शब्दभेद - जगन्नाथ प्रसाद दास Shabdbhed - Hindi book by - Jagannath Prasad Das
लोगों की राय

कविता संग्रह >> शब्दभेद

शब्दभेद

जगन्नाथ प्रसाद दास

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1991
आईएसबीएन : 00000 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :199 पुस्तक क्रमांक : 1256

Like this Hindi book 2 पाठकों को प्रिय

402 पाठक हैं

प्रस्तुत है श्रेष्ठ कविताओं का संग्रह.....

Shabd bhed

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

जे. पी की कविताओं में जो उदासी व्याप्त है उसका कारण जहाँ तक मैं समझ पाया हूं, उसकी यह अनुभूति है कि आज का मनुष्य असहाय है। इस असहयता के लिए जिम्मेवार कुछ घटक तो उसके नियंत्रण से बाहर हैं जैसे देवी आगमन में, पर कुछ ऐसे भी हैं जिनका कारण दूसरे लोग हैं। यह दूसरी स्थिति जगन्नाथ प्रसाद के भीतरी गुस्सा और खीझ पैदा करती है। क्रांति गांधी तथा धर्मयुद्ध जैसी कविताओं में मूल्यों तथा संस्थाओं की विकृतियों को लेकर उसकी व्याकुलता स्पष्ट दिखाई देती है। उसका स्पष्ट संदेश यही है कि अपनी त्रासदियों को भोगता हुआ व्यक्ति अपने से श्रेष्ठ और विराट शक्तियों का वीरतापूर्वक सामना करने के उल्लास को प्राप्त करने से स्वयं ही विमुख हो गया है। उसका सारा संघर्ष तो उन लोगों की दुष्टताओं, पाखंड तथा आत्मश्लाघा का सामना करने में होता है जिन पर सामान्यता सामाजिक संस्थाओं तथा सही मूल्यों को बनाये रखने की जिम्मेदारी है, इन शक्तियों के साथ जूझने का अनुभव अत्यन्त कष्टकारी होता है क्योंकि वह  ओछेपन और शर्म का अनुभव होता है।

असहायता का अनुभव व्यक्ति को उसके भीतरी स्व से विमुख होने के लिए बाध्य करता है। इस स्व में शरण पाते हुए यह भी जानता है कि बाहरी जगत की तरह उसका भीतरी जगत भी खंडहर हो चुका है।
भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा पाठकों को समर्पित यह जे. पी. का हिन्दी में दूसरा कविता-संकलन है।

प्रस्तुति


जगन्नाथ प्रसाद दास, अपने मित्रों के लिए जे. पी. से मेरा वास्तविक परिचय कविता के माध्यम से ही हुआ। उनके नाम से बहुत पहले परिचय हो चुका था पर भेंट आज से पन्द्रह साल पहले हुई जब वे अपनी कविताओं के पहले अंग्रेजी रूपान्तरण ‘‘फर्स्ट परसन’’ भेंट करने आए। इन कविताओं को पढ़ने के बाद तुरंत ही मैंने उनकी कविताओं का हिन्दी अनुवाद ‘‘प्रथम पुरुष’’ भी पढ़ा। उसके बाद समय-समय पर उनकी अन्य काव्य कृतियों को पढ़ने का अवसर मिला। ये कहना आवश्यक नहीं है कि इन कविताओं से मैं बहुत प्रभावित हुआ। तभी जब मैंने भारतीय ज्ञानपीठ के प्रकाशन का कार्य सँभाला तो उनसे उनकी नयी कविताओं के प्रकाशन का अनुरोध किया। ‘‘लौटते समय’’ (1989) उसी अनुरोध का परिणाम है।

‘‘लौटते समय’’ का हिन्दी पाठकों ने जो भव्य स्वागत किया उससे जे पी. को संतोष है या नहीं मुझे नहीं मालूम। पूछना आवश्यक नहीं लगा क्योंकि स्वंय मुझे उससे अत्यंत प्रसन्नता हुई। यह संकलन ‘‘लौटते समय’’ का अगला चरण है। इस संकलन की कविताओं में कई विशिष्टताएं है। संक्षेप में स्मृतियों की पृष्ठभूमि में वे कवि आन्तरिक तनाव, द्वन्द्व और दंश के साथ ही आनंद और अवसाद का बड़ा प्रखर चित्रण करते हैं। समाज से अलगाव पैदा करता है। वह सब इन कविताओं में खूब मुखर हुआ है। इन कविताओं की तीव्र संवेदनशीलता किसी के अन्तर को भी छुए बिना नहीं रह सकती।
‘‘लौटते समय’’ की सफलता के बाद मेरे आग्रह पर जे. पी. ने मुझे अपना प्रस्तुत संकलन प्रकाशन के लिए दिया जिसे पाठकों को समर्पित करते हुए मुझे विशेष हर्ष है। इस संकलन में जे. पी. की नवीनतम कविताएं है।

