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भारतीय कहानियाँ 1984

बालस्वरूप राही

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1990
पृष्ठ :334
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 1305
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है 28 विशिष्ट कहानियों का संग्रह...

Bharatiya kahaniyan 1984

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


प्रति वर्ष स्फुट रूप से स्थायी महत्त्व की कई रचनाएँ प्रकाशित होती हैं और सामान्य रचानाओं की भीड़ में खो जाती हैं। यदा-कदा चर्चित होती है, रेखांकित भी होती हैं, किन्तु एक स्थान पर सहेजी नहीं जातीं। अन्य भाषाओं की उपलब्धियों से साक्षात्कार तो दुर्लभ ही है, हम अपनी ही भाषा की सर्वोत्तम कृतियों से अपरिचित रह जाते हैं। परिचय होता भी है तो बस क्षण मात्र के लिए। ये हम सभी न्यूनाधिक यह अनुभव और स्वीकार करते हैं कि भारतीय साहित्य विभिन्न भाषाओं में रचे जाने पर भी कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी रूप में एक मुख्य धारा से सम्पृक्त है। भाषा विशेष साहित्य के सही मूल्यांकन एवं सच्चे आस्वाद के लिए उसे समग्र भारतीय साहित्य के परिदृश्य में रख कर देखा जाना नितान्त आवश्यक एवं वांछनीय है।

‘भारतीय कहानियाँ 1984’ सभी भाषाओं की दो-दो प्रतिनिधि कहानियों की महत्त्वपूर्ण चयनिका है। चुनाव केवल उन्हीं रचनाओं में से किया गया है जो लिखी चाहे कभी भी गई हों, पुस्तक, पत्र-पत्रिका, आकाशवाणी, दूरदर्शन आदि के माध्यम से पहली बार सन् 1984 में ही प्रकाश में आयीं। इससे 1984 की विशिष्ठ कहानियाँ एक ही स्थान पर उपलब्ध एवं सुरक्षित हो सकेंगी और समकालीन भारतीय काव्य-धारा के प्रति जिज्ञासु कहानी-प्रेमियों को इधर-उधर भटकना नहीं पड़ेगा।
हमें पूरा विश्वास है कि ‘भारतीय कहानियाँ : 1983’ के समान ही इस चयनिका को भी आप समकालीन भारतीय कहानी को समझने और परखने की दृष्टि से उपयोगी पाएँगे।

प्रस्तुत प्रयास

परिकल्पना

(प्रथम चयनिका से उद्धृत प्रासंगिक अंश)

अपनी स्थापना से ही भारतीय ज्ञानपीठ का लक्ष्य भारतीय साहित्य के संवर्द्धन में योगदान रहा है। अपने लक्ष्य की सिद्धि के लिए वह प्रारम्भ से ही त्रि-आयामी प्रयास करता आ रहा है। एक ओर तो वह जटिल किन्तु विश्वसनीय मूल्यांकन-प्रणाली द्वारा भारतीय साहित्य की शिखर उपलब्धियों को रेखांकित-पुरस्कृत करता है, ताकि साहित्य को समर्पित अग्रणी भारतीय रचनाकारों को अधिकतम मान-सम्मान एवं राष्ट्रव्यापी प्रतिष्ठा प्राप्त हो और उनकी शीर्ष कृतियाँ अन्य रचनाकारों के लिए प्रकाश-स्तम्भ का कार्य करें। दूसरी ओर वह समग्र समकालीन भारतीय साहित्य में से कालजयी रचनाओं का चयन कर उन्हें, प्रायः हिन्दी के माध्यम से, वृहत्तर प्रबुद्ध पाठक-समुदाय तक ले जाता है, ताकि एक भाषा का सर्वोत्कृष्ट साहित्य दूसरी भाषा तक पहुंचे और इस प्रकार विभिन्न भाषाओं के रचनाकारों एवं सजग पाठकों के मध्य तादात्म्य स्थापित हो और परस्पर-प्रतिक्रिया हो। तीसरी ओर वह संवेदनशील, संभावनावान, उदीयमान रचनाकारों की सशक्त कृतियाँ प्रकाशित कर उन्हें उनका दाय प्राप्त कराने में सक्रिय सहयोग करता है।

