यों की स्थापना की।
लोक-कथाओं जैसी कथारस से भरपूर उनकी कहानियाँ जीवन की ऊबड-खाबड़ घाटियों से होते हुए हमें ऐसे लोक में ले जाती है जहाँ आत्मा की शुभ्रता की उजास फैली-दिखती महसूस होती है। यथार्थ और फन्तासी की मिली-जुली शैली में लिखी इस संग्रह की कहानियाँ पाठकों को भूल-भुलैय़ा का रोमांच तो अवश्य देती हैं पर वे अपने उद्देश्य से उन्हें भटकाती नहीं है।
आस्कर वाइल्ड की डेढ़ सौवीं वर्षगाँठ पर भारतीय ज्ञानपीठ धर्मवीर भारती द्वारा किया उनकी कहानियों का सुन्दर अनुवाद ‘पुनर्नवा संस्करण’ के रूप में प्रकाशित करते हुए प्रसन्नता का अनुभव करता है।
आस्कर वाइल्ड अँग्रेजी साहित्य के उन थोड़े से लेखकों में से एक हैं जिनका लेखन विवादास्पद रहा है, उतना ही उनका व्यक्तित्व भी। किन्तु अँग्रेजी गद्य के अनुपम शैलीकार के रूप में उन्हें सभी ने मान्यता दी है ! शिल्प-सज्जा, शब्द-चयन, चमत्कारपूर्ण अभिव्यक्ति और भाषा प्रवाह के लिए आज भी उनका लेखन अद्वितीय माना जाता है। उनकी कथाएँ अपने ढंग की अनूठी हैं, वे हिन्दी के पाठकों को रुचिकर प्रतीत होंगी।

अनुवादक

‘‘कैलेवरी के पहाड़ों पर प्रभु जीसस को फाँसी दी गयी थी। जब जोजेफ़ उनकी फाँसी देखकर शाम को नीचे घाटी में आया तो उसने एक सफेद चट्टान पर एक जवान आदमी को बैठकर रोते हुए देखा। और जोजेफ़ उसके पास गया और बोला-‘‘मैं जानता हूँ तुझे कितना दुःख हो रहा है क्योंकि सचमुच जीसस महान पैगम्बर था।’’
लेकिन उस जवान आदमी ने कहा-‘‘ओह, मैं उसके लिए नहीं रो रहा हूँ। मैं इसलिए रो रहा हूँ मुझे भी जादू आता है, मैंने भी अन्धों को आँखें दी हैं, मुर्दों को जीवन दिया है, भूखों को रोटी दी है, पानी को शराब बनाया है... और फिर भी मानव जाति ने मुझे क्रास पर नहीं लटकाया।’’

आस्कर वाइल्ड

शिशु देवता


स्कूल से लौटते समय रोज शाम को बच्चे उस जादूगर के बाग में जाकर खेला करते थे।
बड़ा सुंदर बाग था, मखमली घास वाला ! घास में यहाँ वहाँ तारों की तरह रंगीन फूल जड़े थे और उसमें बारह नारंगी के पेड़ थे जिनमें वसंत में मोतिया किसलय लगते थे और पतझड़ में रसदार फल। डालों पर बैठकर चिड़ियाँ इतने मीठे स्वरों में गाती थीं कि बच्चे खेल रोककर उन्हें सुनने लगते थे।
एक दिन जादूगर विदेश से लौट आया। वह अपने मित्र को देखने गया था वह वहाँ सात वर्ष तक रुक गया था। सात साल तक बातें करते रहने के बाद उसकी बातें समाप्त हो गयीं (क्योंकि उसे थोड़ी सी बात करनी थी) और वह अपने घर को लौट आया। जब वह आया तो उसने बाग में बच्चों को ऊधम मचाते हुए देखा।
‘‘ऐ ! तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो ?’’ उसने गुर्राकर पूछा। लड़के डर कर भाग गये।

