आबिद सुरती चित्रकार हैं, कार्टूनिस्ट हैं, व्यंग्यकार हैं, उपन्यासकार
हैं, घुमक्कड़ हैं, फक्कड़ हैं–और एक कहानीकार भी हैं। विभिन्न
कला-विधाएँ उनके लिए जिंदगी के ढर्रे को तोड़ने का माध्यम हैं। उनकी ये
कोशिशें जितनी उनके चित्रों में नजर आती हैं, उससे अधिक नहीं तो कम-अज-कम
उतनी ही उनकी कहानियों में भी नजर आती हैं। स्वभाव से यथार्थवादी होते हुए
भी वे अपनी कहानियों में मानव-मन की उड़ानों को शब्दांकित करते हैं। जीवन
की सच्चाई से सीधे साक्षात्कार न करके फंतासी और काल्पनिकता का सहारा लेते
हैं। व्यंग्य का से पैनापन इसी से आता है; क्योंकि यथार्थ से फंतासी की
टकराहट से जो तल्खी पैदा होती है, उसका प्रभाव सपाट सच्चाई के प्रभाव से
कहीं ज्यादा तीखा होता है। एक सचेत-सजग कलाकार की तरह आबिद अपनी कहानियों
में सदियों से चली आ रही जड़-रूढ़ियों, परंपराओं और जिंदगी की कीमतों पर
लगातार प्रश्नचिह्न लगाते हैं और उन्हें तोड़ने के लिए भरपूर वार भी करते
हैं। यह बात उन्हें उन कलाकारों की पंक्ति में ला खड़ा करती है, जो कला को
महज कला नहीं, ज़िंदगी की बेहतरी के माध्यम के रूप में जानते हैं। सबसे
बड़ी खूबी यह है कि आबिद के भीतर अब भी एक जिज्ञासु बालक मौजूद है, जो हर
चीज पर क्या, क्यों, कैसे जैसे प्रश्नचिह्न लगाता रहता है। यही वजह है कि
उनकी रचनाएँ जहाँ हमें आंदोलित और उद्वेलित करती हैं, वहीं हमारा बौद्धिक
मनोरंजन भी करती हैं। विचार और रोचकता का ऐसा अद्भुत सम्मिश्रण बहुत कम
रचनाकारों में नजर आता है–और जिनमें नजर आता है, वे प्रथम
पंक्ति के रचनाकार हैं।
–सुदीप
अनुक्रम
विधवा
छँटनी
बेडरूम
हरमसरा
तीसरी आँख
बिज्जू
सांताक्लोज के तीन क्लोजअप
पेड़
हनीमून की एक रात
सतहे
भैंसोंवाला टोला
अंडरवीयर
इंद्रधनुषी योनि
आतंकित
शोफर
तब और अब
चेहरे पर उभरता चेहरा
अनाड़ी नंबर वन
कोटा-रेड
छड़ी के बजाय
विधवा
आग बरसाता हुआ मई महीने का सूरज, चिलचिलाती धूप, हवाओं के साथ बहती लू,
चौपाटी का उबलता हुआ समंदर, छिछले पानी में तपती काली शिलाओं के उठे हुए
सिर...123 नंबर की बस लड़कियों के हॉस्टल के सामने से सपाटे से गुजर गई।
श्री तोलाराम ने खिड़की से बाहर सिर निकालकर दौड़ती हुई बस से पान की
पिचकारी छोड़ी। हवा के साथ उड़ता हुआ मैला लाल रस कई छींटों में कोलतार की
सड़क पर फैल गया।
सिर अंदर लेते हुए श्री तोलाराम ने जेब से रूमाल निकाला, मुँह पोंछा, माथे
पर जमी हुई पसीने की बूँदें पोंछीं, फिर चंद सेंटीमीटर उठकर अपने स्थूल
जिस्म के नीचे दबे लॉन्ग कोट का छोर खींच निकाला और नोटबुक से हवा खाने
लगे।
चहल-पहल कारों, टैक्सियों और बसों से भरी सड़क, स्त्री-पुरुषों के पसीने
से चूते जिस्म, मजदूरों से अधिक परेशान मालिकों के शरीर, होंठ, गाल, माथा,
गरदन पर नाजुक रूमाल दबाती, बड़बड़ाती और आगे बढ़ जाती लड़कियाँ। सड़कों
के बीच द्वीप में खड़ी कारों के चमकते बदन।
बस ‘स्टैंड’ पर रुकी और एक के बाद एक तीन यात्री
उतरकर शेड में दौड़ गए।
‘‘चलो, आ जाओ... आ जाओ !’’
