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गीता प्रेस, गोरखपुर >> निष्काम श्रद्धा और प्रेम

निष्काम श्रद्धा और प्रेम

जयदयाल गोयन्दका

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :156
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1043
आईएसबीएन :00000

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प्रस्तुत है निष्काम श्रद्धा और प्रेम का मार्मिक चित्रण.....

Nisham Shrida Aur Prem a hindi book by Jaidayal Goyandaka - निष्काम श्रद्धा और प्रेम - जयदयाल गोयन्दका

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

निवेदन

गीताजी के तीसरे अध्याय के 18वें श्लोक में कहा है—

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः।।


जो महात्मा हैं वह कोई काम करें, उन्हें करने से भी कोई प्रयोजन नहीं है और न करने से भी कोई प्रयोजन नहीं है। उन्हें जड़-चेतन किसी से भी कोई प्रयोजन नहीं महात्मा का सम्पूर्ण भूतों से कुछ भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रहता, फिर भी उनके द्वारा संसार के कल्याण के कार्य किये जाते हैं। परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका की एक बड़ी भूख स्वाभाविक थी कि जीवनमात्र का कल्याण हो; अतः उन्हें प्रवचन देने का बड़ा उत्साह था। घंटों- घंटो प्रवचन देकर भी थकाटव महसूस नहीं करते थे। उन प्रवचनों को उस समय प्राय- लिखा जाता था। उनका कहना था जब तक ये बातें जीवन में न आ जायें यानी कल्याण न हो जाये तब तक ये बातें हमेंशा ही नयी हैं, इन्हें बार-बार सुनना, पढ़ना, मनन करना और जीवन में लाने की चेष्टा करनी चाहिये।’ उनके द्वारा दिये गये कुछ प्रवचनों को यहाँ पुस्तकरूप में प्रकाशित किया जा रहा है। इसमें कुछ स्थानों पर पहले प्रकाशित हुई बात भी आ सकती है; परन्तु पुनरुक्ति अध्यात्म-विषय में दोष नहीं माना गया है। अध्यात्म-विषय में पुनरुक्ति उस विषय को पुष्ट ही करती है, अतः हमें इन लेखों-बातों को जीवन में लाने के भाव से बार-बार इनका पठन तथा मनन करना चाहिये।

प्रकाशक

दयाका तत्त्व


एक क्षणमें, एक दिन में, एक साल में सभी समय लाभ हो सकता है। यह सब साधक पर निर्भर है। साधक यह निश्चय कर ले कि आज से साधन गड़बड़ नहीं होगा। यह मनमें निश्चय कर ले कि मेरे में किसी प्रकार का अवगुण और विघ्न आ ही कैसे सकता है। पूर्व में जो मिथ्या बोला गया वह इसलिए बोला गया कि सत्य का महत्त्व नहीं समझा। यदि किसी प्रकार भूलसे बोला जाय तो उसके लिये भी बड़ा पश्चाताप होना चाहिये कि ऐसी भूल क्यों हुई ? घोर समुद्र में डूबते हुए आदमी को अगर जहाज का रस्सा मिल जाय तो वह उसे भूल से भी नहीं छोड़ सकता; क्योंकि रस्सा छोड़ना ही उसके लिये मृत्यु होगी। जिसको भगवत्प्रेम में, भगवत्- चिन्तन में, भगवद्भाव में आनन्द आता है वह उसको छोड़ ही कैसे सकता है। जो मनुष्य इस प्रकार की धारणा कर लेता है, उसका निश्चय दृढ़ हो जाता है। अगर किसी में दोष आ जाता है तो उसमें श्रद्धा की ही कमी है। उसने सत्य का महत्त्व जाना ही नहीं। एक बार मनुष्य को शान्ति और आनन्द का मार्ग मिल जाय तो कोई भी समझदार आदमी उस रास्ते को नहीं छोड़ सकता। प्रभु की दया है, योगक्षेम वहन करनेवाले प्रभु की बिना माँगे ही मदद है, फिर विचलित होने का कोई कारण ही नहीं है।

