Mantra Sadhna Se Siddhi-A Hindi Book by Kedarnath Mishra
प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश
मंत्र साधना से सिद्ध
1.मन्त्र साधना की सम्पूर्ण विधि
2. मन्त्र साधना के गोपनीय रहस्यों का सर्वप्रथम उद्घाटन।
3. मन्त्र साधना के महत्वपूर्ण अंगों का सम्पूर्ण विश्लेषण।
4. मन्त्र साधना हेतु माला, आसन, क्षेत्र शोधन विधान।
5. मन्त्र साधना से रोग निवारण
6. मन्त्र साधना से कामना सिद्धि।
7. मन्त्र साधना से भौतिक बाधाओं के उपचार।
8 मन्त्र साधना में सफलता क्यों नहीं मिलती ?
9. मन्त्र साधना में आने वाली बाधाएँ व उनके निवारण के उपाय।
10. मन्त्र साधना से सिद्धि प्राप्ति के सरल उपाय।
11. इसके अतिरिक्त ऋद्धि-सिद्धि प्रदायक गणपति साधना पर विशेष सामग्री,
कलयुग में शीघ्र सिद्धिप्रद मन्त्र, सिद्ध पीठ और साधना विधियाँ।
12. साधकों के जीवन में भौतिक-आध्यात्मिक पक्षों को आलोकित करती व
मन्त्र-साधना के गूढ़ रहस्यों का सरल भाषा में अनावरण करती यह श्रेष्ठ
कृति।
भूमिका
‘मंत्र साधना’ भौतिक बाधाओं का आध्यात्मिक उपचार है।
इस तथ्य
से आज का प्रबुद्ध जन-मानस भली-भाँति परिचित है और स्वकल्याणर्थ पीड़ित जन
नाना प्रकार के मन्त्रों का जप प्रायः किया करते हैं।
‘मन्त्र’ से तात्पर्य एक विशिष्ट प्रकार के संयोजित
वर्णों के
उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि से है। वह ध्वनि ही हमारे शरीर के विभिन्न
स्थानों में स्थिति अन्तश्चक्रों को ध्वनित अतएव जाग्रत एवं प्रखर
ऊर्जावान बनाकर आत्मशक्ति एवं जीवनी शक्ति का विकास करती है। परिणामस्वरूप
हमारी अन्तस् नस-नाड़ियाँ एवं मस्तिष्क की संवेदनशील तनावयुक्त ग्रन्थियाँ
स्फूर्ति का अनुभव करती हैं और तनावमुक्त हो जाती हैं। इस तरह से व्यक्ति
सहज ही तनाव-शैथिल्य का अनुभव कर अपनी क्रिया शक्ति का विकास कर सकता है।
प्रश्न यह उठता है कि जब ‘मन्त्र साधना’ पर प्रचुर
मात्रा में
आज का लिखित साहित्य उपलब्ध है, तब पुनर्लेखन की आवश्यकता क्यों ? सहज
उत्तर यह है कि आज के तथा सृजित साहित्य में आकर्षक मन्त्रों की तो भरमार
है किन्तु साधना विधियाँ प्रायः लुप्त हैं और ऐसी स्थिति में जिस व्यक्ति
ने कभी किसी मन्त्र की साधना नहीं की, वह साधना’ के प्रारम्भिक
क्रिया-कलापों की जानकारी कैसे प्राप्त करे ? पुस्तकों में मन्त्रों की
चमत्कारिक फल श्रुतियों को पढ़कर सुहाने स्वप्नों में खोजकर जब पाठकजन
किसी मन्त्र की अज्ञानापूर्वक साधना करना प्रारम्भ कर देते हैं, तो कतिपय
