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Vyakaran Pustak
कागजी संस्करण
कृपया दायें चलिए
यह लोकप्रिय
लेखक अमृतलाल नागर के चुने हुए हास्य-व्यंग्य के निबंधों का
संग्रह है। इसमें लेखक की नई रचनाओं के अतिरिक्त कुछ वे पुरानी रचनाएँ भी
हैं जो अपने समय में बहुत चर्चित हुई थीं और जो अब प्राप्य नहीं हैं। सभी
रचनाएं लेखक की अपनी विशिष्ट शैली में लिखी हैं और मनोरंजक होने के साथ ही
उद्बोधक भी हैं। हास्य-व्यंग्य
की रचनाएं लिखने में अमृतलाल नागर सिद्धहस्त हैं। ये पाठक
को स्वस्थ्य मनोरंजन प्रदान करती हैं और समाज की सड़ी-गली कुरीतियों पर
चोट करके उसे भी बदलने का अवसर देती हैं।
एक घोषणा-पत्र
इस बार भी
अगस्त के महीने में जब हमारी किताबों की रायल्टी की राशि चढ़ती
महंगाई के मुकाबिले में एकदम औसत ही आई, तो हम अपने पेशे की आय रूपी
अकिंचनता से एकदम चिढ़ उठे, हमने यह तय किया कि अब लिखना छोड़कर कोई और
धंधा करेंगे। मगर क्या करें, यह समझ में न आता था। कई बिगड़े रईसों के
बारे में सुना था कि जिन आदतों से वे बिगड़े थे, उन्हीं में नये
लक्ष्मीवाहनों के पट्टों को फंसाकर रईस बन गए थे। हमारी लत तो बुरी ही नहीं निकम्मी भी
थी, यानी साहित्यकार बन गए थे। और यह साहित्यिकता आमतौर से रईस छौनों के
मनबहलाव की वस्तु ही नहीं होती, इसलिए हमारे वास्ते यह साहित्यिक इल्लत उस
रूप में भी बेकार थी। दूसरा विचार आया कि पान और भंग-ठण्डाई की दुकान खोल
लें। जगत्-प्रसिद्ध साहित्यिक नहीं बन सके, तो न सही,
‘जगत्-प्रसिद्ध तांबूल विक्रेता’ का साइनबोर्ड टांगने
का शानदार मौका मिल जाना भी अपने-आप में कम-महत्त्वपूर्ण उपलब्धि न होगी। ठंडाई के तो
हमें ऐसे-ऐसे नुस्खे मालूम हैं कि शहर के सारे ठंडाईवाले
हमारे आगे ठंडे हो जाएंगे। सीधे गर्वनर से ही दुकान का उद्धाटन कराया
जाएगा; उन्होंने अपने शासनकाल में अब तक हर तरह के उद्घाटन कृपापूर्वक कर
डाले हैं, बस पान-ठंडाई की दुकान ही अब तक नहीं खोली, खुशी से चले आएंगे।
धूम मच जाएगी। बस यही होगा कि चार हमारा मज़ाक उड़ाएंगे कि नागरजी ने
पान-ठंडाई की दुकान खोली है। अरे उड़ाया करें, ‘आहारे-व्यवहारे,
लज्जा नकारे।’ जब इतने बड़े महाकवि जयशंकर प्रसाद अपने
पैतृक-पेशेवश सुंघनीसाहु कहलाने से न सकुचाए, तो पान-ठंडाई-सम्राट कहलाने
से भला हम ही क्यों शर्माएं !