‘‘मेरा बाग मेरा खुद का बाग है। कोई भी नासमझ इसे समझ सकता है ?’’ इसलिए उसने उसके चारों ओर ऊँची सी दीवार खिंचवायी और फाटक पर एक तख्ती लटका दी जिस पर लिखा था कि-‘आम रास्ता नहीं है।’
अब बेचारे बच्चों के खेलने के लिए कोई जगह नहीं रह गयी। वे सड़क पर खेलने लगे मगर सड़क पर नुकीले पत्थर गड़ते थे अतएव जब उनकी छुट्टी हो जाती थी तो वे उस ऊँची दीवार के चक्कर लगाते थे।
उसके बाद वसंत आया और सभी बागों में छोटी-छोटी चिड़ियाँ चहकने लगीं और नये किसलय फूलने लगे। मगर इस जादूगर के बाग में अब भी शिशिर ऋतु थी। उसमें कोई बच्चे न थे इसलिए चिड़ियाँ गाने की इच्छुक न थीं और पेड़ फूलना भूल गये थे।

एक बार फूल ने घास से सिर निकाल कर ऊपर झाँका, किन्तु जब उसने वह तख्ती देखी तो उसे इतना दुःख हुआ कि वह शबनम के आँशुओं से रोता हुआ फिर जमीन में सोने चला गया।
हाँ, हिम और पाला बेहद खुश थे--‘‘वसंत शायद इस बाग को भूल गया है—अब हम सालभर यहीं रहेंगे।’’ उन्होंने उत्तरी ध्रुव की बर्फीली आँधी को भी आमन्त्रित किया और वह भी वहाँ आ गयी।
‘‘वाह ! कैसी अच्छी जगह है’’ आँधी ने कहा-‘‘यहाँ ओलों को भी बुला लिया जाय तो कैसा हो !’’ और ओले भी आ गये।
‘मालूम नहीं अभी तक वसंत क्यों नहीं आया ?’ स्वार्थी जादूगर ने सोचा-उसने खिड़की में बैठकर ठण्डे सफेद बाग की ओर देखा-‘अब तो मौसम बदलना चाहिए !’
लेकिन वसंत नहीं आया और न ग्रीष्म-पतझड़ में हर बाग में सुनहले फल झूलने लगे-मगर जादूगर के बाग की डालें खाली थीं।

‘‘वह बड़ा स्वार्थी है,’’ पतझड़ ने कहा-और वहाँ सदा शिशिर रहा-और आँधी, हिम और ओले के साथ कोहरा बराबर छाया रहा।
एक दिन सुबह जब जादूगर आया तो उसे बड़ा आकर्षक संगीत सुन पड़ा। इतना मीठा था वह स्वर कि उसने समझा राजा के चारण इधर से गाते हुए निकल रहे हैं। किन्तु वास्तव में उसकी खिड़की के पास एक वृक्ष की डाल पर बैठकर एक चिड़िया गीत गा रही थी। किसी भी विहग के कलरव को सुने उसे इतने दिन बीत गये थे कि वह उसे स्वर्गीय संगीत समझ रहा था। और खुले वातायन से सौरभ की लहरें उसे चूम जाती थी।
‘‘मैं समझता हूँ वसन्त आ गया है,’’ जादूगर ने कहा और बिस्तर से उछल कर बाहर झाँकने लगा।
उसने एक आश्चर्य जनक दृष्य देखा-दीवाल के एक छोटे से छेद में से बच्चे भीतर घुस आये हैं और पेड़ की शाखाओं पर बैठ गये हैं। पेड़ बच्चों का स्वागत करने में इतने खुश थे कि वे फूलों से लद गये थे और लहराने लगे थे ! चिड़ियाँ खुशी से फुदक-फुदक कर गीत गा रहीं थीं और फूल घास में से झाँककर हँस रहे थे।
किन्तु फिर भी एक कोने में अभी शिशिर था। वहाँ एक बहुत छोटा बच्चा खड़ा था। वह इतना छोटा था कि डाल तक नहीं पहुँच पाता था-अतः वह रोता हुआ घूम रहा था। पेड़ बर्फ से ढँका था और उस पर उत्तरी हवा बह रही थी।
‘‘प्यारे बच्चे, चढ़ जाओ !’’ पेड़ ने कहा और डालें झुका दीं मगर वह बच्चा बहुत छोटा था।
वह दृष्य देखकर जादूगर का दिल पिघल गया। ‘मैं कितना स्वार्थी था !’ उसने सोचा, ‘यह कारण था कि अभी तक मेरे बाग में वसंत नहीं आया था ? मैं उस बच्चे को पेड़ पर चढ़ा दूँगा, यह दीवाल तुड़वा दूँगा और तब मेरा उपवन हमेशा के लिए शैशव की क्रीड़ा भूमि बन जायगा !’