मन्त्र जो सौम्य होते हैं, वे तो साधक पर कुछ विशेष दुष्प्रभाव नहीं
डालते। कुछ का कोई शुभ-अशुभ प्रभाव नहीं होता किन्तु कुछ मन्त्र जो उग्र
प्रकृति के होते हैं, वे मन्त्र-जापक का अनिष्ठ ही कर डालते हैं और तब उस
साधक का ऐसी स्थिति में मन्त्र-साधना से विश्वास ही उठ जाय तो क्या
आश्चर्य ? कई बार तो ऐसा भी देखा गया है कि मन्त्र के अभिमानी देवताओं की
अकृपा से कुछ पागल हो गये। कुछ गम्भीर रोगों से ग्रस्त हो गये और कइयों को
मृत्यु का वरण करना पड़ा। इसलिए मैंने अपनी लेखनी से ऐसे प्रयोगों को
लिखने से बचने का पूर्ण प्रयास किया है जिनके माध्यम से साधक अपना अथवा
दूसरे का अनिष्ट कर सके।
इस पुस्तक के माध्यम से प्रायः यही जानकारी देने का प्रयास किया गया है कि
किस प्रकार नव्य साधकगण सीधी, सरल और निरापद साधना-विधियों द्वारा
साधन-विधान सम्पन्न कर अपना अभीष्ट प्राप्त करें। शास्त्रों का कथन है कि
कभी लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, कष्ट, कठिनाइयों से पीड़ित होकर उपासना-साधना
मार्ग में प्रवृत्त नहीं होना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि यदि हम
सांसारिक द्वन्द्वों से मुक्त होकर साधना मार्ग में प्रवृत्त होंगे तो
सफलता असंदिग्ध होगी। कालान्तर में मन्त्र-जप का परिणामी-प्रभाव होकर
हमारी समस्या का समाधान करेगा ही।
मन्त्र-साधना में विशेष ध्यान देने वाली बात है- मन्त्र का सही उच्चारण।
जब तक मन्त्र का सही एवं शुद्ध उच्चारण नहीं किया जायेगा तब तक अभीष्ट
परिणाम की आशा करना व्यर्थ है। इसलिए यदि आप प्रथम बार किसी मन्त्र की
साधना प्रारम्भ कर रहे हों तो संस्कृत-भाषा के किसी जानकार व्यक्ति से
मन्त्र का सही उच्चारण एवं न्यास आदि की विधियाँ क्रियात्मक रूप से
सीख-समझ लेनी चाहिए। हवन में जिन मन्त्र के साथ जिस प्रकार की
हवन-सामग्री बतायी गयी है, उसी का प्रयोग करना चाहिए। अपनी तरफ
से
कुछ घटाना या बढ़ाना नहीं चाहिए।
श्रद्धा और विश्वास, साधना के मेरुदण्ड हैं जिनके ऊपर ही यह शास्त्र फलित
होता है। श्रद्धा और विश्वास को निरन्तर बनाये हुए रखकर समान संख्या का
जप करना चाहिए। अपनी ओर से मन्त्र की संख्या में सुविधानुसार
घट-बढ़
नहीं करनी चाहिए और न ही बार-बार मन्त्र और इष्ट देवता का परिवर्तन,
अन्यथा कुछ भी हाथ नहीं लगता है। इस सम्बन्ध एक दो प्रत्यक्ष उदाहरण देना
उचित होगा। लगभग पाँच वर्ष पूरे मैंने अपने दो घनिष्ट मित्रों को
संकटग्रस्त देखकर सहज स्वभाववश भगवान गणपति की उपासना की प्रेरणा दी