भांग के गहरे
नशे में इस स्कीम पर हम जितना ही अधिक गौर करते गए, उतनी ही
हमारी आस्था भी बढ़ती गई। हमें यही लगा कि जैसी आस्था हमें इस
व्यापार-योजना में मिल रही हैं, वैसी किसी साहित्यिक योजना से अब तक मिली
न थी। अस्तित्ववाद, शाश्वतवाद, रस-सिद्धान्त, पूंजीवाद, लोकतंत्रवाद,
भारतीय संस्कृतिवाद, आदि हर दृष्टि से हमारी यह दुकान-योजना परम ठोस थी।
इसलिए मन पोढ़ा करने हमने अपने दोनों लड़कों को बुलाकर अपने मन की बात
कही। छोटा बोला, ‘‘बाबूजी, मैं तो सपने में भी यह
कल्पना नहीं कर सकता कि आप दुकानदार बन सकते हैं !’’ हमने
आस्थायुक्त स्वर में उत्तर दिया, ‘‘बेटे, यथार्थ
सदा कल्पना से अधिक विचित्र रहा है। जहां इच्छा है, वहां गति भी है।
जवाहरलाल नेहरू का एक वाक्य है कि सफलता प्राय: उन्हीं को मिलती है, जो
साहस के साथ कुछ कर गुजरते हैं; कायरों के पास वह क्वचित् ही जाती
है।’’ बड़े बेटे ने कहा, ‘‘आप जैसे जाने-माने लेखक के लिए
यह शोभन नहीं लगता, बाबूजी। यदि अपनी नहीं, तो कम से कम हम लोगों की
बदनामी का ही खयाल कीजिए।’’ हमने
तुर्की-बतुर्की जवाब दिया, ‘‘तुम लोगों का यह
आबरूदारी का हौवा निहायत पेटी बुर्जूआ किस्म का है। हम घर आती हुई छमाछम
लक्ष्मी को देख रहे हैं। तुम लोग क्यों नहीं देखते कि दुकान की सफलता के
लिए हमारी साहित्यिक गुड़विल, पान और भांग-रसिया होने के संबंध में हमारी
अनोखी किंवदंतियों-भरी ख्याति कितनी लाभकारी सिद्ध होगी। चार-पांच हजार
रूपये महीने से कम आमदानी न होगी। तुम लोग चाहे कुछ भी कहो, हम दुकान जरूर
खोलेंगे। हज़ार-दो हजार की लागत में लाखों का नफ़ा। हम यह अवश्य
करेंगे।’’ लड़के बेचारे
हमारे आगे भला क्या बोलते। उठकर चले गए और जाकर अपनी मां के
आगे शंख फूंका।
तोप के गोले की तरह लाल-लाल दनदनाती हुई वह हमारे कमरे में
आई और बोलीं, ‘‘ये दुकान खोलने की बात आखिर तुम्हें
क्यों सूझी ?’’
‘‘पैसा कमाने के लिए।’’
‘‘पैसा तो खाने-भर को भगवान दे ही रहा
है।’’ ‘‘हमें ऐश करने के लिए पैसा चाहिए।’’
‘‘इस उमर में ! अब भला क्या ऐश करोगे ! जो करना था, कर चुके।’’
‘‘ऐश
का अर्थ सिर्फ औरत और शराब ही नहीं होता, देवी
जी। हम कार, बंगला, रेफ्रिजिरेटर, कूलर और डनलोपिलो के गद्दे चाहते हैं।
प्राइवेट सेक्रेटरी हो, स्टेनोग्राफर हो, हांजी-हांजी करने वाले दस नौकर
हाथ बांधे हरदम खड़े रहें, तब साहित्यिक की वकत होती है आजकल। साले
पेटभरू, चप्पल चटकाऊ साहित्यिक का भला मूल्य ही क्या रह गया है, भले ही वह
तीस नहीं, एक सौ तीस मारखां ही क्यों न हो ! हम पूछते हैं, क्या तुम्हें
चाह नहीं होती इस वैभव की ?
’’पत्नी शांत हो गई, गंभीर स्वर में बोलीं, ‘‘जब मुझे चाह थी, तब तो यह कहते थे कि साहित्य का वैभव साहित्यिक होता है.....’’