वह नीचे उतरा और दरवाजा खोलकर बाग में गया। जब बच्चों ने देखा तो डरकर भागे और बाग में जाड़ा आ गया। मगर उस छोटे बच्चे की आँखों में आँसू भरे थे और वह जादूगर का आगमन नहीं देख सका जादूगर चुपचाप पीछे से गया और धीरे से उसे उठाकर पेड़ पर बिठा दिया पेड़ में फौरन कलियाँ फूट निकलीं और चिड़ियाँ लौट आयीं और गाने लगीं। छोटे बच्चे ने अपनी नन्ही बाँहे फैलाकर जादूगर को चूम लिया। दूसरे बच्चों ने भी यह देखा और जब उन्होंने देखा कि जादूगर अब निष्ठुर नहीं रहा तो वे भी लौट आये और उनके साथ-साथ मधुमास भी लौट आया।
‘‘अब यह बाग तुम्हारा है,’’ जादूगर ने कहा और उसने फावड़ा लेकर वह दीवाल ढहा दी।

दिनभर बच्चे खेलते रहे और शाम होने पर वे जादूगर से विदा माँगने आये। ‘‘मगर वह नन्हा साथी कहाँ है ?’’ उसने पूछा ‘‘वह जिसे मैंने पेड़ पर बिठाया था !’’ जादूगर उसे प्यार करने लगा था।
‘‘हम नहीं जानते –आज वह पहली बार आया था।’’
जादूगर बहुत दुःखी हो गया।
हर रोज स्कूल के बाद बच्चे आकर जादूगर के साथ खेलते थे। मगर वह छोटा बच्चा फिर कभी नहीं दिखाई पड़ा। वह सभी बच्चों को चाहता था मगर उस नन्हे बच्चे से बहुत प्यार करता था !
बरसों बीत गये और वह जादूगर बहुत बुड्ढा हो गया। अब एक आराम कुर्सी डालकर बैठ जाता था और बच्चों के खेलों को देखा करता था-‘‘मेरे बाग में इतने फूल हैं मगर ये जिन्दा फूल सबसे कोमल हैं !’’
एक दिन जाड़े की सुबह उसने अपनी खिड़की के बाहर देखा। वह विचित्र दृष्य था। उसने ताज्जुब से आँखें मलीं। दूर कोने में एक पेड़ सफेद फूलों से ढका था। उसकी डालियाँ सोने की थीं और उसमें चाँदी के दो फल लटक रहे थे और उसके नीचे वह बच्चा खड़ा था। वह प्यारा नन्हा बच्चा जिसे वह प्यार करता था।

जादूगर खुशी से पागल होकर दौड़ा और बच्चे के पास गया मगर जब पास पहुँचा तो गुस्से से चीख उठा-‘‘किसने तुम्हें घायल करने की हिम्मत की ?’’ क्योंकि बच्चे की हथेलियों पर और पाँवों में क्रास के निशान थे।
‘‘किसने यह दुस्साहस किया है ? बताओ, मैं उसको अभी इसका मजा चखाता हूँ !’’
‘‘नहीं !’’ बच्चे ने कहा-‘‘ये प्रेम के घाव हैं !’’
जादूगर स्तब्ध हो गया।

‘‘कौन हो तुम ?’’ उसने भयमिश्रित श्रद्धा से पूछा। बच्चा हँसा और बोला-‘‘तुमने एक बार मुझे अपने बाग में खेलने दिया था। आज तुम मेरे बाग में चलो-वह बाग जिसे लोग स्वर्ग कहते हैं।’’
आज दोपहर को बच्चे आये तो उन्होंने देखा कि उस पेड़ के नीचे सफेद फूलों की चादर ओढ़े बूढ़ा जादूगर अनन्त निद्रा में निमग्न है।
 

