संगीत का आदिम स्त्रोत प्राकृतिक ध्वनियाँ ही है। प्राक् संगीत-युग में
मनुष्य के प्रकृति की ध्वनियों और उनकी विशिष्ट लय को समझने की कोशिश की।
हर तरह की प्राकृतिक ध्वनियाँ संगीत का आधार नहीं हो सकतीं, अत: भाव पैदा
करने वाली ध्वनियों को परखकर संगीत का आधार बनाने के साथ-साथ उन्हें लय
में बाँधने का प्रयास किया गया होगा। प्रकृति की वे ध्वनियाँ जिन्होंने
मनुष्य के मन-मस्तिष्क को स्पर्श कर उल्लसित किया, वही सभ्यता के विकास के
साथ संगीत का साधन बनीं। हालांकि विचारकों के भिन्न-भिन्न मत हैं।
दार्शनिकों ने नाद के चार भागों परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी में से
मध्यमा को संगीतोपयोगी स्वर का आधार माना। डार्विन ने कहा कि
‘‘पशु रति के समय मधुर ध्वनि करते हैं। मनुष्य ने जब
इस प्रकार की ध्वनि का अनुकरण आरम्भ किया तो संगीत का उद्भव
हुआ।’’ कार्ल स्टम्फ ने भाषा उत्पत्ति के बाद मनुष्य
द्वारा ध्वनि की एकतारता को स्वर की उत्पत्ति माना। उन्नीसवीं शती के
उत्तरार्द्ध में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा कि
‘‘संगीत की उत्पत्ति मानवीय संवेदना के साथ
हुई।’’ उन्होंने संगीत को गाने, बजाने, बताने (केवल
नृत्य मुद्राओं द्वारा) और नाचने का समुच्चय बताया।
प्राच्य शास्त्रों में संगीत की उत्पत्ति को लेकर अनेक रोचक कथाएँ हैं।
देवराज इन्द्र की सभा में गायक, वादक व नर्तक हुआ करते थे। गन्धर्व गाते
थे, अप्सराएँ नृत्य करती थीं और किन्नर वाद्य बजाते थे। गान्धर्व-कला में
गीत सबसे प्रधान रहा है। आदि में गान था। वाद्य का निर्माण पीछे हुआ। गीत
की प्रधानता रही। यही कारण है कि चाहे गीत हो, चाहे वाद्य सबका नाम संगीत
पड़ गया। पीछे से नृत्य का भी इसमें अन्तर्भाव हो गया। संसार की जितनी
आर्य भाषाएँ हैं उनमें संगीत शब्द अच्छे प्रकार से गाने के अर्थ में मिलता
है। संगीत शब्द ‘सम्+ग्र’ धातु से बना है। और भाषाओं
में ‘सं’ का ‘सिं’ हो गया है और
‘गै’ या ‘गा’ धातु (जिसका भी
अर्थ गाना होता है) किसी न किसी रूप में इसी अर्थ में अन्य भाषाओं में भी
वर्तमान है। ऐंग्लोसैक्सन में इसका रूपान्तर है
‘सिंगन’ (singan) जो आधुनिक अंग्रेजी में
‘सिंग’ हो गया है, आइसलैंड की भाषा में इसका रूप है
‘सिग’ (singja), (केवल वर्ण विन्यास में अन्तर आ गया
है,) डैनिश भाषा में है ‘सिंग (Synge),डच में है
‘त्सिंगन’ (tsingen), जर्मन में है
‘सिंगन’ (singen)। अरबी में
‘गना’ शब्द है जो ‘गान’ से
पूर्णतः मिलता है। सर्वप्रथम ‘संगीत रत्नाकर’ ग्रन्थ
में गायन, वादन और नृत्य के मेल को ही ‘संगीत’ कहा
गया है। वस्तुतः ‘गीत’ शब्द में
‘सम्’ जोड़कर ‘संगीत’ शब्द बना,
जिसका अर्थ है ‘गान सहित’। नृत्य और वादन के साथ किया