‘‘वो हमारी भूल थी। सोशलिस्ट विचारों ने हमारा दिमाग
खराब कर दिया था।’’
‘‘पर मैं तो समझती हूं कि तुम्हारी वह दिमाग-खराबी ही
बहुत अच्छी थी।’’
‘‘तुम कुछ भी समझती रहो, पर हम तो अब पैसे वाले बनकर
ही रहेंगे।’’
‘‘बनो, जो चाहो सो बनो, पर कान खोलकर सुन लो, मैं इस
काम के लिए एक कानी कौड़ी भी न दूंगी इस रायल्टी की रकम में
से।’’ पत्नी अब तेज हो चली थीं।
हमने भी अकड़कर कहा, ‘‘न दो, हम एक नया उपन्यास लिखकर
एडवांस रायल्टी ले लेंगे।’’
‘‘जो
चाहो सो करो। जब अपनी बनी तकदीर बिगाड़ने पर तुल
ही गए हो, तो कोई क्या कर सकता है ! हि:, रूपये की दो अठन्नियां भुनाना तो
आता नहीं, बिज़नेस करेंगे ये !’’ पत्नी तैश में आकर
बड़बड़ाती हुई बाहर चली गई और बरामदे में खड़ी होकर गरजने लगीं,
‘‘ये बिज़नेस करेंगे ! अरे, चार बरस पहले नरेन्द्र जी
का लड़का परितोष आया था। कितना छोटा था तब वह, फिर भी खेल ही खेल में
इन्होंने जब उससे कहा कि हम-तुम साझे में पान की दुकान खोल लें, तो वह
बोला कि नहीं चाचाजी, आपके साथ साझा करने में घाटा हो जाएगा। सारे पान और
भांग तो ये और इनके यार-दोस्त ही गटक जाएंगे। न ये अपनी आदतें छोड़ सकते
हैं और न मुहब्बत। बिज़नेस करेंगे मेरा कपाल !’’ कविवर
नरेन्द्र जी के बेटे वाली बात ध्यान में आ जाने से गुस्से का चढ़ाव
न चाहते हुए भी थमने लगा। यह झूठ नहीं कि ठंडाई और पान के शौक में ऐसे
बहुत-से परिचित मित्र हमारी दुकान पर रोज़ आ जाएंगे, जिनसे पैसा वसूल करना
हमारे लिए टेढ़ी खीर हो जाएगा। सोचा कि घरैतिन ठीक ही कहती है, इस धंधे
में घाटा होने की संभावना ही अधिक है। फिर धीरे-धीरे मन यहां तक मान गया
कि हम न तो धंधा करने के योग्य हैं और न कोई नौकरी ही, चाहे वह बढ़िया
वाली ही क्यों न हो। अपनी अयोग्यता और अभागेपन पर झुंझलाहट होने लगी।
दूसरे दिन इतवार था। इतवार औरों के लिए छुट्टी और हमारे लिए सिर दर्द का
दिन होता है। अभी घड़ी में पूरे-पूरे सात भी न बजे थे कि बेटी ने आकर
मोहल्ले के कई व्यक्तियों के पधारने की सूचना दी। हमने सोचा कि शायद
मध्यवधि चुनाव के सिलसिले में किसी उम्मीदवार के नाम का प्रस्ताव लेकर आए
होंगे। इस विचार ने मन को स्फूर्ति दी। सोचा, इस बार हम क्यों न खड़े हो
जाएं। पान की दुकान न सही, नेतागिरी सही, इन दोनों ही पेशों की आमदानी सदा
इनकमटैक्स विभाग वालों की पकड़ से बाहर ही रहती है। इस विचार से एक बार
फिर आस्था रूपी जीवनमूल्य की उपलब्धि हुई। तब तक हाथ में
अपना हुक्का उठाए हुए बड़े बाबू, लल्लों बाबू, पत्तो बाबू,
सत्तो बाबू, सुनत्तो बाबू वगैरह-वगैरह ढब-बेढब नामों के चार-पांच शिष्ट
जन पधारे। बड़े बाबू आते ही बोले, ‘‘पंडित जी, गली
वाली नाली देखी आज आपने ? गंगा-गोमतियां फ्लडियाया करती थीं, अब साली नाली
में फ्लड आता है। ये ज़माना है, ये गवरमेंट है साली!’’‘‘आज