साहित्य राष्ट्रीय चेतना का सर्वप्रमुख संवाहक है। यदि किसी देश की सांस्कृतिक धड़कनों को समझना हो तो उसकी नब्ज़- साहित्य पर हाथ रखना आवश्यक होता है। अन्य राष्ट्रों को ही नहीं, अपने राष्ट्र को भी हम प्रमुखत: अपने साहित्य के माध्यम से ही सही-सही पहचानते हैं। स्वराष्ट्र की आत्मा से साक्षात्कार करना कौन नहीं चाहता। राष्ट की आत्मा साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त होती है और साहित्य भाषा के माध्यम से मुखरित होता है। किन्तु हमारे लिए कठिनाई यह है कि भारतीय साहित्य एक या दो भाषाओं के माध्यम से तो मुखरित होता नहीं। अत: भाषा जो एक पथ है, सेतु है, वही व्यवधान बन जाती है। इस व्यवधान के अतिक्रमण में भारतीय ज्ञानपीठ निरन्तर सुधी पाठकों का सहायक रहा है। इस बार सोचा गया कि एक और नयी राह निकाली जाए, एक और नयी दिशा का संधान हो।

कालजयी शाश्वत रचनाओं तक ही सीमित क्यों रहा जाए ? जिन रचनाओं को अभी काल की कसौटी पर कसा जाना है, उन तक भी पहुँच क्यों न हो ? आज की धड़कनें पहचानने के लिए आज का आमना-सामना आवश्यक है। जो सबसे ताज़ी है, आज की रचना है, वही तो वर्तमान को समझने में सबसे बड़ी सहायक बन सकती है। वही कल कालजयी सिद्ध होकर धरोहर भी बन सकती है।

प्रति वर्ष स्फुट रूप से स्थायी महत्त्व की कई रचनाएँ प्रकाशित होती हैं और सामान्य रचनाओं की भीड़ में खो जाती हैं। यदा-कदा चर्चित होती हैं, रेखांकित भी होती हैं, किन्तु एक स्थान पर सहेजी नहीं जातीं। अन्य भाषाओं की उफलब्धियों से साक्षात्कार तो दुर्लभ ही है, हम अपनी ही भाषा की सर्वोत्तम कृतियों से अपरिचित रह जाते हैं। परिचय होता भी है, तो बस क्षण मात्र के लिए। यों हम सभी न्यूनाधिक यह अनुभव और स्वीकार करते हैं कि भारतीय साहित्य के विभिन्न भाषाओं में रचे जाने पर भी कहीं-न- कहीं, किसी-न-किसी रूप में एक मुख्य धारा से संपृक्त है। भाषा विशेष के साहित्य के सही मूल्यांकन एवं सच्चे आस्वाद के लिए उसे समग्र भारतीय साहित्य के परिदृश्य में रखकर देखा जाना नितान्त आवश्यक एवं वांछनीय है। इसी भावना से प्रेरित होकर हमने यह निर्णय किया कि भारतीय ज्ञानपीठ प्रति वर्ष समस्त भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होने वाली विधा विशेष की श्रेष्ठ रचनाओं को एक संकलन में एक साथ सँजोने का क्रम प्रारम्भ करे। निर्णय हुआ कि वार्षिक चयनिकाओं की इस श्रृंखला का प्रारम्भ 1983 में प्रकाशित कहानियों और कविताओं की चयनिकाओं से हो। तय हुआ कि कथा-संकलन के लिए हर भाषा से दो कहानियाँ चुनी जाएँ और इस प्रकार चयनिका में सभी भाषाओं की लगभग 28 कहानियों का समावेश हो।

इससे 1983 की विशिष्ट कहानियाँ एक ही स्थान पर उपलब्ध एवं सुरक्षित हो सकेंगी। और समकालीन भारतीय कथा-धारा के प्रति जिज्ञासु कथा-प्रेमियों को इधर-उधर भटकना नहीं पड़ेगा।
सबसे बड़ी समस्या थी रचनाओं का चयन। कोई एक तो सभी भाषाओं का जानकर होता नहीं। अत: इस योजना के क्रियान्वयन के लिए सोचा यह गया कि हर भाषा से रचना-चयन का दायित्व भाषा विशेष के ही किसी कथा मर्मज्ञ को सौंपा जाए जो कथाओं का चयन भी करे और चुनी हुई कहानियों के हिन्दी रूपान्तरों की प्रामाणिकता भी परख ले।
यहाँ हम यह स्पष्ट कर दें कि कथा-चयन में चयन-मण्डल के हर सदस्य को हमने पूरी स्वतंत्रता दी है और अपनी पसंद को कहीं भी आरोपित नहीं किया। चुनाव के लिए पूरी-पूरी ज़िम्मेदारी, पूरी-पूरी ज़वाबदेही चयनकर्ता की ही है। हाँ, चयनकर्ता का चुनाव हमारा है और हमने यह पूरी सावधानी एवं दायित्व के साथ किया है। हर चयनकर्ता अपनी भाषा के साहित्य का विश्वसनीय मर्मज्ञ एवं अधिकारी विद्वान है। अनेक तो मूर्द्धन्य भारतीय साहित्यकारों अथवा साहित्य-मनीषियों में गौरवपूर्ण स्थान रखते हैं। चयनिका को और अधिक परिपूर्ण एवं सार्थक बनाने तथा उसे सन्दर्भ-ग्रन्थ के रूप में और भी अधिक उपयोगी बनाने के लिए हमने सहयोगी साहित्यकारों के सचित्र परिचय का समावेश भी इसमें कर दिया है।

