संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण - गीताप्रेस 539 Sankshipta Markandey Puran - Hindi book by - Gitapress
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संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण

गीताप्रेस

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 81-293-0153-9 मुखपृष्ठ : सजिल्द
पृष्ठ :294 पुस्तक क्रमांक : 1196

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अठारह पुराणों की गणना में सातवाँ स्थान है मार्कण्डेयपुराण का...

Markandey Puran-A Hindi Book by Gitapress - संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण - गीताप्रेस

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

निवेदन

पुराण भारत तथा भारतीय संस्कृति की सर्वोत्कृष्ट निधि हैं। ये अनन्त ज्ञान-राशि के भण्डार हैं। इनमें इहलौकिक सुख-शान्ति से युक्त सफल-जीवन के साथ-साथ मानवमात्र के वास्तविक लक्ष्य-परमात्म तत्त्व की प्राप्ति तथा जन्म-मरण से मुक्त होने का उपाय और विविध साधन बड़े ही रोचक, सत्य और शिक्षाप्रद कथाओं के रूप में उपलब्ध हैं। इसी कारण पुराणों को अत्यधिक महत्त्व और लोकप्रियता प्राप्त है; परन्तु आज ये अनेक कारणों से दुर्लभ होते जा रहे हैं।

पुराणों की ऐसी महत्ता, उपयोगिता और दुर्लभता के कारण कुछ पुराणों के सरल हिन्दी अनुवाद ‘कल्याण’ विशेषांकों के रूप में समय-समय पर प्रकाशित किये जा चुके हैं। उनमें ‘संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण-ब्रह्मपुराणांक’ भी एक है। ये दोनों पुराण सर्वप्रथम संयुक्त रूप से ‘कल्याण-के इक्कीसवें (सन् 1947 ई.) वर्ष के विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुए थे। पश्चात्, श्रद्धालु, पाठकों की माँ पर अन्य पुराने विशेषांकों की तरह इनके (संयुक्त रूप में) कुछ पुनर्मुद्रण संस्करण भी प्रकाशित हुए। पुराण-विषयक इन विशेषांकों की लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए अब पाठकों से सुविधार्थ इस प्रकार से संयुक्त दो पुराणों को अलग-अलग ग्रन्थाकार में प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया है। तदनुसार यह ‘संक्षिप्त-मार्कण्डेयपुराण’ आपकी सेवा में प्रस्तुत है। (इसी तरह ‘संक्षिप्त ब्रह्मपुराण’ भी अब अलग से ग्रन्थाकार में उपलब्ध है।)

‘मार्कण्डेयपुराण’ का अठारह पुराणों की गणना में सातवाँ स्थान है। इसमें जैमिनि-मार्कण्डेय-संवाद एवं मार्कण्डेय ऋषि का अभूतपूर्व आदर्श जीवन-चरित्र, राजा हरिश्चन्द्र का चरित्र-चित्रण, जीव के जन्म-मृत्यु तथा महारौरव आदि नरकों के वर्णनसहित भिन्न-भिन्न पापों से विभिन्न नरकों की प्राप्ति का दिग्दर्शन है। इसके अतिरिक्त इसमें सती मदालसा का आदर्श चरित्र, गृहस्थों के सदाचार का वर्णन, श्राद्ध-कर्म, योगचर्चा तथा प्रणव की महिमा पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला गया है। इसमें देवताओं के अंश में भगवती महादेवी का प्राकट्य और इसके द्वारा सेनापतियों सहित महिषासुर-वध का वृत्तान्त भी विशेष उल्लेखनीय है। इसमें श्री दुर्गा सप्तशती सम्पूर्ण-मूल के साथ हिन्दी-अनुवाद, माहात्मय तथा पाठकों की विधिसहित विस्तार से वर्णित है। इस प्रकार लोक-परलोक के सुधार हेतु इसका अध्ययन अति उपयोगी, महत्त्वपूर्ण और कल्याणकारी है।
अतएव कल्याणकामी सभी साधकों और श्रद्धालु पाठकों को इसके अध्ययन-अनुशीलन द्वारा अधिक-से-अधिक लाभ उठाना चाहिए।

-प्रकाशक

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