पूरी गोबरमिंट है साहब, राज की गोबरनर का है। हम
तो कहते हैं कि इस बार मध्यावधि चुनाव में इसे पूरी तरह बदल
डालिए’’ अपनी भावी वोटर भगवान को जोश दिलाने की कामना
से हमने ज़रा नेता मार्का नाटकीय अंदाज साधा।
‘‘कहते
तो आप ठीक ही हैं पंडित जी, मगर मध्यवधि चुनाव
के अभी चार-पांच महीने पड़े हैं, आप तत्काल की बात सोचिए। कार्पोरेशन में
किसी बड़े अफसर को फोन-वोन करके ये गंदगी ठीक करवाइए जल्दी से, अंदर से
मैनहोल उभर रहा है। बड़ी बदबू फैल रही हैं बाहर।’’खैर, किस्सा
कोताह यह कि मेयर, डिप्टी मेयर, हेल्थ अफसर आदि और उस सफलता
के तुफैल में हमने भावी चुनाव में खड़े होने का इशारा भी फेंक दिया। चार
दिन में धूम मच गई कि हम खड़े हो रहे हैं। पत्नी फिर
सामने आई, ‘‘इलेक्शन लड़ोगे?’’‘‘हां,
अब मिनिस्टर बनने का इरादा है।’’‘‘पैसा कौन देगा ?’’ हमने कहा,
‘‘बुद्धिजीवी जब अपना ईमान बेचता है, तो
पैसों की कमी नहीं रहती।’’ तभी लड़के आए,
उन्होंने पूछा, ‘‘आप किस पार्टी से इलेक्शन लड़ेंगे ?’’ हम बोले,
‘‘इस समय तो हमारी गुडविल ऐसी जबरदस्त है कि
सभी पार्टियां हमें टिकट देना चाहती हैं।’’ बड़ा बोला,
‘‘मगर इस समय तो इन सब पार्टियों की साख
गिरी हुई है। इनमें से एक भी पूरी तरह सफलता नहीं
पाएगी।’’ ‘‘हमने
कहा, ‘‘सही कहते हो। हम
बुद्धिमत्ता से काम लेकर अपनी पार्टी बनाएंगे।’’ ‘‘आपका
मेनिफेस्टो क्या होगा ?’’
हम गौर करने लगे। अपना स्वार्थ साधने के लिए ऐसा मेनिफेस्टो बनाना चाहिए,
जो औरों से अलग लगे और साथ ही पैसा मिलने के साधन भी जुट जाएं।
हमने कहा,
‘‘देखो, इनमें से कोई भी पार्टी इस बार
बहुमत नहीं पाएगी। क्योंकि जनता सबमें अपना विश्वास खो बैठी है। और यहां
के सेठ हमें पैसा ही नहीं देंगे, क्योंकि इनमें से कुछ कांग्रेस के साथ
हैं और कुछ जनसंघ के। इसलिए हमारा पहला नारा यह होगा कि भारत के जिन-जिन
प्रदेशों में इस समय मध्यावधि चुनाव हो रहा है, उनमें स्थायी शांति और
सुशासन लाने के लिए दस बरसों तक पाकिस्तान, अमरीका और ब्रिटेन का सम्मिलित
राज होना चाहिए। इससे हिन्दू-मुस्लिम एकता और स्थायी शांति बढ़ेगी तथा इन
तीनों की तरफ से मुख्यमंत्रित्व का भार हम संभालेंगे। इस त्रिदेशीय
फार्मूले से हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के सारे मसले हल हो जाएंगे। इस तरह
देश की पूर्वी और पश्चिम सीमाओं पर नि:शस्त्रीकरण की नीति को अमल में लाने
के लिए एक रास्ता खुल जाएगा।’’
‘‘ठीक। और क्या होगा आपके मेनिफेस्टो में?’’
विचारों की
रोशनी से हमारी आंखें सहसा चौंधिया उठीं। हमने फौरन अपना धूप
का चश्मा चढ़ा लिया और गंभीर पैगंबरी स्वर में कहा,
‘‘हम अपरिवर्तनवाद का सिद्धान्त चलाएंगे- हिन्दू
हिन्दू रहे और मुसलमान मुसलमान। इन्हें एक भारतीय समाज हरगिज़ न बनने देना
चाहिए, हम एक और अखंड भारत के खिलाफ हैं।’’
‘‘और भाषा ?’’
