409 Vastavik Sukh - A Hindi Book by - Swami Ramsukhadas - वास्तविक सुख - स्वामी रामसुखदास
Hindi / English

शब्द का अर्थ खोजें

पुस्तक विषय
नई पुस्तकें
कहानी संग्रह
कविता संग्रह
उपन्यास
नाटक-एकाँकी
लेख-निबंध
हास्य-व्यंग्य
व्यवहारिक मार्गदर्शिका
गजलें और शायरी
संस्मरण
बाल एवं युवा साहित्य
जीवनी/आत्मकथा
यात्रा वृत्तांत
भाषा एवं साहित्य
प्रवासी लेखक
संस्कृति
धर्म एवं दर्शन
नारी विमर्श
कला-संगीत
स्वास्थ्य-चिकित्सा
योग
बोलती पुस्तकें
इतिहास और राजनीति
खाना खजाना
कोश-संग्रह
अर्थशास्त्र
वास्तु एवं ज्योतिष
सिनेमा एवं मनोरंजन
विविध
पर्यावरण एवं विज्ञान
पत्र एवं पत्रकारिता
ई-पुस्तकें
अन्य भाषा

मूल्य रहित पुस्तकें
सुमन
चन्द्रकान्ता
कृपया दायें चलिए
प्रेम पूर्णिमा
हिन्दी व्याकरण

मार्च १८, २०१३
पुस्तकें भेजने का खर्च
पुस्तकें भेजने के सामान्य डाक खर्च की जानकारी
आगे
409 Vastavik Sukh

वास्तविक सुख

<<खरीदें
स्वामी रामसुखदास<<आपका कार्ट
मूल्य$ 2.95  
प्रकाशकगीताप्रेस गोरखपुर
आईएसबीएन81-293-0433-3
प्रकाशितफरवरी १३, २००६
पुस्तक क्रं:998
मुखपृष्ठ:अजिल्द

सारांश:
Vastvik Sukh-A Hindi Book by Swami Ramsukhdas - वास्तविक सुख - स्वामी रामसुखदास

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

।।श्रीहरिः।।

निवेदन

प्रस्ततु पुस्तक में श्रद्धेयस्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज द्वारा नागपुर में दिये गये कुछ उपयोगी प्रवचनों का संग्रह किया गया है। ये प्रवचन कल्याण के इच्छुक साधकों के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। पाठकों से मेरी विनम्र प्रार्थना है कि वे कम-से-कम एक बार इस पुस्तक को मननपूर्वक अवश्य ही पढ़ें और इससे लाभ उठाने की चेष्टा करें।


विनीत

1.  वास्तविक सुख

मनुष्य जब तक उत्पत्ति-विनाशशील सुख में फँसा रहता है, तब तक उसको होश नहीं होता, ज्ञान नहीं होता। उसको यह विचार ही नहीं होता कि इससे कितने दिन काम चलायेंगे ! जो उत्पन्न होता है, वह नष्ट होता ही है। जिसका संयोग होता है, उसका वियोग होता ही है। जो आता है, वह चला जाता है। जो पैदा होता है वह मर जाता है। अब इनके साथ हम कितने दिन रहेंगे ? अतः मनुष्य के लिए यह बहुत आवश्यक है कि वह ऐसे आनन्द को प्राप्त कर ले, जिसे प्राप्त करने पर वह सदा के लिये सुखी हो जाय, उसको कभी किञ्चित मात्र भी कष्ट न हो।

हम देखते हैं कि बचपन से लेकर अभी तक मैं वही हूँ। शरीर बदल गया है, दृश्य बदल गया, परिस्थिति बदल गयी, देश, काल, आदि सब कुछ बदल गया, पर मैं वही हूँ। बदलने वालों के साथ मैं कितने दिन रह सकता हूँ ? इनसे मुझे कब तक सुख मिलेगा ? इस बात पर विचार करने की योग्यता तथा अधिकार केवल मनुष्य-को ही मिला है, और मनुष्य ही इसको समझ सकता है। पशु-पक्षियों में इसको समझने की ताकत ही नहीं है। देवता आदि समझ तो सकते हैं पर उनको भी वह अधिकार नहीं मिला है, जो कि मनुष्य को मिला हुआ है। मनुष्य खूब आगे बढ़ सकता है; क्योंकि मानव-शरीर मिला ही भगवत्प्रप्ति के लिए है।


मुख्र्य पृष्ठ  

No reviews for this book..
Review Form
Your Name
Last Name
Email Address
Review
 

   

पुस्तक खोजें

चर्चित पुस्तकें


मेरा दावा है
    सुधा ओम ढींगरा

धूप से रूठी चाँदनी
    सुधा ओम ढींगरा

कौन सी जमीन अपनी
    सुधा ओम ढींगरा

  आगे

समाचार और सूचनाऍ

दिसम्बर १५, २०१३
हमारे संग्रह में ई पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। कुछ ई-पुस्तकें यहाँ देखें।
आगे...

Font :