‘गांधी जी बोले थे : छद्म धारणाओं का आलेख’ ग्रंथ में समीक्षक प्रहलाद रामशरण ने अभिमन्यु अनत द्वारा सृजित उपन्यास पर अपना समीक्षात्मक दृष्टिकोण पेश किया है। क्या अनत ने अपनी कृति में ऐतिहासिकता की रक्षा करते हुए युगानुकूल वातावरण का निर्माण किया? क्या उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक वातावरण को यथासम्भव ऐतिहासिक यथार्थ के रूप में प्रस्तुत किया है? क्या उनके ऐतिहासिक पात्रों के व्यक्तित्व एवं उनके कार्यों का उल्लेख उन्होंने ईमानदारी से किया है? क्या उनके उपन्यास में उल्लिखित ऐतिहासिक घटनाएँ विश्वसनीय बन पायी हैं? क्या एम. के. गांधी के इन्हीं प्रेरक शब्दों-शक्तियों से ही मॉरिशस के भारतवंशियों के मानस में जागरूकता आई है? क्या उनके आह्वानों के फलस्वरूप यहाँ के भारतवंशियों में राजनीतिक शक्तियाँ प्रदीप्त हुई हैं?
इन सारे प्रश्नों पर प्रह्लाद रामशरण ने गहराई से विचार किया है। उन्होंने उपन्यासकार की रचनाधर्मिता पर प्रकाश डालते हुए यह बताया है कि अनत ने ऐतिहासिक उपन्यासों के सिद्धान्त के अनुरूप अन्तर्वस्तु का निर्माण नहीं किया है, इसीलिए उसमें अनेक विसंगतियाँ आ गई हैं।















