सामयिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, विसंगतियों और विडम्बनाओं पर तीखा
प्रहार करते हुए व्यंग्य परम्परा को एक नई भाषा और शिल्प प्रदान करनेवाला
विशिष्ट संकलन।
लेखक यहाँ हमारे दैनिक जीवन और रोजमर्रा की विडम्बनापूर्ण घटनाओं का
सूक्ष्म विश्लेषण कर न सिर्फ हमें झकझोरता है, बल्कि उन कारणों को भी
परत-दर-परत खोलता है जो इनके मूल में हैं।
इस संकलन का हर आलेख हास-परिहास करते हुए संवेदना के स्तर पर पाठकों से
रिश्ता बनाकर उनके दुःख, बेचैनी के साथ जुड़ता है और उन्हें आश्वस्त कर
सोच का एक नया स्तर भी प्रदान करता है।
पुस्तक में राजनीति के विभिन्न रंगों, सत्तालोलुपता और भ्रष्टाचार को
बेनकाब किया गया है और आन्तरिक स्थितियों पर दृष्टिपात करते हुए चीजों को
देखने की एक नई दृष्टि की ओर भी संकेत किया गया है।
अपने व्यंग्य-उपन्यासों से हिन्दी व्यंग्य को एक नई ऊँचाई देनेवाले ज्ञान
चतुर्वेदी की इन रचनाओं से हँसी उतनी नहीं आती, जिनती अपने आसापास की
विडम्बनाएँ हमें कोंचती हैं।
शायद यही व्यंग्यकार की सफलता भी है।