एक बार वह गिर जाता है तब वह सावधान हो जाता है, फिर नहीं गिरता। जैसे मकान का दरवाजा छोटा है, चोट लगने से सावधान हो जाता है। कई बार असावधानी से फिर चोट लग जाती है। तब पुनः सावधान होता है फिर उसको बार-बार चोट नहीं लगती। जैसे कोई लड़का गिरता है, चोट लगते ही रोता है, फिर भूल जाता है, फिर गिरता है, फिर रोता है, माँ समझाती है, अब तो सावधान हो जाओ। वही जब समझदार हो जाता है। तब चोट नहीं खाता।

प्रभु की दया का प्रभाव अपरिमित है। जितनी हम लोगों की कल्पना है, उससे अपरिमित है। प्रभु असम्भव को भी सम्भव कर देते हैं। जो साधन की कमी प्रतीत होती है। वह प्रभु की दया पर रख दें तो एक क्षण में वह सारी पूर्ति कर सकते हैं। प्रभु की दया का स्वरूप समझने से वह विकसित हो जाती है। उस परदे को हटाने से उसका रहस्य खुल जाता है। वह प्रत्यक्ष हो जाती है। उसका रहस्य महात्मा कहते हैं। हर देश, हर काल, हर वस्तु में प्रभु की दया को पूर्ण देखो। दया ही-दया भरी हुई है। ओत-प्रोत देखो। न दीखो तो भी देखो। विवाह में ध्रुवतारा दिखाया जाता है, बादल हों तो मान लेते हैं कि ध्रुव है। बस दया-ही-दया भरी पड़ी है। यह मान लेनेपर मायाका परदा टिक नहीं सकता।


दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।

(गीता 7/14)


यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है; परंतु जो पुरुष केवल मुझकों ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया का उल्लंघन  कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं।

उस दया के प्रताप से परम पद पा जाता है। सदा, सर्वदा  सर्वत्र  दया के सिवाय दूसरी बात नहीं है। एक महात्मा एक गृहस्थ के घर गये। गृहस्थ ने कहा कि महाराज बड़ी दया की; किन्तु घर में चार दिन से अन्न का दाना ही नहीं है, हम लोग भूखे बैठे हैं। महात्मा ने कहा कि तुम्हारे समान धनी तो कोई नहीं है। गृहस्थ ने कहा कि महाराज आपकी बात समझ में नहीं आती। महात्मा ने एक पत्थर की तरफ संकेत करके कहा कि यह क्या है ? गृहस्थ ने कहा कि यह चटनी पीसने का पत्थर है। महात्मा ने कहा तुम्हारे पास लोहे का जो सामान हो वह ले आओ। उस पत्थर से छूते ही लोहा सोना बन गया। वह पारस पत्थर था। जैसे पारस की बात बतायी गयी। महात्मा दया करने वाले थे, उस दीन पुरुष में श्रद्धा की कमी ही थी। यहाँ प्रभु की दया पारस है। उसके छूने से लोहा सोना बन जाता है। जिन-जिन स्थलों में हमें काल रात्रि का दुःख दीखता था, ईश्वर की दया मानने के साथ  ही वहाँ सुख-आनन्द हो जाता है। इससे अनुमान कर लेना चाहिये। यही उसका रहस्य है। छोटी चीजें जैसे सोना हुईं वैसे ही बड़ी-बड़ी भी हो सकती है।

यदि सारा घर सोने से भरना है तो सर्वत्र हर समय दया-ही-दया समझे। उसके सिवाय कोई दूसरी चीज की गुंजाइश ही नहीं, परमात्मा और परमात्मा की दया में दूसरी चीज घुसने की गुंजाइश नहीं है।

