सत्य की खोज - स्वामी रामसुखदास 1019 Satya ki Khoj - Hindi book by - Swami Ramsukhadas
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गीता प्रेस, गोरखपुर >> सत्य की खोज

सत्य की खोज

स्वामी रामसुखदास

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2006
आईएसबीएन : 81-293-0699-9 मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पृष्ठ :90 पुस्तक क्रमांक : 1034

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प्रस्तुत है सत्य की खोज....

Satya Ki Khoj a hindi book by Swami Ramsukhadas - सत्य की खोज - रामसुखदास

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

।।श्रीहरि:।।

निवेदन

एक उत्पत्ति होती है और एक खोज होती है। उत्पत्ति उस वस्तु की होती है, जो पहले नहीं थी तथा बाद में भी नहीं रहेगी, और खोज उस वस्तु की होती है, जो पहले से विद्यमान है और आगे भी सदा विद्यमान रहेगी। इस दृष्टि से असत्य वस्तु की उत्पत्ति होती है और सत्य वस्तु की खोज होती है। साधक वह होता है, जो सत्य वस्तु की खोज में लगा है। इसलिये प्रस्तुत पुस्तक साधकों के लिये बड़े काम की है और सत्य की खोज में बड़ी सहायक है। आशा है, सत्यान्वेषी पाठकगण इस पुस्तक का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन-मनन करके लाभ उठायेंगे।

प्रकाशक

1. सत्य की खोज

शास्त्रों में लिखा है कि मनुष्य शरीर कर्म प्रधान है। जब मनुष्य के भीतर कुछ पाने की इच्छा होती है, तब उसकी कर्म करने में प्रवृत्ति होती है। क्रम के दो प्रकार हैं-कर्त्तव्य और अकर्तव्य। निष्काम भाव से कर्म करना ‘कर्तव्य’ है और सकाम भाव से कर्म करना ‘अकर्तव्य’ है। अकर्तव्य का मूल कारण है-संयोगजन्य सुख की कामना। अपने सुख की कामना मिटने पर अकर्तव्य नहीं होता। अकर्तव्य न होने पर कर्तव्य का पालन अपने-आप होता है। जो साधन अपने-आप होता है, वह असली होता है और जो साधन किया जाता है, वह नकली होता है।

मनुष्य में यदि कोई कामना पैदा हो जाय तो वह पूरी होगी ही- ऐसा कोई नियम नहीं है। कामना पूरी होती भी है और नहीं भी होती। सब कामनाएँ आज तक किसी एक भी व्यक्ति की पूरी नहीं हुई और पूरी हो सकती भी नहीं। अगर कामना पैदा तो हो जाय, पर पूरी न हो तो बड़ा दुख होता है ! परन्तु मनुष्य की दशा यह है कि वह कामना की अपूर्ति से दु:खी भी होता रहता है और कामना भी करता रहता है ! परिणाम यह होता है कि न तो सब कामनाएँ पूरी होती हैं और न दु:ख ही मिटता है। इसलिये अगर किसी को दु:ख से बचना हो तो इसका उपाय है-कामना का त्याग। यहाँ शंका हो सकती है कि अगर हम कोई भी कामना न करें तो फिर कर्म करें ही क्यों ? इसका समाधान है कि कर्म फल प्राप्ति के लिये भी किया जाता है और फल की कामना का त्याग करने के लिये भी किया जाता है। जो कर्म बन्धन से मुक्त होना चाहता है, वह फलेच्छा का त्याग करने के कर्म करता है। यह भी शंका हो सकती है कि अगर हम कोई कामना न करें तो हमारा जीवन कैसे चलेगा ? जीवन-निर्वाह के लिये तो अन्न-जल आदि चाहिये ? इसका समाधान है कि अन्न-जल लेते-लेते इतने वर्ष बीत गये, फिर भी हमारी भूख-प्यास तो नहीं मिटी ! अन्न-जल के बिना हम मर जायँगे तो क्या अन्न-जल लेते-लेते नहीं मरेंगे ? मरना तो पड़ेगा ही। वास्तव में हमारा जीवन कामना-पूर्ति के अधीन नहीं है। क्या जन्म लेने के बाद माँ का दूध कामना करने से मिला था ? जीवन-निर्वाह कामना करने से नहीं होता, प्रत्युत किसी विधान से होता है।

सब कामनाएँ कभी किसी की पूरी नहीं होतीं। कुछ कामनाएँ पूरी होती हैं और कुछ पूरी नहीं होतीं- यह सबका अनुभव है। इसमें विचार करना चाहिये कि कामना पूरी होने अथवा न होने की स्थिति में क्या हमारे में कोई फर्क पड़ता है ? क्या कामना पूरी न होने पर हम नहीं रहते ? विचार करने से अनुभव होगा कि कामना पूरी हो अथवा न हो, हमारी सत्ता-ज्यों-की-त्यों रहती है। कामना उत्पन्न होने से हम जैसे थे, कामना की ‘पूर्ति’ होने पर भी हम वैसे ही रहते हैं, कामना की ‘अपूर्ति’ होने पर भी हम वैसे ही रहते हैं और कामना की ‘निवृत्ति’ होने पर भी हम वैसे ही रहते हैं। इस बात से एक बल मिलता है कि यदि कामना की अपूर्ति से हमारे में कोई फर्क नहीं पड़ता तो फिर हम कामना करके क्यों दु:ख पायें !

