प्रसिद्ध लेखक कमलेशवर की आत्मकथा के दो खंड प्रकाशित होकर बहुत लोकप्रिय हो चुके हैं। ये एक व्यक्ति से जुड़े होने पर भी अपने आप में स्वतंत्र हैं और समय के क्रम में मोटे तौर पर ही चलते हैं। तीसरे खंड, "जलती हुई नदी" की थीम भी एक रहस्यमयी स्त्री से बँधी आरम्भ से अंत तक चलती है। उसी के साथ वे व्यक्तियों और घटनाओं को अपनी विशिष्ट ईमानदारी और बेबाकी के साथ साहित्य, कला और फ़िल्म की कहानी कहते चलते हैं।
बंबई के फ़िल्म-जगत में प्रतिष्ठित होने वाले कमलेशवर हिंदी साहित्य के पहले अग्रणी लेखक है, और इस दुनिया का चित्रण भी उनका सबसे अलग और विशिष्ट हैं। ये झांकियाँ बहुत आकर्षक बन पड़ी हैं।
आत्मकथा-लेखन में कमलेशवर का यह नया प्रयोग एक तरह से एक नयी विधा की ही सृष्टि करता है। उन्होंने न ख़ुद अपने को बख़्शा है, न दूसरों को, और सच्चाई, जिसे वे सापेक्ष ही मानते हैं-क्योंकि दूसरों की सच्चाई कुछ और भी हो सकती है-उनकी क़लम से निर्बाध बहती रहती है।