इस दया में कितने गुण हैं, यह मुझे पता नहीं है। ईश्वर में जितने गुण बताये जाते हैं वे ईश्वर की दया से सारे-के-सारे उस साधक में आ जाते हैं। ईश्वर से भी ज्यादा गुण ईश्वर की दया से समझे। जो दयाका स्वरूप है वही दया का तत्त्व है। जब यह माया का परदा दूर हो गया तभी दया का तत्त्व जान गया। ईश्वर प्राप्त हो गये। ईश्वर की दया की महिमा ईश्वर भी नहीं जान सकते। फिर मैं क्या कह सकता हूँ मनुष्य को अपना कर्तव्य ही करना चाहिये। इसके बाद उसको उलाहना नहीं है। ईश्वर की दया के प्रकरण को सुनने से ही लाभ है। इस प्रकरण को बार-बार सुनने से दया प्रत्यक्ष हो जाती है। जैसे-जैसे इसको समझता है वैसे-वैसे यह प्रतीत होता रहता है कि आज ठीक समझा। जैसे पर्वत पर चढ़ने वाला जिस चोटी पर पहुँचता है, देखता है यही सबसे ऊँचा पर्वत है। फिर और आगे जाता है तो और ऊँची चोटी पर जा पहुँचता है।

जो उत्साह से चढ़े जाता है वह पहुँच ही जाता है।  पहाड़ की चढ़ाई में अनेक जोखिम हैं; किन्तु इस मार्ग में कोई विघ्न नहीं है। भगवान् की प्रतीक्षा है। कोई चिन्ता नहीं है, जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाता है। उतना-2 ही आनन्द बढ़ता जाता है।  शेष में—


यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते।।

(गीता 6/22)


परमात्मा की प्राप्तिरुप जिस लाभ को प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मप्राप्तिरूप जिस अवस्था में स्थित योगी  बड़े भारी दुःखसे भी चलायमान नहीं होता।
यह सन्तोष हो जाता है कि इससे बढ़कर और आनन्द नहीं है, वहाँ तुष्टि-पुष्टि सबकी पूर्णता हो जाती है। संसार में जितना लौकिक दुःख है, सारा-का-सारा उसपर आ जाय तो भी उसको दुःख व्यापना तो दूर रहा, वह सुखकी स्थित से विचलित ही नहीं होता। उसको संतोष विश्वास हो जाता है कि इससे बढ़कर और कुछ नहीं है। भक्त और भगवान् के विषय में आनन्द बहुत अद्भुत बात है। नयी बात है, कभी पुरानी नहीं होती। यह प्रभुका सूत्र है—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते’ इस पर सभी कुछ-न-कुछ कहते हैं। मैंने इस पर कुछ विस्तार किया है; परन्तु वास्तव में है उतना तो मन में नहीं आ सकता। जितना मन में आता है उतना वाणी में नहीं आ पाता, वाणी में आता है उतना समझा भी नहीं सकता। स्वामी को सुख पहुँचना आनन्दमय ही है। जिस क्रिया से स्वामी सन्तुष्ट हों वही काम करता है। भक्त की क्रिया से प्रभु आह्लादित हो जाते हैं। प्रभु के आनन्दसे भक्तों को आनन्द होता है।

माँ सीता विलाप करती हैं इसलिये भगवान् राम रोते हैं। अपने प्यारे प्रेमी भक्तों को प्रफुल्लित करने के लिये प्रभु प्रफुल्लति होते हैं। प्रेम में भी यही स्थिति होती है, प्रेमी और प्रेमास्पद दोनों प्रेममय हो जाते हैं। प्रेम ही उन दोनों का स्वरूप हो जाता है। एक हुए ही दो-से दीखते हैं। भगवान् भक्त के जीवन हैं, प्राण हैं, प्रेम हैं, धन हैं, शान्ति हैं, सर्वस्व हैं। इसी प्रकार भक्त भगवान् के लिये है। भगवान् मरें तो भक्त मरे। वहाँ तो एकता हो जाती है। शब्दों को लिखना कठिन है, यदि शब्द लिखे भी जायँ तो मेरा हाव-भाव कैसे लिखा जा सकता है यह अनुभवगम्य है। जिसको प्राप्त होता है वही जानता है। गीतारूपी सागर की एक बूँद भी मैं नहीं जानता। भगवान् कहते हैं—

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।

(गीता 6/30)

 

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