स्पष्ट ही है कि इस प्रकार का कोई भी चयन-निर्णय निर्विवाद नहीं हो सकता। इस कहानी-चयन के सामने प्रश्नचिह्न लगाये जा सकते हैं और संभव हैं लगे भी। दो-चार नहीं, दर्जनों कहानियाँ ऐसी होंगी जो अपनी भाषा में 1983 की उपलब्धि मानी जाएँ। अपनी भाषा में ही क्यों, सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में एक उपलब्धि मानी जाएँ। किन्तु प्रतिनिधि रचनाओं की संख्या सीमित एवं सुनिश्चित रखना व्यावहारिक समझा गया-संकलन के आकार-नियंत्रण के लिए भी और सभी भाषाओं के प्रति समभाव की दृष्टि से भी। हमारे लिए सभी भाषाएँ महत्वपूर्ण हैं। प्रतिनिधि रचनाएँ और भी हो सकती हैं या यह भी हो सकता है कि इनमें से किसी रचना को प्रतिनिधि माना ही न जाए। तब भी इतना तो है ही कि ये सर्वोत्कृष्ट हों या नहीं, इस संकलन के माध्यम से हम आज के भारतीय कथा-साहित्य का चेहरा काफी़ कुछ पहचान सकते हैं। पूर्ण तो कुछ नहीं होता वृत्त के अतिरिक्त। पूर्ण संतोष भी दुर्लभ ही है। हमें पूरा विश्वास है कि यह संकलन एक झरोखे का काम करेगा और हम झाँक कर देख सकेंगे कि पड़ोसी आँगन में किस-किस प्रकार के फूल खिल रहे हैं। और उनकी महक भी हम तक आ सकेगी।

दरकती राष्ट्रीय चेतना और चटखते एकात्मता भाव के इस संकटपूर्ण समय में इस प्रकार के प्रयासों की विशिष्ट भूमिका हो सकती है। परिचय सौहार्द की पहली सीढ़ी है। अपनी भाषा से इतर साहित्य के साक्षात्कार से न केवल भारतीय साहित्य की समझ अधिक परिपक्व होती है, बल्कि हम अपनी भाषा के साहित्य की प्रासंगिकताओं को भी और बेहतर ढंग से समझते हैं। हमें प्रसन्नता है हमारे इस विनम्र प्रयास को प्रारम्भ से ही सभी दिशाओं से सहयोग एवं सराहना प्राप्त होती रही है। एक पत्रकार बन्धु ने तो इसे ‘‘राष्ट्र में स्वाधीनता के उपरान्त किया जाने वाला सर्वाधिक उल्लेखनीय साहित्य एकता आयोजन’’ माना है। हमारा प्रयत्न होगा कि हम यह क्रम बनाए रख सकें। यदि प्रतिवर्ष की साहित्य-उपलब्धियाँ इस प्रकार सुरक्षित की जा सकीं तो इस दशक की समाप्ति पर दशक के भारतीय साहित्य पर शोध करने वाले शोधार्थियों के लिए ये ग्रन्थ आधार-सामग्री के रूप में अपनी उपयोगिता सिद्ध करेंगे।

भारतीय साहित्य मूल रूप में एक है अथवा एक मुख्य धारा से जुड़ा है-यह एक सत्य है या मात्र एक आह्लादकारी मिथक, इस आशय से विवादास्पद प्रश्नों का उत्तर खोजने में इस प्रकार के ग्रन्थों की सार्थकता विवादातीत मानी जा सकती है।

पुनश्च : (सन्दर्भ—चयनिका 1984)