किन्तु उनकी प्रकृति के अनुसार एक माला प्रतिदिन का जप बताया। पहले सज्जन
तो जो नियम बताया गया था उसी प्रकार से आज तक करते चले आ रहे हैं और भगवान
गणपति की कृपा का अनुभव करते हुए बड़े-बड़े संकटों से उबर कर
प्रसन्नतापूर्वक जीवन-यापन कर रहे हैं।
दूसरे सज्जन का हाल सुनिये। साधना-प्रारम्भ हो जाने के एक माह बाद उन्हें
गणपति की कृपा का अनुभव होना प्रारम्भ हो गया। उसके गृह में झुण्ड के
झुण्ड गणपति वाहन आ-आकर उछल-कूद मचाने लगे। एक माला के मन्त्र के जप से
उनको तृप्ति नहीं मिलती थी। मन में विचार अंकुरित होने लगे कि मन्त्र की
जप संख्या में वृद्धि करनी चाहिए। मुझसे परामर्श किया तो मैंने स्पष्ट रूप
से मना कर दिया कि यह उचित मात्रा है और इतना ही जप करो। उनको मन में ऐसा
लगा कि शायद इनको मेरा साधना में उत्कर्ष प्राप्त करना अच्छा नहीं लग रहा
है। अतः उन्होंने बिना मुझसे बताए जप-संख्या में इच्छानुसार वृद्धि करनी
शुरू कर दी और बढ़ाते-बढ़ाते इक्कीस माला प्रतिदिन तक पहुँचा दी। एक दिन
संयोगवश मैं उनके घर गया तो देखा कि जब वे मुझे चाय देने के लिए आये और
मुझे चाय देकर स्वयं जमीन पर उकड़ूँ बैठ कर चाय पीने लगे तो दस-प्रद्रह
गणपति-वाहन आकर उनके पैरों के आस-पास निश्चित भाव से बैठ गये और प्रसन्नता
से आँखें मटकाने लगे। मुझे लगा कि मित्र-महोदय कुछ गड़बड़ जरूर कर रहे
हैं। निदान मैंने पूछ ही लिया, ‘आजकल गणपति की बड़ी कृपा आपके
ऊपर
परिलक्षित हो रही है। कितनी मालाएँ नित्य फेरते हैं, मन्त्र की
?’’
‘‘इक्कीस मालाएं प्रतिदिन कर रहा हूँ, क्योंकि इससे
कम में मन
को तृप्ति नहीं मिलती है। मित्र के उत्तर से मैं अवाक रह गया। कारण तो मैं
ही जानता था। नित्य अधिक मन्त्र के जप से जब मन्त्र का देवता क्षुधित होता
है तो उसे उचित मात्रा में आहार भी तो चाहिए। ‘ध्यान, पूजा, जप
होमः’ के अनुसार यज्ञ से ही देवता पुष्ट होते हैं और मन्त्र के
बल-वीर्य की वृद्धि होती है। और मित्र महोदय के वश में इस क्रिया का होना
सम्भव नहीं है। इसके उपरान्त कुछ दिनों बाद उनके जीवन में कठिनाइयों का
प्रवेश प्रारम्भ हो गया। गणपति विघ्न-नाशक हैं तो विघ्न कारक
भी।
स्वास्थ्य-धन सामाजिक-प्रतिष्ठा सभी कुप्रभावों से ग्रस्त हो गये। मुझसे व
पूजा-पाठ से मित्र का विश्वास समाप्त प्राय हो गया। आज भी वे मुझसे
यदा-कदा किसी श्रेष्ठ मन्त्र की साधना के विषय में पूछा करते हैं। उनकी
बातों को ध्यान पूर्वक सुनते हुए मौन, रहने के सिवा कर ही क्या सकता हूँ ?