अभिषेक


दूसरे दिन प्रातः उसका राज्याभिषेक होने वाला था, और तरुण युवराज अपने सुषमागार में अकेले बैठा था। भूमि पर शिर झुकाकर बन्दन कर उसके दरबारियों ने उससे विदा माँग ली थी और महल के मुख्य बहिःप्रकोष्ठ में चले गये थे। वहाँ अभिषेकाचार्य उन्हें उत्सव की रीति समझा रहा था, क्योंकि उनमें से कुछ अब भी साधारण स्वाभाविक व्यवहार के अभ्यस्त होने के कारण दरबारी आडम्बर न सीख पाये थे। किन्तु स्वाभाविकता दरबार में अपराध गिना जाता है।
युवराज-जो अभी केवल सोलह वर्ष का था, उनके जाने पर तनिक भी अप्रसन्न नहीं हुआ और छुटकारे की एक लम्बी साँस लेकर अपने जड़ाऊ पलंग के रेशमी गद्दे पर लेट गया और आजादी के लिए बेकरार निगाहों से चारों ओर देखने लगा जैसे कोई कंजों का स्वच्छन्द पक्षी या जाल में नया फँसा हुआ कोई आजाद जंगली जानवर।

सच तो यह है कि उसे भी शिकारी जाल में फँसा लाये थे। वह खुले बदन हाथ में बाँसुरी लेकर गाड़ियों के झुण्ड के साथ जा रहा था। वह बचपन में उन्हीं के बीच पला था और अपने को भी गड़रिया समझता था। किन्तु वास्तव में वह एक राजकुमारी की सन्तान था।

वह अपने पिता की अकेली पुत्री थी और उसने अपने से बहुत निम्न श्रेणी के किसी व्यक्ति से गन्धर्व विवाह किया था। कुछ का कहना था कि एक अजबनी ने जादू-भरी बाँसुरी के रजत स्वरों से राजकुमारी की चेतना पर मोहिनी का जाल बुन दिया था; कुछ का कहना था कि रिमिनी के किसी कलाकार के प्रति राजकुमारी ने साधारण आकर्षण प्रदर्शित किया था और जो अधूरा मन्दिर निर्माण छोड़कर भाग गया था। जब कुमार केवल सात दिन का था, तभी किसी ने चुराकर उसे एक साधारण किसान दम्पती को सौंप दिया था, जो स्वयं निस्सन्तान थे और शहर से बहुत कम अन्तर पर रहते थे। दुःख यह महामारी, या जैसा राजवैद्य का कथन था कि प्याले में मिले हुए इटालियन जहर के कारण, प्रसव के बाद जागते ही उसके सुन्दर और कृशकाय माता मर गयी। जिस समय उसे सुरक्षित रूप से ले जाने वाले विश्वस्त अनुचर ने अपना थका हुआ घोड़ा रोककर किसान दम्पती का द्वार खटखटाया, उस समय उस राजकुमारी का शव नगर से किसी दूर उजाड़ स्थान में खुदी समाधि में लिटाया जा रहा था, जिसमें एक बहुत सुन्दर विदेशी युवक का शव पहले से ही रखा हुआ था, जिसके हाथ पीठ की ओर बँधे हुए थे और सीने पर कई ताजे घाव खून टपका रहे थे।
इस तरह की अफवाहें लोगों में उड़ रही थीं। यह तो निश्चित था कि स्वर्गीय महाराज ने पश्चाताप वश या वंसोच्छेदन के भय से अपनी मरण-शय्या पर वर्तमान युवराज को बुलवा भेजा था और सरेआम उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।