जिसका स्वर ‘‘लौटते समय’’ से भिन्न है। बाकी निर्णय अब पाठकों को ही करना है।
हमारे साहित्यिक संदर्भ में एक भाषा की कविता को दूसरे भाषा-भाषी अनुवाद के ही माध्यम से समझ सकते हैं। इसी पृष्ठभूमि में भारतीय साहित्यकारों की विभिन्न विधाओं की कृतियों को ज्ञानपीठ, सुव्यवस्थिति ढंग से प्रकाशित करने की योजना कार्यान्वित कर रहा है। कविता का अनुवाद विशेष रूप से कठिन होता है। राजेन्द्र मिश्र के अनुवाद में कोई खटकने वाली कमी नहीं दिखाई देती। इस सशक्त और प्रभावी अनुवाद के लिए मैं राजेन्द्र मिश्र का बहुत कृतज्ञ हूँ।

बिशन टंडन, निदेशक

भूमिका


 मैं इसे दुर्भाग्य ही कहूँगा कि मेरे बार-बार विरोध करने के बावजूद कि जगन्नाथ प्रसाद दास के इस संकलन की भूमिका लिखने के लिए मुझसे न कहा जाये, मेरी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया। मेरे इस विरोध के दो आधार थे। पहला तो यह कि जगन्नाथ प्रसाद एक तरह से मुझसे वरिष्ठ कवि है किसी पत्रिका में मेरी एक कविता के छपने से पहले ही जगन्नाथ प्रसाद का पहला कविता संकलन प्रकाशित हो चुका था और उसे एक प्रतिभावान कवि माना जाने लगा था। दूसरा यह कि केवल उसकी कविताओं को ही आधार बनाकर उसके भीतर के रचनाकार को समझने की कोशिश को मैं सही नहीं मानता। उसने कहानियां और नाटक भी लिखे है।, उड़ीसा के इतिहास और पारंपरिक चित्रकारिता पर शोधपरक लेख भी लिखे हैं और हाल ही में एक उपन्यास भी लिखा है। बीच में कुछ समय उसका झुकाव चित्रकला की ओर भी रहा। इस प्रकार कविता तो उसकी आत्माभिव्यक्ति की विभिन्न प्रणालियों में से मात्र एक है। मेरे स्थान पर कोई दूसरा व्यक्ति, जो जगन्नाथ प्रसाद के दूसरे कला रूपों का उतना गहरा जानकार न होता जितना मैं हूँ, उसे हिन्दी पाठकों के सामने कवि के रूप में प्रस्तुत करने का काम मुझसे बेहतर कर सकता था।

फिर भी इसमें कोई शक नहीं है कि आत्मभिव्यक्ति के लिए कविता जगन्नाथ प्रसाद के लिए एक महत्वपूर्ण साधन रही है। मैं नहीं मानता कि जगन्नाथ प्रसाद ने अपनी कविताओं में जो बात कही है, उसे कहने के लिए वह कहानी में भी सफल रहता। यह तो सकता है कि मूलतः जो कुछ वह कहना चाहता है वह एक ही, चाहे वे कहानियां हों या कविताएं, पर कविता में ही स्वयं को पूरी तरह से और अधिक गहराई से व्यक्त कर सका है।

कहानियों में एक चरित्र एक स्थिति में रहता है या फिर कुछ विशेष मामलों में उसे दूसरे चरित्रों की सापेक्षता में दिखाया जाता है। उसके अस्तित्व की गुणवत्ता उस परिस्थित पर तथा उन चरित्रों के साथ उसकी पारस्परिकता पर निर्भर करती है, जबकि कविता में इसके विपरीत कवि अस्तित्व की जिस गुणवत्ता का वर्णन करता है वह स्पष्ट और असंदिग्ध रूप से मानव के अस्तित्व की गुणवत्ता होती है। याने उसका बोध तत्काल हो जाता है। इसके लिए बाहरी घटनाओं तथा उन घटनाओं की महत्ता को आत्मा द्वारा पहचाने जाने के बीच की दूरी को तय किये बिना ही जाना जा सकता है। जगन्नाथ प्रसाद की कई कहानियों (जिनके विषय तथा शिल्प असाधारण भी हैं और उत्कृष्ट भी) को पढ़ने के बाद मै निःसंकोच कह सकता हूँ कि जगन्नाथ प्रसाद ने अपनी कविताओं में स्वंय को जिस प्रकार अभिव्यक्त करने की कोशिश की है वह कहानियों में संभव ही नहीं है।

