Nyaydarshanam - A Hindi Book by - Aacharya Udayveer Shastri - न्यायदर्शनम् - आचार्य उदयवीर शास्त्री
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Nyaydarshanam

न्यायदर्शनम्

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आचार्य उदयवीर शास्त्री<<आपका कार्ट
मूल्य$ 14.95  
प्रकाशकविजयकुमार गोविन्दराम हंसनंद
आईएसबीएन8170770556
प्रकाशितजनवरी ०१, २०१०
पुस्तक क्रं:8741
मुखपृष्ठ:सजिल्द

सारांश:
Nyaydarshanam -Aacharya Udayveer Shastri

महर्षि यास्क ने अपने निरुक्त में एक इतिहास प्रस्तुत किया है।
पूर्वकाल में ऋषियों के न रहने पर मनुष्य देवजनों के पास गये बोले अब हमारा कौन ऋषि होगा ? तब देवों ने उन्हें तर्क-ऋषि प्रदान किया। अर्थात जो तर्क के द्वारा अनुसन्धान करता है वही धर्म के तत्त्व को जानता है, अन्य नहीं।

यहाँ तर्क से अभिप्राय है-प्रमाणों के अनुसार सत्य का निश्य करना। प्रमाण ही न्याय का देवता अथवा मुख्य प्रतिपाद्य है। लोक में उसी को तर्कविज्ञान या तर्कशास्त्र भी कहते हैं। जब तक वादी-प्रतिवादी होकर वाद न किया जाय जब तक सत्यासत्य का निर्णय नहीं हो सकता। समस्त दार्शनिक, धार्मिक तथा व्यावहारिक ऊहापोह का नियमन न्यायदर्शन के सिद्धान्तों के द्वारा ही होता है। अन्यथा चिरकाल तक मन्थन करते रहने पर भी तत्त्वार्थ-नवनीत की प्राप्ति नहीं होती।

दार्शनिक साहित्य के प्रणयन में निष्णात, दर्शनशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान् हैं। आचार्य उदयवीर शास्त्री अपने विषय के अधिकृत विद्वान है। दर्शनशास्त्र जैसे क्लिष्ट एवं शुष्क विषय के प्रस्तुतिकरण की उनकी शैली की यह विशेषता है कि वह विद्वानों से लेकर साधारणजनों तक के लिए सुबोध एवं रुचिकर होने से सभी के लिए समान रूप से उपादेय है।

आचार्य उदयवीर शास्त्री का जीवन परिचय


भारतीय दर्शन के उद्भट विद्वान् आचार्य उदयवीर शास्त्री का जन्म 6 जनवरी 1894 को बुलन्दशहर जिले के बनैल ग्राम में हुआ। मृत्यु 16 जनवरी 1991 को अजमेर में हुई।

प्रारम्भिक शिक्षा गुरुकुल सिकन्दराबाद में हुई। 1910 में गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर से विद्याभास्कर की उपाधि प्राप्त की। 1915 में कलकत्ता से वैशेषिक न्यायतीर्थ तथा 1916 में सांख्य-योग तीर्थ की परिक्षाएँ उत्तीर्ण की। गुरुकुल महाविद्यालय ने इनके वैदुष्य तथा प्रकाण्ड पाण्डित्य से प्रभावित होकर विद्यावाचस्पति की उपाधि प्रदान की। जगन्नाथ पुरी के भूतपूर्व शंकराचार्य स्वामी भारती कृष्णातीर्थ ने आपके प्रौढ़ पाण्डित्य से मुग्ध होकर आपको ‘शास्त्र-शेवधि’ तथा ‘वेदरत्न’ की उपाधियों से विभुषित किया।

स्वशिक्षा संस्थान गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर में अध्यापन प्रारम्भ किया। तत्पश्चात् नेशनल कॉलेज, लाहौर में और कुछ काल दयानन्द ब्राह्म महाविद्यालय में अध्यापक के रूप में रहे। तथा बीकानेर स्थित शार्दूल संस्कृत विद्यापीठ में आचार्य पद पर कार्य किया।

अन्त में ‘विरजानन्द वैदिक शोध संस्थान’ में आ गये। यहाँ रह कर आपने उत्कृष्ट कोटि के दार्शनिक ग्रन्थों का प्रणयन किया।


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