किन्तु इस अधिकार-प्राप्ति के प्रथम क्षण से ही उसमें सौन्दर्य के प्रति असाधारण उपासना के भाव दीख पड़े थे, जो बाद में उसके जीवन में बहुत ही प्रभावशाली सिद्ध हुए। उसके विश्वस्त अनुचरों का कहना था कि जब कभी वह कोई सुन्दर वस्त्र या जाज्वल्यमान रत्न देखता था तो वह खुशी से चीख उठता था। और अपने मृगचर्म और मेखला को फेंकते समय वह आनन्द से पागल था। यद्यपि कभी-कभी वह वनवासी जीवन की स्वतन्त्रता की कमी अनुभव करता था; कम से कम दरबार की अनावश्यक रस्म-रिवाजों से तो वह बहुत ऊब चुका था, किन्तु वह आश्चर्यजनक महल, जिसका नाम ‘सुषमागार’ था और जिसका वह एकच्छत्र स्वामी था, उसे एक सर्वथा नवीन संसार-सा मालूम होता था। ज्योंही उसे दरबार या मन्त्रणा-गृह से छुटकारा मिलता था, वह आनन्द से रजत-सोपानों पर संचरण करता था। प्रकोष्ठ से प्रकोष्ठ में वह घूमता था जैसे वह सौन्दर्य में दुख और दुर्बलता का प्रतिकार ढूँढ़ रहा हो।
वह इनको आविष्कार की यात्राएँ समझता था और वास्तव में उसके लिए ये जादू के देश की स्वप्निल यात्राएँ थीं। कभी-कभी उसके साथ सुनहली अलकोंवाले कृश बालभृत्य रहते थे। किन्तु अधिकतर वह एकान्त में ही रहता था क्योंकि उसने न जाने किस दैवी प्रेरणा से यह समझ लिया था कि कला के गूढ़तम सत्य केवल एकान्त में ही मिलते हैं और ज्ञान की भाँति सौन्दर्य भी एकान्त पूजा से सन्तुष्ट होता है।

उनके विषय में उन दिनों विचित्र कहानियाँ कही जाती थीं। कहा जाता है कि नागरिकों की ओर से उसे अभिनन्दन देने के लिए आनेवाले प्रबन्धाध्यक्ष ने देखा कि वह एक बड़े-से चित्र के सामने झुककर उसकी पूजा कर रहा है। वह चित्र वेनिस से आया था और उसमें किसी नवीन देवता की पूजा का रेखांकन है। एक बार वह कई घण्टों के लिए खो गया और बहुत लम्बी खोज के बाद वह महल की उत्तरी मीनार में मिला जहाँ वह एक बड़े-से ग्रीक हीरे को अपलक देख रहा था जिस पर कामदेव का चित्र खुदा हुआ था। कहा जाता कि एक दिन वह संगमरमर की प्रतिमा के अधरों को चूमते हुए देखा गया जो सन्तरिणी के निर्माण के समय सरिता तट पर पायी गयी थी। कहते हैं, एक समूची पूनो की रात उसने एक रजत प्रतिमा पर किरण रेखाएँ देखने में बिता दी।

सभी मूल्यवान और दुर्लभ वस्तुओं में उसे एक विचित्र आकर्षण मालूम देता था। उन्हें मँगवाने की उत्सुकता में बहुत-से सौदागरों को विदेशों में भेजा था। कुछ कस्तूरी की खोज में उत्तरी समुद्र के मल्लाहों के पास गये, कुछ मिस्र गये ताकि वहाँ से वह दुर्लभ हीरा लाएँ जो राज-समधियों में पाया जाता है और जिसमें जादू की शक्तियाँ होती हैं। कुछ फारस के कालीन विचित्र बर्तन लाने गये और भारत से हाथी दाँत की जालियाँ, दन्तपत्र, चन्द्रकान्त मणि, पन्ने के कण्ठहार, चन्दन, नीलम और ऊनी शाल लेने गये।
किन्तु वह अपने अभिषेक के वस्त्रों के लिए बहुत ही व्यस्त था। स्वर्ण तारों के वस्त्र, लाल-जटित मुकुट और मुक्ता-खचित राजदण्ड; आज वह अपनी राज्य-शय्या पर लेटकर अग्निपात्र में सुलगते हुए कण्ठ की ओर शून्य दृष्टि से देखते हुए इन्हीं के विषय में सोच रहा था।
उस युग के श्रेष्ठतम कलाकारों ने उनके नमूने बनाकर महीनों पहले उसे दिखा दिये थे और उसने जौहरियों को दिन-रात काम कर उसे पूरा करने की आज्ञा दे दी थी और संसार भर से उसके लिए हीरे एकत्रित किये जा रहे थे। उसने कल्पना में देखा कि वह राजसी वस्त्र में मन्दिर के सोपान पर खड़ा है, उसके होंठों पर एक मुस्कराहट खेलने लगी और उसकी काली आँखों में एक चमक आ गयी।