शास्त्रों में जो जप की मात्रा निर्धारित की गयी है, वह ऋषियों के हजारों
लाखों वर्ष के शोध का परिणाम है।
मन्त्र-साधना से सम्बन्धित सम्पूर्ण सामग्री, यथा-माला, आसन, सिद्धपीठ
मन्त्र का चुनाव, मन्त्र संस्कार, सभी प्रकार की साधनाओं के प्रारम्भिक
न्यास, आसन पर बैठने का नियम, आत्मरक्षा-प्रकार पूजा में प्रयुक्त उपचारों
के फल के साथ अन्य सभी आवश्यक व उपयोगी विषयों का सोदाहरण विवेचन-विश्लेषण
के साथ-साथ गणपति साधना पर विशिष्ट-सामग्री इस पुस्तक की विशेषता है।
विशेष बात यह है कि यदि आप मन्त्र-साधना प्रारम्भ करते हैं तो मन्त्र का
जप पूर्ण होने पर हवन अवश्य करें। हवन लौह-पात्र में न करें अन्यथा अनिष्ट
फल की प्राप्ति होती है। पीपल के बड़े पात्र में या फर्श पर ईटें बिछाकर
उस पर बालू डालकर, जमीन से चार-छः अंगुल ऊँची वेदी बनाकर यज्ञ सम्पन्न
करें । पीपल, पलाश, गूलर, खैर, शमी, चन्दन आदि की समिधा का हवन में प्रयोग
करें। आम वृक्ष की समिधा जो आजकल प्रायः हवन में प्रयुक्त ही जा रही है,
उसका कोई शास्त्रीय आधार नहीं है, यह पूर्णतः वेद-विरुद्ध व आर्ष
सिद्धान्तों के विपरीत है। इस पर मैंने अपने ग्रन्थ
‘यज्ञ-विज्ञान
में विस्तृत रूप से शोध-निष्कर्ष प्रस्तुत किया है।
‘तन्त्र साधना से सिद्ध’ मेरी आगामी प्रकाशित होने
वाली कृति
है। इसमें तन्त्र के सम्बन्ध में समाज में व्याप्त मूढ़ मान्यताओं का
खण्डन करते हुए तन्त्र के वैज्ञानिक स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है और मानव
को उच्चतम स्तर प्रदान करने वाले तन्त्र के विलक्षण रहस्यों का उद्घाटन
किया गया है। ‘तान्त्रिक यज्ञ पद्धति और तन्त्र के कुछ विलक्षण
साधकों के परिचय के साथ-साथ 108 स्वानुभूत तन्त्र प्रयोग इनकी अन्य
विशेषताएं हैं।
अन्त में प्रार्थना यह कि साधना-जगत में पूर्ण श्रद्धा और आस्था के साथ
प्रवेश करें। इसमें बिताया गया प्रत्येक क्षण सफलता है। विश्वास
रखें हर किया गया काम देर-सबेर फलता है और क्यों नहीं फलेगा ?
विघ्न-बाधाएँ हमारी सफलता के सहायक हैं, अवरोध नहीं पूर्ण निष्ठा, आस्था
और श्रेष्ठ क्रिया विधि के साथ किया गया कर्म निष्फल नहीं जाता।
प० केदारनाथ मिश्र
ज्योतिषाचार्य
धर्मो रक्षति रक्षितः
मानव प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ रचना है क्योंकि वही एक ऐसा प्राणी है, जो
बुद्धि-विवेक से युक्त है एवं ज्ञान प्राप्त करने योग्य है।
‘श्रीमद्भागवत’ में उल्लेख है कि जगत्पिता ब्रह्मा
सृष्टि-रचना काल में जब अत्यधिक प्रसन्न हुए, तब समग्र सृष्टि के निर्माण
के अन्त में अपने श्रेष्ठतम युवराज के रूप में अपने मन की सत्ता से अर्थात
मनः शक्ति से विश्व की अभिवृद्धि करने वाले मनुओं की रचना कर
उन्हें
अपना वह पुरुषाकार शरीर दे दिया (स्वीयं पुरं पुरुषं)। इससे पूर्व अन्य
उत्पन्न देव, गंधर्वादि ने हर्षपूर्वक ब्रह्माजी को प्रणाम करते हुए कहा,
‘‘देव आपकी यह रचना सर्वश्रेष्ठ है। इससे श्रेष्ठ
रचना और
नहीं हो सकती। इस नर देह में प्राणियों के अभ्युदय तथा निःश्रेयस के समस्त
साधन विद्यमान हैं। अतः इसके द्वारा हम सभी देवता भी अपनी छवि ग्रहण कर
संतुष्ट हुआ करेंगे।’’ भाव यह है कि यह मानवी काया
सुरदुर्लभ
है। देवता भी इसे श्रेष्ठ मानते हुए उसके माध्यम से सिद्धियाँ हस्तगत करने
की कामना किया करते हैं।