मनुष्य के सामने दो ही बातें हैं- या तो वह अपनी सभी कामनाएँ पूरी कर ले अथवा उनका त्याग कर दे। वह कामनाओं को पूरी तो कर सकता ही नहीं, फिर उनको छोड़ने में किस बात का भय ! जो हम कर सकते हैं, उनको तो करते नहीं और जो हम नहीं कर सकते, उसको करना चाहते हैं- इसी प्रमाद से हम दु:ख पा रहे हैं।

जो कामनाओं को छोड़ना चाहता है, उसके लिये सबसे पहले यह मानना जरूरी है कि ‘संसार में मेरा कुछ नहीं है’। जब तक शरीर को अथवा किसी भी वस्तु को अपना मानेंगे, तब तक कामना का सर्वथा त्याग कठिन है। अनन्त ब्रह्माण्डों में ऐसी एक भी वस्तु नहीं है, जो मेरी और मेरे लिये हो- इस वास्तविकता को स्वीकार करने से मेरी कामना स्वत: मिट जाती है; क्योंकि जब मेरा और मेरे लिये कुछ है ही नहीं तो फिर हम किसी की कामना करें और क्यों करें ?

कामनाओं का सर्वथा त्याग तब होता है, जब मनुष्य का शरीर से संबंध (मैं-मेरापन) नहीं रहता। अत: कामनाओं के सर्वथा त्याग का तात्पर्य हुआ- जीते-जी मर जाना। जैसे, मनुष्य मर जाता है तो वह किसी भी वस्तु को अपनी नहीं कहता और कुछ भी नहीं चाहता। उस पर अनुकूलता-प्रतिकूलता, मान-सम्मान, निन्दा स्तुति आदि का प्रभाव नहीं पड़ता, ऐसे ही कामनाओं का सर्वथा त्याग होने पर मनुष्य पर अनुकूलता-प्रतिकूलता आदि का प्रभाव तो पड़ता नहीं और जीता रहता है ! इसलिये महाराज जनक देह के रहते हुए भी ‘विदेह’ कहलाते थे। जो जीते-जी मर जाता है, वह अमर हो जाता है। इसलिये मनुष्य अगर सर्वथा कामना-रहित हो जाय तो वह जीते-जी मर जायगा-

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिता:।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्रुते।।

(कठ.2/3/14; बृहदा. 4/4/7)

‘साधक के हृदय में स्थित सम्पूर्ण कामनाएँ जब समूल नष्ट हो जाती हैं, तब मरणधर्मा मनुष्य अमर हो जाता है और यहीं (मनुष्य शरीर में ही) ब्रह्म का भली भाँति अनुभव कर लेता है।’

जब साधक के भीतर कामना-पूर्ति का महत्त्व नहीं रहता, तब उसके द्वारा सभी कर्म स्वत: निष्काम भाव से होने लगते हैं और वह कर्म-बन्धन से छूट जाता सुख की कामना न रहने से उसके सभी दोष नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि सम्पूर्ण दोष सुख की कामना से ही पैदा होते हैं। साधक का जीवन निर्दोष होना चाहिये। सदोष जीवनवाला साधक नहीं हो सकता।

अब यह विचार करें कि दोष किसमें रहते हैं ? संसार में दो ही वस्तुएँ हैं- सत् और असत्। दोष न तो सत् (अविनाशी) में रहते हैं और न असत्- (विनाशी) में ही रहते हैं। सत् में दोष नहीं रहते; क्योंकि सत् का कभी अभाव नहीं होता- ‘नाभावो विद्यते सत:’ (गीता 2/16)। कामना अभाव से पैदा होती है। जिसका कभी अभाव नहीं होता, उसमें कोई कामना हो ही नहीं सकती और जिसमें कामना नहीं होती, उसमें कोई दोष आ ही नहीं सकता। असत् में भी दोष नहीं रहता, क्योंकि असत् की सत्ता ही नहीं है- ‘नासतो विद्यते भाव:’ (गीता 2/16)। जिसकी सत्ता ही नहीं है, उसमें (बिना आधार के) दोष कहाँ रहेगा ? असत् की सत्ता न होना ही सबसे बड़ा दोष है, जिसमें दूसरा दोष आने की सम्भावना ही नहीं है। सत् और असत् के संबंध में भी दोष नहीं मान सकते; क्योंकि जैसे प्रकाश और अन्धकार का संबंध असम्भव है, ऐसे ही सत् और असत् का संबंध भी असम्भव है। तो फिर दोष किसमें हैं ? दोष उसमें हैं, जिसमें कामना है। कारण कि सम्पूर्ण दोष कामना से ही पैदा होते हैं- ‘काम एष.......’ (गीता 3/37)।

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