शायरी के नये मोड़-1 - अयोध्याप्रसाद गोयलीय Shayari ke Naye Mode-1 - Hindi book by - Ayodhyaprasad Goyaliya
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शायरी के नये मोड़-1

अयोध्याप्रसाद गोयलीय

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 1999
आईएसबीएन : 81-263-0023-x मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :288 पुस्तक क्रमांक : 1210

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प्रस्तुत है श्रेष्ठ शाइरों की श्रेष्ठ रचनाएँ....

shayari ke naye mod(1)

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मेरे अज्ञात हितैषी !

न जाने इस वक़्त तुम कहाँ हो ? न मैं तुम्हें जानता हूँ और न तुम मुझे जानते हो, फिर भी तुम कभी-कभी याद आते रहे हो। बक़ौल फ़िराक़ गोरखपुरी-


मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गये हों, तुझे ऐसा भी नहीं


तुम्हें तो 26 जनवरी 1921 ई. की वह रात स्मरण नहीं होगी, जब कि तुमने मुझे अन्धा कहा था। मगर मैं वह रात अभी तक नहीं भूला हूँ। रौलट-ऐक्ट के आन्दोलन से प्रभावित होकर मई 1919 में चौरासी-मथुरा के जैन-महाविद्यालय से मध्यमा की पढ़ाई छोड़कर मैं आ गया था और काँग्रेसी कार्यों में मन-ही-मन दिलचस्पी लेने लगा था। उन्हीं दिनों संभवत: 26 जनवरी 1921 ई. की बात है, रात को चाँदनी-चौक से गुज़रते-समय बल्लीमारान के कोने पर चिपके हुए काँग्रेस के उर्दू-पोस्टर को खड़े हुए बहुत-से लोग पढ़ रहे थे। मैं भी उत्सुकतावश वहाँ पहुँचा और उर्दू से अनभिज्ञ होने के कारण तुमसे पूछ बैठा- ‘‘बड़े भाई ! इसमें क्या लिखा हुआ है’’ ? तुमने फ़ौरन दन्दान-शिकन जवाब दिया-‘‘अमाँ अन्धे हो, इतना साफ़ पोस्टर भी नहीं पढ़ा जाता।’’ जवाब सुनकर मैं खिसियाना-सा खड़ा रह गया। घर आकर ग़ैरत ने तख़्ती और उर्दू का क़ाएदा लाने को मज़बूर कर दिया।

अब मैं कई बार सोचता हूँ कि कहीं फिर से तुमसे मुलाकात हो जाए तो मेरी आँखों की रही-सही धुन्ध भी दूर हो जाए। लेकिन यह मुमकिन नहीं। अत: मीठे ताने की स्मृतिस्वरूप यह कृति तुम्हें भेंट कर रहा हूँ। जहाँ भी हो, मेरे अज्ञात हितैषी ! अपने इस अन्धे पथिक की भेंट स्वीकार करना।


1 मई 1958 ई.    

गोयलीय

समा-ख़राशी1


1.    ‘शाइरी के नये मोड़’ के अन्तर्गत जिस शाइरी का परिचय दिया जाएगा, उसका प्रचलन 1935 ई. के आसपास हुआ। 1935 से 1958 तक शाइरी ने कई मोड़ लिये हैं। प्रस्तुत प्रथम मोड़ में 1946 से मार्च 1958 ई. तक की शाइरी का बहुत संक्षेप में उल्लेख हो सका है। आगे के मोड़ों में इस 22-23 वर्ष की शाइरी की गतिविधि का यथा-स्थान अध्ययन प्रस्तुत किया जाएगा। यह प्रथम मोड़ तो केवल उसकी झलक मात्र है।

2.    इस दौर में यूँ तो सभी तरह की शाइरी का विकास हुआ है, किन्तु तरक़्क़ी-पसन्द शाइरी का बहुत अधिक विकास हुआ। इसे नयी शाइरी, इश्तरा की शाइरी अथवा नया अदब भी कहते हैं। हिन्दी में कहना चाहें तो प्रगतिशील शाइरी, साम्यवादी शाइरी या नवीन शाइरी कह सकते हैं।