गया गान ‘संगीत’ है। शास्त्रों में संगीत को साधना भी
माना गया है। प्रामाणिक तौर पर देखें तो सबसे प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष,
मूर्तियों, मुद्राओं व भित्तिचित्रों से जाहिर होता है कि हजारों वर्ष
पूर्व लोग संगीत से परिचित थे। देव-देवी को संगीत का आदि प्रेरक सिर्फ
हमारे ही देश में नहीं माना जाता, यूरोप में भी यह विश्वास रहा है। यूरोप,
अरब और फारस में जो संगीत के लिए शब्द हैं उस पर ध्यान देने से इसका रहस्य
प्रकट होता है। संगीत के लिए यूनानी भाषा में शब्द
‘मौसिकी’ (musique), लैटिन में
‘मुसिका’ (musica), फ्रांसीसी में
‘मुसीक’ (musique), पोर्तुगी में
‘मुसिका’ (musica), जर्मन में मूसिक’
(musik), अंग्रेजी में ‘म्यूजिक’ (music), इब्रानी,
अरबी और फारसी में ‘मोसीकी’। इन सब शब्दों में साम्य
है। ये सभी शब्द यूनानी भाषा के ‘म्यूज’(muse) शब्द
से बने हैं। ‘म्यूज’ यूनानी परम्परा में काव्य और
संगीत की देवी मानी गयी है। कोश में ‘म्यूज’ (muse)
शब्द का अर्थ दिया है ‘दि इन्सपायरिंग गॉडेस ऑफ साँग’
अर्थात् ‘गान की प्रेरिका देवी’। यूनान की परम्परा
में ‘म्यूज’ ‘ज्यौस’(zeus) की
कन्या मानी गयी हैं। ज्यौस’ शब्द संस्कृत के
‘द्यौस्’ का ही रूपान्तर है जिसका अर्थ है
‘स्वर्ग’। ‘ज्यौस’ और
‘म्यूज’ की धारण ब्रह्मा और सरस्वती से बिलकुल
मिलती-जुलती है।
वैदिक युग में ‘संगीत’ समाज में स्थान बना चुका था।
सबसे प्राचीन ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ में आर्यो के
आमोद-प्रमोद का मुख्य साधन संगीत को बताया गया है। अनेक वाद्यों का
आविष्कार भी ऋग्वेद के समय में बताया जाता है।
‘यजुर्वेद’ में संगीत को अनेक लोगों की आजीविका का
साधन बताया गया, फिर गान प्रधान वेद ‘सामवेद’ आया,
जिसे संगीत का मूल ग्रन्थ माना गया। ‘सामवेद’ में
उच्चारण की दृष्टि से तीन और संगीत की दृष्टि से सात प्राकार के स्वरों का
उल्लेख है। ‘सामवेद’ का गान (सामगान) मेसोपोटामिया,
फैल्डिया, अक्कड़, सुमेर, बवेरु, असुर, सुर, यरुशलम, ईरान, अरब, फिनिशिया
व मिस्त्र के धार्मिक संगीत से पर्याप्त मात्रा में मिलता-जुलता था। उत्तर
वैदिक काल के ‘रामायण’ ग्रन्थ में भेरी, दुंदभि,
वीणा, मृदंग व घड़ा आदि वाद्य यंत्रों व भँवरों के गान का वर्णन मिलता है,
तो ‘महाभारत’ में कृष्ण की बाँसुरी के जादुई प्रभाव
से सभी प्रभावित होते हैं। अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने उत्तरा को
संगीत-नृत्य सिखाने हेतु बृहन्नला का रूप धारण किया। पौराणिक काल के
‘तैत्तिरीय उपनिषद’, ‘ऐतरेय
उपनिषद’, ‘शतपथ ब्राह्मण’ के अलावा
‘याज्ञवल्क्य-रत्न प्रदीपिका’,
‘प्रतिभाष्यप्रदीप’ और ‘नारदीय
शिक्षा’ जैसे ग्रन्थों से भी हमें उस समय के संगीत का परिचय
