Chai Ke Pyale Mein Gaind - A Hindi Book by - Vijay Mohan Singh - चाय के प्याले में गेंद - विजय मोहन सिंह
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Chai Ke Pyale Mein Gaind

चाय के प्याले में गेंद

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विजय मोहन सिंह<<आपका कार्ट
मूल्य$ 12.95  
प्रकाशकराजकमल प्रकाशन
आईएसबीएन9788183614986
प्रकाशितजनवरी ०१, २०१२
पुस्तक क्रं:8631
मुखपृष्ठ:सजिल्द

सारांश:
Chai Ke Pyale Mein Gaind (Vijay Mohan Singh)
बकौल विजय मोहन सिंह : ‘‘कहानियाँ लिखना दिनोंदिन दुष्कर होता जा रहा है। इसका एक कारँ तो शायद यह है कि मनुष्य की प्रकृति क्रमशः ऐन्द्रिकता तथा संवेदनात्मकता से बौद्धिकता की ओर जाने वाली है। इस परिवर्तन में अनुभव और उम्र की भी बड़ी भूमिका प्रमुख होती है। हमारी संवेदनाएँ उम्र के साथ उतनी सरस तथा ऐन्द्रिक नहीं रह पाती।

कथा-साहित्य कविता जितना भाव-केन्द्रित नहीं होता, लेकिन शुष्क विमर्श और बौद्धिक विश्लेषण पर भी आधारित नहीं होता। ऐसा होने पर उसका कथा-तत्त्व ही नहीं, पठनीयता भी क्षीण होती जाती है। कथा की पठनीयता विचार-साहित्य से पृथक् एक अलग धरातल पर निर्धारित होती है। यह अलग बात है कि अक्सर बड़ा कथा-साहित्य अनुभूति और विचार के एक विरल सन्तुलन पर आधारित होता है, किन्तु जिसे परिपक्वता कहते हैं, वह अनुभूति की तीव्रता की कीमत पर ही प्राप्त होती है।’’

यही कारण है कि इस संग्रह में वे ही कहानियाँ शामिल की गई हैं जिनमें अनुभूति की ताजगी बरकरार है, और जो पाठकों की रुचि को बाँधे रख सकें।

विजय मोहन सिंह कहानी के लिए सामाजिक-राजनीतिक रूप से प्रासंगिक होना अनिवार्य नहीं मानते, लेकिन वह केवल बुद्धि या कल्पना का विलास होकर रह जाए, इससे भी वे सहमत नहीं हैं। प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ अपने समय और समाज के धकातल पर खड़ी होकर कथा-रस का निर्वाह भी करती हैं, और इस तरह एक स्वस्थ और समग्र पठनीयता का आधार पाठक को देती हैं।


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