‘‘भाषा का भूमि और संस्कृति से कोई संबंध नहीं।
पाकिस्तान, अमरीका और ब्रिटेन में से जो हमारे इलेक्शन का खर्च उठाने को
राजी हो जाएगा, उसकी भाषा का समर्थन करेंगे। वैसे अपनी जनता की सुविधा के
लिए हम अंग्रेजी को भारत की राष्ट्रभाषा...........’’
‘‘क्या कहा ? अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा बनाओगे ! अपने
स्वार्थ के लिए हर झूठ को सच बनाओगे ?’’
पत्नी के तेहे
पर हमने अपनी बौद्धिक मार्का हंसी का गुल खिलाया और कहा,
‘‘अरी पगली, नेता और वकीलों की सफलता ही इस बात पर
निर्भर करती है।’’
‘‘झाड़ू पड़े तुम्हारी नेतागिरि पर। मैं आज से ही
तुम्हारा खुला विरोध करूँगी।’’
‘‘अरे, पूरी बात तो सुन लो ! देश में इस वक्त अन्न की
कमी है......’’ हम बोले, तो पत्नी ने बात बीच में काट
दी, तुम्हें कौन खाने पीने की तकलीफ है...जो......’’
हमसे आगे सुना
नहीं गया। हमने अपना तेहा दिखाया,
‘‘ज्यादा बकबक मत करो.........ज्यादा बात करने से भूख
भी ज्यादा लगती है......जब तक भारत में औरतों के मुंह पर पट्टी नहीं बांध
दी जाएगी, तब तक अन्न-समस्या हल होने वाली नहीं है।
अन्न मंगवाने
के लिए हमने तय किया है कि एक टन गेहूं के बदले में हम एक
नेता उस देश को सप्लाई करेंगे, जो हमें अन्न देगें।’’
पत्नी मुंह
बाये सुन रही थीं। मौका देखकर हमने और खुलासा किया,
‘‘हमारी पार्टी भ्रष्टाचार को शिष्टाचार के रूप में
मंजूर करती है, बगैर तकल्लुफ के कहीं राज चलते हैं ? घूसखोरी का तकल्लुफ
हमारे राज में बराबर जाएगा ! रोजी-रोटी मांगने वालों की खाल खिंचवाकर बाटा
वालों को सप्लाई की जाएगी, ताकि रूस से आने वाली जूतों की मांग पूरी की जा
सके।
‘‘गीता
का यह श्लोक हमारा सिद्धान्त वाक्य होगा और
नारा भी.....’’
‘‘स्वधर्मे निधनं श्रेय: परमधर्मो भयावह:’’
‘‘दकियानूसियों
ने इस श्लोक की रेढ़ मारके रख दी है।
हम इसका सीधा, सरल और सही अर्थ अपनी धर्मप्राण जनता को
समझाएंगे।’’
‘‘क्या?’’ पत्नी ने बिफर के पूछा।
‘‘अरे
भई, सीधी-सी बात है। हर आदमी का अपना-अपना धर्म
है। चोर का धर्म चोरी करना, डकैत का डाका डालना, बेईमान का बेईमानी करना,
इसी तरह गरीब का धर्म है गरीबी और अमीर का अमीरी। गरीब को अमीर का धर्म
अपनाने की छूट नहीं दी जाएंगी और न अमीर को गरीब का धर्म अपनाने की। हम इस
धर्म-परिवर्तन के सख्त खिलाफ हैं।
इस धर्मवादिता
से जनसंघ के समर्थक भी हमारी पार्टी में आ सकते हैं.....’’
पत्नी हमारे
विरुद्ध प्रचार करने लगी हैं। हमारा चुनाव का सपना डांवाडोल
हो रहा है और जनता के क्रोध से बचने के लिए हम इस समय बंबई भाग आए हैं।
क्रोध के बराबर यहीं बात मन में फूटती है कि सत्यानाश हो इस जनता का, जो
हमें नेता नहीं मानती।
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