मिलता है। चौथी शताब्दी में भरत मुनि ने
‘नाट्यशास्त्र’ के छ: अध्यायों में संगीत पर ही चर्चा
की। इनमें विभिन्न वाद्यों का वर्णन, उनकी उत्पत्ति, उन्हें बजाने के
तरीकों, स्वर, छन्द, लय व विभिन्न कालों के बारे में विस्तार से लिखा गया
है। इस ग्रन्थ में भरत मुनि ने गायकों और वादकों के गुणों और दोषों पर भी
खुलकर लिखा है। बाद में छ: राग ‘भैरव’,
‘हिंडोल’, ‘कैशिक’,
‘दीपक’, ‘श्रीराग’ और
‘मेध’ प्रचार में आये। पाँचवीं शताब्दी के आसपास मतंग
मुनि द्वारा रचित महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ ‘वृहददेशी’ से
पता चलता है कि उस समय तक लोग रागों के बारे में जानने लगे थे। लोगों
द्वारा गाये-बजाये जाने वाले रागों को मतंग मुनि ने देशी राग कहा और देशी
रागों के नियमों को समझाने हेतु‘वृहद्देशी’ ग्रन्थ की
रचना की। मतंग ही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अच्छी तरह से सोच-विचार कर
पाया कि चार या पाँच स्वरों से कम में राग बन ही नहीं सकता। पाणिनी के
‘अष्टाध्यायी’ में भी अनेक वाद्यों जैसे मृदंग,
झर्झर, हुड़क तथा गायकों व नर्तकों सम्बन्धी कई बातों का उल्लेख है।
सातवीं–आठवीं शताब्दी में ‘नारदीय शिक्षा’
और ‘संगीत मकरंद’ की रचना हुई। ‘संगीत
मकरंद’ में राग में लगने वाले स्वरों के अनुसार उन्हें अलग-अलग
वर्गों में बाँटा गया है और रागों को गाने-बजाने के समय पर भी गम्भीरता से
सोचा गया है।
ग्यारहवीं शताब्दी में मुसलमान अपने साथ फारस का संगीत लाए। उनकी और हमारी
संगीत पद्धतियों के मेल से भारतीय संगीत में काफी बदलाव आया। उस दौर के
राजा-महाराजा भी संगीत-कला के प्रेमी थे और दूसरे संगीतज्ञों को आश्रय
देकर उनकी कला को निखारने-सँवारने में मदद करते थे। बादशाह अकबर के दरबार
में 36 संगीतज्ञ थे। उसी दौर के तानसेन, बैजूबावरा, रामदास व तानरंग खाँ
के नाम आज भी चर्चित हैं। जहाँगीर के दरबार में खुर्रमदाद, मक्खू, छत्तर
खाँ व विलास खाँ नामक संगीतज्ञ थे। कहा जाता है कि शाहजहाँ तो खुद भी
अच्छा गाते थे और गायकों को सोने-चाँदी के सिक्कों से तौलवाकर ईनाम दिया
करते थे। मुगलवंश के एक और बादशाह मुहम्मदशाह रंगीले का नाम तो कई पुराने
गीतों में आज भी मिलता है। ग्वालियर के राजा मानसिंह भी संगीत प्रेमी थे।
उनके समय में ही संगीत की खास शैली ‘ध्रुपद’ का विकास
हुआ। 12वीं शताब्दी में संगीतज्ञ जयदेव ने ‘गीत
गोविन्द’ नामक संस्कृत ग्रन्थ लिखा, इसे सकारण
‘अष्टपदी’ भी कहा जाता है। तेरहवीं शताब्दी में
पण्डित शारंगदेव ने ‘संगीत रत्नाकर’ की रचना की। इस
ग्रन्थ में अपने दौर के प्रचलित संगीत और भरत व मतंग के समय के संगीत का
गहन अध्ययन मिलता है। सात अध्यायों में रचे होने के कारण इस उपयोगी ग्रन्थ