उसकी कविताओं की एक असामान्य विशेषता यह है कि इनमें किसी प्रकार का उतावलापन नहीं है, पाठक को शब्दों से चकित करके बहा ले जाने की या उसे ऐसे रास्ते पर ले जाने की कोशिश, जिस पर उसका विवेक कभी न ले गया हो, नहीं है। भाषा ऐसी है जिसमें गद्य के तर्क तथा काव्य की गति का एक ऐसा सम्मिश्रण है कि आतंकित घटनाओं की श्रृंखला स्वाभाविक रूप से उतारती चलती हैं, यद्यपि इनमें से कुछ घटनाएं असामान्य हैं पर वे अपरिहार्य  हैं और पिछली घटनाओं की स्वाभाविक परिणति हैं। उदाहरण के लिए जब कोई स्वयं को ऐसी स्थिति में पाता  है किः

कई जिज्ञासाओं के कोई
अंतिम उद्देश्य नहीं होते
प्रश्न ही स्वयं अपना उद्देश्य है    

(यक्ष प्रश्न)

घटनाओं के क्रम में वह पाता है कि
उत्तर दिए बिना मुक्ति नहीं
मृत्यु की चिरंतनता से ढूंढनी पड़ती
जीने की क्षणिक घड़ियाँ

(यक्ष प्रश्न)

तो यह पूर्णतया स्वाभाविक और अपरिहार्य है। यदि परिस्थियों ऐसी है कि जहाँ

यहीं खत्म होती है
मनोकामना की अपनी नगरी

 तो यह स्वाभाविक है कि परवर्ती घटनाएं ऐसी होंगी कि उन्हें आकार देने की क्षमता व्यक्ति में नहीं होगी और उसकी प्रतिक्रियाओं का भी कोई परिणाम न होगा। तब वह स्वाभाविक रूप से ऐसी स्थिति की ओर अग्रसर होता है जहाँ

कुछ भी निश्चय करने का समय नहीं होता
अंतरंग इच्छाएं मुरझाकर
शरीर को बोझिल कर देती है
अपना ही चेहरा मुखौटा बन जाता है
आगे कोई लक्ष्य स्थल नहीं होता...

(मध्य  पर्व)

जगन्नाथ प्रसाद की कविताओं में जो उदासी व्याप्त है उसका कारण जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ उसकी यह अनुभूति है कि आज मनुष्य असहाय है। इस असहायता के लिए जिम्मेवार कुछ घटक तो उसके नियंत्रण से बाहर है (जैसे देवी आगमन में) पर कुछ ऐसे भी हैं जिनका कारण दूसरे लोग हैं। यह दूसरी स्थिति जगन्नाथ प्रसाद के भीतर गुस्सा तथा खीझ पैदा करती है क्रांति, गांधी तथा धर्मयुद्ध जैसी कविताओं में मूल्यों तथा संस्थाओं की विकृतियों को लेकर उसकी व्याकुलता स्पष्ट दिखाई देती है।

उसका स्पष्ट संदेश यही है के अपनी त्रासदियों को भोगता हुआ व्यक्ति अपने से श्रेष्ठ और विराट शक्तियों का वीरतापूर्वक सामना करने के उल्लास को प्राप्त करने से स्वयं ही विमुख हो गया है। उसका सारा संघर्ष तो उन लोगों की दुष्टताओं, पाखंड तथा आत्मश्लाघा का सामना करने में होता है जिन पर सामान्यतया सामाजिक संस्थाओं तथा सही मूल्यों को बनाये रखने की जिम्मेदारी है। इन शक्तियों के साथ जूझने का अनुभव बहुत ही बहुत कष्टकारी होता है क्योंकि वह ओछेपन और शर्म का अनुभव होता है।

अन्य पुस्तकें

To give your reviews on this book, Please Login