3.    तरक़्क़ी-पसन्द शाइरी सिर्फ़ उस शाइरी को कहा जाता है। जो मार्क्सवादियों, कम्युनिस्टों अथवा रूस के प्रबल अनुयायियों द्वारा प्रस्तुत की जा रही है। तरक़्क़ी-पसन्द शाइरों और नये अदब के लेखकों का अपना बहुत बड़ा समूह है, अपनी निजी विचारधाराएँ हैं और अपने पत्र के प्रचार का एक ढंग है। अपने से भिन्न-विचार रखनेवाले शाइरी और लेखक को वे ग़ैर-तरक़्की-पसन्द कहते हैं। जो शाइर या लेखक मार्क्सवादी या रूसी विचारधारा के पूर्ण समर्थक नहीं हैं, वे चाहे कितनी ही नवीन और उन्नतिपूर्ण रचनाएँ करें, तरक़्क़ी-पसन्द-शाइर उन्हें अपने समूह में सम्मिलित नहीं करते।

4.    वर्तमान युग में यूँ तो सभी विचारधाराओं के शाइर अपनी रुचि के अनुकूल-ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई, क़िते, आज़ाद नज़्म (मुक्त छन्द) सॉनेट, गीत आदि कह रहे हैं, परन्तु ‘शाइरी के नये मोड़’ के मोड़ों में निम्न विचारधाराओं के मुख्य-मुख्य प्रतिनिधि शाइरों का परिचय एवं कलाम दिया जाएगा-

वर्तमानयुगीन शाइर-

परम्परानुसार शाइरी में किसी उस्ताद के
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1.समय का अपव्यय

शिष्य। व्याकरण-छन्दशास्त्र की सीमा में रहते हुए नवीनता के समर्थक, साथ ही प्राचीन अच्छी बातों के अनुयायी।

नवीन शाइर-

अपनी आयु और विचारों के कारण इसी युग के शाइर। युगानुसार शाइरी में नवीन-नवीन प्रयोग करते हैं। हर उन्नति और सुधार के समर्थक, किन्तु रूसी विचारधारा के अन्ध अनुयायी नहीं।

तरक़्क़ी-पसन्द शाइर-

हरेक पहलू से केवल अन्ध अनुयायी।


तरक़्क़ी-पसन्द-


विरोधी शाइर-जो प्रत्येक प्राचीन परम्परा का मख़ौल उड़ाते हैं, या भिन्न मत रखनेवालों को बुर्जुआ या ग़ैर-तरक़्क़ी-पसन्द कहते हैं। उन तरक़्क़ी-पसन्द शाइरों या नये अदब के लेखकों के विरोधी।

5.    तरक़्क़ी-पसन्द और ग़ैर-तरक़्क़ी-पसन्द शाइरी क्या है ? नयी शाइरी और पुरानी शाइरी में क्या अन्तर है ? यह तो वे विज्ञ पाठक सरलता से समझ ही लेंगे, जिन्होंने ‘शेरो शाइरी’ ‘शेरो-सुख़न’ पांचों भाग, ‘शाइरी के नये दौर’ और प्रस्तुत ‘नवीन मोड़’ का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया है। फिर भी आगे मोड़ों में उत्तरोत्तर यथावश्यक जानकारी सुलभ होती जाएगी।

6.    सन् 1946 से मार्च 1958 तक 8-10 उर्दू-मासिक पत्र मेरे अवलोकन में आते रहे हैं। तक़रीब 700-800 अंकों में-से अपनी रुचि के अनुकूल जो कलाम डायरी में नोट करता रहा हूँ, उनमें से बहुत-से अशआर ऐसे हैं, जिन्होंने मुझे तड़पा-तड़पा दिया है एक-एक शेर ने गुनगुनाने के लिए कई-कई रोज़ मज़बूर कर दिया है। यह सब कलाम ‘बज़्मे-अदब परिच्छेद में दे दिया गया है। कुछ पूरी या अधूरी ग़ज़लें और नज़्में उन पाठकों के मनोरंजनार्थ भी देनी पड़ी हैं, जिनका उलाहना था, कि कुछ पूर्ण भी देनी चाहिए, ताकि उन्हें गाया जा सके। कुछ अशआ़र केवल इसलिये दिये गये हैं, ताकि पाठक अन्तर समझ सकें और तुलनात्मक अध्ययन करते समय उदाहरण-स्वरूप काम आ सकें।