को सप्ताध्यायी भी कहा जाता है। शांरगदेव द्वारा रचित ‘संगीत
रत्नाकर’ के अतिरिक्त चौदहवीं शताब्दी में विद्यारण्य द्वारा
‘संगीत सार’, पन्द्रहवीं शताब्दी में लोचन कवि द्वारा
‘राग तरंगिणी’, सोलहवीं शताब्दी में पुण्डरीक विट्ठल
द्वारा ‘सद्रागचंद्रोदय’, रामामात्य द्वारा
‘स्वरमेल कलानिधि’, सत्रहवीं शताब्दी में हृदयनारायण
देव द्वारा ‘हृदय प्रकाश’ व ‘हृदय
कौतुकम्’, व्यंकटमखी द्वारा
‘चतुर्दंर्डिप्रकाशिका’, अहोबल
द्वारा‘संगीत पारिजात’, दामोदर पण्डित द्वारा
‘संगीत दर्पण,’ भावभट्ट द्वारा ‘अनूप
विलास’ व ‘अनूप संगीत रत्नाकार’,
सोमनाथ’ द्वारा’ अष्टोत्तरशतताल लक्षणाम्’
और अठारहवीं शताब्दी में श्रीनिवास पण्डित द्वारा ‘राग तत्व
विबोध:’, तुलजेन्द्र भोंसले द्वारा ‘संगीत
सारामृतं’ व ‘राग लक्षमण्’ ग्रन्थों की
रचना हुई। स्वामी हरिदास, विट्ठल, कृष्णदास, त्यागराज, मुथ्थुस्वामी
दीक्षितर और श्यामा शास्त्री जैसे अनेक संत कवि–संगीतज्ञों ने
भी उत्तर आदि दक्षिण भारत के संगीत को अनगिनत रचनाएँ दीं। कहा जा सकता है
कि भारतीय संगीत शताब्दियों के प्रयास व प्रयोग का परिणाम है।
विद्वानों ने माना है कि जो ध्वनियाँ निश्चित ताल और लय में होती हैं वहीं
संगीत पैदा करती हैं। ध्वनियों के मोटे तौर पर दो प्रकार
‘आहत’ और ‘अनाहत’ ध्वनियाँ संगीत
के लिए उपयोगी नहीं होतीं, इनका अनुभव ध्यान की परावस्था में होता है अतः
‘आहत’ नाद से ही संगीत का जन्म होता है। यह नाद दो
वस्तुओं को आपस में रगड़ने, घर्षण या एक पर दूसरी वस्तु के प्रहार में
पैदा होता है। ‘आहत’ नाद हम तक कंपन के माध्यम से
पहुँचता है। ध्वनि अपनी तरंगों से हवा में हलचल पैदा करती है। ध्वनि
तरंगों की चौ़ड़ाई और लम्बाई पर ध्वनि का ऊँचा या नीचा होना तय होता है।
संगीत के सात स्वरों में ‘रे’ का नाद
‘सा’ के नाद से ऊँचा है। इसी तरह
‘ग’ का नाद ‘रे’ से ऊँचा है। यह
भी कह सकते हैं कि ‘ग’ की ध्वनि में तरंगों की लम्बाई
‘रे’ की ध्वनि–तरंगों से कम है और कम्पनों
की संख्या ‘रे’ की तुलना में ज्यादा है। इसके अलावा
ध्वनि से सम्बन्धित और भी कई सिद्धान्त हैं जो ध्वनि का भारी या पतला
होना, देर या कम देर तक सुनाई देना निश्चित करते हैं। इन्हीं गुणों को
ध्यान में रखते हुए संगीत के लिए मुख्यतः सात स्वर निश्चित किये गए। षड्ज,
गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत व निषाद स्वर-नामों के पहले अक्षर लेकर इन्हें
सा, रे ग, म, प, ध और नि कहा गया। ये सब शुद्ध स्वर है। इनमें
‘सा’ और ‘प’ अचल माने गये हैं
क्योंकि ये अपनी जगह से जरा भी नहीं हटते। बाकी पाँच स्वरों को विकृत या
विकारी स्वर भी कहते हैं, क्योंकि इनमें अपने स्थान से हटने की गुंजाइश