कंडक्टर ने भीतर से आवाज दी।
एक यहूदी लड़की अंदर दौड़ आई। उसके पीछे एक मुसलमान बेवा थी। बेवा के सीने
से एक अधनंगा, बीमार बच्चा चिपका हुआ था।
यहूदी लड़की की ओर कनखियों से देखते हुए कंडक्टर ने अपनी ढीली पतलून थोड़ी
ऊपर उठाई, घंटी बजाई, बस कोलाबा की ओर चल दी।
सिर्फ तीन यात्री थे इस बस में।
1. श्री तोलाराम : दो शख्सों की जगह रोककर, पैर फैलाकर अकेले बैठे थे और
नोटबुक से हवा खा रहे थे।
2. खादीधारी जवान : उजला कुर्ता, उजला पाजामा, काला वास्केट, चेहरे पर
चाँदी की चमक थी।
3. ओ.एन.जी.सी. का क्लर्क : सफेद कमीज, गहरी नीली पैंट, जिस पर तेल के दाग
थे, टाई हवा में लहरा रही थी।
अपने काले बुर्के को सँभालते हुए मुसलमान विधवा प्रवेश के करीब की एक सीट
पर बैठ गई। बच्चे को उसने गोद में लिटा लिया।
एक सरसरी निगाह तीनों यात्रियों पर डाल यहूदी लड़की ने ड्राइवर के पीछे
वाली सीट पर जगह ली। पसीने से गीला उसका तंग टी-शर्ट टुकड़ों में पारदर्शक
हो गया था। शार्ट (नेकर) जाँघों के ऊपर चढ़ आई थी। बाकी सारे अंग खुले थे,
गोरे थे, गुलाबी भी थे, सिर्फ आँखों को छोड़कर। नाक पर धूप का काला चश्मा
था।
यहूदी लड़की के खुले अंगों ने बस के सुस्त माहौल में चुस्ती पैदा कर दी।
क्लर्क के चश्मे की डंडी ऊपर-नीचे होने लगी। खादीधारी युवक की आँखें गहरी
साँसें लेने के बहाने सिर के साथ ऊँची होतीं और धीरे-धीरे वापस झुक जातीं।
श्री तोलाराम की मोटी गरदन के निकट गतिशील नोटबुक की गति थोड़ी और तेज हो
गई थी।
कंडक्टर गला खँखार अपनी टोपी को तिरछी कर और सीना फुलाकर लड़की के सामने आ
खड़ा हुआ। वह जैसे मैदान मार गया हो, ऐसे बाकी तीनों यात्रियों के चेहरे
उतर गए।
काले बुर्के के दो छेदों में से विधवा की कंचे जैसी आँखें घूर रही
थीं–श्री तोलाराम के खुले मुँह को, क्लर्क की नाक पर उतर आई
चश्मे की डंडी को, सिर खुजलाते खादीधारी युवक को।
‘‘टिकट प्लीज !’’ कंडक्टर के
शब्दों में शहद घुला था।
लड़की ने बटुआ खोला। तीनों यात्री भीतर झाँकने के लिए उत्सुक हो उठे। गरदन
ऊपर उठ गई। नजरें बटुए में घुसने के लिए मार्ग ढूँढ़ने लगीं। आखिर
नाजुक-नाजुक रामतरोईसी अंगुलियों की हरकत को गौर से देखकर संतोष मान लिया,
लेकिन नजरें इंच भर भी नहीं हटीं।
रीगल सिनेमा से थोड़े फासले पर बस रुकी। ऊपर बैठे दो यात्री बाहर निकलकर
सिनेमाघर की ओर बढ़ गए। ‘स्पिल बर्ग’ की नई फिल्म इसी
हफ्ते लगी होने के कारण बाहर भीड़ काफी थी। एक्स्ट्रा टिकट के लिए लोग
छीना-झपटी कर रहे थे। यहाँ की धूप बेअसर थी।
घरररररररररररर...