हमारे लिए यह विषय गर्व से भी अधिक संतोष का है कि भारतीय साहित्य वर्ष विशेष में प्रकाशित कविताओं और कहानिओं की वार्षिक चयनिकाओं के नियमित प्रकाशन की हमारी इस जोखिम भरी और महत्त्वाकांक्षी योजना का साहित्य-मर्मज्ञों में महत्त्वपूर्ण, उपयोगी, मौलिक, सामयिक और सार्थक माना है। वॉयस ऑफ़ अमेरिका सहित देशी-विदेशी प्रसार-माध्यमों ने भी इसकी व्यापक चर्चा की है और इस पर साक्षात्कार तथा प्रतिक्रियाएँ प्रसारित की जा सकती हैं। भारतीय भाषाओं के मध्य सेतुबंध के रूप में इसे स्वीकृति मिली और इसे राष्ट्रीय एकत्व को कलात्मकता पूर्वक परिपक्व एवं परिपुष्ट करने वाली कहा गया है। हमें सबसे अधिक प्रसन्नता तो इसी बात की है कि हमने भाषा और भाषा के बीच की नकली दीवारें तोड़ने की जो कोशिश की है, या कह लीजिए कि इन दीवारों के बीच झरोखे बनाने का जो विनम्र प्रयास किया, वह काफ़ी हद तक कारगर साबित हुआ और एक भाषा की चुनी हुई कृतियाँ दूसरी भाषाओं तक पहुँचीं। सभी भारतीय भाषाओं के अनेक जागरुक रचनाकारों ने इस चयनिका में रुचि ली, सक्रिय सहयोग का आश्वासन दिया और हमारी भरपूर हौसला-आफजाई की। अनेक विद्वानों और साहित्य-पारखियों में यह आशा व्यक्त की कि यदि यह चयनिका-क्रम इसी प्रकार जारी रखा जाये तो कालान्तर में ये पुस्तकें भारतीय साहित्य के विश्वसनीय संदर्भ ग्रन्थ प्रमाणित होगीं और इनके माध्यम से काल विशेष के भारतीय साहित्य की उपलब्धियों को एक साथ जानने-पहचानने और पहरखने में शोधार्थियों और साहित्य-मनीषियों को अपार सुविधा होगी। हम इस प्रोत्साहन और मूल्यांकन के लिए कृतज्ञ हैं और साभार कुछ प्रतिक्रियाएँ उद्धृत कर रहे हैं

समीक्षकों के विचार :

‘भारतीय कहानियाँ : 1983’ का प्रकाशन हिन्दी कथा-साहित्य में एक घटना है। आधुनिक भारतीय भाषाओं की अट्ठाइस कहानियों का यह चयन एक सुरुचिपूर्ण जिज्ञासा उत्पन्न करने का प्रयत्न है। वस्तुतः भारतीय भाषाओं के कथा-साहित्य में वस्तु और शिल्प के स्तर पर जो चिंतन चल रहा है, ये कहानियाँ उसे प्रस्तुत करने में पूर्णतः सफल हैं।
डॉ. रामजन्म शर्मा (सारिका)

इधर एक नयी योजना के अन्तर्गत भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रत्येक वर्ष में प्रकाशित विभिन्न भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठ कविताओं और कहानियों का पुस्तक रूप में हिन्दी-अनुवाद निकालने का निर्णय लिया है। प्रत्येक भाषा में से दो-दो कहानियाँ ली गई हैं। इस पुस्तक का संपादन भी बालस्वरूप राही ने किया है। आरम्भ में अपनी समीक्षात्मक भूमिका जोड़कर उन्होंने समकालीन भारतीय कहानी की पहचान में प्रसंशनीय योग दिया है।
डॉ. रणवीर रांग्रा (आकाशवाणी)

विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य को सही-सही प्रतिनिधित्व देकर उसे समुचित अनुवाद में प्रस्तुत करना निश्चित ही एक चुनौती है, जिसे इस बार भारतीय ज्ञानपीठ ने स्वीकार किया है।
डॉ शेरगंज गर्ग (समाज कल्याण)

असमी, उड़िया, कन्नड़, कश्मीरी, गुजराती, तमिल, तेलगू, पंजाबी, बांग्ला, मराठी, मलयालम, सिंधी और हिंदी भाषाओं के माध्यम से वर्ष 1983 में प्रकाश में आयी ये कहानियाँ समकालीन जीवन को प्रायः विचित्र समस्याओं के यंत्रणा तले नहीं देखतीं हैं, बल्कि जीवन के सभी पक्षों में घुस आयी विभिन्न विसंगतियों को एक लम्बे सच की कसौटी पर कसकर परखती हैं।
राजकुमार गौतम (दिनमान)

शोधार्थियों तथा साहित्य के पाठकों के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं जिन्हें प्रति-वर्ष के श्रेष्ठ साहित्य को पढ़ने के लिए इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा।
सुशील राजेश (आजकल)

‘भारतीय कहानियाँ 1983’ का प्रकाशन करके भारतीय ज्ञानपीठ ने जिस नयी परम्परा की शुरुआत की है उसमें भारतीय कहानी की यात्रा की सिलसिलेवार देखना-परखना सहज ही संभव हो सकेगा। जैसा कि भारतीय ज्ञानपीठ कृत संकल्प है आने वाले समय में भारत की सभी भाषाओं की इतनी सारी प्रतिनिधि कहानियाँ एक साथ उपलब्ध होंगी कि हमें भारतीय संस्कृति को देखने और उसके मूल्यांकन में कोई असुविधा नहीं होगी।
विजयकिशोर मानव (दैनिक हिन्दुस्तान)


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