होती है। कोई स्वर अपने नियत स्थान से थो़ड़ा नीचे खिसकता है तो वह कोमल
स्वर कहलाता है। और ऊपर खिसकता है तो तीव्र स्वर हो जाता है। फिर अपने
स्थान पर लौट आने पर ये स्वर शुद्ध कहे जाते हैं। रे, ग, ध, नि जब नीचे
खिसकते हैं तब वे कोमल बन जाते हैं और ‘म’ ऊपर
पहुँचकर तीव्र बन जाता है। इस तरह सात शुद्ध स्वर, चार कोमल और एक तीव्र
मिलकर बारह स्वर तैयार होते हैं।
सात स्वरों को ‘सप्तक’ कहा गया है, लेकिन ध्वनि की
ऊँचाई और नीचाई के आधार पर संगीत में तीन तरह के सप्तक माने गये। साधारण
ध्वनि को ‘मध्य’, मध्य से ऊपर की ध्वनि को
‘तार’ और मध्य से नीचे की ध्वनि को
‘मन्द्र’ सप्तक कहा जाता है। ‘तार
सप्तक’ में तालू, ‘मध्य सप्तक’ में गला और
‘मन्द्र सप्तक’ में हृदय पर जोर पड़ता है । संगीत के
आधुनिक-काल के महान संगीतज्ञों पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर और पण्डित
विष्णुनारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत परम्परा को लिखने की पद्धित विकसित
की। भातखण्डे जी ने सप्तकों के स्वरों को लिखने के लिए बिन्दु का प्रयोग
किया। स्वर के ऊपर बिन्दु तार सप्तक, स्वर के नीचे बिन्दु मन्द्र सप्तक और
बिन्दु रहित स्वर मध्य सप्तक दर्शाते हैं। इन सप्तकों में कोमल और तीव्र
स्वर भी गाये जाते हैं, जिन्हें भातखण्डे लिपि में स्वरों के ऊपर खड़ी पाई
(म) लगाकर तीव्र तथा स्वरों के नीचे पट पाई (ग) लगाकर कोमल दर्शाया जाता
है। इन स्वरों की ध्वनि का केवल स्तर बदलता है। इनकी कोमलता और तीव्रता
बनी रहती है।
संगीत में स्वर को लय में निबद्ध होना पड़ता है। लय भी सप्तकों की तरह तीन
स्तर से गुजरती है जैसे सामान्य लय को ‘मध्य लय,’
सामान्य से तेज लय को ‘द्रुत लय’ तथा सामान्य से कम
को ‘विलिम्बित लय’ कहा जाता है। संगीत में समय को
बराबर मात्राओं में बाँटने पर ‘ताल’ बनता है।
‘ताल’ बार-बार दोहराया जाता है और हर बार अपने अन्तिम
टुक़ड़े को पूरा कर समय के जिस टुकड़े से शुरू हुआ था उसी पर आकर मिलता
है। हर टुकड़े को ‘मात्रा’ कहा जाता है। संगीत में
समय को मात्रा से मापा जाता है। तीन ताल में समय या लय के 16 टुकड़ें या
मात्राएँ होती हैं। हर टुकड़े को एक नाम दिया जाता है, जिसे
‘बोल’ कहते हैं। इन्हीं बोलों को जब वाद्य पर बजाया
जाता है तो उन्हें ‘ठेका’ कहते हैं।
‘ताल’ की मात्राओं को विभिन्न भागों में बाँटा जाता
है, जिससे गाने या बजाने वाले को यह मालूम रहे कि वह कौन सी मात्रा पर है
और कितनी मात्राओं के बाद वह ‘सम’ पर पहुँचेगा। तालों
में बोलों के छंद के हिसाब से उनके विभाग किए जाते हैं। जहाँ से चक्र
दोबारा शुरू होता है उसे ‘सम’ कहा जाता है।
‘ताल’ में ‘खाली’ भरी’
दो महत्त्वपूर्ण शब्द हैं। ‘ताल’ के उस भाग को भरी