7.    प्रस्तुत मोड़ ‘बज़्मे-अदब’ परिच्छेद में इस युग के ख्याति-प्राप्त प्रतिनिधि शाइरों का कलाम जान-बूझकर नहीं दिया गया है, क्योंकि उनका विस्तृत परिचय एवं कलाम दूसरे भाग से दिया जा रहा है। उक्त परिच्छेद में दिये गये कुछ उदीयमान और कुछ उस्तादाना मर्त्तबे के ऐसे शाइर भी हैं, जिनका विस्तृत परिचय एवं कलाम कभी-न-कभी दिये बिना मुझे चैन नहीं आएगा।

8.    प्रस्तुत मोड़ में भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण रखनेवाले शाइरों के कलाम की यत्र-तत्र झलक मिलेगी। आज का शाइर गज़ल में भी इन्क़िलाबी, आर्थिक, सामाजिक, साम्यवादी आदि विचारों की पुट दिये बग़ैर नहीं रहता। प्रेयसी से बस्लो-हिज्र की बातें करते हुए भी ग़मे-दौराँ नहीं भूलता। मिलन के तनिक-से क्षणों में भी क्रान्तिकारी भावना प्रकट कर देता है। नवीन शाइरी ने अपना लबो-लहजा कितना बदल दिया है और वह कितने मोड़ों से गुजरती हुई कहाँ-से-कहाँ आ पहुँची है ? इसका आभास प्रस्तुत भाग से मिलना प्रारम्भ हो जाएगा। इस युग के सभी विचारधाराओं के मुख्य प्रतिनिधियों का
 परिचय एवं कलाम आगे के भागों में देने के बाद अन्तिम भाग में इस युग का इतिहास और अध्ययन प्रस्तुत किया जाएगा।

9.    नज़्मों के ऊपर शीर्षक हैं और ग़ज़लें बगै़र शीर्षक की हैं। अत: नज़्म और ग़ज़ल में क्या अन्तर है, यह सरलता से समझा जा सकेगा।

10.    जिन मासिक पत्रों से एक भी शेर लिया है, आभार-स्वरूप उसका नाम कलाम के नीचे दे दिया गया है, किन्तु कुछ अशआ़र के नीचे नाम नहीं दिये जा सके। इसका कारण यही है कि किसी अंक से 2-4 शाइरों के शेर नोट करने पर अन्त के शेर पर पत्र का नाम अंकित किया गया। डायरी में नोट करते समय यह ख़्वाबों-ख़्याल भी न था कि स्वान्त:सुखाय की गयी संचित पूँजी भी ज़मींदारी प्रथा के समान जनता की हो जाएगी। पुस्तक में देते समय पहिले अक्षरवार देने का विचार नहीं था, किन्तु पुनरावृत्ति के भय से और उपयोगिता की दृष्टि से अक्षरवार रखना ही उचित प्रतीत हुआ। अत: जब अक्षरवार कलाम का चयन हुआ तो पूरी सावधानी बरतते हुए भी ऊपर के शेरों के नीचे पत्रों का नाम कहीं-कहीं अंकित करने से रह गया। कहीं-कहीं ऐसा भी हुआ है कि एक ही शाइर का कलाम कई अंकों से चुना गया है,  किन्तु अक्षरवार दिये जाने के कारण उन सब अंकों का उल्लेख न होकर एक-दो का ही हुआ है। प्रस्तुत पुस्तक में दिये गये कलाम को जो पाठक पूर्ण देखना चाहें, वह उसके नीचे दिये गये पत्र को मँगाकर देखें, मुझे लिखने का कष्ट न करें।
11.    जिस शाइर का कलाम मुझे इन बारह वर्षों में पत्र-पत्रिकाओं के अम्बार में जितना उपलब्ध हुए, उसमें-से अपनी रुचि के अनुसार चयन कर लिया, जिनका कम उपलब्ध हुआ, कम चयन हुआ। केवल यही कारण है कि किसी शाइर का अधिक और किसी का कम कलाम दिया गया है।

‘सौदा’ ! ख़ुदा के वास्ते कर क़िस्सा मुख़्तसर।
अपनी तो नींद उड़ गयी तेरे फ़साने से।।

डालमियानगर (बिहार)
1 मई 1958 ई.

अ.प्र. गोयलीय



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