यंत्र थरथराए। इंजिन तले से पानी की कुछ बूँदें टपकीं और बस फिर आगे बढ़ी
यहूदी लड़की की अंगुलियाँ अभी भी बटुए में भटक रही थीं। दैनिक इस्तेमाल की
चीजें भीतरी हिस्सों से ऊपर आकर फिर गायब हो जाती थीं। नन्हा सा जापानी
पंखा, लिपिस्टिक की ट्यूब, रूमाल, इत्र की शीशी, छोटा आईना अंगुलियों के
बीच लुका-छिपी खेल रहे थे और...
अब भी सभी आँखें वहीं केंद्रित थीं। ऊपर के होंठ ऊपर और नीचे के नीचे
स्थिर हो गए थे। साँसें जैसे रुक गई थीं।
अंत में यहूदी लड़की ने बटुए में से बटुए के बेटे जैसा चमड़े का छोटा सा
पॉकिट निकाला, जिप खोली और सौ का एक नोट कंडक्टर के आगे बढ़ा दिया।
यात्रियों की जान में जान आई।
‘‘सॉरी, मैडम !’’ कंडक्टर ने
कंधे से झूलते अपने पॉकिट में पूरा हाथ घुसाते हुए दुःख जताया,
‘‘नो चेंज।’’
गोरी चमड़ी उलझन में पड़ गई।
यात्री परेशान हो उठे।
कोई कुछ बोले, इससे पहले श्री तोलाराम की हमदर्दी जाग उठी। उन्होंने
मुसकराकर पूछा, ‘‘कहाँ जाना है, मैडम
?’’
‘‘कोलाबा से आगे।’’
‘‘मैं भी वहीं जा रहा हूँ...कंडक्टर
!’’ उनकी आवाज कड़ी हुई, ‘‘पैसा
हम देगा। मैडम को टिकट दो।’’
कंडक्टर ने चौड़ी आँखों से श्री तोलाराम के चेहरे में सीधा देखा।
‘‘श्रीमानजी !’’ लड़की ने खड़े
होते हुए सेठजी से कहा, ‘‘मैं यहीं उतर
जाऊँगी।’’
वह आगे बढ़ी, जैसे रैंप पर कोई फैशन मॉडल आगे बढ़ी। गोरे-गोरे अंग हिले।
साथ क्लर्क का दिल भी हिल गया। वह भी खड़ा हो गया।
‘‘इस धूप में आप कहाँ जाएँगी ?’’
लड़की का रास्ता रोकते हुए उसने नम्रता से कहा,
‘‘सिर्फ पचास पैसे का सवाल है न, मैं
दूँगा।’’
श्री तोलाराम की आँखों में खून उतर आया। क्लर्क ने जेब में हाथ डाला। उसकी
आँखें लड़की के टी-शर्ट के एक खुले बटन पर ठहरी थीं, दूसरे बटन को खोलने
का प्रयास कर रही थीं।
‘‘क्षमा कीजिएगा !’’ वह पैसे
निकाले इससे पहले लड़की बोल उठी, ‘‘आपके जज्बात की
मैं कद्र करती हूँ, लेकिन’’
‘‘मैडम !’’ मौका पाते ही
खादीधारी युवक ने बीच में कहा, ‘‘आप विदेशी हैं।
हमारे देश की मेहमान हैं। अगर आप उतर जाएँगी तो वह सिर्फ हमारा नहीं,
बल्कि इस देश का भी अपमान होगा।’’
लड़की का चेहरा गद्गद हो गया।
क्लर्क का चेहरा सख्त हो गया। मन-ही-मन युवक के पुरखों की धूल झाड़ते हुए
वह अभी जेब टटोल रहा था कि युवक ने पचास पैसे का सिक्का बढ़ाते हुए
कंडक्टर से साफ शब्दों में कहा, ‘‘एक टिकट मैडम के
लिए।’’
क्लर्क बर्फ हो गया। उसे अहसास हुआ, युवक की आवाज में विजयी टार्जन की
पुकार थी। गर्व था।
कंडक्टर ने टिकट काटा।
‘‘शुक्रिया !’’ लड़की ने युवक से
कहा, ‘‘बहुत-बहुत शुक्रिया।’’
पल भर में तो वह पानी-पानी हो गया, पचास पैसा वसूल हो गया।
‘‘टिकट !’’ कंडक्टर ने मुसलमान
विधवा के आगे खड़े होते हुए अपनी मूल खुरदरी आवाज में कहा।
विधवा ने चेहरा उठाया। कंडक्टर के चेहरे पर एक नजर डालकर उसने काले बुर्के
में हाथ डाला। वह सीधा ही भीतर मैली चोली में उतर गया। चिथड़े-सा एक रूमाल
हाथ में आया। बाहर निकालकर उसे खोला। पैसे गिने। पैंतालीस पैसे थे उसमें।
पाँच पैसे का सिक्का कहाँ फिसल गया ?