कहते हैं जिस पर बोल के हिसाब से अधिक बल देना है। ‘भरी पर ताली
दी जाती हैं। ‘ताल’ में खाली उम भाग को कहते हैं जिस
पर ताली नहीं दी जाती और जिससे गायक को सम के आने का आभास हो जाता है। ताल
लय को गाँठता है और उसे अपने नियंत्रण में रखता है।
जब 12 स्वर खोज लिए गये होंगे तब उन्हें इस्तेमाल करने के तरीके ढूँढ़े
गये। 12 स्वरों के मेल से ही कई राग बनाए गये। उनमें से कई रागों में
समानता भी थी। कवि लोचन ने ‘राग-तरंगिणी’ ग्रंथ में
16 हजार रागों का उल्लेख किया है, लेकिन इतने सारे रागों में से चलन में
केवल 16 राग ही थे। राग उस स्वर समूह को कहा गया जिसमें स्वरों के
उतार-चढ़ाव और उनके मेल में बनने वाली रचना सुनने वाले को मुग्ध कर सके।
यह जरूरी नहीं कि किसी भी राग में सातों स्वर लगें। यह तो बहुत पहले ही तय
कर दिया गया था कि किसी भी राग में कम से कम पाँच स्वरों का होना जरूरी
है। ऐसे और भी नियम बनाये गये थे जैसे षड्ज यानी ‘सा’
का हर राग में होना बहुत ही जरूरी है क्योंकि वही तो हर राग का आधार है।
कुछ स्वर जो राग में बार-बार आते हैं उन्हें ‘वादी’
कहते हैं और ऐसे स्वर दो ‘वादी’ स्वर से कम लेकिन
अन्य स्वरों से अधिक बार आएँ उन्हें ‘संवादी’ कहते
हैं। लोचन कवि ने 16 हजार रागों में से कई रागों में समानता पाई तो उन्हें
अलग-अलग वर्गों में रखा। उन्होंने 12 वर्ग तैयार किये जिनमें से हर वर्ग
में कुछ-कुछ समान स्वर वाले राग शामिल थे। इन वर्गों को
‘मेल’ या ‘थाट’ कहा गया।
‘थाट’ में 7 स्वर अर्थात् ‘सा’,
‘रे,’ ‘ग’,
‘म’,
‘प’,‘ध’,
‘नि’, होने आवश्यक है। यह बात और है कि किसी
‘थाट’ में कोमल और किसी में तीव्र स्वर होंगे या
मिले-जुले स्वर होंगे। इन ‘थाटों’ में वही राग रखे
गये जिनके स्वर मिलते-जुलते थे। इसके बाद सत्रहवीं शताब्दी में दक्षिण के
विद्वान पंडित श्रीनिवास ने सोचा कि रागों को उनके स्वरों की संख्या के
सिहाब से ‘मेल’ में रखा जाये यानी जिन रागों में 5
स्वर हों वे एक ‘मेल’ में, छः स्वर वाले दूसरे और 7
स्वर वाले तीसरे ‘मेल’ में। कई विद्वानों में इस बात
को लेकर चर्चा होती रही कि रागों का वर्गीकरण ‘मेलों’
में कैसे किया जाये। दक्षिण के ही एक अन्य विद्वान व्यंकटमखी ने गणित का
सहारा लेकर कुल 72 ‘मेल’ बताए। उन्होंने दक्षिण के
रागों के लिए इनमें से 19 ‘मेल’ चुने। इधर उत्तर भारत
में विद्वानों ने सभी रागों के लिए 32 ‘मेल’ चुने।
अन्ततः भातखण्डेजी ने यह तय किया कि उत्तर भारतीय संगीत के सभी राग 10
‘मेलों’ में समा सकते हैं। ये
‘मेल’। कौन-कौन से हैं इन्हें याद रखने के लिए
‘चतुर पण्डित’ ने एक कविता बनाई। चतुर पण्डित कोई और
नहीं स्वयं पण्डित भातखण्डे ही थे। इन्होंने कई रचनाएँ
‘मंजरीकार’ और ‘विष्णु शर्मा’
नाम से भी रची है।