कुछ देर बाद वह उठा और अग्निपात्र के नक्काशीदार शिखर पर झुककर उसने धुँधली रोशनी वाले कमरे की ओर देखा। दीवारों पर जरीदार स्वर्ण-पट टँगे थे जिन पर सौन्दर्य की विजय अंकित थी। शय्या के आस्तरण पर पीली कलियाँ कढ़ी हुई थीं मानो नींद की थकी हुई अंजलि से खुलकर बिखर गयी हों। वंशीनुमा हाथीदाँत की छड़ियों के ऊपर का चँदोवा थमा हुआ था जिसमें गुँथे हुए शुतुरमुर्ग के खूबसूरत पंख छत के रजत आवरण को स्पर्श कर सिहर उठते थे। हरे मीने की एक हँसती हुई रति-प्रतिमा शीश पर एक स्वच्छ दर्पण थामे थी।

बाहर एक मन्दिर का बड़ा-सा गुम्बद था। नदी के किनारे उनींदे प्रहरी घूम रहे थे। दूर किसी उपवन में एक बुलबुल गा रही थी। खुले हुए वातायन के हवा के झोंके रजनीगन्धा का सौरभ उँड़ेल रहे थे। उसने माथे पर झूलती हुई भूरी अलकें पीछे की ओर समेटीं और एक वीणा उठाकर अलसित भाव से तारों पर उँगलियाँ फिराने लगा। उसकी पलकें मुँद गयीं और अजब-सा नशा उस पर छा गया। कभी जीवन में उस पर सौन्दर्य के जादू ने इतना नशा नहीं डाला था।
जब नगर कोट से अर्ध रात्रि का निर्घोष हुआ तो उसने आवाज दी। भृत्यों ने आकर उसके वस्त्र उतारे और गुलाब-जल से उसके हाथ धुलाये। तकिए पर शॉल बिछा दिये गये और उनके जाने के कुछ ही क्षणों बाद उसे नींद आ गयी।

जब वह सो गया तो उसने एक स्वप्न देखा। वह स्वप्न यह था। उसने देखा कि वह एक बड़े-से प्रकोष्ठ में खड़ा है, जहाँ बहुत-सी कराहों का शोर गूँज रहा है ! पुरानी खिड़कियों से सहमी हुई धूप झाँक रही थी। और उसके धुँधले उजाले में वह जालों पर झुके हुए वस्त्रकारों को देख रहा था। ताने-बाने के पास जर्द बीमार बच्चे बैठे थे। करघे की गुल्ली ज्योंही इस ओर से उस ओर फिसलती जा रही थी, वे खटका उठा देते थे और उसके गुजरते ही खटका गिराकर सूत मिला देते थे। उनके चेहरों पर भूख की छाया थी और उनके बाँस-से पतले हाथ कमजोरी से काँप रहे थे। कुछ भूखी औरतें चौकी के पास बैठी कपड़े सिल रही थीं। पूरे स्थान में एक विचित्र गरीबी की दुर्गन्ध थी। दीवारों पर नमी थी और लोना लग गया था।
युवराज एक वस्त्रकार के समीप गया और उसके बगल में खड़े होकर देखने लगा। वस्त्रकार ने उसकी ओर झल्लाकर देखा और कहा—‘‘तू मुझे क्यों देख रहा है ? क्या तू मेरे मालिक का जासूस है ?’’
‘‘कौन है तुम्हारा मालिक ?’’ युवराज ने पूछा।

‘‘मेरा मालिक !’’ वस्त्रकार बहुत कड़ुवे स्वर में बोला—‘‘वह मेरी ही तरह एक मनुष्य है। हाँ, इसमें यह भेद अवश्य है कि मैं चीथड़े पहनता हूँ, वह रेशम पहनता है। मैं भूखों मरता हूँ, वह खाना भी नहीं पचा पाता !’’
‘‘यह देश तो प्रजातन्त्रवादी है।’’ युवराज ने कहा—‘‘यहाँ कोई किसी का गुलाम नहीं !’’
‘‘युद्ध में विजयी पराजित को गुलाम बना लेते हैं और शान्तिकाल में धनी निर्धन को।’’ वस्त्रकार ने कहा—‘‘हम जीने के लिए काम करते हैं और वह हमें इतना कम धन देते हैं कि हम मरने लगते हैं। हम दिनभर काम करते हैं, वे अपनी तिजोरी में सोना भरते हैं।


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