उसने फिर भीतर हाथ डाला। पाँच पैसे का सिक्का ढूँढ़ता हुआ हाथ चोली के
दो-तीन हुक तोड़कर बाहर निकल आया। कम्बख्त कहाँ छिप गया ? या फिर कहीं गिर
गया ?
यह मुमकिन न था। क्योंकि आज तक ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। घर से निकलने से
पहले वह खर्च के पूरे पैसे गिनकर रूमाल में बाँध लेती थी। वैसे आज वह तीन
रुपए लेकर निकली थी। उसने सबसे पहले पचास पैसे का एक टिकट कटवाया था।
सार्वजनिक अस्पताल में बच्चे की दवाई के दो रुपए दिए थे। बाकी बचे थे पचास
पैसे और अब वह घर लौट रही थी।
एक बार उसने हाथ पीठ पर भी फेर देखा। निराशा के सिवा उसे कुछ न मिला।
मायूस नजरों से उसने कंडक्टर की ओर देखा।
‘‘किधर जाना है ?’’ कंडक्टर ने
पूछा।
‘‘कोलाबा से आगे झुग्गी-झोंपड़ी में रहती
हूँ।’’ विधवा की आवाज में लाचारी थी।
‘‘लेकिन पाँच पैसे कम हैं।’’
‘‘कम हैं !’’ कंडक्टर की भौंहें
तन गईं। हाथ बढ़ा। घंटी बजी। बस रुकी। ड्राइवर ने मुड़कर पीछे देखा।
‘‘चलो, नीचे...नीचे उतरो !’’
विधवा रूआँसी हो आई।
‘‘कंडक्टर साहब !’’ उसने दोनों
हाथ जोड़ते हुए गुजारिश की, ‘‘मेरा बच्चा बीमार है।
सवेरे से कुछ खाया भी नहीं। इस धूप में चलकर जाऊँगी तो मेरा बच्चा दम तोड़
देगा।’’
‘‘क्या है, मास्टर ? क्या बात है
?’’ ड्राइवर ने अपनी सीट से आवाज दी।
कंडक्टर ने बताया, ‘‘इस औरत को मुफ्त में सफर करना
है।’’
ड्राइवर ने बैठे-बैठे ही पाँव पछाड़ा।
‘‘सिर्फ पाँच पैसे कम हैं।’’
विधवा ने श्री तोलाराम की ओर घूमते हुए कहा, ‘‘आप ही
मदद कर दीजिए।’’
श्री तोलाराम ने जेब में रखी डिबिया से पान की एक और गिलौरी निकालकर मुँह
खोला।
‘‘बस में भीख माँगते हुए आपको शर्म आनी
चाहिए।’’ क्लर्क बोला।
‘‘कंडक्टर !’’ खादीधारी युवक
भड़क उठा था, ‘‘मुँह क्या देखते हो ? बाहर खदेड़ दो।
बस ‘डिले’ हो रही है।’’
विधवा गिड़गिड़ाती, पाँच पैसे की भीख माँगती बस से उतर गई।
अब श्री तोलाराम ने खिड़की से बाहर सिर के साथ गरदन भी निकालकर पान की
दूसरी पीक मारी, धूप में बस को घूरती खड़ी विधवा की ओर देखा और गला
खँखारकर बड़बड़ाए, ‘‘पता नहीं कब सुधरेगी यह कौम
!’’
और पिघलते कोलतार की सड़क पर टायरों के निशान छोड़ती बस कोलाबा से आर.सी.
चर्च की दिशा में आगे बढ़ गई।